भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2100

[ 3/118–128 तीसरा अध्याय 83 लेना। मैं तुम्हें अवश्य ही अङ्गीकार करूँगा। तब तक तुम यहीं बैठकर नाम-सङ्कीर्तनका श्रवण करो। मेरी नाम-संख्या पूर्ण होनेपर तुम्हारे मनकी अभिलाषा भी पूर्ण हो जायेगी॥”118–120॥ तुलसीरे तबै वेश्या नमस्कार करि' । द्वारे बसि' नाम सुने, बले—'हरि' 'हरि' ॥ 121 ॥ अनुवाद—तब वेश्या तुलसीजीको प्रणाम करके द्वारपर बैठकर नाम-सङ्कीर्तन सुनने लगी और वह भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी॥ 121 ॥ रात्रि शेष हैल, वेश्या उसिमिसि करे। ता'र रीति देखि' हरिदास कहेन ताहारे॥ 122 ॥ ठाकुर श्रीहरिदासके द्वारा अपनी महामन्त्रकी दीक्षाका वर्णन और दीक्षाके द्वारा ब्राह्मणता :— “कोटि नामग्रहणयज्ञ करि एकमासे। एइ दीक्षा करियाछि, हैल आसि' शेषे॥ 123 ॥ आजि समाप्त हबेक, हेन ज्ञान छिल। समस्त रात्रि निलुँ नाम, समाप्त ना हैल ॥ 124 ॥ कालि समाप्त हबे, तबै हबे व्रतभङ्ग। स्वच्छन्दे तोमार सङ्गे हइबेक सङ्ग ॥”125 ॥ अनुवाद—रात्रि समाप्त हो गयी। वेश्या चञ्चल होकर कभी तो उठ रही थी और कभी बैठ रही थी। उसे ऐसा करते देखकर श्रीहरिदास ठाकुरने उससे कहा,—“मैं एक मासमें एक करोड़ नाम ग्रहण करनेका यज्ञ करता हूँ। मैंने ऐसा ही नियम बनाया हुआ है और अब वह प्रायः समाप्त होने ही वाला है। मैंने सोचा था कि मेरी नाम-संख्या आज पूर्ण हो जायेगी। मैंने सारी रात नाम-कीर्तन किया, परन्तु तो भी नाम-संख्या पूर्ण नहीं हुई। अब तो कल ही नाम-संख्या पूर्ण होगी और तभी मेरा व्रत खुलेगा। तब स्वच्छन्दरूपसे मेरा तुम्हारे साथ सङ्गम होगा॥”122–125 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उसिमिसि करे',—उसिमिसि अर्थात् उठना-बैठना करते बहुत चञ्चल अथवा उतावली हो गयी॥122॥ अनुभाष्य—प्रतिदिन तीन लाख तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीससे कुछ अधिक संख्याकी गणना करते हुए हरिनाम ग्रहण करनेपर एक मासमें एक करोड़ नाम होते हैं। इस नामग्रहण-यज्ञमें नामी-स्वरूप भगवान्‌की उपासना होती है। साधारण लौकिक विश्वासके अनुसार श्रीहरिदास ठाकुर शौक्र [जन्म-अधिकारके द्वारा] अथवा सावित्र्य [दीक्षा-अधिकारके द्वारा] यज्ञ करनेवालेके रूपमें परिचित नहीं होनेपर भी नामयज्ञमें दीक्षित होनेके कारण, वैदिक एकायनशाखामें [आदिलीला भूमिकामें पृष्ठ संख्या xiv देखें] दीक्षित ब्राह्मणके रूपमें नाम-यज्ञका साधन करते थे। त्रिज श्रीहरिदास ठाकुरने अप्राकृत याज्ञिक-ब्राह्मण होकर जो नामयज्ञ आरम्भ किया था, वही नाम-सम्बन्धीय यज्ञ लगभग समाप्त हो गया था, अथवा [निर्धारित समयमें] समाप्त नहीं होनेपर भी तो उनका यज्ञ भङ्ग होगा, ऐसा उन्होंने कहा॥ 123 ॥ वेश्या गिया समाचार खाँनेरे कहिल। आर दिन सन्ध्याकाले ठाकुर-ठाञि आइल ॥ 126 ॥ अनुवाद—वेश्या रामचन्द्र खाँनके पास गयी और उसको रात्रिका वृत्तान्त बतलाया। अगले दिन वह सन्ध्याके समय ही श्रीहरिदास ठाकुरके पास आयी ॥ 126 ॥ तुलसीरे, ठाकुरेरे नमस्कार करि'। द्वारे बसि' नाम सुने, बले—'हरि' 'हरि' ॥ 127 ॥ अनुवाद—वेश्या तुलसी तथा श्रीहरिदास ठाकुरको प्रणाम करके द्वारपर बैठ गयी। वहाँ बैठे हुए वह श्रीहरिदासके नाम-कीर्तनका श्रवण करने लगी और स्वयं भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी ॥ 127 ॥ “नाम पूर्ण हबे आजि",—बले हरिदास। “तबे पूर्ण करिमु तोमार अभिलाष ॥”128 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने वेश्यासे कहा,—“आज