श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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82 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/108-120 ] रात्रिकाले सेइ वेश्या सुवेश धरिया। हरिदासेर वासाय गेल उल्लसित हञा॥ 108 ॥ अनुवाद—रात्रिकालमें बहुत आकर्षक वेश धारण करके वह वेश्या बहुत प्रसन्न होकर श्रीहरिदास ठाकुरकी भजन कुटियामें गयी॥ 108 ॥ तुलसी नमस्करि' हरिदासेर द्वारे याञा। गोसाञिरे नमस्करि' रहिला दाण्डाञा॥ 109 ॥ अनुवाद—उस वेश्याने कुटियाके बाहर तुलसीजीको प्रणाम किया और श्रीहरिदास ठाकुरकी कुटियाके द्वारपर जाकर उनको नमस्कार किया तथा वह वहीं खड़ी हो गयी॥ 109 ॥ अङ्ग उघाड़िया देखाय बसिया दुयारे। कहिते लागिला किछु सुमधुर स्वरे॥ 110 ॥ “ठाकुर, तुमि—परमसुन्दर, प्रथम यौवन। तोमा देखि' कोन् नारी धरिते पारे मन??111॥ तोमार सङ्गम लागि' लुब्ध मोर मन। तोमा ना पाइले प्राण ना याय धारण॥” 112 ॥ अनुवाद—फिर वह वेश्या अपने अङ्गोंको कुछ अनावृत करके श्रीहरिदास ठाकुरको दिखलाते हुए द्वारपर बैठ गयी और सुमधुर स्वरमें कहने लगी,—“हे ठाकुर! आप परम सुन्दर हैं और आपने अभी-अभी युवावस्थामें प्रवेश किया है। आपको देखकर कौन-सी नारी अपने मनको वशमें रख सकती है? आपके साथ सङ्गम करनेके लिये मेरा मन लालायित हो रहा है। आपको प्राप्त नहीं कर पानेकी स्थितिमें मैं प्राण धारण नहीं कर पाऊँगी॥” 110-112 ॥ हरिदास कहे,—“तोमा करिमु अङ्गीकार। संख्या-नाम-कीर्त्तन यावत् ना समाप्त आमार॥ 113 ॥ तावत् तुमि बसि' शुन नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम-समाप्त हैले करिमु ये तोमार मन॥” 114 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं अवश्य ही तुम्हें अङ्गीकार करूँगा, किन्तु जब तक मेरे नाम-कीर्त्तनकी संख्या पूर्ण नहीं हो जाय, तब तक तुम यहीं बैठकर भगवद्-नाम-सङ्कीर्त्तनका श्रवण करो। जब मेरी नाम-संख्या समाप्त हो जायेगी, तब मैं तुम्हारे मनकी इच्छा पूर्ण करूँगा॥” 113-114 ॥ एत शुनि' सेइ वेश्या बसिया रहिला। कीर्त्तन करे हरिदास प्रातःकाल हैला॥ 115 ॥ अनुवाद—यह सुनकर वह वेश्या वहीं बैठी रही और श्रीहरिदास ठाकुर अपना नाम-सङ्कीर्त्तन करते रहे। नाम-सङ्कीर्त्तन करते-करते प्रातःकाल हो गया॥ 115 ॥ प्रातःकाल देखि' वेश्या उठिया चलिला। समाचार रामचन्द्र खाँनेरे कहिला॥ 116 ॥ “आजि आमार सङ्ग करिबे कहिला वचने। अवश्य ताहार सङ्गे हइबे सङ्गमे॥” 117 ॥ अनुवाद—प्रातःकाल देखकर वह वेश्या वहाँसे उठकर चली गयी और उसने रामचन्द्र खाँनको जाकर सब समाचार दिया तथा कहने लगी,—“हरिदासने वचन दिया है कि वह आज मेरा सङ्ग करेगा, इसलिये अवश्य ही उसके साथ मेरा सङ्गम होगा॥” 116-117 ॥ आर दिन रात्रि हैले वेश्या आइल। हरिदास ता'रे बहु आश्वास करिल॥ 118 ॥ “कालि दुःख पाइला, अपराध ना लाइबा मोर। अवश्य करिमु आमि तोमाय अङ्गीकार॥ 119 ॥ तावत् इँहा बसि' शुन नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम पूर्ण हैले, पूर्ण हबे तोमार मन॥” 120 ॥ अनुवाद—अगले दिवस रात्रि होनेपर वह वेश्या श्रीहरिदासकी भजन कुटियामें आयी, तब श्रीहरिदासने उसे बहुत प्रकारसे आश्वासन दिया,—“कल तुम्हें मेरे कारण दुःख हुआ, इसके लिये मेरा कोई अपराध मत