श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें96 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/220-226 ] [अर्थात् “हजार ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक याज्ञिक अधिकांश अवैष्णव हैं, इनका संसार-मोचन किस पुरुष श्रेष्ठ है, हजारों याज्ञिक ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक प्रकार होगा? इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने श्रीकृष्णको अवतरित सर्ववेदान्त-शास्त्रज्ञ पुरुष श्रेष्ठ है, करोड़ों सर्ववेदान्त- करानेकी प्रतिज्ञा की और वे जल एवं तुलसी शास्त्रज्ञोंकी अपेक्षा एक वैष्णव श्रेष्ठ है और हजारों अर्पणकर श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे॥ 221-222 ॥ वैष्णवोंकी अपेक्षा एक एकान्तिक भक्त श्रेष्ठ है।”] श्रीहरिदासके द्वारा नाम कीर्तन :- भक्तिसन्दर्भकी 247 संख्यामें उद्धृत गरुड़पुराण वचन,- हरिदास करे गोफाय नाम-सङ्कीर्त्तन। “भक्तिरष्टविधा ह्येषा यस्मिन् म्लेच्छेऽपि वर्त्तते। कृष्ण अवतीर्ण हबेन, -एइ ताँर मन ॥ 223 ॥ स विप्रेन्द्रो मुनिश्रेष्ठः स ज्ञानी स च पण्डितः। तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा हरिः॥” अनुवाद-इसी प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें बैठकर नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे। उनके मनमें भी यही [अर्थात् “(भगवद्भक्तोंके प्रति वात्सल्य, पूजा-विषयमें भाव था कि नाम-सङ्कीर्त्तनके द्वारा श्रीकृष्ण अवश्य ही अनुमोदन, भगवत् कथाके श्रवणमें प्रीति, स्वर-नेत्रादिका अवतरित होंगे॥ 223 ॥ विकार, भगवत् प्रीतिके लिये नृत्य, दम्भ परित्याग, स्वयं अर्चन और विष्णुको जीविका नहीं बनाना)—यह आठ दोनोंके आह्वानसे जीवोंके उद्धारके लिये प्रकारकी भक्ति यदि किसी म्लेच्छमें भी विद्यमान हो, श्रीकृष्णचैतन्य अवतार और नामप्रेमके वितरणके द्वारा समस्त जगत्का उद्धार :- तो उस व्यक्तिकी ब्राह्मणश्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ, पण्डित, ज्ञानीमें दुइजनेर भक्त्ये चैतन्य कैला अवतार। गणना होती है, उसे दान करेंगे, उसका अवशेष ग्रहण नाम-प्रेम प्रचार कैला जगत् उद्धार ॥ 224 ॥ करेंगे एवं श्रीहरिकी भाँति उसकी पूजा करेंगे।”] अनुवाद-इन दोनोंकी भक्तिके प्रभावसे श्रीचैतन्य हःभःविः 10/91,- “न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। महाप्रभु अवतरित हुए। महाप्रभुने हरिनामके द्वारा प्रेमका तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम्॥” प्रचार करके जगत्का उद्धार किया॥ 224 ॥ [अर्थात् “चारों वेदोंको जाननेपर भी यदि कोई मेरा श्रीठाकुरके अप्राकृत चरित्रका वर्णन :- अभक्त हो तो वह मुझे प्रिय नहीं है, परन्तु चण्डाल आर अलौकिक एक चरित्र ताँहार। भी भक्त होनेपर मुझे प्रिय है, उसे दान करना चाहिये, याहार श्रवणे लोके हय चमत्कार ॥ 225 ॥ उसका उच्छिष्ट ग्रहण करना चाहिये और वह मेरी श्रौतपन्थामें अप्राकृत अनुभूति, भाँति ही पूज्य है।]॥ 220 ॥ तर्कपन्थामें वह असम्भव :- श्रीअद्वैताचार्यकी जीवोंके प्रति अतुलनीय कृपा :- तर्क ना करिह, तर्कागोचर ताँर रीति। जगत्-निस्तार लागि' करेन चिन्तन। विश्वास करिया शुन करिया प्रतीति ॥ 226 ॥ अवैष्णव-जगत् केमने हइबे मोचन ? ? 221 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके जीवनकी अन्य एक आचार्यके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना :- अलौकिक घटना है जिसे सुनकर लोग आश्चर्यचकित कृष्णे अवतारिते अद्वैत प्रतिज्ञा करिला। हो जाते हैं। इस विषयमें किसी प्रकारका तर्क मत जल-तुलसी दिया पूजा करिते लागिला ॥ 222 ॥ करना, क्योंकि उनकी रीति तर्कसे परे है। आप सभी अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य जगत्के उद्धारके लिये सदा श्रद्धापूर्वक विश्वासके साथ इन कथाओंको श्रवण चिन्तन करते थे। उन्होंने विचार किया कि जगत्में कीजिये॥ 225-226 ॥