श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 3/227–240 तीसरा अध्याय 97 ठाकुर श्रीहरिदास और मायादेवीके उद्धारके वृत्तान्तका वर्णन :— एकदिन हरिदास गोफाते बसिया। नाम-सङ्कीर्त्तन करेन उच्च करिया॥227॥ **अनुवाद—**एकदिन श्रीहरिदास ठाकुर गुफामें बैठकर उच्च स्वरसे नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे॥227॥ ज्योत्स्नावती रात्रि, दश दिक् सुनिर्मल। गङ्गार लहरी ज्योत्स्नाय करे झलमल॥228॥ **अनुवाद—**चाँदनी रात थी और चन्द्रमाकी किरणोंसे गङ्गाजीकी लहरें झलमल कर रही थीं। दसों दिशाएँ सुनिर्मल थीं॥228॥ द्वारे तुलसी-लेपा-पिण्डिर उपर। गोफार शोभा देखि' लोकेर जुड़ाय अन्तर॥229॥ **अनुवाद—**गुफाके द्वारपर एक लिपे हुए मञ्चके ऊपर तुलसीजी विराजमान थीं। गुफाकी शोभाको देखकर लोगोंका हृदय शीतल हो जाता था॥229॥ हेनकाले एक नारी अङ्गने आइल। ताँर अङ्गकान्त्ये स्थान पीतवर्ण हइल॥230॥ ताँर अङ्ग-गन्धे दश दिक् आमोदित। भूषण-ध्वनिते कर्ण हय चमकित॥231॥ आसिया तुलसीरे सेइ कैला नमस्कार। तुलसी परिक्रमा करि' गेला गोफा-द्वार॥232॥ **अनुवाद—**उसी समय एक नारी गुफाके बाहर आङ्गनमें आयी। उसकी अङ्गकान्तिसे सम्पूर्ण स्थान पीतवर्णका हो गया। उसके अङ्गोंकी गन्धसे दसों दिशाएँ सुगन्धसे भर गयीं, उसके आभूषणोंकी मधुर झङ्कार कानोंको आश्चर्यचकित कर रही थी। उसने आकर तुलसीको प्रणाम किया और वह तुलसीकी परिक्रमा करके गुफाके द्वारपर चली गयी॥230-232॥ योड़-हाते हरिदासेर वन्दिला चरण। द्वारे बसि' कहे किछु मधुर वचन॥233॥ जीवमोहिनी मायाके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरकी परीक्षा :— “जगतेर बन्धु तुमि रूपगुणवान्। तव सङ्ग लागि' मोर एथाके प्रयाण॥234॥ मोरे अङ्गीकार कर हञा सदय। दीने दया करे,—एइ साधु-स्वभाव हय॥” 235॥ **अनुवाद—**उसने हाथ जोड़कर श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। तब वह द्वारपर बैठकर ऐसे मधुर वचन कहने लगी,—“आप सम्पूर्ण जगत्के बन्धु हैं और अत्यन्त रूपवान् और गुणवान् हैं। आपके सङ्गके लिये ही मैं यहाँ आयी हूँ। आप कृपा करके मुझे अङ्गीकार कीजिये। दीन व्यक्तियोंपर कृपा करना ही साधुका स्वभाव होता है॥” 233-235॥ एत बलि' नाना-भाव करये प्रकाश। याहार दर्शने मुनिर हय धैर्यनाश॥236॥ **अनुवाद—**यह कहकर वह अनेक प्रकारके भाव प्रकाशित करने लगी, जिन्हें देखकर मुनियोंके धैर्यका भी नाश हो जाता है॥236॥ निर्विकार हरिदास गम्भीर-आशय। बलिते लागिला ताँरे हञा सदय॥237॥ ठाकुर श्रीहरिदासकी संख्या नामकीर्तन-यज्ञमें दीक्षा और निष्ठा :— “संख्या-नाम-सङ्कीर्त्तन—एइ ‘महायज्ञ’ मन्ये। ताहाते दीक्षित आमि हइ प्रतिदिने॥238॥ यावत् कीर्त्तन समाप्त नहे, ना करि अन्यकाम। कीर्त्तन समाप्त हैले, हय दीक्षार विश्राम॥239॥ द्वारे बसि' शुन तुमि नाम-सङ्कीर्त्तन। नाम समाप्त हैले करिमु तव प्रीति-आचरण॥” 240॥ **अनुवाद—**किन्तु गम्भीर हृदयवाले श्रीहरिदास ठाकुर