श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें98 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/237–249 ] निर्विकार होकर बैठे रहे। वे उसके प्रति दयासे युक्त होकर कहने लगे,–“संख्यापूर्वक नाम-सङ्कीर्तनको मैं 'महायज्ञ' मानता हूँ। मैं प्रतिदिन उसमें दीक्षित होता हूँ अर्थात् उसका नियमपूर्वक पालन करता हूँ। जब तक कीर्तन समाप्त नहीं होता, तब तक मैं अन्य कोई काम नहीं करता। कीर्तनके समाप्त होनेपर ही दीक्षाका विश्राम होता है। आप द्वारपर बैठकर नाम-सङ्कीर्तन श्रवण करो। नामके समाप्त होनेपर मैं आपको सन्तुष्ट करनेवाला आचरण करूँगा॥”237-240 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरका मन तो सदैव श्रीकृष्णनाममें ही आविष्ट रहता था। इसलिये उस नारीके भाव निर्जन वनमें क्रन्दनके समान व्यर्थ हो गये॥ 244 ॥ अनुभाष्य—श्रीहरिदासका मन हरिनाम ग्रहणके समय सर्वदा श्रीकृष्णनाममें आविष्ट रहनेके कारण मायादेवीकी पुरुषोंको आकर्षित करनेवाली इन्द्रजाल जैसी बद्धजीव-मोहिनी स्त्रीभाव-माला निर्जन वनमें क्रन्दन करनेकी भाँति विफल हो गयी॥ 244 ॥ एत बलि' करेन तेंहो नाम-सङ्कीर्त्तन। सेइ नारी बसि' करे श्रीनाम-श्रवण॥ 241 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीहरिदास ठाकुर नाम-सङ्कीर्तन करने लगे। वह नारी बैठकर श्रीनाम-श्रवण करने लगी॥ 241 ॥ कीर्त्तन करिते आसि' प्रातःकाल हैल। प्रातःकाल देखि' नारी उठिया चलिल॥ 242 ॥ अनुवाद—कीर्तन करते करते ही प्रातःकाल हो गया। प्रातःकाल देखकर वह नारी वहाँसे उठकर चली गयी॥ 242 ॥ तृतीय दिवसेर रात्रि-शेष यबे हैल। ठाकुरेर स्थाने नारी कहिते लागिल॥ 245 ॥ “तिन दिन वञ्चिला आमा करि' आश्वासन। रात्रि-दिने नहे तोमार नाम-समापन॥” 246 ॥ अनुवाद—तीसरे दिन जब रात्रि समाप्त हुई, तब वह नारी श्रीहरिदास ठाकुरसे कहने लगी,–“आपने आश्वासन देकर भी तीन दिन तक मेरी वञ्चना की है। रात-दिन आपका नाम करना ही समाप्त नहीं होता॥”245-246 ॥ श्रीठाकुरकी अपने नियमानुसार सेवा :— हरिदास ठाकुर कहेन,—“आमि कि करिमु? नियम करियाछि, ताहा केमने छाड़िमु?? 247 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“मैं क्या करूँ? मैंने जो व्रत लिया है, उसे कैसे त्याग दूँ?” 247 ॥ तीन दिन तक मायाके द्वारा कठोर परीक्षा :— एइमत तिनदिन करे आगमन। नाना भाव देखाय, याते ब्रह्मार हरे मन॥ 243 ॥ अनुवाद—इसी प्रकार वह नारी तीन दिन तक श्रीहरिदास ठाकुरके पास आती-जाती रही। वह ऐसे-ऐसे अनेक भाव दिखाती थी जिससे वह ब्रह्माका मन भी हर सकती थी॥ 243 ॥ मायाके द्वारा अपना परिचय देना :— तबे नारी कहे ताँरे करि' नमस्कार। “आमि—माया, करिते आइलाङ परीक्षा तोमार॥ 248 ॥ अपनी पराजय-स्वीकार :— ब्रह्मादि जीव, आमि सबारे मोहिलुँ। एकेला तोमारे आमि मोहिते नारिलुँ॥ 249 ॥ अद्वयज्ञान नामप्रभुके एकान्तिक सेवक द्वितीय-अभिनिवेशयुक्त भोक्ताभावसे रहित श्रीठाकुरके निकट मायाकी पराजय :— कृष्णे नामाविष्ट-मना सदा हरिदास। अरण्ये रोदित हैल स्त्रीभाव-प्रकाश॥ 244 ॥ अनुवाद—तब उस नारीने श्रीहरिदास ठाकुरको