श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2116, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/248–256 तीसरा अध्याय 99 प्रणाम करके उनसे कहा, — “मैं मायादेवी हूँ। मैं आपकी परीक्षा लेनेके लिये आयी थी। ब्रह्मादि तक समस्त जीवोंको मैंने मोहित किया है, मैं एकमात्र आपको ही मोहित नहीं कर पायी ॥ 248–249 ॥ अनुभाष्य—आब्रह्मस्तम्ब अर्थात् ब्रह्मासे आरम्भ करके देव-नर-पशु-पक्षी-तिर्यग्-स्थावर आदि तक समस्त श्रेणियोंके सभी प्राणियोंको मायादेवी अपने ‘भोक्ता’ एवं स्वयंको ‘भोग्या’के रूपमें उपलब्धि करवाकर मोहित करती है। किन्तु श्रीकृष्णकी सेवा करके श्रीकृष्णेन्द्रियोंको ही तृप्त करनेका श्रीहरिदासका हृदयगत भाव किसी भी प्रकारसे मायाके छलनेवाले प्रलोभनसे वशीभूत नहीं हुआ। श्रीहरिदासकी भाँति समस्त शुद्ध वैष्णवोंकी यही वैदान्तिक धारणा है कि शुद्धभक्त नित्य श्रीकृष्णसेवक हैं और वे कभी भी मायाके भोक्ता नहीं हैं। भगवान् नित्य, वैकुण्ठ, अधोक्षज, गुणातीत अथवा अप्राकृत वस्तु हैं। जीव देहात्मबुद्धिको छोड़कर स्वयंको कृष्णदास अथवा वैष्णव समझनेसे अर्थात् अधोक्षज श्रीकृष्णकी सेवाके फलसे ही मायाके विक्रम अथवा अनर्थसे पूर्णतया मुक्त हो सकता है ॥ 249 ॥ श्रीठाकुरकी प्रशंसा और स्तुति :- महाभागवत तुमि,—तोमार दर्शने। तोमार कृष्णनाम-कीर्त्तन-श्रवणे ॥ 250 ॥ श्रीठाकुरसे कृपा-याचना :- चित्त शुद्ध हैल, चाहे कृष्णनाम लैते। कृष्णनाम उपदेशि' कृपा करह आमाते ॥ 251 ॥ अनुवाद—आप महाभागवत हैं। आपके दर्शन करने और आपके द्वारा किये गये श्रीकृष्णनाम-कीर्तनके श्रवणसे मेरा चित्त शुद्ध हो गया है। अब मेरी भी श्रीकृष्णनाम-कीर्तन करनेकी अभिलाषा हो गयी है। आप श्रीकृष्णनामका उपदेश प्रदानकर मुझपर कृपा कीजिये ॥ 250–251 ॥ अहैतुक-कृपा-अवतीर्ण श्रीचैतन्यके आश्रयमें कृष्णभक्तिके अनुशीलनके बिना जीव जड़तुल्य :- चैतन्यावतारे बहे प्रेमामृत-वन्या। सब जीव प्रेमे भासे, पृथिवी हैल धन्या ॥ 252 ॥ अनुवाद—चैतन्य महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे प्रेमामृतकी बाढ़ आ गयी है, समस्त जीव प्रेममें निमग्न हो रहे हैं और पृथिवी धन्य हो गयी है ॥ 252 ॥ ए-वन्याय ये ना भासे, सेइ जीव—छार। कोटिकल्पे तबे तार नाहिक निस्तार ॥ 253 ॥ अनुवाद—इस प्रेमकी बाढ़में जो निमग्न नहीं हुआ, वह जीव अति निन्दनीय है। करोड़ों कल्पों तक भी उसका उद्धार नहीं होगा ॥ 253 ॥ अनुभाष्य—तैंतालीस लाख बीस हजार (43,20,000) सौरवर्षोंमें एक महायुग होता है, एक हजार महायुगोंका एक कल्प होता है; उसके (कल्पके) भी करोड़ों गुणा जितना समय ॥ 253 ॥ तीसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। पहले मदनको जय करनेवाले शम्भुसे तारकब्रह्म रामनामकी प्राप्ति :- पूर्वे आमि 'रामनाम' पाञाछि शिव हैते। तोमार सङ्गे लोभ हैल 'कृष्णनाम' लैते ॥ 254 ॥ 'रामनाम' और 'कृष्णनाम'के माहात्म्यका वैशिष्ट्य :- मुक्ति-हेतु तारक हय 'रामनाम'। 'कृष्णनाम' पारक हञा करे प्रेमदान ॥ 255 ॥ कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा और कृष्णप्रेमकी याचना :- कृष्णनाम देह' तुमि मोरे कर धन्या। आमारे भासाओ तैछे एइ प्रेमवन्या ॥ 256 ॥ अनुवाद—पहले मैंने शिवजीसे 'रामनाम' प्राप्त किया था, किन्तु अब आपके सङ्गसे मुझे कृष्णनाम ग्रहण करनेका लोभ हो गया है। मुक्ति प्रदान करनेके कारण 'रामनाम' तारकब्रह्म कहलाता है। किन्तु 'कृष्णनाम'