भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2117

100 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/254-265 ] भवसागरसे पार करवाकर अर्थात् पारक बनकर प्रेमदान करते हैं। आप मुझे कृष्णनाम प्रदान करके धन्य कर दीजिये जिसके द्वारा मैं भी प्रेमकी बाढ़में निमग्न हो जाऊँ॥" 254-256 ॥ मायादेवीके द्वारा श्रीठाकुरके शरणागत होना और श्रीठाकुरके द्वारा उसे कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा प्रदान :- एत बलि' वन्दि'ला हरिदासेर चरण। हरिदास कहे,-“कर कृष्ण-सङ्कीर्त्तन ॥” 257 ॥ अनुवाद-यह कहकर मायादेवीने श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - “आप बस श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करो॥" 257 ॥ मायाका अन्तर्धान होना :- उपदेश पाञा माया चलिला हञा प्रीत। ए-सब कथाते कारो ना जन्मे प्रतीत ॥ 258 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरसे उपदेश प्राप्त करके मायादेवी प्रसन्नतापूर्वक अन्तर्धान हो गयीं। किसी दुर्भागेको इन सब बातोंमें विश्वास नहीं होता ॥ 258 ॥ अप्राकृत विश्वास ही श्रेयका कारण :- प्रतीत करिते कहि कारण इहार। याहार श्रवणे हय विश्वास सबार ॥ 259 ॥ अनुवाद-इन बातोंमें सबको विश्वास हो, इसलिये मैं इसका कारण बतलाता हूँ, जिसे श्रवण करनेसे सभीको विश्वास हो जायेगा ॥ 259 ॥ कृष्णप्रेमप्रदाता श्रीचैतन्यके अवतारमें कृष्णप्रेमकी प्राप्तिके लिये देव-ऋषि आदि सभीका नररूपमें जन्मग्रहण :- चैतन्यावतारे कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा। ब्रह्मा-शिव-सनकादि पृथिवीते जन्मिया ॥ 260 ॥ कृष्णनाम लञा नाचे, प्रेमवन्याय भासे। नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य-प्रकाशे ॥ 261 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके समय श्रीकृष्णप्रेमके लिये लालायित होकर ब्रह्मा-शिव-सनकादिने भी पृथ्वीपर जन्म ग्रहण किया। वे सब श्रीकृष्णनामका उच्चारण करते हुए नृत्य करते हैं, प्रेमकी बाढ़में निमग्न हो जाते हैं। इसी लोभसे श्रीनारद-प्रह्लाद आदि भी मनुष्यका रूप धारण करके इस धराधामपर आते हैं॥ 260-261 ॥ लक्ष्मी आदिका भी मनुष्यरूपमें कृष्ण-प्रेमास्वादन :- लक्ष्मी-आदि करि' कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा। नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये जन्मिया ॥ 262 ॥ अनुवाद-लक्ष्मी आदिने भी श्रीकृष्णप्रेमके प्रति लोभयुक्त होकर मनुष्यके रूपमें जन्म ग्रहण करके नाम-प्रेमका आस्वादन किया ॥ 262 ॥ स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा अपने माधुर्य-प्रेमका आस्वादन :- अन्येर का कथा, आपने व्रजेन्द्रनन्दन। अवतरि' करेन प्रेम-नाम आस्वादन ॥ 263 ॥ अनुवाद-अन्योंकी तो बात ही क्या, स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन भी अवतरित होकर प्रेम-नामका आस्वादन करते हैं॥ 263 ॥ मायादेवीका भी कृष्णप्रेमास्वादनके प्रति लोभ; एकमात्र शुद्धनाम और शुद्धकीर्तनकारीकी कृपासे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- माया-दासी 'प्रेम' मागे,-इथे कि विस्मय ? 'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' ना जन्माय ॥ 264 ॥ अनुवाद-तब श्रीकृष्णकी दासी माया यदि 'प्रेम' माँगती हैं तो उसमें कैसा विस्मय ? वास्तवमें 'साधुकृपा' और 'नाम'के बिना प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 264 ॥ चैतन्यावतारमें जगत्-जीवोंको कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- चैतन्य-गोसाञिर लीलार एइ त' स्वभाव। त्रिभुवन नाचे, गाय, पाञा प्रेमभाव ॥ 265 ॥