श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2118, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/265-270 तीसरा अध्याय 101 अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका यही तो उन सब लीलाओंको मैंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके स्वभाव है कि तीनों लोकोंके वासी प्रेमभावको प्राप्त मुखसे श्रवण किया है। इन सब लीलाओंको मैंने करके नृत्य एवं गान करते हैं॥ 265 ॥ संक्षेपमें कहा है। क्षुद्रजीव होनेपर भी मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे इन सब लीलाओंका वर्णन कर रहा स्वयं भगवान् श्रीकृष्णादि समस्त ईश्वरतत्त्व हूँ॥ 267-268 ॥ और स्थावर-जङ्गमादि जीवोंकी कृष्णकीर्तनके प्रभावसे कृष्णप्रेममें मत्तता :— नामाचार्य श्रीठाकुरके माहात्म्यके कृष्ण-आदि, आर यत स्थावर-जङ्गमे। श्रवणसे शुद्धभक्तोंको आनन्द :— कृष्णप्रेमे मत्त करे कृष्ण-सङ्कीर्तने॥ 266 ॥ हरिदास ठाकुरेर कहिलुँ महिमार कण। याहार श्रवणे भक्तेर जुड़ाय श्रवण ॥ 269 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनाम इतना आकर्षक और प्रभावशाली है कि उसका सङ्कीर्तन सभी स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको अनुवाद—मैंने श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमाके एक और यहाँ तक श्रीकृष्णको भी कृष्णप्रेममें मत्त कर देता कणका ही वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे भक्तोंके है॥ 266 ॥ कानोंको आनन्द प्राप्त होता है॥ 269 ॥ श्रौतपन्थामें गुरुमुखसे ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। इन सब लीलाओंका वर्णन :— चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 270 ॥ स्वरूप-गोसाञि कड़चाय ये लीला लिखिल। रघुनाथदास-मुखे ये-सब शुनिल ॥ 267 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास- स्वयं ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :— ठाकुर-महिमा-कथनं नाम तृतीयः परिच्छेदः। सेइ सब लीला कहि संक्षेप करिया। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी चैतन्य-कृपाते लिखि क्षुद्रजीव हञा ॥ 268 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 270 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुकी जिन लीलाओंको कालक्रमसे लिपिबद्ध किया था श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-ठाकुर- [श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उन्हें कण्ठस्थ कर लिया था], महिमा-कथन नामक तीसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।