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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

100 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/254-265 ] भवसागरसे पार करवाकर अर्थात् पारक बनकर प्रेमदान करते हैं। आप मुझे कृष्णनाम प्रदान करके धन्य कर दीजिये जिसके द्वारा मैं भी प्रेमकी बाढ़में निमग्न हो जाऊँ॥" 254-256 ॥ मायादेवीके द्वारा श्रीठाकुरके शरणागत होना और श्रीठाकुरके द्वारा उसे कृष्णनाम-महामन्त्रकी दीक्षा प्रदान :- एत बलि' वन्दि'ला हरिदासेर चरण। हरिदास कहे,-“कर कृष्ण-सङ्कीर्त्तन ॥” 257 ॥ अनुवाद-यह कहकर मायादेवीने श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - “आप बस श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन करो॥" 257 ॥ मायाका अन्तर्धान होना :- उपदेश पाञा माया चलिला हञा प्रीत। ए-सब कथाते कारो ना जन्मे प्रतीत ॥ 258 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरसे उपदेश प्राप्त करके मायादेवी प्रसन्नतापूर्वक अन्तर्धान हो गयीं। किसी दुर्भागेको इन सब बातोंमें विश्वास नहीं होता ॥ 258 ॥ अप्राकृत विश्वास ही श्रेयका कारण :- प्रतीत करिते कहि कारण इहार। याहार श्रवणे हय विश्वास सबार ॥ 259 ॥ अनुवाद-इन बातोंमें सबको विश्वास हो, इसलिये मैं इसका कारण बतलाता हूँ, जिसे श्रवण करनेसे सभीको विश्वास हो जायेगा ॥ 259 ॥ कृष्णप्रेमप्रदाता श्रीचैतन्यके अवतारमें कृष्णप्रेमकी प्राप्तिके लिये देव-ऋषि आदि सभीका नररूपमें जन्मग्रहण :- चैतन्यावतारे कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा। ब्रह्मा-शिव-सनकादि पृथिवीते जन्मिया ॥ 260 ॥ कृष्णनाम लञा नाचे, प्रेमवन्याय भासे। नारद-प्रह्लादादि आसे मनुष्य-प्रकाशे ॥ 261 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके समय श्रीकृष्णप्रेमके लिये लालायित होकर ब्रह्मा-शिव-सनकादिने भी पृथ्वीपर जन्म ग्रहण किया। वे सब श्रीकृष्णनामका उच्चारण करते हुए नृत्य करते हैं, प्रेमकी बाढ़में निमग्न हो जाते हैं। इसी लोभसे श्रीनारद-प्रह्लाद आदि भी मनुष्यका रूप धारण करके इस धराधामपर आते हैं॥ 260-261 ॥ लक्ष्मी आदिका भी मनुष्यरूपमें कृष्ण-प्रेमास्वादन :- लक्ष्मी-आदि करि' कृष्णप्रेमे लुब्ध हञा। नाम-प्रेम आस्वादिला मनुष्ये जन्मिया ॥ 262 ॥ अनुवाद-लक्ष्मी आदिने भी श्रीकृष्णप्रेमके प्रति लोभयुक्त होकर मनुष्यके रूपमें जन्म ग्रहण करके नाम-प्रेमका आस्वादन किया ॥ 262 ॥ स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा अपने माधुर्य-प्रेमका आस्वादन :- अन्येर का कथा, आपने व्रजेन्द्रनन्दन। अवतरि' करेन प्रेम-नाम आस्वादन ॥ 263 ॥ अनुवाद-अन्योंकी तो बात ही क्या, स्वयं व्रजेन्द्रनन्दन भी अवतरित होकर प्रेम-नामका आस्वादन करते हैं॥ 263 ॥ मायादेवीका भी कृष्णप्रेमास्वादनके प्रति लोभ; एकमात्र शुद्धनाम और शुद्धकीर्तनकारीकी कृपासे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- माया-दासी 'प्रेम' मागे,-इथे कि विस्मय ? 'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' ना जन्माय ॥ 264 ॥ अनुवाद-तब श्रीकृष्णकी दासी माया यदि 'प्रेम' माँगती हैं तो उसमें कैसा विस्मय ? वास्तवमें 'साधुकृपा' और 'नाम'के बिना प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 264 ॥ चैतन्यावतारमें जगत्-जीवोंको कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- चैतन्य-गोसाञिर लीलार एइ त' स्वभाव। त्रिभुवन नाचे, गाय, पाञा प्रेमभाव ॥ 265 ॥

[ 3/265-270 तीसरा अध्याय 101 अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका यही तो उन सब लीलाओंको मैंने श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके स्वभाव है कि तीनों लोकोंके वासी प्रेमभावको प्राप्त मुखसे श्रवण किया है। इन सब लीलाओंको मैंने करके नृत्य एवं गान करते हैं॥ 265 ॥ संक्षेपमें कहा है। क्षुद्रजीव होनेपर भी मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे इन सब लीलाओंका वर्णन कर रहा स्वयं भगवान् श्रीकृष्णादि समस्त ईश्वरतत्त्व हूँ॥ 267-268 ॥ और स्थावर-जङ्गमादि जीवोंकी कृष्णकीर्तनके प्रभावसे कृष्णप्रेममें मत्तता :— नामाचार्य श्रीठाकुरके माहात्म्यके कृष्ण-आदि, आर यत स्थावर-जङ्गमे। श्रवणसे शुद्धभक्तोंको आनन्द :— कृष्णप्रेमे मत्त करे कृष्ण-सङ्कीर्तने॥ 266 ॥ हरिदास ठाकुरेर कहिलुँ महिमार कण। याहार श्रवणे भक्तेर जुड़ाय श्रवण ॥ 269 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनाम इतना आकर्षक और प्रभावशाली है कि उसका सङ्कीर्तन सभी स्थावर-जङ्गम प्राणियोंको अनुवाद—मैंने श्रीहरिदास ठाकुरकी महिमाके एक और यहाँ तक श्रीकृष्णको भी कृष्णप्रेममें मत्त कर देता कणका ही वर्णन किया है, जिसके श्रवणसे भक्तोंके है॥ 266 ॥ कानोंको आनन्द प्राप्त होता है॥ 269 ॥ श्रौतपन्थामें गुरुमुखसे ग्रन्थकारके द्वारा श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। इन सब लीलाओंका वर्णन :— चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 270 ॥ स्वरूप-गोसाञि कड़चाय ये लीला लिखिल। रघुनाथदास-मुखे ये-सब शुनिल ॥ 267 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदास- स्वयं ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :— ठाकुर-महिमा-कथनं नाम तृतीयः परिच्छेदः। सेइ सब लीला कहि संक्षेप करिया। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी चैतन्य-कृपाते लिखि क्षुद्रजीव हञा ॥ 268 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 270 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुकी जिन लीलाओंको कालक्रमसे लिपिबद्ध किया था श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदास-ठाकुर- [श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने उन्हें कण्ठस्थ कर लिया था], महिमा-कथन नामक तीसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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चौथा अध्याय कथासार—श्रीसनातन गोस्वामी मथुरामण्डलसे अकेले झारिखण्डके वनमार्गसे पुरुषोत्तम क्षेत्र (श्रीजगन्नाथपुरी)में आये। मार्गमें गन्दे जल और उपवासके कारण उनके शरीरमें पीब निकलनेवाली खाजका रोग हो गया। खाजकी यातनासे उन्होंने मनमें विचार किया,—“मैं महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथके रथके पहियेके नीचे इस शरीरका परित्याग करूँगा।” पुरुषोत्तममें आकर वे श्रीहरिदासके वासस्थानपर रहे। महाप्रभु श्रीसनातनको देखकर बड़े हर्षित हुए। बादमें महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको अनुपमकी गङ्गाप्राप्तिकी बात और श्रीरामके चरणोंके प्रति उनकी निष्ठाकी बात बतलायी। एकदिन महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा,—“देहत्याग आदि तामसिक धर्म हैं,—देहत्यागके द्वारा कृष्णप्रेम प्राप्त नहीं किया जा सकता; तुम इस तमोबुद्धिका परित्याग करो। तुम्हारा शरीर तुमने मुझे अर्पित किया है, इसलिये तुम्हें इस शरीरको परित्याग करनेका कोई अधिकार नहीं है। तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं अनेक भक्तिशास्त्रोंका प्रचार और वृन्दावनमें लुप्त तीर्थोंका उद्धार करूँगा।” महाप्रभुके उठकर चले जानेपर श्रीहरिदास और श्रीसनातनमें बहुत बातचीत हुई। एकदिन महाप्रभुने श्रीसनातनको यमेश्वर तोटामें बुला भेजा, श्रीसनातन समुद्रके पथसे वहाँ गये। महाप्रभुके द्वारा पूछनेपर श्रीसनातनने कहा,—“सिंहद्वारके मार्गसे श्रीजगन्नाथके सेवक आते-जाते हैं, इसलिये मैं बालूके मार्गसे आया हूँ। मेरे पैरोंमें जो फफोले पड़ गये हैं, मुझे उसका पता ही नहीं चला।” श्रीसनातनके इन मर्यादा-स्थापक वचनोंको सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए। पीब महाप्रभुके शरीरमें लगेगी, इसी कारण श्रीसनातन महाप्रभुसे दूर-दूर रहते, किन्तु महाप्रभु बलपूर्वक उनका आलिङ्गन करते। इस बातसे श्रीसनातनने बहुत दुःखी होकर श्रीजगदानन्द पण्डितसे परामर्श किया, तो श्रीजगदानन्द पण्डितने उन्हें रथयात्राके बाद वृन्दावन जानेका उपदेश दिया। महाप्रभुने यह सुनकर श्रीजगदानन्दका कुछ तिरस्कार किया और उनकी अपेक्षा श्रीसनातनके श्रेष्ठत्वको दिखलाया। महाप्रभुने और भी कहा,—“तुम शुद्धभक्त हो, तुम्हारी देहका भद्र या अभद्र होना, यह विचार करने योग्य नहीं है। विशेषतः मैं संन्यासी हूँ, मेरे द्वारा वैसा विचार करना उचित नहीं है।” अन्तमें उन्होंने कहा,—“तुम मेरे लालनीय हो एवं मैं लालक [प्यार करनेवाला] हूँ, इसलिये तुम्हारी पीबके प्रति मेरी घृणा नहीं है।” इन सब प्रसङ्गोंके बाद महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको आलिङ्गन करनेसे ही श्रीसनातनके अङ्गोंसे पीब-खाज आदि सब कुछ दूर हो गये। उस वर्ष श्रीसनातनको पुरीमें ही रखकर महाप्रभुने (अगले वर्ष उन्हें) श्रीवृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। श्रीसनातन भी उनकी आज्ञानुसार वनपथसे होते हुए वृन्दावन चले गये। इधर श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंसे विदायी लेकर, गौड़देशमें एक वर्ष तक रहकर कुटुम्ब, ब्राह्मण और देवालयमें सम्पूर्ण धनको बाँटनेके बाद वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनसे मिले। इसके पश्चात् श्रीकविराज गोस्वामीने श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामी द्वारा रचित ग्रन्थोंके नामोंका उल्लेख किया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीसनातनकी देहत्यागके सङ्कल्पसे रक्षा करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :— वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं श्रीगौरः श्रीसनातनम्। देहपातादवन् स्नेहात् शुद्धं चक्रे परीक्षया ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीगौरचन्द्रने वृन्दावनसे आये श्रीसनातनको स्नेहवशतः देहत्यागसे उद्धार करके परीक्षा लेकर शुद्ध किया था ॥ 1 ॥

104 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/1-9 ] अनुभाष्य— श्रीगौरः (महाप्रभुः) वृन्दावनात् पुनः प्राप्तं (काशीमिलनानन्तरं क्षेत्रमागतं) श्रीसनातनं [प्रभुं] स्नेहात् देहपातात् (शरीरनाशात्) अवन् (रक्षन्) परीक्षया शुद्धं चक्रे। श्लोक-भावानुवाद—श्रीगौरचन्द्रने काशीमें मिलनेके पश्चात् श्रीक्षेत्रमें वृन्दावनसे आये श्रीसनातनकी स्नेहवशतः शरीर नाशसे रक्षा करके परीक्षा लेकर शुद्ध किया था॥1॥ सपार्षद श्रीगौरको जय-प्रदान :- जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥ श्रीरूपका पुरीसे गौड़-गमन, श्रीसनातनका वृन्दावनसे पुरीमें आगमन :- नीलाचल हैते रूप गौड़े यबे गेला। मथुरा हैते सनातन नीलाचल आइला॥3॥ अनुवाद—जब श्रीरूप गोस्वामी नीलाचलसे गौड़देश गये, तभी श्रीसनातन गोस्वामी मथुरासे नीलाचल पहुँचे॥3॥ झारिखण्डके मार्गमें बहुत कष्ट सहन करके पुरीमें आगमन :- झारिखण्ड-वनपथे आइला एकेला चलिया। कभु उपवास, कभु चर्वण करिया॥4॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी झारिखण्डके वनमार्गसे अकेले चलते हुए आये। उन्होंने मार्गमें कभी तो उपवास किया और कभी कुछ खा लिया॥4॥ बाहरसे देखनेसे श्रीसनातनके सभी अङ्गोंमें खाजका दिखलायी देना :- झारिखण्डेर जलेर दोषे, उपवास हैते। गात्रे कण्डु हैल, रसा पड़े खाजुयाइते॥5॥ अनुवाद—झारिखण्डके गन्दे जलके कारण और उपवास करनेसे श्रीसनातन गोस्वामीके शरीरमें खाज हो गयी। शरीरमें खाजके कारण वे खुजली करते और खुजली करनेसे पीब बहने लगती॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'खाजुयाइते'—खुजलीवाले स्थानको खुजलानेसे॥5॥ मार्गमें श्रीसनातनकी निराशा और आत्मदैन्यपूर्ण उक्ति :- निर्वेद हइल पथे, करेन विचार। 'नीच-जाति, देह मोर—अत्यन्त असार॥6॥ अनुवाद—मार्गमें चलते हुए श्रीसनातन गोस्वामीके हृदयमें ग्लानि और निराशा हुई और वे विचार करने लगे,—'मैं नीच जातिका हूँ और मेरा शरीर भजनके अत्यन्त अयोग्य है॥6॥ अनुभाष्य—'निर्वेद'—विरक्ति; 'असार',—कृष्णभजनके अयोग्य॥6॥ जगन्नाथे गेले ताँर दर्शन ना पाइमु। प्रभुर दर्शन सदा करिते नारिमु॥7॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें जानेपर भी मैं भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन नहीं कर पाऊँगा और सदैव महाप्रभुके भी दर्शन नहीं कर पाऊँगा॥7॥ मन्दिर-निकटे शुनि ताँर वासा-स्थिति। मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि शक्ति॥8॥ अनुवाद—मैंने सुना है कि महाप्रभुका वासस्थान श्रीजगन्नाथ मन्दिरके निकट ही है और मन्दिरके निकट जानेकी शक्ति (योग्यता) मुझमें नहीं है॥8॥ स्वयंको प्राकृत अपवित्र जीव समझकर मर्यादाके उल्लङ्घनका भय :- जगन्नाथेर सेवक फेरे कार्य-अनुरोधे। ताँर स्पर्श हैले मोर हबे अपराधे॥9॥

[ 4/9-18 चौथा अध्याय 105 अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सेवक सेवाके कार्योंसे मन्दिरके पास आते-जाते हैं, उनके साथ स्पर्श होनेपर मेरा अपराध होगा॥9॥ पुरीमें श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुके नृत्यके समय देहत्यागका सङ्कल्प :- ताते यदि एइ देह भाल-स्थाने दिये। दुःख-शान्ति हय आर सद्गति पाइये॥10॥ अनुवाद—इसलिये यदि इस शरीरको किसी अच्छे स्थानपर त्याग किया तो दुःखसे छुटकारा मिल जायेगा और साथ ही मुझे सद्गतिकी भी प्राप्ति होगी॥10॥ जगन्नाथ रथयात्राय हइबेन बाहिर। ताँर रथ-चाकाय छाड़िमु एइ शरीर॥11॥ अनुवाद—जब श्रीजगन्नाथ रथयात्राके समय मन्दिरसे बाहर आयेंगे, तब मैं उनके रथके पहियेके नीचे आकर इस शरीरका त्याग कर दूँगा॥11॥ महाप्रभुर आगे, आर देखि' जगन्नाथ। रथे देह छाड़िमु,—एइ परम-पुरुषार्थ॥'12॥ अनुवाद—मैं महाप्रभुके सामने ही श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करके रथके पहियेके नीचे शरीर त्याग करूँगा,—यही मेरे लिये परम पुरुषार्थ होगा॥'12॥ ठाकुर श्रीहरिदासके स्थानपर आगमन :- एइ त' निश्चय करि' नीलाचले आइला। लोके पुछि' हरिदास-स्थाने उत्तरिला॥13॥ अनुवाद—ऐसा निश्चय करके श्रीसनातन गोस्वामी नीलाचलमें आये। लोगोंसे पूछ-पूछकर वे श्रीहरिदास ठाकुरकी भजन कुटियापर आ पहुँचे॥13॥ श्रीहरिदासको प्रणाम, श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :- हरिदासरे कैला तँह चरण वन्दन। जानि' हरिदास ताँरे कैला आलिङ्गन॥14॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीहरिदास ठाकुरके चरणोंकी वन्दना की। श्रीहरिदास ठाकुर उन्हें जानते थे, इसलिये उनका आलिङ्गन किया॥14॥ महाप्रभुके चरणोंके दर्शनके लिये व्याकुल श्रीसनातन :- महाप्रभु देखिते ताँर उत्कण्ठित मन। हरिदास कहे,—“प्रभु आसिबेन एखन॥”15॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीका मन महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो रहा था। श्रीहरिदास ठाकुरने उन्हें कहा,—“महाप्रभु अभी आने ही वाले हैं॥”15॥ महाप्रभुका आगमन :- हेनकाले प्रभु 'उपलभोग' देखिया। हरिदासे मिलिते आइला भक्तगण लञा॥16॥ अनुवाद—उसी समय महाप्रभु भगवान् श्रीजगन्नाथके 'उपलभोग'का दर्शन करके अपने भक्तों सहित श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलनेके लिये आये॥16॥ दोनोंके द्वारा महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासका आलिङ्गन :- प्रभु देखि' दुँहे पड़े दण्डवत् हञा। प्रभु आलिङ्गिला हरिदासरे उठाञा॥17॥ अनुवाद—महाप्रभुको देखकर दोनोंने दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको उठाकर उनका आलिङ्गन किया॥17॥ श्रीसनातनके आगमनसे महाप्रभुमें विस्मय और प्रीति :- हरिदास कहे,—“सनातन करे नमस्कार।” सनातने देखि' प्रभु हैला चमत्कार॥18॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“महाप्रभु! सनातन आपको प्रणाम कर रहा है।” श्रीसनातन गोस्वामीको देखकर महाप्रभु आश्चर्यचकित हो गये॥18॥

106 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/19-28 ] अपने प्रिय भक्तवरको आलिङ्गन करनेके लिये भगवान्‌का आगे जाना, श्रीसनातनका दूर भागना और दैन्यपूर्ण उक्ति :— सनातने आलिङ्गिते प्रभु आगु हैला। पाछे भागे सनातन कहिते लागिला ॥ 19 ॥ “मोरे ना हुँइह प्रभु, पड़ों तोमार पाय। एके नीचजाति अधम, आर कण्डूरसा गाय ॥” 20 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करनेके लिये जैसे ही आगे बढ़े, श्रीसनातन गोस्वामी पीछे भागते हुए कहने लगे,—“हे महाप्रभु! मैं आपके चरणोंमें पड़ता हूँ, आप कृपया मुझे स्पर्श मत कीजिये, मैं अधम हूँ और नीचजातिका भी हूँ, उसपर मेरे शरीरमें खाजके कारण पीब निकल रही है ॥” 19-20 ॥ बलपूर्वक भगवान्‌के द्वारा अपने प्रिय भक्तवरका आलिङ्गन :— बलात्कारे प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल। कण्डूक्लेद महाप्रभुर श्रीअङ्गे लागिल ॥ 21 ॥ अनुवाद—परन्तु महाप्रभुने बलपूर्वक श्रीसनातन गोस्वामीका आलिङ्गन किया जिससे पीब महाप्रभुके श्रीअङ्गोंपर लग गयी ॥ 21 ॥ भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :— सब भक्तगणे प्रभु मिलाइला सनातने। सनातन कैला सबार चरण वन्दने ॥ 22 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अपने उपस्थित सभी भक्तोंके साथ श्रीसनातन गोस्वामीका परिचय करवाया। श्रीसनातन गोस्वामीने सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की ॥ 22 ॥ दीनतापूर्वक श्रीहरिदास और श्रीसनातनका भक्तोंसे नीचे बैठना :— प्रभु लञा बसिला पिण्डार उपरे भक्तगण। पिण्डार तले बसिला हरिदास, सनातन ॥ 23 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंको साथमें लेकर एक चबूतरेपर बैठ गये, श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीसनातन गोस्वामी चबूतरेके नीचे बैठे ॥ 23 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातन और ब्रजवासी भक्तोंके कुशलकी जिज्ञासा और श्रीसनातनका उत्तर :— कुशलवार्त्ता महाप्रभु पुछेन सनातने। तेँह कहेन,—“परम मङ्गल देखिनु चरणे ॥” 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातनसे उनके कुशल-मङ्गलके विषयमें पूछा। श्रीसनातनने कहा,—“आपके चरणकमलोंके दर्शन हो गये, इसलिये सभी परम मङ्गल है ॥” 24 ॥ मथुरार वैष्णव-सबेर कुशल पुछिला। सबार कुशल सनातन जानाइला ॥ 25 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे मथुराके समस्त वैष्णवोंका कुशल-मङ्गल पूछा। श्रीसनातन गोस्वामीने उन सभीकी कुशलताके विषयमें बतलाया ॥ 25 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको श्रीरूप और श्रीअनुपमका संवाद-प्रदान :— प्रभु कहे,—“इँहा रूप छिल दशमास। इँहा हैते गौड़े गेला, हैल दिन दश ॥ 26 ॥ तोमार भाइ अनुपमेर हैल गङ्गा-प्राप्ति। भाल छिल रघुनाथे दृढ़ ताँर भक्ति ॥” 27 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रूप दस महीने तक यहीं था। वह यहाँसे दस दिन पहले ही गौड़देश गया है। तुम्हारे भाई अनुपमको गङ्गा-प्राप्ति हुई है। वह बहुत अच्छा भक्त था, उसकी श्रीरघुनाथमें दृढ़ भक्ति थी ॥” 26-27 ॥ श्रीसनातनके द्वारा अपने विषयमें दैन्य-उक्ति और महाप्रभुकी अयाचित कृपाकी महिमाका वर्णन :— सनातन कहे,—“नीच-वंशे मोर जन्म। अधर्म, अन्याय यत,—आमार कुलधर्म ॥ 28 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मेरा जन्म

[ 4/28–41 चौथा अध्याय 107 नीच वंशमें हुआ है। जितने अधर्म तथा अन्यायपूर्ण कार्य हैं, उन्हें करना तो मेरा कुलधर्म है॥ 28॥ अनुभाष्य—'नीच-वंशे',—मध्यलीला 1/189 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 28॥ हेन वंशे घृणा छाड़ि' कैला अङ्गीकार। तोमार कृपाय वंशे मङ्गल आमार॥ 29॥ अनुवाद—ऐसे वंशके प्रति घृणाका त्याग करके आपने मुझे स्वीकार किया है, आपकी कृपासे ही मेरे वंशमें मङ्गल है॥ 29॥ छोटे भाई श्रीअनुपमकी एकान्तिकी रामनिष्ठाका वर्णन :— सेइ अनुपम–भाइ शिशुकाल हैते। रघुनाथ–उपासना करे दृढ़चित्ते॥ 30॥ रात्रि–दिने रघुनाथेर ‘नाम’ आर ‘ध्यान’। रामायण निरवधि सुने, करे गान॥ 31॥ तीनों भाइयोंकी परस्पर अकृत्रिम प्रीति :— आमि आर रूप—ताँर ज्येष्ठसहोदर। आमा–दोँहा–सङ्गे तँह रहे निरन्तर॥ 32॥ अनुवाद—मेरा भाई अनुपम बचपनसे ही भगवान् श्रीरघुनाथकी दृढ़ चित्तसे उपासना करता था। अनुपम रात-दिन भगवान् श्रीरघुनाथका ही नाम और उनका ही ध्यान करता था। वह निरन्तर रामायणका श्रवण तथा कीर्तन करता था। मैं और रूप अनुपमके बड़े भाई हैं, अनुपम सदा हमारे साथ ही रहता था॥ 30-32॥ आमा–सबा–सङ्गे कृष्णकथा, भागवत सुने। ताहार परीक्षा कैलुँ आमि–दुइजने॥ 33॥ श्रीअनुपमको दोनों बड़े भाइयोंके द्वारा श्रीकृष्णके गुण- माधुर्यके वर्णनके द्वारा कृष्णभजनका प्रलोभन देना :— “शुनह वल्लभ, कृष्ण—परम मधुर। सौन्दर्य, माधुर्य, प्रेम–विलास—प्रचुर॥ 34॥ कृष्णभजन कर तुमि आमा–दुँहार सङ्गे। तिन भाइ एकत्र रहिमु कृष्णकथा–रङ्गे॥” 35॥ अनुवाद—वह हमारे साथ श्रीकृष्णकथा और भागवत भी सुनता था। हम दोनोंने अनुपमकी परीक्षा लेते हुए कहा था,—“हे वल्लभ (अनुपम)! सुनो, श्रीकृष्ण परम मधुर हैं। श्रीकृष्णमें सौन्दर्य, माधुर्य तथा प्रेमरूपी विलास असीम है। इसलिये तुम हम दोनोंके साथ मिलकर श्रीकृष्णका भजन करो। हम तीनों भाई एक साथ श्रीकृष्णकथाके आनन्दमें डूबे रहेंगे॥” 33-35॥ दोनों बड़े भाइयोंके अत्यधिक अनुरोध करनेपर एकान्तिक श्रीअनुपमका थोड़े समयके लिये चित्त-परिवर्तन :— एइमत बार बार कहि दुइजन। आमा-दुँहार गौरवे किछु फिरि' गेल मन॥ 36॥ श्रीअनुपमकी कृष्णभजन करनेकी इच्छा :— “तोमा दुँहार आज्ञा आमि केमने लङ्घिमु? दीक्षा-मन्त्र देह', कृष्ण-भजन करिमु॥” 37॥ अनुवाद—इस प्रकार हम दोनों बार बार उसे ऐसा कहने लगे, तो हम दोनोंके प्रति सम्मानके कारण अनुपमका मन कुछ परिवर्तित हो गया। अनुपमने हमसे कहा,—“मैं आप दोनों भाईयोंकी आज्ञाका कैसे उल्लङ्घन करूँ? आप मुझे दीक्षा-मन्त्र प्रदान कीजिये जिससे मैं भी कृष्ण-भजन करूँ॥” 36-37॥ श्रीरामके भजनका परित्याग करनेके कारण श्रीअनुपमकी चिन्ता और व्याकुलता :— एत कहि' रात्रिकाले करेन चिन्तन। ‘केमने छाड़िमु रघुनाथेर चरण॥’ 38॥ क्रन्दन, जागरण और निवेदन :— सब रात्रि क्रन्दन करि' कैल जागरण। प्रातःकाले आमा दुँहाय कैल निवेदन॥ 39॥ श्रीअनुपमकी गम्भीर एकान्तिक रामनिष्ठा :— “रघुनाथेर पादपद्मे बेचियाछोँ माथा। काड़िते ना पारोँ माथा, पाङ बड़ व्यथा॥ 40॥ कृपा करि' मोरे आज्ञा देह' दुइजन। जन्मे-जन्मे सेवों रघुनाथेर चरण॥ 41॥

108 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/38–48 ] रघुनाथेर पादपद्म छाड़ान ना याय। छाड़िवार मन हैले प्राण फाटि' याय॥"42॥ अनुवाद—यह कहकर अनुपम रात्रिकालमें विचार करने लगा—'मैं भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका कैसे परित्याग करूँगा?' अनुपम उस रात सो नहीं सका और सारी रात रोते-रोते बितायी। प्रातःकालमें उसने हम दोनोंसे निवेदन किया,—'मैंने भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंमें अपने मस्तकको बेच दिया है। मैं अपने मस्तकको वहाँसे उठा नहीं पा रहा हूँ। ऐसा करनेपर मुझे बहुत अधिक पीड़ा होगी। आप दोनों कृपा करके मुझे यही आज्ञा प्रदान कीजिये कि मैं जन्म-जन्मान्तर तक भगवान् श्रीरघुनाथके चरणकमलोंकी सेवा करूँ। श्रीरघुनाथके चरणकमलोंका परित्याग करना मेरे लिये सम्भव नहीं है। इस बातका विचार करनेसे ही मेरे प्राण फटकर निकलने लगते हैं॥"38-42॥ छोटे भाईको दोनों बड़े भाइयोंका आशीर्वाद :- तबे आमि-दुँहे तांरे आलिङ्गन कैलुँ। “साधु, दृढ़भक्ति तोमार”—कहि' प्रशंसिलुँ॥43॥ अनुवाद—तब हम दोनोंने अनुपमको आलिङ्गन किया और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा,—“तुम्हारी श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति साधुवाद योग्य है॥"43॥ महाप्रभुकी कृपाके प्रति दृढ़ आस्था :- ये वंशेर उपरे तोमार हय कृपा-लेश। सकल मङ्गल ताहे, खण्डे सब क्लेश॥"44॥ अनुवाद-“हे महाप्रभो! जिस वंशके प्रति आपकी लेशमात्र भी कृपा होती है, वहाँ मङ्गल-ही-मङ्गल होता है और समस्त प्रकारके कष्ट दूर हो जाते हैं॥"44॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमुरारिगुप्तकी रामनिष्ठाके दृष्टान्तका वर्णन :- गोसाञि कहेन,-“एइमत मुरारि-गुप्त। पूर्वे आमि परीक्षिलुं तांर एइ रीत॥45॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मैंने भी इसी प्रकार पहले मुरारि-गुप्तकी परीक्षा ली थी, उसकी भी अनुपमकी भाँति श्रीरघुनाथके प्रति दृढ़भक्ति थी॥45॥ अनुभाष्य-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 15/137 से 157 संख्यामें वर्णित श्रीमुरारि गुप्तकी श्रीरामनिष्ठा विचारणीय है॥45॥ अमृतानुकणा-इस प्रसङ्गमें मध्यलीला 8/83 संख्या- "किन्तु याँर येइ रस, सेइ सर्वोत्तम। तटस्था हञा विचारिले, आछे तर-तम॥" यह पद्य और इसकी अनुभाष्य टीका विचारणीय है॥45॥ एकान्तिक भक्त और भगवान्, परस्परकी प्रीतिका वैशिष्ट्य :- सेइ भक्त धन्य, ये ना छाड़े प्रभुर चरण। सेइ प्रभु धन्य, ये ना छाड़े निज-जन॥46॥ अनुवाद-वही भक्त धन्य है जो अपने प्रभुके चरणोंको कभी भी नहीं छोड़ता और वही प्रभु धन्य हैं जो अपने सेवकको कभी नहीं त्यागते॥46॥ एकान्तिक भक्तवत्सल भगवान् :- दुर्दैवे सेवक यदि याय अन्यस्थाने। सेइ ठाकुर धन्य तांरे चुले धरि' आने॥47॥ अनुवाद-दुर्भाग्यसे यदि सेवक पतित होकर अन्य किसी स्थानपर चला जाता है, तो वही प्रभु धन्य हैं जो अपने उस सेवकको उसके केशोंसे पकड़कर पुनः खींचकर ले आते हैं॥47॥ श्रीसनातनको श्रीहरिदासके साथमें रहनेकी आज्ञा :- भाल हैल, तोमार इँहा हैल आगमने। एइ घरे रह इँहा हरिदास-सने॥48॥ अनुवाद-अच्छा ही हुआ जो तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है। तुम यहीं इसी घरमें हरिदास ठाकुरके साथ रहो॥48॥

[ 4/49-57 चौथा अध्याय 109 श्रीसनातन और श्रीहरिदासकी प्रशंसा करके महाप्रभुका आदेश :- कृष्णभक्तिरसे दुँहे परम प्रधान। कृष्णरस आस्वादन कर, लह कृष्णनाम॥"49॥ अनुवाद-तुम दोनों ही कृष्णभक्तिरसको जाननेमें परम प्रवीण हो। तुम दोनों कृष्णरसका आस्वादन करो और कृष्णनामका कीर्तन करो॥"49॥ महाप्रभुका प्रस्थान; दोनोंके लिये प्रसाद भेजना :- एत बलि' महाप्रभु उठिया चलिला। गोविन्द-द्वाराय दुँहे प्रसाद पाठाइला॥ 50॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु उठकर चल दिये और श्रीगोविन्दके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीके लिये प्रसाद भिजवाया॥ 50॥ श्रीसनातनके द्वारा मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम :- एइमत सनातन रहे प्रभुस्थाने। जगन्नाथेर चक्र देखि' करेन प्रणामे॥ 51॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके आश्रयमें रहने लगे। वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके शिखरपर लगे चक्रको देखकर उसे प्रणाम करते॥ 51॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र' - नीलचक्र॥ 51॥ प्रतिदिन दोनोंके साथ महाप्रभुका साक्षात्कार और महाप्रसाद-प्रदान :- प्रभु आसि' प्रतिदिन मिलेन दुइजने। इष्टगोष्ठी, कृष्णकथा कहे कतक्षणे॥ 52॥ अनुवाद-महाप्रभु आकर प्रतिदिन श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलते और कुछ समय तक कृष्णकथारूपी इष्टगोष्ठी करते॥ 52॥ दिव्यप्रसाद पाञा नित्य जगन्नाथ-मन्दिरे। ताहा आनि' नित्य अवश्य देन दोंहाकारे॥ 53॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रतिदिन श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे दिव्य महाप्रसाद प्राप्त करते और अवश्य ही उसे श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीको देते थे॥ 53॥ एकदिन अन्तर्यामी महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके पूर्व-सङ्कल्पके विषयमें बतलाना :- एकदिन आसि' प्रभु दुँहारे मिलिला। सनातने आचम्बिते कहिते लागिला॥ 54॥ श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके मनोधर्मके द्वारा चलनेवाले अनर्थयुक्त साधकको महाप्रभुके द्वारा शिक्षा प्रदान; फल्गु-ज्ञान और वैराग्य कृष्णप्राप्तिके उपाय नहीं :- “सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि पाइये। कोटि-देह क्षणेके तबे छाड़िते पारिये॥ 55॥ युक्त-वैराग्यके साथ शुद्धभक्ति ही कृष्णप्राप्तिका उपाय, अन्य कुछ नहीं :- देहत्यागे कृष्ण ना पाइ, पाइये भजने। कृष्णप्राप्त्येर उपाय कोन नाहि 'भक्ति' बिने॥ 56॥ अनुवाद-एकदिन महाप्रभु आकर उन दोनोंसे मिले। वे अचानक श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,-'हे सनातन! देहत्याग करनेसे यदि कृष्ण प्राप्त होते हों, तो मैं एक क्षणमें ही करोड़ों शरीरोंको त्याग कर दूँ। केवल देहत्याग करनेसे कृष्ण प्राप्त नहीं हो सकते, वे तो भजनसे ही प्राप्त होते हैं। भक्तिके अतिरिक्त कृष्णको प्राप्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ 54-56॥ अप्राकृत विशुद्धसत्त्वमयी भक्तिमें ही श्रीकृष्णका वास, प्राकृत गुणमयी कर्म-ज्ञानकी चेष्टासे श्रीकृष्णकी प्राप्ति नहीं :- देहत्यागादि यत, सब-तमोधर्म। तमो-रजो-धर्मे कृष्णेर ना पाइये मर्म॥ 57॥ अनुवाद-आत्महत्याके द्वारा देहत्याग आदि जैसे जो कुछ कार्य हैं, वे सब तमोगुणी धर्मके अन्तर्गत हैं। तमोगुणी और रजोगुणी धर्मके द्वारा कृष्णके मर्मको नहीं जाना जा सकता॥ 57॥

110 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/58-63 ] कृष्णभक्ति ही कृष्णप्रेमकी प्राप्तिका एकमात्र उपाय :- 'भक्ति' बिना कृष्णे कभु नहे 'प्रेमोदय'। प्रेम बिना कृष्णप्राप्ति अन्य हैते नय ॥ 58 ॥ अनुवाद-‘भक्ति’के बिना कृष्णके प्रति कभी भी 'प्रेमका उदय' नहीं हो सकता। प्रेमके बिना अन्य किसी उपायसे कृष्णकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ 58 ॥ श्रीमद्भागवत (11/14/20) में- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 59 ॥ अनुवाद-हे उद्धव ! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा- अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है ॥ 59 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 59 ॥ मनोधर्मी साधकके द्वारा भेदबुद्धिसे फल्गु-त्याग और ज्ञानकी चेष्टा-जड़ेन्द्रिय तृप्तिमयी, श्रीकृष्णप्रीति-तात्पर्यमयी नहीं होनेके कारण उसके द्वारा श्रीकृष्णप्राप्ति असम्भव :- देहत्यागादि तमो-धर्म-पातक-कारण। साधक ना पाय ता'ते कृष्णेर चरण ॥ 60 ॥ अनुवाद-आत्महत्या आदि तमोधर्मका पालन तो नरकमें गिरानेवाले पापका कारण बनता है, उससे साधकको कृष्णके चरणोंकी प्राप्ति नहीं होती ॥ 60 ॥ सिद्ध अनुरागी भक्तकी गाढ़-विप्रलम्भसे उत्पन्न देहत्यागकी इच्छा-सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी इच्छासे चालित और श्रीकृष्ण- प्रीति चेष्टामयी, उससे ही उसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति :- प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह छाड़िते। प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना पाय मरिते ॥ 61 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 61 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कृष्णके विच्छेदमें प्रेमिक-भक्त अपनी देहको त्याग करनेकी इच्छा करते हैं; उसी प्रेमके बलसे ही वे कृष्णको प्राप्त करते हैं, इसलिये वे देहत्याग नहीं कर पाते अर्थात् कृष्ण उन्हें मरने नहीं देते ॥ 61 ॥ गाढ़ानुरागेर वियोग ना याय सहन। ता'ते अनुरागी वाञ्छे आपन-मरण ॥ 62 ॥ अनुवाद-गाढ़ अनुराग होनेपर कृष्णका विरह सहन नहीं होता, इसलिये अनुरागी व्यक्ति अपनी मृत्युकी कामना करता है ॥ 62 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 12/31 संख्या देखें- “किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय। इष्ट ना पाइले निजप्राणसे छोड़य॥” [अर्थात् “किन्तु अनुरागी व्यक्तियोंका यह स्वभाव होता है कि वे अपने इष्टको न पाकर अपने प्राणोंको त्याग देते हैं।"] ॥ 61-62 ॥ श्रीवासुदेवके प्रति रुक्मिणीके द्वारा अनुराग-निवेदन :- श्रीमद्भागवत (10/52/43) में- यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजःस्नपनं महान्तो वाञ्छन्त्युमापतिरिवात्मतमोऽपहत्यै। यह्य॑म्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादं जह्यामसून् व्रतकृशाञ्छतजन्मभिः स्यात् ॥ 63 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कमलनयन, अपने तमोगुणका विनाश करनेके लिये शिव जैसे महान व्यक्ति भी जिनके चरणकमलोंकी रजमें स्नान करनेकी इच्छा करते हैं, आपका वह प्रसाद यदि मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तब फिर आपकी प्राप्तिके लिये व्रतसे दुर्बल होकर जीवन परित्याग करके सौ जन्मोंमें ऐसे ही व्रत करते हुए उसके बाद आपकी कृपाको प्राप्त कर ही लूँगी ॥ 63 ॥

[ 4/63-66 चौथा अध्याय 111 [बायाँ स्तम्भ] अनुभाष्य—लोगोंके मुखसे श्रीकृष्णकी अनन्त सद्गुणावली श्रवण करके, भीष्मककी पुत्री श्रीरुक्मिणीके द्वारा [मनसे] उन्हें अपने पतिके रूपमें वरण करनेपर भी उनके बड़े भाई कृष्णद्वेषी रुक्मीने चेदिनरेश शिशुपालको ही उनके वरके रूपमें चुना है, ऐसा सुनकर [रुक्मिणीने] निर्जनमें एक प्रेमपत्र लिखकर एक विश्वसनीय ब्राह्मणको देकर तत्क्षणात् उसे श्रीकृष्णके पास भेजा। ब्राह्मण द्वारकामें उपस्थित होकर श्रीकृष्णके द्वारा यथाविधि सत्कार प्राप्त करनेके पश्चात् श्रीकृष्णकी अनुमतिसे रुक्मिणीके उस प्रेमपत्रको पढ़ने लगे— हे अम्बुजाक्ष (कमलनयन), आत्मनः (स्वस्य) तमः (अज्ञानम्) अपहत्यै (विनाशाय) उमापतिः (शिवः) इव महान्तः (ब्रह्मादयः) यस्य (भवतः) अङ्घ्रि-पङ्कजरजःस्नपनं (अङ्घ्रिपङ्कजस्य पादपद्मस्य रजोभिः स्नपनं) वाञ्छन्ति, तद्भवत्प्रसादं (तस्य भवतः अनुग्रहं) यर्हि अहं न लभेय (न प्राप्नुयां, तर्हि) व्रतकृशान् (व्रतैः उपवासादिभिः कृशान्) असून् (प्राणान्) जह्यां (त्यजेयम्,–एवमेव) शतजन्मभिः [अपि तव प्रसादः] स्यात्। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 63 ॥ श्रीकृष्णके प्रति रासोत्सुका गोपियोंके द्वारा अनुराग-निवेदन :- श्रीमद्भागवत (10/29/35) में— सिञ्चाङ्ग नस्त्वदधरामृतपूरकेण हासावलोक-कल-गीतज-हृच्छयाग्निम्। नो चेद्वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहा ध्यानेन याम पदयोः पदवीं सखे ते ॥ 64 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे प्रिय, आपकी मन्द-मुस्कानके दर्शनसे और आपके [मुरलीके] कलगीतको श्रवण करके हमारी जिस कामाग्निने वृद्धि प्राप्त की है, उसे अपने अधरामृतके सञ्चारके द्वारा सिञ्चित करके शीतल करो; वैसा नहीं करनेसे हे सखे, हम तुम्हारे विरहसे उत्पन्न अग्निके द्वारा दग्ध देहसे [योगियोंके [दायाँ स्तम्भ] समान] ध्यानके द्वारा तुम्हारे चरणोंके सान्निध्यमें उपस्थित होंगी ॥ 64 ॥ अनुभाष्य—चाँदनीसे स्नान की हुई शारदीय रात्रिमें श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे सम्पूर्ण रूपमें आकृष्ट गोपवधुएँ आत्म-विस्मृत होकर श्रीकृष्णके समीप उपस्थित हुईं। श्रीकृष्णने उनके अनुरागको और भी वर्धित करनेके उद्देश्यसे उन्हें घरमें जानेके लिये कहा। तब कृष्णमें ही समर्पित प्राणवाली गोपियाँ दुःखित होकर रुद्धकण्ठसे गद्गद वचनोंके द्वारा श्रीकृष्णसे कह रही हैं— हे अङ्ग (कृष्ण,) त्वदधरामृतपूरकेण (तव ओष्ठसम्बन्धिना सुधाप्रवाहेण) नः (अस्माकं) हासावलोककलगीतजहृच्छयाग्निं (हाससहितेन अवलोकः च कलगीतं मधुरवंशीध्वनिः च ताभ्यां जातः यः हृदि शेते वसति हृच्छयः कामः सः एव अग्निः दाहकः तं) सिञ्च (निर्वापय); नोचेत् हे सखे, वयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहाः (विरहजेन विरहात् जनिष्यते यः अग्निः तेन उपयुक्तदेहाः दग्धशरीराः सत्यः योगिनः इव) ध्यानेन ते (तव) पदयोः पदवीम् (अन्तिकं) याम (प्राप्नुयाम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 64 ॥ श्रीसनातनको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा अनर्थयुक्त साधकको निरन्तर हरिभजनकी शिक्षा प्रदान :- कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण-कीर्त्तन। अचिरात् पाबे तबे कृष्णप्रेम-धन ॥ 65 ॥ अनुवाद—कुबुद्धिका परित्याग करके श्रवण-कीर्त्तन करो, तब तुम अतिशीघ्र कृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त करोगे ॥ 65 ॥ अनुभाष्य—'कुबुद्धि',— कृष्णसेवापरायण बुद्धिके अतिरिक्त नश्वर जड़ेन्द्रियकी तृप्तिके परायण असती बुद्धि ॥ 65 ॥ स्त्रीके सङ्गसे उत्पन्न शौक्र जन्मवादका खण्डन; कृष्णभजनमें योग्यताका निर्देश; शुद्धभक्त ही गुरु अथवा महत्तम :- नीचजाति नहे कृष्णभजने अयोग्य। सत्कुल-विप्र नहे भजनेर योग्य ॥ 66 ॥

112 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/66-70 ] [ बायाँ स्तम्भ / Left Column ] अनुवाद—नीचजातिमें जन्म लेनेवाला व्यक्ति कृष्णभजनके अयोग्य नहीं होता और सत्कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण होनेसे ही कोई कृष्णभजनके योग्य नहीं बन जाता॥ 66 ॥ अनुभाष्य—(भाः 3/33/7)— “अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्, यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या, ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” [अर्थात् “हे भगवन्! जिनके मुखमें आपका नाम वर्तमान है, वे चण्डाल-कुलमें जन्म लेनेपर भी सर्वश्रेष्ठ हैं—उन्होंने समस्त प्रकारकी तपस्या की है, समस्त यज्ञ किये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान किया है, इसलिये उनकी गणना आर्योंमें होती है।”] (भाः 1/8/26)— “जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमान-मदः पुमान्। नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम्॥” [अर्थात् “हे कृष्ण! सत्कुल, ऐश्वर्य, विद्या और रूपादिके द्वारा मदमत्त व्यक्ति निरभिमान और निष्काम भक्तोंके ग्रहण योग्य आपके ‘श्रीकृष्ण’ ‘गोविन्द’ आदि शुद्धनामोंका कीर्तन करनेमें निश्चय ही समर्थ नहीं होते।”] ॥ 66 ॥ येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त—हीन छार। कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि-विचार॥ 67 ॥ अनुवाद—जो कृष्णका भजन करता है, वास्तवमें वही श्रेष्ठ है। अभक्त तो हीन और तिरस्कार योग्य है। कृष्णभजनमें जाति और कुल आदिका कोई भी विचार नहीं है॥ 67 ॥ प्राकृत जन्म, ऐश्वर्य, पाण्डित्य और सुन्दरता आदि दुःसङ्ग त्याग करके श्रीकृष्णमें सर्वस्व समर्पण करनेवाले एकान्तिक शरणागतकी ही भगवान्‌की कृपाको प्राप्त करनेकी योग्यता :— दीनेरे अधिक दया करे भगवान्। कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान॥ 68 ॥ [ दायाँ स्तम्भ / Right Column ] अनुवाद—भगवान् दीन व्यक्तिपर अधिक कृपा करते हैं, क्योंकि उच्च कुलमें जन्म लेनेवाले, विद्वान और धनी व्यक्तियोंमें बहुत अभिमान होता है॥ 68 ॥ श्रीमद्भागवत (7/9/10) में— विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पदारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः॥ 69 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है, किन्तु अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता॥ 69 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 20/59 संख्या देखें॥ 69 ॥ अभिधेयसे ही सम्बन्ध और प्रयोजनकी प्राप्ति :— भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नवविधा भक्ति। ‘कृष्णप्रेम’, ‘कृष्ण’ दिते धरे महाशक्ति॥ 70 ॥ अनुवाद—भजनके सभी अङ्गोंमें-से नवधा (नौ प्रकारकी) भक्ति श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें श्रीकृष्णप्रेम और श्रीकृष्णको प्रदान करनेकी महाशक्ति है॥ 70 ॥ अनुभाष्य—नवविधा भक्ति,—(भाः 7/5/23)— “श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥” [अर्थात् “श्रीप्रह्लादजीने कहा—भगवान् विष्णुके नाम, रूप, गुण और परिकरोंकी लीलादिका श्रवण, उनका कीर्तन, उनका स्मरण करना, उनके ही चरणकमलोंकी सेवा-परिचर्या करना, षोडशोपचारके द्वारा उनका अर्चन करना, उनका दास बन जाना, उनके साथ सख्यभाव स्थापित करना और उनके चरणोंमें अपना सर्वस्व समर्पण कर देना—ये भक्तिकी नौ विधियाँ हैं।”]

[ 4/70-71 ] चौथा अध्याय 113

नवविधा-भक्ति (अभिधेय) ही श्रीकृष्णप्रेम (प्रयोजन) और श्रीकृष्ण (सम्बन्ध)को प्रदान करनेकी महाशक्तिको धारण करती है। साधनभक्ति ही अभिधेयरूपमें प्रकट होकर बादमें प्रेमभक्तिके स्वरूपको प्राप्त करती है। प्रयोजनरूपी श्रीकृष्णप्रेम ही सम्पूर्णरूपसे श्रीकृष्णको प्रदान करता है॥70॥

दस अपराधोंसे रहित होकर निरन्तर विश्रामरहित कृष्णकीर्तनके फलसे कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- ता॑र मध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम-सङ्कीर्त्तन। निरपराधे नाम लैले पाय प्रेमधन॥71॥

अनुवाद—नवधा-भक्तिके अङ्गोंमें-से नाम-सङ्कीर्त्तन ही सर्वश्रेष्ठ है। निरपराध होकर भगवन्नाम-कीर्त्तन करनेसे श्रीकृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥71॥

अनुभाष्य—श्रीजीवगोस्वामि प्रभु (भक्तिसन्दर्भकी 270 संख्यामें),— “इयञ्च कीर्त्तनाख्या भक्तिर्भगवतो द्रव्यजातिगुणक्रियाभिर्दीन- जनैकविषयापारकरुणामयीति श्रुतिपुराणादिविश्रुतिः। xx अतएव कलौ स्वभावत एवातिदीनेषु लोकेषु आविर्भूय ताननायासेनेव तत्तद्युगगत-महासाधनानां सर्वमेव फलं ददाना सा कृतार्थयति। अतएव तयैव कलौ भगवतो विशेषतश्च सन्तोषो भवति॥” (273 संख्यामें)— “अतएव यद्यन्यापि भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा तत्संयोगेनैव॥” [अर्थात् “जो द्रव्य, जाति, गुण और क्रियाके विषयमें दीन हैं अर्थात् जिनके पास उत्तम द्रव्य (धन), जाति, गुण और क्रिया नहीं हैं, उनके एकमात्र (कल्याणकारी) विषय रूपमें ही अपार करुणामयी यह भगवान्की नाम-रूप-गुणकी कीर्त्तनाख्या (कीर्त्तन-नामक) भक्ति है,—यह श्रुति-पुराणादि शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। इसलिये कलियुगमें स्वभावतः अतिदीन मानवोंमें आविर्भूत हुई यह कीर्त्तनाख्या भक्ति अनायास ही उन्हें अन्यान्य युगोंके अन्तर्गत महासाधनसमूहके सभी फल ही प्रदान करके कृतार्थ करती है—क्योंकि उसके द्वारा भगवान् विशेषरूपसे सन्तुष्ट होते हैं। इसलिये कलियुगमें यद्यपि अन्यान्य भक्तिके अनुष्ठान कर्त्तव्य हैं, किन्तु उन्हें कीर्त्तनाख्या भक्तिके संयोगसे ही करना होगा।”]

श्रीरूपप्रभु (नामाष्टकके प्रथम श्लोकमें),— “निखिलश्रुतिमौलिरत्नमालाद्युतिनीराजित पादपङ्कजान्त। अयि मुक्तकुलैरूपास्यमानं परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि॥” [अर्थात् “हे हरिनाम! मैं, आपका सर्वतोभावसे आश्रय ग्रहण करता हूँ, क्योंकि आपका महत्त्व विचित्र है। देखो, समस्त श्रुतियोंकी मुकुटमणिरूप उपनिषद्स्वरूप रत्नोंकी मालाकी चमचमाती हुई कान्तिके द्वारा, आपके चरणकमलोंके अन्तभागकी अर्थात् नखोंकी आरती उतारी जाती है और मुक्तमुनिगण भी आपकी उपासना करते रहते हैं।”]

श्रीसनातन प्रभु (बृहद्भागवतामृतके प्रथम खण्ड प्रथम अध्यायके नौवें श्लोकमें)— “जयति जयति नामानन्दरूपं मुरारे- र्विरमितनिजधर्मध्यानपूजादियत्नम्। कथमपि सकृदात्तं मुक्तिदं प्राणिनां यत् परमममृतमेकं जीवनं भूषणं मे॥” [अर्थात् “जो वर्णाश्रमधर्म, ध्यान और पूजादिसे छुटकारा देनेवाले हैं अर्थात् जो वर्णाश्रमधर्मके अनुष्ठान, ध्यान-परायण व्यक्तियोंका मनोनिग्रह तथा पूजा-निष्ठित व्यक्तियोंके पूजाके उपकरण संग्रह आदि दुःखोंका निवारण करते हैं; जो किसी प्रकार एकबार मात्र गृहीत होनेपर प्राणीमात्रको मुक्ति प्रदान करते हैं, जो मेरे (ग्रन्थकारके) एकमात्र परम अमृतस्वरूप-जीवनस्वरूप- भूषणस्वरूप हैं, वे आनन्दमय श्रीहरिनाम सभी प्रकारसे जययुक्त हों, जययुक्त हों।”]

(भाः 2/1/11)— “एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम्। योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्त्तनम्॥” [अर्थात् “हे राजन्! जो इस संसारसे विरक्त होकर एकान्तिक भक्ति कर रहे हैं, जिनकी स्वर्ग अथवा मोक्षादिकी कामना है और जो आत्माराम योगी पुरुष हैं, उन सभीके लिये श्रीहरिके नाम और गुणोंका पुनः-

114 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/71-78 ] पुनः श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही परम साधन और साध्यके रूपमें पूर्व-पूर्व आचार्योंके द्वारा निर्णीत हुआ है।"] (भाः 6/3/22)— “एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः॥” [अर्थात् “श्रीभगवान् वासुदेवका जो नामसङ्कीर्तन आदि भक्तियोग है, इस जगत्में जीवोंके लिये बस वही परम धर्म कहा गया है।"] श्रीगौरहरिके (स्वकृत शिक्षाष्टकके तृतीय श्लोकमें)— “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥” [अर्थात् “जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्तन करनेके अधिकारी हैं।"] 'निरपराधे' अर्थात् दस नामापराधोंसे रहित निरन्तर अथवा विश्रामरहित नामसेवामें रत होकर। 'दस नामापराध', - आदिलीला 8/24 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य और अनुभाष्य देखें ॥ 71 ॥ महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार श्रीसनातनके द्वारा फल्गु देहत्यागकी इच्छाको परित्याग करनेरूपी लीलाके अभिनयके द्वारा जीवोंको शिक्षा प्रदान :- एत शुनि' सनातनेर हैल चमत्कार। 'प्रभुरे ना भाय मोर मरण-विचार ॥ 72 ॥ सर्वज्ञ महाप्रभु निषेधिला मोरे।' प्रभुर चरण धरि' कहेन ताँहारे ॥ 73 ॥ निष्किञ्चन वैष्णवाचार्य श्रीसनातनकी दैन्योक्ति, महाप्रभुकी स्तुति और अपने दैहिक कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :- “सर्वज्ञ, कृपालु तुमि - ईश्वर स्वतन्त्र। यैछे नाचाओ, तैछे नाचि, -येन काष्ठयन्त्र ॥ 74 ॥ नीच, अधम, पामर मुञि पामर-स्वभाव। मोरे जियाइले तोमार किबा हबे लाभ ? ?"75 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके वचनोंको सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी आश्चर्यचकित हो गये। श्रीसनातन गोस्वामी समझ गये कि 'मेरे आत्महत्या करनेके विचारमें महाप्रभुका अनुमोदन नहीं है और सर्वज्ञ महाप्रभुने मुझे इसके लिये निषेध किया है।' श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर उनसे कहा, – “आप सर्वज्ञ, कृपालु और स्वतन्त्र ईश्वर हैं। मैं तो काठसे बने यन्त्रके समान हूँ, आप मुझे जैसे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। मैं नीच, अधम, पापी हूँ और मेरा स्वभाव भी पापी व्यक्तिवाला है। तो फिर मुझे जीवित रखनेसे आपको क्या लाभ होगा?"72-75 ॥ अनुभाष्य—'ना भाय',—'योग्य' कहलानेका बोध नहीं होता ॥ 72 ॥ महाप्रभुका उत्तर; श्रीसनातनका काय-मन-वाक्यादि सर्वस्व ही श्रीगौर-कृष्णके द्वारा आत्मसात्, उसके द्वारा ही श्रीगौर-कृष्णके द्वारा अपना सेवा-कार्य-साधन :- प्रभु कहे, - "तोमार देह मोर निज-धन। तुमि मोरे करियाछ आत्मसमर्पण ॥ 76 ॥ दीक्षासिद्ध भक्तोंके लिये श्रीकृष्णकी इच्छाको ही अपनी परिचालिका मानकर उसके आनुगत्यमें अपने कर्त्ता होनेके अभिमान अथवा अहङ्कारके त्यागकी कर्त्तव्यता :- परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते ? धर्माधर्म-विचार किबा ना पार करिते ? ? 77 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “तुम्हारी देह मेरी अपनी सम्पत्ति है। तुमने इसे मुझे आत्म-समर्पण किया है। तुम किसी दूसरेकी वस्तुको विनष्ट क्यों करना चाहते हो? धर्म-अधर्मका विचार क्यों नहीं करते हो? 76-77 ॥ सनातन भगवान् श्रीकृष्ण-चैतन्यके अभिन्न प्रकाश-विग्रह चिद्विलास श्रीसनातन प्रभु :- तोमार शरीर- मोर प्रधान 'साधन'। ए शरीरे साधिमु आमि बहु प्रयोजन ॥ 78 ॥ अनुवाद—तुम्हारा शरीर मेरे मनोभीष्टकी पूर्तिके लिये प्रधान साधन है। तुम्हारे इस शरीरके द्वारा मैं

[ 4/78-86 चौथा अध्याय 115 अपने बहुतसे प्रयोजन सिद्ध करूँगा ॥ 78 ॥ मथुरामण्डलमें श्रीसनातनके माध्यमसे महाप्रभुके द्वारा (1) भक्त और भगवद्-तत्त्व अथवा अभिधेय, सम्बन्ध और प्रयोजन-तत्त्वका प्रकाश, (2) वैष्णव-स्मृति- सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-सदाचार-प्रवर्त्तन, (3) मठ- मन्दिरादिमें श्रीकृष्णविग्रह अर्चनरूपी वैधीभक्ति, मनमें राग अथवा प्रेमसेवाके आदर्शका प्रदर्शन और (4) लुप्त-तीर्थोंका उद्धार और युक्तवैराग्यके साथ शुद्धभक्तिमय जीवन दिखलाकर शिक्षा :- भक्त-भक्ति-कृष्णप्रेम-तत्त्वेर निर्धार। वैष्णवेर कृत्य आर वैष्णव-आचार ॥ 79 ॥ कृष्णभक्ति, कृष्णप्रेमसेवा-प्रवर्त्तन। लुप्ततीर्थ-उद्धार आर वैराग्य-शिक्षण ॥ 80 ॥ निज-प्रियस्थान मोर-मथुरा-वृन्दावन। ताँहा एत धर्म चाहि करिते प्रचारण ॥ 81 ॥ अनुवाद—"मैं भक्त, भक्ति और कृष्णप्रेम-तत्त्वका निर्धारण, वैष्णवोंके कृत्य तथा वैष्णव-आचार, कृष्णभक्ति, कृष्णकी प्रेमपूर्वककी जानेवाली सेवाका प्रवर्त्तन, लुप्त तीर्थोंका उद्धार एवं वैराग्यकी शिक्षा—इन सभी तत्त्वोंका अपने प्रिय स्थान मथुरा-वृन्दावनमें प्रचार करना चाहता हूँ॥ 79-81 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा सर्वप्रथम श्रीबृहद्भागवतामृतकी रचना करवाकर भक्त-भक्ति- कृष्णप्रेमतत्त्वको निर्धारित किया है; दूसरा, श्रीहरिभक्तिविलास संग्रह करवाकर वैष्णवोंके कृत्य और वैष्णवोंके आचारको निर्धारित किया है; तीसरा, श्रीसनातन गोस्वामीके अद्भुत अनुष्ठानके द्वारा श्रीवृन्दावनमें श्रीविग्रहोंकी सेवा एवं आदर्श भजनानन्दमय चरित्रके द्वारा मानसमें व्रज-भजनका प्रवर्त्तन करवाया है; चौथा, कुण्डादि लुप्त तीर्थसमूहका उद्धार एवं उनके वैराग्ययुक्त भक्तिरसमय आदर्श भक्तजीवनके द्वारा शुद्धभक्तोंके अनुकरणीय विषयोंसे सुदूर अवस्थित विरक्त जीवन-यापनकी शिक्षा दी है। श्रीमथुरा और वृन्दावन श्रीगौरसुन्दरकी अत्यन्त प्रियभूमि है, श्रीसनातनको उस भूमिमें अवस्थान कराकर महाप्रभुने उनके द्वारा पूर्वोक्त धर्मसमूहका प्रचार करनेकी अभिलाषा की॥ 79-81 ॥ माताकी आज्ञासे स्वयं क्षेत्रमण्डलमें रहकर अपने अभिन्न प्रकाश-विग्रह चिद्विलास श्रीसनातनके रूपमें मथुरामण्डलमें पूर्वोक्त चार प्रकारकी मनोऽभीष्ट कृष्णसेवाका सम्पादन :- मातार आज्ञाय आमि बसि नीलाचले। ताँहा 'धर्म' शिखाइते नाहि निज-बले ॥ 82 ॥ अनुवाद—मैं माताकी आज्ञासे इस जगन्नाथपुरीमें रह रहा हूँ। इसलिये मैं मथुरा-वृन्दावनमें जाकर वहाँके लोगोंको धाममें रहकर प्रेमधर्मका पालन कैसे किया जाय, यह नहीं सिखा सकता ॥ 82 ॥ अनुभाष्य— 'ताँहा',—मथुरामण्डलमें ॥ 82 ॥ एत सब कर्म आमि ये-देहे करिमु। ताहा छाड़िते चाह तुमि, केमने सहिमु ? ?”83 ॥ अनुवाद—इन सब कार्योंको मैं जिस देहके द्वारा करना चाहता हूँ, तुम मेरी उसी देहको त्यागना चाहते हो। मैं इसे कैसे सहन कर सकता हूँ?”83 ॥ श्रीसनातनके द्वारा स्वयंको यन्त्रके रूपमें और महाप्रभुको यन्त्री जानकर महाप्रभुकी स्तुति :- तबे सनातन कहे,–“तोमाके नमस्कारे। तोमार गम्भीर हृदय के बुझिते पारे ? ?84 ॥ काष्ठेर पुतली येन कुहके नाचाय। आपने ना जाने, पुतली किबा नाचे गाय ! !85 ॥ यारे यैछे नाचाओ, से तैछे करे नर्त्तने। कैछे नाचे, केबा नाचाय, सेह नाहि जाने ॥”86 ॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपके हृदयके गम्भीर भावोंको कौन समझ सकता है? मदारी जैसे काठकी पुतलीको नचाता है, तो पुतली स्वयं यह नहीं जानती

116 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/84-95 ] कि वह कैसे नाचती-गाती है! उसी प्रकार आप जिसे जैसे नचाते हैं, वह वैसे ही नृत्य करता है। किन्तु वह कैसे नाचता है, उसे कौन नचाता है, वह इस बातको नहीं जानता॥"84-86॥ श्रीहरिदासको साक्षी मानकर महाप्रभुके द्वारा उनपर अपने निजी कहकर स्वीकार किये गये श्रीसनातनकी देहके रक्षणका भार-अर्पण :- हरिदासे कहे प्रभु,—"शुन, हरिदास। परेरे द्रव्य इँहो चाहेन करिते विनाश॥ 87 ॥ परेरे स्थाप्य द्रव्य केह ना खाय, बिलाय। निषेधिह इँहारे,—येन ना करे अन्याय॥"88॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा,—"हे हरिदास, सुनो! यह सनातन दूसरेकी वस्तुको विनष्ट करना चाहता है। किसी दूसरेकी धरोहरको न तो स्वयं ही भोग करना चाहिये और न ही बाँटना चाहिये। इसलिये इसे ऐसे अन्यायपूर्ण कार्य करनेसे आप निषेध करना॥"87-88॥ अनुभाष्य—'स्थाप्य',—रक्षणीय; 'खाय',—स्वयं ही भोग करे; 'बिलाय',—वितरण करे, 'अन्याय'—मुझमें अर्थात् कृष्णमें समर्पित इसकी देहका विनाश॥ 88॥ श्रीहरिदासके द्वारा जीवोंको शिक्षा,—अधोक्षज महाप्रभुकी अप्राकृत हृदयगत कृष्णेन्द्रिय-तर्पण-इच्छाके आनुगत्यमें ही बद्धजीवके द्वारा फल्गु-अहङ्कारत्यागकी कर्त्तव्यता :- हरिदास कहे,—"मिथ्या अभिमान करि। तोमार गम्भीर हृदय बुझिते ना पारि॥ 89 ॥ कोन् कोन् कार्य तुमि कर कोन् द्वारे। तुमि ना जानाइले केह जानिते ना पारे॥ 90 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीसनातनके महाप्रभु-कृपा-प्राप्ति रूपी सौभाग्यका वर्णन करके महाप्रभुकी स्तुति :- एतादृश तुमि इँहारे करियाछ अङ्गीकार। एत सौभाग्य इँहा ना हय काहार॥"91॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"हम तो मिथ्या अभिमान करते हैं। वास्तवमें हम आपके हृदयके गम्भीर भावोंको नहीं समझ सकते। कौन-कौनसे कार्य आप किसके द्वारा करते हैं, उसे आपके द्वारा जनाये बिना कोई नहीं जान सकता। ऐसे गम्भीर हृदयवाले आपने इनको (श्रीसनातनको) अङ्गीकार किया है, इसलिये इनका जितना सौभाग्य है, उतना सौभाग्य अन्य किसीका भी नहीं है॥"89-91॥ दोनोंको आलिङ्गन करनेके बाद महाप्रभुका प्रस्थान :- तबे महाप्रभु करि' दुँहारे आलिङ्गन। 'मध्याह्न' करिते उठि' करिला गमन॥ 92 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातनको आलिङ्गन किया और अपने मध्याह्न-कृत्य करनेके लिये उठकर चल दिये॥ 92 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीसनातनके सौभाग्यका वर्णन :- सनातने कहे हरिदास करि' आलिङ्गन। "तोमार भागयेर सीमा ना याय कथन॥ 93 ॥ श्रीसनातनकी देह महाप्रभुका ही अपना कहकर स्वीकार किया गया धन :- तोमार देह कहेन प्रभु 'मोर निज-धन'। तोमा-सम भाग्यवान् नाहि कोन जन॥ 94 ॥ मथुरामण्डलमें श्रीसनातनकी देहके द्वारा महाप्रभुके चार प्रकारके मनोऽभीष्ट-सम्पादन :- निज-देहे ये कार्य ना पारेन करिते। से कार्य कराइबे तोमा, सेह मथुराते॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करते हुए कहा,—"तुम्हारे भाग्यकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा सकता। तुम्हारे शरीरको महाप्रभु 'मेरी निजी-सम्पत्ति' कहते हैं। तुम्हारे समान भाग्यवान् अन्य कोई व्यक्ति नहीं है। महाप्रभु अपनी देहके द्वारा जिन कार्योंको नहीं कर पा रहे, वे कार्य तुम्हारे द्वारा करवायेंगे और इन कार्योंको वे मथुरामें करवायेंगे॥ 93-95॥

[ 4/95-103 चौथा अध्याय 117 अनुभाष्य-पूर्वोक्त (इसी अध्यायकी) 82-83 संख्याकी उक्तिके तात्पर्यके लिये 79-81 संख्या देखें ॥95॥ सफलता अथवा सिद्धि-श्रीकृष्णकी इच्छाकी अनुगामी दासी :- ये कराइते चाहे ईश्वर, सेइ सिद्ध हय। तोमार सौभाग्य एइ कहिलुँ निश्चय ॥96॥ श्रीसनातनके माध्यमसे महाप्रभुके द्वारा मुख्यतः शुद्धभक्ति और वैष्णव स्मृतिके सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-आचारका संस्थापन :- भक्तिसिद्धान्त, शास्त्र-आचार-निर्णय। तोमाद्वारे कराइबेन, बुझिलुँ आशय ॥97॥ श्रीहरिदासका स्वाभाविक वैष्णवोचित दैन्य और हृदयकी व्यथाको बतलाना :- आमार एइ देह प्रभुर कार्ये ना लागिल। भारत-भूमिते जन्मि' एइ देह व्यर्थ हैल॥"98॥ अनुवाद-भगवान् जो भी कार्य करवाना चाहते हैं, वह कार्य अवश्य ही सिद्ध होता है। यह तुम्हारा सौभाग्य ही है, मैं इस बातको निश्चित रूपसे कह रहा हूँ। मुझे महाप्रभुके कहनेका यही आशय समझ आता है कि वे भक्ति-सिद्धान्त और शास्त्रीय-आचरणके निर्णयको तुम्हारे द्वारा प्रकाशित करवाना चाहते हैं। मेरा यह शरीर महाप्रभुके किसी भी कार्यमें नहीं लग सका, इसलिये भारत-भूमिमें जन्म ग्रहण करनेपर भी मेरा यह शरीर धारण करना व्यर्थ हो गया है॥"96-98॥ अनुभाष्य-'भारत-भूमिते,'-आदिलीला 9/41 संख्या और भाः 5/19/19-27 श्लोक देखें ॥98॥ श्रीसनातनके द्वारा श्रीहरिदासकी स्तुति :- सनातन कहे,-"तोमा-सम केबा आछे आन? महाप्रभुर गणे तुमि-महाभाग्यवान् ! ॥99॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,-"हे श्रीहरिदास ठाकुर ! आपके समान अन्य कौन है? आप महाप्रभुके गणोंमें-से एक हैं, इसलिये आप महाभाग्यवान् हैं !99॥ शुद्धकृष्णनाम कीर्तन अथवा प्रचार ही आचार्यरूपी भगवदवतारका अपना कार्य, कीर्तन-आचार्य श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुका नामका प्रचार :- अवतार-कार्य प्रभुर-नाम-प्रचारे। सेइ निज-कार्य प्रभु करेन तोमार द्वारे ॥100॥ अनुवाद-महाप्रभुके अवतरित होनेका मुख्य कार्य नामका प्रचार ही है, अपना वही कार्य महाप्रभु आपके द्वारा ही करवा रहे हैं॥100॥ अनुभाष्य-निजकार्य जो शुद्धकृष्णनामका प्रचार है, उसे महाप्रभुने श्रीहरिदासके द्वारा सम्पादित किया ॥100॥ ठाकुर श्रीहरिदासका आचार और प्रचार :- प्रत्यह कर तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्त्तन। सबार आगे कर नामेर महिमा कथन ॥101॥ अनुवाद-आप प्रतिदिन तीन लाख नाम-सङ्कीर्तन करते हैं और सभीको नामकी महिमा बतलाते हैं॥101॥ असुष्ठु अथवा असम्पूर्ण आचार-प्रचार :- आपने आचरे केह, ना करे प्रचार। प्रचार करेन केह, ना करेन आचार ॥102॥ अनुवाद-कई व्यक्ति स्वयं तो आचरण करते हैं, किन्तु प्रचार नहीं करते। अन्य कई व्यक्ति प्रचार तो करते हैं, किन्तु आचरण नहीं करते॥102॥ कृष्णेन्द्रिय प्रीतियुक्त चेष्टामय यथार्थ आचार्यका ही शुद्धनाम-भक्ति प्रचारमें अधिकार; चारों प्रकारके वर्णाश्रमके व्यक्ति तथा जगत्के गुरु वैष्णवाचार्य परमहंस श्रीहरिदास ठाकुरका आदर्श जीवन :- 'आचार', 'प्रचार'-नामेर करह 'दुइ' कार्य। तुमि-सर्वगुरु, तुमि-जगतेर आर्य ॥"103॥ अनुवाद-आप नामका 'आचार' और 'प्रचार'-इन दोनों कार्योंको करते हैं। आप सभीके गुरु तथा जगत्के आर्य अर्थात् श्रेष्ठ भक्त हैं॥"103॥ अनुभाष्य-श्रीहरिदास ठाकुर-सर्वमान्य जगद्गुरु

118 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/103-112 ] हैं, क्योंकि वे एक ही साथ स्वयं दीक्षित ब्राह्मणके रूपमें शुद्धनाम ग्रहण करके 'आचार्य' और उच्चकीर्तन करके समस्त जगतवासियोंको नाम-यज्ञमें दीक्षित करवाकर 'प्रचारक' हैं—यही उनका 'आचार और प्रचार' है॥ 103 ॥ श्रीहरिदास और श्रीसनातनका परस्पर कृष्णकथाकी चर्चामें समय व्यतीत करना :- एइमत दुइजन नाना-कथा-रङ्गे। कृष्णकथा आस्वाद्य रहिं एकसङ्गे ॥ 104 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामी एकसाथ रहकर अनेक प्रकारकी कृष्णकथाके आनन्दका आस्वादन करते ॥ 104 ॥ रथयात्राके समय गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन और दर्शन :- यात्राकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् कैला सबे रथयात्रा दरशन ॥ 105 ॥ अनुवाद—रथयात्राके समय गौड़देशके समस्त भक्त आये तथा पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभीने रथयात्राके दर्शन किये ॥ 105 ॥ रथके आगे महाप्रभुके नृत्यको देखकर श्रीसनातनका विस्मय :- रथ-अग्रे प्रभु तैछे करिला नर्त्तन। देखिं चमत्कार हैल सनातनेर मन ॥ 106 ॥ अनुवाद—रथके सामने महाप्रभुने पहलेकी भाँति नृत्य किया। उसे देखकर श्रीसनातन गोस्वामीके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 106 ॥ चातुर्मास्यके समय गौड़ीय और उड़िया भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :- वर्षार चारिमास रहिला सब निज-भक्तगणे। सबा-सङ्गे प्रभु मिलाइला सनातने ॥ 107 ॥ अनुवाद—वर्षा ऋतुके चार मास तक गौड़देशसे आये सभी भक्त श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको उन सब भक्तोंसे मिलवाया ॥ 107 ॥ अद्वैत, नित्यानन्द, श्रीवास, वक्रेश्वर। वासुदेव, मुरारि, राघव, दामोदर ॥ 108 ॥ पुरी, भारती, स्वरूप, पण्डित-गदाधर । सार्वभौम, रामानन्द, जगदानन्द, शङ्कर ॥ 109 ॥ काशीश्वर, गोविन्दादि यत भक्तगण। सबा-सने सनातनेर कराइला मिलन ॥ 110 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवास पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीराघव पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीगोविन्द आदि जितने भक्त थे, महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीकी उन सबसे भेंट करवायी ॥ 108-110 ॥ श्रीसनातन सभीकी ही प्रीतिके पात्र :- यथायोग्य सबार कैला चरण वन्दन। ताँरे कराइला सबार कृपार भाजन ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने यथायोग्य सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुकी कृपाके कारण श्रीसनातन उन सभीकी कृपाके पात्र बन गये ॥ 111 ॥ अपने गुणोंके द्वारा विष्णु-वैष्णवके स्नेह-प्रीतिके पात्र :- सद्गुणे, पाण्डित्ये, सबार प्रिय-सनातन। यथायोग्य कृपा-मैत्री-गौरव-भाजन ॥ 112 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी अपने सद्गुणों तथा पाण्डित्यके कारण सबके प्रिय थे। वे महाप्रभुके भक्तोंमें-से यथायोग्य किसीकी कृपा, किसीकी मित्रता और अन्य किसीके गौरवके पात्र थे ॥ 112 ॥

[ 4/113-121 चौथा अध्याय 119 गौड़ीय भक्तोंका गौड़देशमें लौटना और महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनका आह्वान, श्रीसनातनका पुरीमें अवस्थान :- श्रीसनातनका आनन्द :- सकल वैष्णव यबे गौड़देशे गेला। मध्याह्न-भिक्षाकाले सनातने बोलाइल। सनातन महाप्रभुर चरणे रहिला ॥ 113 ॥ प्रभु बोलाइला, ताँर आनन्द बाड़िल ॥ 117 ॥ अनुवाद-जब सभी वैष्णव गौड़देश लौट गये, तब अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न भोजनके समय श्रीसनातन भी श्रीसनातन महाप्रभुके चरणकमलोंके आश्रयमें ही गोस्वामीको भी बुलवाया। महाप्रभुने मुझे बुलाया है-इससे रहे ॥ 113 ॥ श्रीसनातन गोस्वामीका आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 117 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीसनातनका दोलयात्राका दर्शन :- दोलयात्रा-आदि प्रभुर सङ्गेते देखिल। महाप्रभुकी प्रीतिके वशीभूत आत्म-विस्मृत श्रीसनातनका दिने-दिने प्रभुसङ्गे आनन्द बाड़िल ॥ 114 ॥ देहस्मृतिकी लुप्त-अवस्थामें प्रखर तप्त तीक्ष्ण बालूके पथपर महाप्रभुके समीप गमन :- अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके साथ दोलयात्रा मध्याह्ने समुद्र-बालु हञाछे अग्नि-सम। आदिका दर्शन किया। इस प्रकार महाप्रभुके साथ रहते सेइपथे सनातन करिला गमन ॥ 118 ॥ हुए दिन-प्रतिदिन उनका आनन्द बढ़ने लगा ॥ 114 ॥ 'प्रभु बोलाञाछे'-एइ आनन्दित मने। ज्येष्ठ मासमें श्रीसनातनकी परीक्षा-विषयक तप्त-बालुकाते पा पोड़े, ताहा नाहि जाने ॥ 119 ॥ वृत्तान्तका वर्णन :- दुइ पाये फोस्का हैल, तबु गेला प्रभुस्थाने। पूर्व वैशाखमासे सनातन यबे आइला। भिक्षा करि' महाप्रभु करियाछेन विश्रामे ॥ 120 ॥ ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे परीक्षा करिला ॥ 115 ॥ महाप्रभुके भुक्त-अवशिष्ट प्रसादकी प्राप्ति :- अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी पहले जब वैशाख-मासमें भिक्षा-अवशेष-पात्र गोविन्द तारे दिला। जगन्नाथपुरीमें आये थे, तब महाप्रभुने ज्येष्ठमासमें उनकी प्रसाद पाञा सनातन प्रभुपाशे आइला ॥ 121 ॥ परीक्षा ली थी ॥ 115 ॥ अनुवाद-दोपहरके समय समुद्रकी बालू आगकी यमेश्वर-टोटामें महाप्रभुके द्वारा दोपहरमें भिक्षा :- भाँति तप रही थी, परन्तु श्रीसनातन गोस्वामी उसी ज्येष्ठमासे प्रभु यमेश्वर-टोटा आइला। पथसे गये। 'महाप्रभुने बुलाया है' - इस बातसे उनके भक्त-अनुरोधे ताँहा भिक्षा ये करिला ॥ 116 ॥ मनमें इतना आनन्द हो रहा था कि तपती बालूसे अनुवाद-ज्येष्ठ मासमें महाप्रभु यमेश्वर तोटा उनके पाँव जल रहे हैं, इस बातका उन्हें अनुभव ही आये तो भक्तोंके अनुरोधपर उन्होंने वहींपर भिक्षा नहीं हुआ। उनके दोनों पाँवोंमें फफोले पड़ गये, तब (भोजन) ग्रहण करना स्वीकार किया ॥ 116 ॥ भी वे महाप्रभुके पास गये। उस समय महाप्रभु भोजन अनुभाष्य- 'यमेश्वर-टोटा,'-यमेश्वर-शिवके बगीचेवाली करनेके बाद विश्राम कर रहे थे। श्रीगोविन्दने श्रीसनातन गलीमें; तोटा-शब्दका अर्थ उड़िया भाषामें 'बगीचा' होता गोस्वामीको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रदान किया। वे प्रसाद है ॥ 116 ॥ पाकर महाप्रभुके पास आ गये ॥ 118-121 ॥