श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2136, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/113-121 चौथा अध्याय 119 गौड़ीय भक्तोंका गौड़देशमें लौटना और महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनका आह्वान, श्रीसनातनका पुरीमें अवस्थान :- श्रीसनातनका आनन्द :- सकल वैष्णव यबे गौड़देशे गेला। मध्याह्न-भिक्षाकाले सनातने बोलाइल। सनातन महाप्रभुर चरणे रहिला ॥ 113 ॥ प्रभु बोलाइला, ताँर आनन्द बाड़िल ॥ 117 ॥ अनुवाद-जब सभी वैष्णव गौड़देश लौट गये, तब अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न भोजनके समय श्रीसनातन भी श्रीसनातन महाप्रभुके चरणकमलोंके आश्रयमें ही गोस्वामीको भी बुलवाया। महाप्रभुने मुझे बुलाया है-इससे रहे ॥ 113 ॥ श्रीसनातन गोस्वामीका आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 117 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीसनातनका दोलयात्राका दर्शन :- दोलयात्रा-आदि प्रभुर सङ्गेते देखिल। महाप्रभुकी प्रीतिके वशीभूत आत्म-विस्मृत श्रीसनातनका दिने-दिने प्रभुसङ्गे आनन्द बाड़िल ॥ 114 ॥ देहस्मृतिकी लुप्त-अवस्थामें प्रखर तप्त तीक्ष्ण बालूके पथपर महाप्रभुके समीप गमन :- अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके साथ दोलयात्रा मध्याह्ने समुद्र-बालु हञाछे अग्नि-सम। आदिका दर्शन किया। इस प्रकार महाप्रभुके साथ रहते सेइपथे सनातन करिला गमन ॥ 118 ॥ हुए दिन-प्रतिदिन उनका आनन्द बढ़ने लगा ॥ 114 ॥ 'प्रभु बोलाञाछे'-एइ आनन्दित मने। ज्येष्ठ मासमें श्रीसनातनकी परीक्षा-विषयक तप्त-बालुकाते पा पोड़े, ताहा नाहि जाने ॥ 119 ॥ वृत्तान्तका वर्णन :- दुइ पाये फोस्का हैल, तबु गेला प्रभुस्थाने। पूर्व वैशाखमासे सनातन यबे आइला। भिक्षा करि' महाप्रभु करियाछेन विश्रामे ॥ 120 ॥ ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे परीक्षा करिला ॥ 115 ॥ महाप्रभुके भुक्त-अवशिष्ट प्रसादकी प्राप्ति :- अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी पहले जब वैशाख-मासमें भिक्षा-अवशेष-पात्र गोविन्द तारे दिला। जगन्नाथपुरीमें आये थे, तब महाप्रभुने ज्येष्ठमासमें उनकी प्रसाद पाञा सनातन प्रभुपाशे आइला ॥ 121 ॥ परीक्षा ली थी ॥ 115 ॥ अनुवाद-दोपहरके समय समुद्रकी बालू आगकी यमेश्वर-टोटामें महाप्रभुके द्वारा दोपहरमें भिक्षा :- भाँति तप रही थी, परन्तु श्रीसनातन गोस्वामी उसी ज्येष्ठमासे प्रभु यमेश्वर-टोटा आइला। पथसे गये। 'महाप्रभुने बुलाया है' - इस बातसे उनके भक्त-अनुरोधे ताँहा भिक्षा ये करिला ॥ 116 ॥ मनमें इतना आनन्द हो रहा था कि तपती बालूसे अनुवाद-ज्येष्ठ मासमें महाप्रभु यमेश्वर तोटा उनके पाँव जल रहे हैं, इस बातका उन्हें अनुभव ही आये तो भक्तोंके अनुरोधपर उन्होंने वहींपर भिक्षा नहीं हुआ। उनके दोनों पाँवोंमें फफोले पड़ गये, तब (भोजन) ग्रहण करना स्वीकार किया ॥ 116 ॥ भी वे महाप्रभुके पास गये। उस समय महाप्रभु भोजन अनुभाष्य- 'यमेश्वर-टोटा,'-यमेश्वर-शिवके बगीचेवाली करनेके बाद विश्राम कर रहे थे। श्रीगोविन्दने श्रीसनातन गलीमें; तोटा-शब्दका अर्थ उड़िया भाषामें 'बगीचा' होता गोस्वामीको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रदान किया। वे प्रसाद है ॥ 116 ॥ पाकर महाप्रभुके पास आ गये ॥ 118-121 ॥