भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2137

120 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/122-127 ] स्नेहपूर्वक महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके उपायकी जिज्ञासा, श्रीसनातनका दैन्यसहित उत्तर :- प्रभु कहे,—“कोन पथे आइला सनातन?” तँह कहे,—“समुद्र-पथे, करिलुँ आगमन॥”122॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, तुम कौनसे मार्गसे आये हो?” उन्होंने उत्तर दिया,—“मैं समुद्रतटके मार्गसे आया हूँ॥”122॥ प्रभु कहे,—“तप्त-बालुकाते केमने आइला? सिंहद्वारेर पथ—शीतल, केने ना आइला??123॥ तप्त-बालुकाय तोमार पाय हैल व्रण। चलिते ना पार, केमने करिला सहन??”124॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम तपती बालूपर कैसे चलकर आये? सिंहद्वारका मार्ग तो शीतल है, तुम वहाँसे क्यों नहीं आये? तपती बालूपर चलकर आनेसे तुम्हारे पाँवोंमें फफोले पड़ गये हैं। अब तो तुम चल भी नहीं पा रहे हो, तुमने यह सब कैसे सहन किया?”123-124॥ अनुभाष्य—‘सिंहद्वार’,—जगन्नाथमन्दिरके मूल पूर्वदिशावाले द्वारको सिंहद्वार कहते हैं॥123॥ सनातन कहे,—“दुःख बहुत ना पाइलुँ। पाये व्रण हञाछे ताहा ना जानिलुँ॥125॥ स्वयं रागमार्गीय परमहंस होनेपर भी आदर्श मानप्रदाता वैष्णवाचार्यके रूपमें श्रीसनातन प्रभुके द्वारा साधकोंको शिक्षा प्रदान करनेके लिये वैध अर्चन-मार्गके प्रति यथोचित मर्यादाका प्रदर्शन :- सिंहद्वारे याइते मोर नाहि अधिकार। विशेषे—ठाकुरेर ताँहा सेवकेर प्रचार॥126॥ सेवक गतागति करे, नाहि अवसर। तार स्पर्श हैले, सर्वनाश हवे मोर॥”127॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मुझे कुछ अधिक कष्ट नहीं हुआ। पैरोंमें फफोले पड़ गये हैं, मुझे पता ही नहीं चला। सिंहद्वारकी ओरसे आनेका मेरा अधिकार नहीं है, विशेषकर उस मार्गपर श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंका निरन्तर आना-जाना लगा रहता है। श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके सब समय उस मार्गपर आने-जाने-से मार्ग कभी भी खाली नहीं रहता। इसलिये उनसे मेरा स्पर्श होनेपर तो मेरा सर्वनाश हो जायेगा॥”125-127॥ अमृतानुकणिका—ज्येष्ठ-मासमें दोपहरके समय सूर्यके प्रखर तापसे गोवर्धनकी शिलाएँ तप्त हो रही थीं। श्रीकृष्ण गोचारण करते-करते गोवर्धनकी तलहटीमें पहुँचे और राधाजी पर्वतके ऊपर खड़ी होकर वहाँसे श्रीकृष्णको देख रही थीं। ऊपरसे सूर्यका ताप आ रहा था और नीचेसे शिलाके तप्त होनेके कारण उनके चरणोंके तलवोंमें फफोले पड़ रहे थे। राधाजीके चरणकमल तो अत्यन्त कोमल हैं, किन्तु श्रीकृष्णके दर्शनसे उनको इतना आनन्द हो रहा था कि उन्हें कोई कष्ट ही नहीं अनुभव हो रहा था। इसी प्रकार गिरिराज गोवर्धनको इन्द्रके वज्रके प्रहारका पता ही नहीं चल रहा था। (श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तीकृत श्रीश्रीगोवर्धनाष्टकम् 2)— स्वप्रेष्ठहस्ताम्बुज सौकुमार्य सुखानुभूते रतिभुमम्नि वृत्ते। महेन्द्र-वज्राहतिमपजानन्न् गोवर्धनो मे दिशतामभीष्टम्॥ अर्थात् “जो अपने प्रियतमके करकमलोंकी सुकुमारताके द्वारा अनुभूत अतिशय सुखके कारण महेन्द्रके असंख्य वज्रके आघातको भी नहीं जान पा रहे हैं, वे श्रीगोवर्धन मुझे समस्त अभीष्ट प्रदान करें।” शुद्धभक्तोंके साथ भी ऐसा ही होता है। उनको अपने शरीरकी भी सुधबुध नहीं होती। उनका शरीर प्राकृत नहीं होता, किन्तु यदि उसे प्राकृत भी मान लें, तो भी उनका भजनमें इतना आवेश होता है कि संसारका कोटि-कोटि दुःख भी उनको प्रतीत नहीं होता। तप्त बालूके ऊपर चलते हुए श्रीसनातन गोस्वामीके चरणोंमें फफोले पड़ रहे थे, किन्तु महाप्रभुके साथ मिलन होगा, इस परमानन्दके साथ वे चले जा