श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 4/125-133 चौथा अध्याय 121 रहे थे। इसी प्रकारसे जब कोई मध्यम अधिकारसे धीरे-धीरे ऊपर उठता है, तो उत्तम-कनिष्ठ अवस्थामें आनेपर उसको कोई भी कष्ट अनुभव नहीं होता। साधनावस्थामें ही भक्ति क्लेशघ्नी है, अर्थात् उस अवस्थामें ही क्लेश दूर हो जाते हैं। भावावस्थामें अति अल्प मात्रामें क्लेश रहनेपर भी भक्तको उनकी प्रतीति नहीं होती और प्रेमावस्थामें क्लेश उपस्थित ही नहीं होते और न ही भक्तको क्लेशादिकी अनुभूति होती है। यही प्रेमका लक्षण है। (भःरःसिः 2/1/280)— अविज्ञाताखिलक्लेशाः सदा कृष्णाश्रितक्रियाः। सिद्धाः स्युः सन्ततप्रेमसौख्यास्वादपरायणाः ॥ अर्थात् “जो सर्वदा कृष्ण-सम्बन्धी क्रियाओंमें पूर्णरूपसे निमग्न रहते हैं तथा किसी भी प्रकारके क्लेश या विघ्नसे अपरिचित रहते हैं, वे सिद्ध भक्त हैं।” यदि श्रीसनातन गोस्वामीको महाप्रभुका नित्य परिकर न भी मानें, तो भी सभी उनको उत्तम भक्त तो अवश्य ही मानेंगे। इसलिये श्रीसनातन गोस्वामीको कष्टकी प्रतीति नहीं हुई। जब कोई भक्त मध्यम अधिकारसे ऊपर उठ जाता है, तब वह कष्टको कष्ट ही नहीं मानता। श्रीकृष्णके दर्शनमें और उनकी कथाओंको सुननेमें यदि कोई दुःख भी है, तो उसको वह सुख ही मानता है। रागात्मिका भक्तोंमें (यथा अन्त्य, 20/52—‘ना गणि आपन दुःख------सेइ दुःख-मोर सुखवर्य॥’) और रागानुगा भक्तोंमें भी ऐसा ही होता है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज”॥ 125 ॥ श्रीसनातनकी उक्ति और मान देनेवाले व्यवहारके श्रवणसे महाप्रभुको आनन्द :— शुनि' महाप्रभु मने सन्तोष पाइला। तुष्ट हञा ताँरे किछु कहिते लागिला ॥ 128 ॥ भगवान्के द्वारा भक्तकी स्तुति :— “यद्यपिओ तुमि हओ जगत्पावन। तोमा-स्पर्शे पवित्र हय देव-मुनिगण ॥ 129 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा भक्त अथवा साधुकी रीति और गुणके वैशिष्ट्यका वर्णन :— तथापि भक्त-स्वभाव-मर्यादा-रक्षण। मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण ॥ 130 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीका विचार सुनकर महाप्रभुके मनमें प्रसन्नता हुई। प्रसन्न होकर महाप्रभु कुछ कहने लगे,—“हे सनातन ! यद्यपि तुम जगत्को पवित्र करनेवाले हो और तुम्हें स्पर्श करनेसे तो देवता और मुनिगण भी पवित्र होते हैं, तथापि मर्यादाकी रक्षा करना ही भक्तोंका स्वभाव होता है। मर्यादाका पालन करना ही साधुका भूषण है॥ 128-130 ॥ साधकके द्वारा मर्यादाके उल्लङ्घनका फल :— मर्यादा-लङ्घने लोक करे उपहास। इहलोक, परलोक-दुइ हय नाश ॥ 131 ॥ अनुवाद—मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे लोग उसका उपहास करते हैं और उसका यह लोक और परलोक-दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ 131 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा वैध-मर्यादाके पालनमें आदरका प्रदर्शन और श्रीसनातनके आचरणको देखकर उन्हें आचार्यके रूपमें अङ्गीकार करना :— मर्यादा राखिले, तुष्ट हय मोर मन। तुमि ऐछे ना करिले करे कोन् जन??”132 ॥ अनुवाद—मर्यादाका पालन करनेसे मेरा मन सन्तुष्ट होता है। यदि तुम ऐसा आचरण नहीं करोगे, तो फिर कौन करेगा ?”132 ॥ अप्राकृत देहवाले अपने श्रेष्ठ भक्तको भगवान्के द्वारा आलिङ्गन :— एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल। ताँर कण्डुरसा प्रभुर श्रीअङ्गे लागिल ॥ 133 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने ऐसा कहकर श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन किया तो उनके शरीरका पीब महाप्रभुके श्रीअङ्गपर लग गया॥ 133 ॥