भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2139

122 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/134-141 ] आलिङ्गनके फलसे महाप्रभुके शरीरमें अपने पीबके स्पर्शके कारण दैन्यविग्रह श्रीसनातनके द्वारा वेदनाका अनुभव :- बार बार निषेधेन, तबु करे आलिङ्गन। अङ्गे रसा लागे, दुःख पाय सनातन ॥ 134 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीसनातन गोस्वामीने बार बार महाप्रभुको आलिङ्गन करनेके लिये मना किया, तथापि महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। ऐसा करनेसे महाप्रभुके अङ्गोंमें पीब लग गया जिससे श्रीसनातन गोस्वामीको बहुत दुःख हुआ ॥ 134 ॥ श्रीसनातन-जगदानन्द-संवाद :- एइमते सेवक-प्रभु दुँहे घर गेला। आर दिन जगदानन्द सनातनेरे मिलिला ॥ 135 ॥ अनुवाद—तत्पश्चात् सेवक (श्रीसनातन गोस्वामी) और महाप्रभु, दोनों अपने-अपने वासस्थानपर चले गये। अगले दिन श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलने आये ॥ 135 ॥ अनुभाष्य— 'सेवक-प्रभु', - श्रीसनातन और श्रीमन्महाप्रभु ॥ 135 ॥ पण्डितके साथ कृष्णकथाका संलाप और प्रसङ्गवशतः श्रीसनातनके द्वारा अपने दुःखका ज्ञापन :- दुइजन बसि' कृष्णकथा-गोष्ठी कैला। पण्डितेरे सनातन दुःख निवे दिला ॥ 136 ॥ “इँहा आइलाङ प्रभुरे देखि' दुःख खण्डाइते। येबा मने, ताहा प्रभु ना दिला करिते ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीसनातन गोस्वामी, दोनों बैठकर श्रीकृष्णकथा-गोष्ठी करने लगे। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीजगदानन्द पण्डितसे अपना दुःख निवेदन करते हुए कहा, - "मैं अपने दुःखको दूर करनेके लिये यहाँ मनमें एक सङ्कल्प लेकर आया था, किन्तु महाप्रभुने मुझे वैसा करने नहीं दिया ॥ 136-137 ॥ अनुभाष्य— 'दुःख', - सर्वदा महाप्रभु और श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनरूपी 'सेवाके अभाव'से उत्पन्न कष्ट; 'येबा मने', - श्रीजगन्नाथ-रथके आगे महाप्रभुके नृत्यके समय अपनी देहत्याग ॥ 137 ॥ महाप्रभुकी देहमें अपने पीबके स्पर्श-हेतु दैन्यविग्रह श्रीसनातनमें लज्जा, वेदना और अपराधकी आशङ्का :- निषेधिते प्रभु आलिङ्गन करेन मोरे। मोर कण्डुरसा लागे प्रभुर शरीरे ॥ 138 ॥ अनुवाद-मेरे मना करनेपर भी महाप्रभु मेरा आलिङ्गन करते हैं जिससे मेरे शरीरका पीब महाप्रभुके शरीरपर लग जाता है॥ 138 ॥ अपराध हय मोर, नाहिक निस्तार। जगन्नाथेह ना देखिये, -ए दुःख अपार ॥ 139 ॥ अनुवाद-इससे मेरा अपराध होता है, जिसके कारण मेरा कभी भी निस्तार नहीं होगा। मैं भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन भी नहीं कर पाता - यह एक और अपार दुःख है ॥ 139 ॥ हित-निमित्त आइलाङ आमि, हैल विपरीते। कि करिले हित हय नारि निर्धारिते ॥"140॥ अनुवाद-मैं तो यहाँ अपने हितके लिये आया था, किन्तु सब कुछ उसके विपरीत हो गया। क्या करनेसे मेरा हित होगा, यह मैं निर्धारित नहीं कर पा रहा हूँ॥" 140 ॥ अमङ्गलकी आशङ्कासे पण्डितके द्वारा श्रीसनातनको वृन्दावन-गमनका परामर्श देना :- पण्डित कहे, - "तोमार वासयोग्य 'वृन्दावन' । रथयात्रा देखि' ताँहा करह गमन ॥ 141 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा, - "आपके रहने योग्य स्थान 'वृन्दावन' है। रथयात्रा देखकर आप वृन्दावन चले जाओ ॥ 141 ॥

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