भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2140

[ 4/142-149 चौथा अध्याय 123 प्रभुर आज्ञा हञाछे तोमा' दुइ भाये। वृन्दावने बैस, ताँहा सर्वसुख पाइये ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी आप और श्रीरूप, दोनों भाइयोंके लिये यही आज्ञा हुई है कि आप दोनों वृन्दावनमें ही रहो, वहींपर आपको सब प्रकारके सुखोंकी प्राप्ति होगी ॥ 142 ॥ ये-कार्ये आइला, प्रभुर देखिला चरण। रथे जगन्नाथ देखि' करह गमन॥”143 ॥ अनुवाद—आप जिस कार्यसे आये थे, वह तो पूर्ण हो गया, क्योंकि आपको महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शन हो गये हैं। अब आप रथपर विराजमान भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके वृन्दावनकी ओर प्रस्थान कीजिये ॥”143 ॥ श्रीसनातनकी सम्मति, श्रीवृन्दावनधामको अप्राकृत कृष्णधाम जाननेपर भी महाप्रभुके द्वारा निर्वाचित देश मानकर श्रीसनातनका अतुलनीय गौरप्रेम :— सनातन कहे,—“भाल कैला उपदेश। ताँहा याब, सेइ मोर 'प्रभुदत्त देश' ॥”144 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“आपने बहुत अच्छा परामर्श दिया है। मैं वृन्दावन ही जाऊँगा, वही महाप्रभुके द्वारा प्रदत्त मेरा वासस्थान है ॥”144 ॥ अनुभाष्य—'प्रभुदत्त देश',—तात्पर्य यह है कि जीवके नित्य-आराध्य श्रीहरि-गुरु-वैष्णवके द्वारा निर्वाचित और निर्धारित स्थान ही उसका नित्य-वाञ्छनीय श्रीकृष्णसेवाका आधार श्रीवृन्दावन है; उसमें वास करके उनका सुख-विधान करनेसे ही जीवको नित्य-मङ्गलकी प्राप्ति होती है ॥ 144 ॥ एकदिन महाप्रभुका आगमन :— एत बलि' दुँहे निज-कार्ये उठि' गेला। आर दिन महाप्रभु मिलिवारे आइला ॥ 145 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वार्तालाप करनेके बाद श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीसनातन गोस्वामी अपनी-अपनी सेवाओंके लिये उठ गये। अगले दिन महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलनेके लिये आये ॥ 145 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदासका आलिङ्गन :— हरिदास कैला प्रभुर चरण वन्दन। हरिदासे कैला प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 146 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 146 ॥ आलिङ्गन करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको अपने निकट बुलाना :— दूर हैते दण्ड-परणाम करे सनातन। प्रभु बोलाय बार बार करिते आलिङ्गन ॥ 147 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने दूरसे ही महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करनेके लिये बार बार बुलाने लगे ॥ 147 ॥ श्रीसनातनको अपराधकी आशङ्का; महाप्रभुका शीघ्रतासे उनके निकट आगमन :— अपराध-भये तैं ह मिलिते ना आइल। महाप्रभु मिलिवारे सेइ ठाञि आइल ॥ 148 ॥ अनुवाद—अपराधके भयसे श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुसे मिलनेके लिये नहीं आये, तो महाप्रभु स्वयं उनसे मिलनेके लिये उनके पास चले आये ॥ 148 ॥ श्रीसनातनका भागना, महाप्रभुके द्वारा बलपूर्वक आलिङ्गन :— सनातन भागि' पाछे करेन गमन। बलात्कारे धरि' प्रभु कैला आलिङ्गन ॥ 149 ॥