श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें124 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/149-158 ] अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी दौड़कर पीछेकी ओर जाने लगे, किन्तु महाप्रभुने उन्हें बलपूर्वक पकड़कर उनका आलिङ्गन किया॥ 149 ॥ महाप्रभु और दोनों भक्तोंका बैठना; दैन्यविग्रह श्रीसनातनके द्वारा स्वयंको अपवित्र बद्धजीव मानकर महाप्रभुके निकट गम्भीर दैन्योक्ति और महाप्रभुके स्पर्शके कारण अपने अपराधकी आशङ्का :— दुइ जन लञा प्रभु बसिला पिण्डाते। निर्विण्ण सनातन लागिला कहिते ॥ 150 ॥ अनुवाद—महाप्रभु उन दोनोंको अपने साथ लेकर चबूतरेपर जाकर बैठे। परम वैरागी श्रीसनातन गोस्वामी कहने लगे॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्विण्ण',—निर्वेद अर्थात् विरागयुक्त ॥ 150 ॥ “हित लागि' आइनु मुञि, हैल विपरीत। सेवायोग्य नहि, अपराध करौँ निति नित ॥ 151 ॥ अनुवाद—“मैं तो यहाँ अपने हितके लिये आया था, किन्तु सब कुछ उसके विपरीत हो गया। मैं सेवा करने योग्य तो हूँ नहीं, अपितु दिन-प्रतिदिन अपराध ही कर रहा हूँ॥ 151 ॥ सहजे नीच-जाति मुञि, दुष्ट, ‘पापाशय’। मोरे तुमि धुँइले मोर अपराध हय ॥ 152 ॥ अनुवाद—मैं स्वभावसे ही नीच जातिका, दुष्ट और पापवासनायुक्त हृदयवाला हूँ। आप मुझे स्पर्श करते हैं तो इससे मेरा अपराध होता है॥ 152 ॥ ताहाते आमार अङ्गे कण्डुरसा-रक्त चले। तोमार अङ्गे लागे, तबु स्पर्शह तुमि बले ॥ 153 ॥ अनुवाद—उसपर भी मेरे शरीरसे जो पीब और रक्त बहता है, वह आपके श्रीअङ्गपर लगता है, किन्तु तब भी आप बलपूर्वक मुझे स्पर्श करते हैं॥ 153 ॥ अनुभाष्य—'बले',—बलपूर्वक ॥ 153 ॥ वीभत्स स्पर्शिते ना कर घृणा-लेशे। एइ अपराधे मोर हबे सर्वनाशे ॥ 154 ॥ अनुवाद—आप घिनौने शरीरको स्पर्श करनेमें लेशमात्र भी घृणा नहीं करते हैं, इस अपराधसे मेरा सर्वनाश अवश्य ही होगा ॥ 154 ॥ अपराधकी आशङ्कासे उसके मोचनके लिये वृन्दावन जानेकी अनुमति देनेकी प्रार्थना :— ताते इँहा रहिले मोर ना हय 'कल्याण'। आज्ञा देह'–रथ देखि' याङ वृन्दावन ॥ 155 ॥ अनुवाद—इसलिये यहाँ रहनेपर मेरा 'कल्याण' नहीं होगा। कृपा करके आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं रथयात्राका दर्शन करके वृन्दावन लौट जाऊँ ॥ 155 ॥ श्रीजगदानन्द पण्डितसे वृन्दावन जानेके परामर्शकी प्राप्तिके विषयमें बतलाना :— जगदानन्द-पण्डिते आमि युक्ति पुछिल। वृन्दावन याइते तेंह उपदेश दिल ॥ ”156 ॥ अनुवाद—मैंने श्रीजगदानन्द पण्डितसे भी इस विषयमें उनका विचार पूछा था। उन्होंने मुझे वृन्दावन जानेका ही परामर्श दिया है॥ ”156 ॥ क्रोधसे भरकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना :— एत शुनि' महाप्रभु सरोष-अन्तरे। जगदानन्दे क्रुद्ध हञा करे तिरस्कारे ॥ 157 ॥ “कालिकार पड़ुया जगा ऐछे गर्वी हैल। तोमा-सबारेह उपदेश करिते लागिल ??158 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुके भीतर रोष आ गया और वे श्रीजगदानन्द पण्डितपर क्रोधित होकर कहने लगे,—“कलका छात्र जगा (जगदानन्द) इतना अभिमानी हो गया है कि वह तुम सबको भी उपदेश करने लगा है? 157–158 ॥