श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 4/159–166 चौथा अध्याय 125 श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी प्रचुर कृपा-गौरवपूर्ण उक्ति :- व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार गुरुतुल्य। तोमारे उपदेश करे, ना जाने आपन-मूल्य ?? 159 ॥ अनुवाद-व्यवहारमें हो अथवा परमार्थमें हो, इन दोनों विषयोंमें तुम उसके गुरुके समान हो। वह अपने मूल्यको नहीं जानकर तुम्हें उपदेश देता है ? 159 ॥ आमार उपदेष्टा तुमि-प्रामाणिक आर्य। तोमारेह उपदेशे, बालका करे ऐछे कार्य ॥” 160 ॥ अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेके अधिकारी-प्रामाणिक आर्य हो और वह जगा तुम्हें उपदेश देता है। वह तो नादान बालकके जैसे कार्य कर रहा है॥” 160 ॥ श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दके सौभाग्य और अपने दुर्भाग्यका वर्णन :- शुनि' सनातन पाये धरि' प्रभुरे कहिल। “जगदानन्देर सौभाग्य आजि से जानिल ॥ 161 ॥ आपणार 'असौभाग्य' आजि हैल ज्ञान। जगते नाहि जगदानन्द-सम भाग्यवान् ॥ 162 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर उनसे कहा,-“आज ही मुझे श्रीजगदानन्दके सौभाग्यका पता चला है। और साथ ही आज मुझे अपने 'दुर्भाग्य'का ज्ञान हुआ है। इस जगत्में जगदानन्द पण्डितके समान अन्य कोई भाग्यशाली नहीं है॥ 161–162 ॥ अनुभाष्य- 'आपणार असौभाग्य', - अर्थात् अपना दुर्भाग्य ॥ 162 ॥ अपने और श्रीजगदानन्दके प्रति महाप्रभुके स्नेहकी तुलना :- जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता-सुधारस। मोरे पियाओ गौरवस्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस ॥ 163 ॥ अनुवाद-आप जगदानन्द पण्डितको आत्मीयतारूपी अमृतरसका पान कराते हो और मुझे सम्मान-स्तुतिरूपी नीम-निर्गुण्डी* के कड़वा रसका पान कराते हो ॥ 163 ॥ अनुभाष्य-नीमका और निर्गुण्डीका रस कड़वा होता है, इसलिये आस्वादनके समय वह सुखकर नहीं होता। स्नेह और कृपाके पात्र लालनीय व्यक्तिके लिये उनके सेव्य और पूज्य लालक-व्यक्तिसे गौरव और वन्दना आदि सम्मानकी प्राप्ति भी वैसे ही असुखकर होती है ॥ 163 ॥ सेवकको सेव्यके निजजन-मानकर प्रेमके कारणरूप सम्बन्धकी अनुभूति; श्रीसनातनके गम्भीर हृदयव्यथा-सूचक वचन :- आजिह नहिल मोरे आत्मीयता-ज्ञान ! मोर अभाग्य, तुमि-स्वतन्त्र भगवान् ! !” 164 ॥ अनुवाद-आज तक आपने मुझे अपना आत्मीय नहीं समझा। यह तो मेरा दुर्भाग्य ही है, क्योंकि आप तो स्वतन्त्र भगवान् हैं !” 164 ॥ महाप्रभुकी लज्जा और श्रीसनातनके प्रति सान्त्वना-वाक्य :- शुनि' महाप्रभु किछु लज्जित हैला मने। ताँरे सन्तोषिते किछु बलेन वचने ॥ 165 ॥ श्रीजगदानन्द और श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी स्नेह-प्रीतिके वैशिष्ट्यका वर्णन; श्रीजगदानन्दके प्रति तिरस्कारका कारण :- “जगदानन्द प्रिय आमार नहे तोमा हैते। मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों सहिते ॥ 166 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीकी बात सुनकर महाप्रभु मन-ही-मन कुछ लज्जित हुए। फिर श्रीसनातन गोस्वामीको सन्तुष्ट करनेके लिये कहने लगे, - “जगदानन्द मुझे
- निर्गुण्डी अथवा सम्भालु अथवा सिन्दुवार पौधेमें एक साथ पाँच पत्तियाँ होती हैं और इसका स्वाद बहुत कसैला होता है। इसका प्रयोग औषधि बनानेमें होता है।