भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2143

126 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/165-173 ] तुमसे अधिक प्रिय नहीं है, किन्तु मैं मर्यादाका उल्लङ्घन सहन नहीं कर पाता हूँ॥ 165-166॥ अनुभाष्य-जिसकी जो मर्यादा है, उस मर्यादाका अतिक्रम करके स्वयंको गुरु मानकर अपने सम्माननीय पात्रको परामर्श देनेके कार्यमें महाप्रभुने उत्साह प्रदान नहीं किया, साथ ही, श्रीजगदानन्द जैसे आयुमें छोटे व्यक्तिके वैसे व्यवहारका भी अनुमोदन नहीं किया॥ 166॥ दोनोंके गुणोंके वैशिष्ट्यका वर्णन :- काँहा तुमि-प्रामाणिक, शास्त्रे प्रवीण! काँहा जगा-कालिकार वटु नवीन!! 167॥ अनुवाद-कहाँ तो तुम शास्त्रमें प्रवीण प्रामाणिक व्यक्ति हो, और कहाँ जगा कलका नया ब्राह्मण है! 167॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके गुण-गौरवकी स्तुति :- आमाकेह बुझाइते तुमि धर शक्ति। कत ठाञि बुझाञाछ व्यवहार-भक्ति॥ 168॥ अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेकी शक्ति रखते हो। तुमने तो मुझे कितने स्थानोंपर मर्यादाके विषयमें बतलाया है॥ 168॥ अनुभाष्य-'कत ठाञिं',-मध्यलीला 1/222-224 संख्या अथवा मध्यलीला 16/266 संख्या देखें; 'व्यवहार-भक्ति,'- मर्यादा अथवा शिष्टाचार प्रदर्शन॥ 168॥ तोमारे उपदेश करे, ना याय सहन। अतएव तारे आमि करिये भर्त्सन॥ 169॥ अनुवाद-जगा तुम्हें उपदेश प्रदान करे, यह मैं सहन नहीं कर सकता, इसलिये मैंने उसकी भर्त्सना की है॥ 169॥ भक्तके गुणोंसे आकृष्ट भगवान्‌का भक्तगुण-वर्णन :- बहिरङ्ग-ज्ञाने तोमारे ना करि स्तवन। तोमार गुणे स्तुति कराय यैछे तोमार गुण॥ 170॥ अनुवाद-मैं तुम्हें बाहरी व्यक्ति मानकर औपचारिक रूपसे तुम्हारी स्तुति नहीं करता हूँ, तुम्हारे गुण ही ऐसे हैं कि वे मुझसे तुम्हारा स्वाभाविक रूपसे गुणगान करवाते हैं॥ 170॥ ममताके पात्र बहुतसे 'आश्रय' रहनेपर भी किसी विशेष पात्रके प्रति 'विषय'की प्रीतिका वैशिष्ट्य :- यद्यपि काहार 'ममता' बहुजने हय। प्रीति-स्वभावे काँहा कोन भावोदय॥ 171॥ अनुवाद-यद्यपि किसीकी ममता बहुतसे लोगोंमें होती है, किन्तु प्रीतिके तारतम्यके अनुसार उनके प्रति पृथक्-पृथक् भाव उदित होता है॥ 171॥ अमानी भक्तके द्वारा दैन्यवशतः स्वयंको प्राकृत जीव मानकर सुनीच समझनेपर भी वास्तवमें वह-चित्-दर्शनमें भगवान्‌के द्वारा आलिङ्गित अप्राकृत ब्रह्मवस्तु :- तोमार देह तुमि कर वीभत्स-ज्ञान। तोमार देह आमारे लागे अमृत-समान॥ 172॥ अनुवाद-तुम अपनी देहको घृणित मानते हो, किन्तु तुम्हारी देह मुझे अमृतके समान लगती है॥ 172॥ अप्राकृत देह तोमार प्राकृत कभु नय। तथापि तोमार ताते प्राकृत-बुद्धि हय॥ 173॥ अनुवाद-तुम्हारी देह अप्राकृत है, वह कभी भी प्राकृत नहीं हो सकती। तथापि तुम्हारी उसके प्रति प्राकृत बुद्धि होती है॥ 173॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णोन्मुख भक्त अपने सुखकी प्राप्ति रूपी भोग-वासनाकी तृप्तिके लिये किसी दैहिक काम-आचरणको स्वीकार नहीं करते; वे श्रीकृष्णके सुखके अभिलाषी होकर एकमात्र श्रीकृष्णप्रेम-सेवाके उद्देश्यसे ही समस्त अप्राकृत भजनके अनुष्ठानोंको किया करते हैं। कर्मीगण कर्मफलके भोगके आधार प्राकृत-देहको नश्वर-फलभोगके उद्देश्यसे नियुक्त करते हैं। भक्तोंकी वैसी चेष्टा नहीं है,-वे सब प्रकारसे सदैव

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