भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2144

[ 4/173-174 चौथा अध्याय 127 हरिसेवाके उद्देश्यसे ही अपनी देहके अस्तित्वको स्वीकार और समस्त प्रकारके दैहिक कार्योंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवाका अनुष्ठान किया करते हैं। प्रकृतिके प्रति अभिनिवेश-वशतः प्राकृत-फलभोग-कामनाके कारण ही कर्मीकी देह-प्राकृत है। पुनः श्रीकृष्णसेवाकी एकान्तिक निष्ठावशतः देहका अस्तित्व अथवा दैहिक- क्रियादि सब कुछ ही श्रीकृष्णकी अप्राकृत-सेवापरायण होनेके कारण भक्तकी चिन्मय देह अवश्य ही अप्राकृत है। श्रीकृष्ण-विमुख कर्मीगण निज-भोग-तात्पर्यपरक अपनी देहको प्राकृत मानते हैं, उसी प्रकार वे शुद्ध भक्तोंकी देहको भी 'प्राकृत' मानते हैं। परन्तु शुद्धभक्त और उनके दास उस प्रकार शुद्धभक्तोंकी देहको कभी भी 'प्राकृत' नहीं समझते। अर्थात् वे चित् और अचित्, अप्राकृत और प्राकृत, विधिके अतीत और विधिके अधीन वस्तुको अथवा श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णसे इतर मायाको 'समान' अथवा 'एक' मानकर कृत्रिम उदारता अथवा निरपेक्षताके छलसे चित् और जड़ीय वस्तुके समन्वयवाद (एक समान माननेवाले वाद)का आवाहन करके कभी भी नामापराधी नहीं बनते। अपितु वे शुद्धभक्तोंकी चिदानन्दमय देहको अप्राकृत-स्वरूप जानकर श्रीकृष्णसेवाके उपयोगी समझते हैं। उत्तमाधिकारी भक्त अपनी अनुभूतिको श्रीकृष्णप्रेम रहित जानकर स्वयंको दरिद्र और प्राकृत जीव मानते हैं। प्राकृत-सहजिया आदि अप-सम्प्रदायोंमें श्रीकृष्ण- बहिर्मुख व्यक्ति मूर्खतावशतः अपनी प्राकृत देहको 'अप्राकृत वैष्णवदेह' मानकर शुद्ध वैष्णवोंके अप्राकृत आचार अथवा भक्तिसे बहुत दूर जा पड़ते हैं। इसे लक्ष्य करके ही लोक-शिक्षाके लिये ठाकुर भक्तिविनोदने स्व-रचित 'कल्याण-कल्पतरु'-ग्रन्थमें लिखा है- “आमि त' वैष्णव, ए बुद्धि हइले, अमानी ना हब आमि। प्रतिष्ठाशा आसि' हृदय दूषिबे, हइब निरयगामी॥ निजे श्रेष्ठ जानि', उच्छिष्टादि-दाने, अभिमान हबे भार। ताइ शिष्य तब, थाकिया सर्वदा, ना लइब पूजा कार॥” [अर्थात् “ 'मैं वैष्णव हूँ'-मेरी ऐसी बुद्धि होनेपर मैं कभी भी अमानी नहीं रह पाऊँगा और दूसरोंसे प्रतिष्ठा पानेकी आशासे मेरा हृदय दूषित हो जायेगा, जिसके फलस्वरूप मैं नरकगामी हो जाऊँगा। स्वयंको श्रेष्ठ (गुरु) जानकर यदि मैं अपने उच्छिष्टादिको दूसरोंको प्रदान करूँगा, तो मेरे ऊपर मिथ्या अभिमानका भार आ जायेगा और उसके द्वारा मैं डूब जाऊँगा। इसलिये हे वैष्णव ठाकुर ! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं सदा आपका शिष्य बनकर रहूँ और किसीसे अपनी पूजा स्वीकार नहीं करूँ।”] श्रीकृष्णराज गोस्वामीने भी लिखा है, (अन्त्यलीला 20/28 संख्यामें)- “प्रेमेर स्वभाव-याँहा प्रेमेर सम्बन्ध। सेइ माने कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध॥” [अर्थात् “जहाँ श्रीकृष्णप्रेमका सम्बन्ध होता है, उस प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त यह मानता है कि मुझमें श्रीकृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।”] ॥ 173 ॥ निर्गुण अप्राकृत-राज्यमें गौण अचित्-दर्शनसे उत्पन्न मनोधर्मसुलभ जड़ीय विधि-निषेधके विचारका अभाव :- 'प्राकृत' हैलेह तोमार वपु नाहि उपेक्षिते। भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174 ॥ अनुवाद-यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी हो, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि अप्राकृत स्वरूप मुझ संन्यासीमें भद्राभद्रका (भले और बुरेका) कोई विचार होना उचित नहीं है॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा-तुम वैष्णव हो, तुम्हारी देह अप्राकृत है, उसके प्रति 'भले-बुरे'की बुद्धि करना उचित नहीं है। उसपर भी मैं संन्यासी हूँ, इसलिये यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी होती, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर पाता, क्योंकि अप्राकृतस्वरूप संन्यासीके लिये भली-बुरी-वस्तुरूपी ज्ञान रहना कभी भी उचित नहीं है ॥ 174 ॥