भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2145, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2145

128 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/175-178 ] गौण अचिद्-दर्शनसे उत्पन्न जड़ीय भेद-ज्ञानमूलक मनोधर्ममें पवित्रता-अपवित्रता अथवा विधि-निषेध सब कुछ ही एक समान और अवास्तव :- श्रीमद्भागवत (11/28/4) में- किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्। वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- (अद्वयज्ञान कृष्णप्रतीतिके अतिरिक्त उनसे भिन्न मायिक-प्रतीतिसे युक्त) द्वैत-वस्तुओंकी अवास्तविकता-हेतु वाक्यके द्वारा उदित (कथित) और मनके द्वारा ध्यान की गयीं (जो कुछ भी हैं, वे) सब 'नश्वर' हैं; अतएव उनमें भद्र और अभद्र कैसा? (अर्थात् उनमें 'भद्र' अथवा 'अभद्र' ऐसा जड़ीय) भेद तो है, किन्तु अद्वयज्ञान वस्तुकी प्रतीतिमें वैसा कुछ भी नहीं है॥ 175 ॥ अनुभाष्य-भगवान् उद्धवजीको पहले विस्तारपूर्वक वर्णित शुद्ध भगवद्-ज्ञान-वर्णनके प्रसङ्गमें अक्षज-दर्शनकी [इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानकी] निन्दा कर रहे हैं- [यतः] वाचा [यत्] उदितं (कथितं, चक्षुरादिभिश्च यत् दृश्यं, यच्च) मनसा ध्यातः, तत् [सर्वम्] एव च अनृतं (नश्वरं न सर्वकालसत्यम्; अतः) अवस्तुनः (अद्वयज्ञानेतर- वस्तुनः पृथक्सत्त्वाभावेन वस्तुत्वेन स्वीकर्त्तुमशक्यस्य) द्वैतस्य (प्रपञ्चस्य मध्ये) किं (कियत् किं परिमाणं) भद्रं, किं (कियत्) वा अभद्रम्? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्लोकका सरल अर्थ :- द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब-'मनोधर्म' । 'एइ भाल, एइ मन्द',-एइ सब 'भ्रम' ॥ 176 ॥ अनुवाद-प्राकृत वस्तुमें भले और बुरेका ज्ञान करना-यह सब मनोधर्म है। इसलिये यह कहना कि यह अच्छा है, यह बुरा है-यह सब तो भ्रम है ॥ 176 ॥ अनुभाष्य-अद्वयज्ञान श्रीव्रजेन्द्रनन्दनमें अनश्वर- सत्य नित्य ही विराजमान है। द्वितीय-अभिनिवेशके कारण श्रीकृष्णसे भिन्न मायाके हाथमें पतित जीवके अपने मङ्गल अथवा अमङ्गलके निर्णय आदि सभी सङ्कल्प ही विकल्पात्मक मनके धर्म हैं। स्व-स्वरूप और श्रीकृष्णको भूलकर जीवके भोक्ता-अभिमानसे इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा भले-बुरेके विचारका प्रयास अनेक प्रकारके भ्रम उत्पन्न करता है ॥ 176 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (5/18) में- विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ 177 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो विद्या और विनयसे सम्पन्न ब्राह्मणमें, चण्डालमें, गायमें, हाथीमें और कुत्तेमें समान दृष्टिवाले हैं, वे ही पण्डित हैं ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- विद्या-विनयसम्पन्ने (विद्याविनयाभ्यां सम्पन्ने संयुक्ते सर्वब्रह्मण्यविराजिते, न तु मूर्खे दुर्विनीते) ब्राह्मणे श्वपाके (चण्डाले सर्वाधमे) गवि (पवित्रायां धेनौ) शुनि (अपवित्रे कुक्कुरे) हस्तिनि (शुद्धाशुद्धविचार-रहिते गजे) पण्डिताः (बन्धमोक्षविदः) समदर्शिनः (समं ब्रह्मैव द्रष्टुं शीलं येषां ते, तुल्यबुद्धयः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-जो विद्या और विनयसे युक्त समस्त ब्राह्मणोंमें देदीप्यमान (मूर्ख अथवा दुष्ट नहीं)-ऐसे ब्राह्मणमें, सर्वाधम चण्डालमें, पवित्र गायमें, अपवित्र कुत्तेमें और शुद्धि-अशुद्धिके विचारसे रहित हाथीमें समानरूपमें ब्रह्मको देखनेवाले हैं अर्थात् सभीमें समबुद्धिवाले हैं, वे (बन्धन और मोक्षको जाननेवाले) पण्डित हैं॥ 177 ॥ युक्तवैरागी शुद्धभक्त गोस्वामीका ही सर्वत्र कृष्ण-सम्बन्धके कारण समदर्शन :- श्रीमद्भगवद्गीता (6/8) में- ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्र

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 2145, कुल 2549 में से · BharatKosha