श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 4/173-174 चौथा अध्याय 127 हरिसेवाके उद्देश्यसे ही अपनी देहके अस्तित्वको स्वीकार और समस्त प्रकारके दैहिक कार्योंके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवाका अनुष्ठान किया करते हैं। प्रकृतिके प्रति अभिनिवेश-वशतः प्राकृत-फलभोग-कामनाके कारण ही कर्मीकी देह-प्राकृत है। पुनः श्रीकृष्णसेवाकी एकान्तिक निष्ठावशतः देहका अस्तित्व अथवा दैहिक- क्रियादि सब कुछ ही श्रीकृष्णकी अप्राकृत-सेवापरायण होनेके कारण भक्तकी चिन्मय देह अवश्य ही अप्राकृत है। श्रीकृष्ण-विमुख कर्मीगण निज-भोग-तात्पर्यपरक अपनी देहको प्राकृत मानते हैं, उसी प्रकार वे शुद्ध भक्तोंकी देहको भी 'प्राकृत' मानते हैं। परन्तु शुद्धभक्त और उनके दास उस प्रकार शुद्धभक्तोंकी देहको कभी भी 'प्राकृत' नहीं समझते। अर्थात् वे चित् और अचित्, अप्राकृत और प्राकृत, विधिके अतीत और विधिके अधीन वस्तुको अथवा श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णसे इतर मायाको 'समान' अथवा 'एक' मानकर कृत्रिम उदारता अथवा निरपेक्षताके छलसे चित् और जड़ीय वस्तुके समन्वयवाद (एक समान माननेवाले वाद)का आवाहन करके कभी भी नामापराधी नहीं बनते। अपितु वे शुद्धभक्तोंकी चिदानन्दमय देहको अप्राकृत-स्वरूप जानकर श्रीकृष्णसेवाके उपयोगी समझते हैं। उत्तमाधिकारी भक्त अपनी अनुभूतिको श्रीकृष्णप्रेम रहित जानकर स्वयंको दरिद्र और प्राकृत जीव मानते हैं। प्राकृत-सहजिया आदि अप-सम्प्रदायोंमें श्रीकृष्ण- बहिर्मुख व्यक्ति मूर्खतावशतः अपनी प्राकृत देहको 'अप्राकृत वैष्णवदेह' मानकर शुद्ध वैष्णवोंके अप्राकृत आचार अथवा भक्तिसे बहुत दूर जा पड़ते हैं। इसे लक्ष्य करके ही लोक-शिक्षाके लिये ठाकुर भक्तिविनोदने स्व-रचित 'कल्याण-कल्पतरु'-ग्रन्थमें लिखा है- “आमि त' वैष्णव, ए बुद्धि हइले, अमानी ना हब आमि। प्रतिष्ठाशा आसि' हृदय दूषिबे, हइब निरयगामी॥ निजे श्रेष्ठ जानि', उच्छिष्टादि-दाने, अभिमान हबे भार। ताइ शिष्य तब, थाकिया सर्वदा, ना लइब पूजा कार॥” [अर्थात् “ 'मैं वैष्णव हूँ'-मेरी ऐसी बुद्धि होनेपर मैं कभी भी अमानी नहीं रह पाऊँगा और दूसरोंसे प्रतिष्ठा पानेकी आशासे मेरा हृदय दूषित हो जायेगा, जिसके फलस्वरूप मैं नरकगामी हो जाऊँगा। स्वयंको श्रेष्ठ (गुरु) जानकर यदि मैं अपने उच्छिष्टादिको दूसरोंको प्रदान करूँगा, तो मेरे ऊपर मिथ्या अभिमानका भार आ जायेगा और उसके द्वारा मैं डूब जाऊँगा। इसलिये हे वैष्णव ठाकुर ! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं सदा आपका शिष्य बनकर रहूँ और किसीसे अपनी पूजा स्वीकार नहीं करूँ।”] श्रीकृष्णराज गोस्वामीने भी लिखा है, (अन्त्यलीला 20/28 संख्यामें)- “प्रेमेर स्वभाव-याँहा प्रेमेर सम्बन्ध। सेइ माने कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध॥” [अर्थात् “जहाँ श्रीकृष्णप्रेमका सम्बन्ध होता है, उस प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त यह मानता है कि मुझमें श्रीकृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।”] ॥ 173 ॥ निर्गुण अप्राकृत-राज्यमें गौण अचित्-दर्शनसे उत्पन्न मनोधर्मसुलभ जड़ीय विधि-निषेधके विचारका अभाव :- 'प्राकृत' हैलेह तोमार वपु नाहि उपेक्षिते। भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174 ॥ अनुवाद-यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी हो, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि अप्राकृत स्वरूप मुझ संन्यासीमें भद्राभद्रका (भले और बुरेका) कोई विचार होना उचित नहीं है॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा-तुम वैष्णव हो, तुम्हारी देह अप्राकृत है, उसके प्रति 'भले-बुरे'की बुद्धि करना उचित नहीं है। उसपर भी मैं संन्यासी हूँ, इसलिये यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी होती, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर पाता, क्योंकि अप्राकृतस्वरूप संन्यासीके लिये भली-बुरी-वस्तुरूपी ज्ञान रहना कभी भी उचित नहीं है ॥ 174 ॥
128 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/175-178 ] गौण अचिद्-दर्शनसे उत्पन्न जड़ीय भेद-ज्ञानमूलक मनोधर्ममें पवित्रता-अपवित्रता अथवा विधि-निषेध सब कुछ ही एक समान और अवास्तव :- श्रीमद्भागवत (11/28/4) में- किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्। वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ 175 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- (अद्वयज्ञान कृष्णप्रतीतिके अतिरिक्त उनसे भिन्न मायिक-प्रतीतिसे युक्त) द्वैत-वस्तुओंकी अवास्तविकता-हेतु वाक्यके द्वारा उदित (कथित) और मनके द्वारा ध्यान की गयीं (जो कुछ भी हैं, वे) सब 'नश्वर' हैं; अतएव उनमें भद्र और अभद्र कैसा? (अर्थात् उनमें 'भद्र' अथवा 'अभद्र' ऐसा जड़ीय) भेद तो है, किन्तु अद्वयज्ञान वस्तुकी प्रतीतिमें वैसा कुछ भी नहीं है॥ 175 ॥ अनुभाष्य-भगवान् उद्धवजीको पहले विस्तारपूर्वक वर्णित शुद्ध भगवद्-ज्ञान-वर्णनके प्रसङ्गमें अक्षज-दर्शनकी [इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानकी] निन्दा कर रहे हैं- [यतः] वाचा [यत्] उदितं (कथितं, चक्षुरादिभिश्च यत् दृश्यं, यच्च) मनसा ध्यातः, तत् [सर्वम्] एव च अनृतं (नश्वरं न सर्वकालसत्यम्; अतः) अवस्तुनः (अद्वयज्ञानेतर- वस्तुनः पृथक्सत्त्वाभावेन वस्तुत्वेन स्वीकर्त्तुमशक्यस्य) द्वैतस्य (प्रपञ्चस्य मध्ये) किं (कियत् किं परिमाणं) भद्रं, किं (कियत्) वा अभद्रम्? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥ श्लोकका सरल अर्थ :- द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब-'मनोधर्म' । 'एइ भाल, एइ मन्द',-एइ सब 'भ्रम' ॥ 176 ॥ अनुवाद-प्राकृत वस्तुमें भले और बुरेका ज्ञान करना-यह सब मनोधर्म है। इसलिये यह कहना कि यह अच्छा है, यह बुरा है-यह सब तो भ्रम है ॥ 176 ॥ अनुभाष्य-अद्वयज्ञान श्रीव्रजेन्द्रनन्दनमें अनश्वर- सत्य नित्य ही विराजमान है। द्वितीय-अभिनिवेशके कारण श्रीकृष्णसे भिन्न मायाके हाथमें पतित जीवके अपने मङ्गल अथवा अमङ्गलके निर्णय आदि सभी सङ्कल्प ही विकल्पात्मक मनके धर्म हैं। स्व-स्वरूप और श्रीकृष्णको भूलकर जीवके भोक्ता-अभिमानसे इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा भले-बुरेके विचारका प्रयास अनेक प्रकारके भ्रम उत्पन्न करता है ॥ 176 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (5/18) में- विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ 177 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो विद्या और विनयसे सम्पन्न ब्राह्मणमें, चण्डालमें, गायमें, हाथीमें और कुत्तेमें समान दृष्टिवाले हैं, वे ही पण्डित हैं ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- विद्या-विनयसम्पन्ने (विद्याविनयाभ्यां सम्पन्ने संयुक्ते सर्वब्रह्मण्यविराजिते, न तु मूर्खे दुर्विनीते) ब्राह्मणे श्वपाके (चण्डाले सर्वाधमे) गवि (पवित्रायां धेनौ) शुनि (अपवित्रे कुक्कुरे) हस्तिनि (शुद्धाशुद्धविचार-रहिते गजे) पण्डिताः (बन्धमोक्षविदः) समदर्शिनः (समं ब्रह्मैव द्रष्टुं शीलं येषां ते, तुल्यबुद्धयः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-जो विद्या और विनयसे युक्त समस्त ब्राह्मणोंमें देदीप्यमान (मूर्ख अथवा दुष्ट नहीं)-ऐसे ब्राह्मणमें, सर्वाधम चण्डालमें, पवित्र गायमें, अपवित्र कुत्तेमें और शुद्धि-अशुद्धिके विचारसे रहित हाथीमें समानरूपमें ब्रह्मको देखनेवाले हैं अर्थात् सभीमें समबुद्धिवाले हैं, वे (बन्धन और मोक्षको जाननेवाले) पण्डित हैं॥ 177 ॥ युक्तवैरागी शुद्धभक्त गोस्वामीका ही सर्वत्र कृष्ण-सम्बन्धके कारण समदर्शन :- श्रीमद्भगवद्गीता (6/8) में- ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्र
[ 4/178-181 चौथा अध्याय 129 अनुवाद—जिनका चित्त ज्ञान और विज्ञानसे तृप्त है, जो विकाररहित और जितेन्द्रिय हैं तथा मिट्टी, पाषाण और स्वर्णमें समदर्शी हैं, वे योगारूढ़ पुरुष योगी कहलाते हैं॥ 178॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो ज्ञान-विज्ञानके द्वारा परितृप्त हैं, कूटस्थ अर्थात् चित्-स्वभावमें स्थित हैं, जितेन्द्रिय हैं एवं मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णमें समान बुद्धिवाले हैं, उन्हें ही 'योगी' अर्थात् 'योगारूढ़' कहा जाता है॥ 178॥ चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा (ज्ञानम् औपदेशिकं, 'विज्ञानम्' अपरोक्षानुभवः, ताभ्यां तृप्तः निराकाङ्क्षः आत्मा चित्तं यस्य सः अतः) कूटस्थः (एकेनैव स्वभावेन सर्वकालं व्याप्य स्थितः निर्विकारः वा, अतएव) विजितेन्द्रियः (विजितानि इन्द्रियाणि येन सः, अतएव) समलोष्ट्र मृत्पिण्डपाषाणखण्ड-सुवर्णानि यस्य सः, लोष्ट्र बुद्धिशून्यः इत्यर्थः) योगी युक्तः (योगारूढ़ः) उच्यते। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178॥ जड़़ीय विधि-निषेधसे परे नैष्कर्म्यको प्राप्त संन्यासी अथवा महाभागवतके लिये ही सर्वत्र विष्णुप्रतीतिके कारण जड़़ीय भेदज्ञानसे उत्पन्न विषमता-रहित सुदर्शन :- आमि त'-संन्यासी, आमार 'सम-दृष्टि' धर्म। चन्दन-पङ्केते आमार ज्ञान हय 'सम'॥ 179॥ अनुवाद—मैं तो संन्यासी हूँ, सभीके प्रति सम-दृष्टि रखना ही मेरा धर्म है। चन्दन तथा कीचड़में मेरा सम ज्ञान है॥ 179॥ अनुभाष्य—सभी वस्तुओंके प्रति समदृष्टियुक्त होना ही संन्यासी, पण्डित अथवा वैष्णवका धर्म है; क्योंकि उनमें प्राकृत अभिनिवेश नहीं है। उनकी इन्द्रिय-तर्पणके लिये चन्दनकी सुगन्धको ग्रहण करनेकी आसक्ति अथवा इन्द्रियोंके सुखके लिये कीचड़की दुर्गन्धको त्यागनेकी इच्छा नहीं है। युक्तवैराग्यशील 'वैष्णव' प्राकृत वस्तुका ग्रहण और त्याग—इन दोनों प्रकारकी प्रवृत्तियोंके दास होने अर्थात् उनके वशीभूत होनेके लिये अग्रसर नहीं होते। वे प्राकृत भोग और त्याग, दोनोंके प्रति उदासीन होकर सुदर्शन अथवा चित्-विलास-दर्शनसे युक्त होते हैं॥ 179॥ अपने धर्मसे च्युत होनेकी आशङ्काके कारण अप्राकृत-वैष्णवमें प्राकृत बुद्धि करनेका निषेध :- एड् लागि' तोमा त्याग करिते ना युयाय। घृणा-बुद्धि करि यदि, निज-धर्म याय॥"180॥ अनुवाद—इसलिये मैं तुम्हारा त्याग नहीं कर सकता। यदि मैं तुम्हारे प्रति घृणा-बुद्धि करूँ, तो मेरा अपना धर्म नष्ट होता है॥"180॥ अनुभाष्य—श्रीरूपप्रभु रचित उपदेशामृतका छठा श्लोक— “दृष्टैः स्वभावजनितैर्वपुषश्च दोषैः न प्राकृतत्वमिह भक्तजनस्य पश्येत्। गङ्गाम्भसां न खलु बुद्बुदफेनपङ्कै- र्ब्रह्मद्रवत्वमपगच्छति नीरधर्मैः॥” [अर्थात् “इस जगत्में अवस्थित भक्तजनोंमें नीचवर्ण, कठोरता और आलस्यादि दिखायी पड़नेवाले स्वाभाविक दोषोंके द्वारा अथवा कुरूपता और ज्वर आदि पीड़ाओंसे विकृत दिखायी पड़नेवाले शारीरिक दोषोंके द्वारा भक्तजनोंका प्राकृतत्व नहीं देखना चाहिये अर्थात् उन्हें प्राकृत जीव नहीं समझना चाहिये, जैसे बुलबुलों, फेन और कीचड़ आदिके सम्बन्धसे गङ्गाजल जलधर्मको अङ्गीकार करके भी अपना द्रवीभूत-ब्रह्म होनेका धर्म त्याग नहीं करता अर्थात् अप्राकृत धर्म नहीं छोड़ता; वैसे ही आत्मस्वरूप प्राप्त वैष्णवोंमें प्राकृत दोषोंका आरोप नहीं करना चाहिये।]॥ 180॥ अमानी दोनों भक्तोंका महाप्रभुके द्वारा की गयी प्रशंसाको अस्वीकार करना :- हरिदास कहे,—“प्रभु, ये कहिला तुमि। एइ 'बाह्य प्रतारणा', नाहि मानि आमि॥ 181 ॥
130 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/181–188 ] अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“हे महाप्रभो! आपने हमें वैष्णव मानकर जो सब कहा है, मैं उसे स्वीकार नहीं करता हूँ॥ 181 ॥ अनुभाष्य—'बाह्य प्रतारणा',—वैष्णव मानकर गौरव पूर्ण स्तुति ॥ 181 ॥ स्वयंको दीन-मानकर दोनोंके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :— आमा-सब अधमे ये करियाछ अङ्गीकार। दीनदयालु-गुण तोमार ताहाते प्रचार ॥” 182 ॥ अनुवाद—हम सब अधम हैं, परन्तु आपने हमें अङ्गीकार किया है, क्योंकि आपमें दीनोंके प्रति दयालु होनेका गुण है। इस बातको सारा जगत् जानता है॥” 182 ॥ दोनोंके प्रति महाप्रभुके द्वारा यथार्थ हृदयके भावको व्यक्त करना :— प्रभु हासि' कहे,—“शुन, हरिदास, सनातन। तत्त्व कहि तोमा-विषये आमार यैछे मन ॥ 183 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने मुस्कुराते हुए कहा,—“हे हरिदास! हे सनातन ! मेरी बात सुनो। यथार्थमें मेरे मनमें तुम दोनोंके प्रति जो भाव है, अब मैं उसके विषयमें बतलाता हूँ॥ 183 ॥ भक्त और भगवान्का परस्पर व्यवहार :— तोमारे 'लाल्य', आपनाके 'लालक'-अभिमान। लालकेर लाल्ये नहे दोष-परिज्ञान ॥ 184 ॥ अनुवाद—मैं तुम दोनोंको अपना लालनीय (लालन-पालनके योग्य) और स्वयंको लालक (दुलार करनेवाला) मानता हूँ। लालक कभी भी लालनीयके दोषोंपर ध्यान नहीं देता ॥ 184 ॥ अनुभाष्य—जो लालक होते हैं, वे लाल्य (लालनीय)के प्रति वात्सल्यके कारण अपने लालनीयमें किसी दोषके रहनेपर भी उसे समझ नहीं पाते ॥ 184 ॥ शुद्धभक्तवात्सल्य होनेके कारण सुदर्शनधारी भगवान्में भक्तके दोष दर्शनका अभाव :— आपणारे हय मोर अमान्य-समान। तोमा सबारे करों मुञि बालक-अभिमान ॥ 185 ॥ अनुवाद—यद्यपि मैं स्वयंको सम्मानके अयोग्य मानता हूँ, तथापि तुम सबको मैं अपने बालकके समान मानता हूँ॥ 185 ॥ अनुभाष्य—मैं तुम्हारे गौरव अथवा सम्मान अर्थात् पूजाका पात्र हूँ,—यह बात भक्तप्रेमवत्सल मेरे मनमें नहीं रहती ॥ 185 ॥ मातार यैछे बालकेर 'अमेध्य' लागे गाय। घृणा नाहि जन्मे, आर महासुख पाय ॥ 186 ॥ आत्मसात् किये अपने प्रिय श्रीसनातनको महाप्रभुके द्वारा अपने समान मानना :— 'लाल्यामेध्य' लालकेर चन्दन-सम भाय। सनातनेर क्लेदे आमार घृणा ना उपजाय ॥” 187 ॥ अनुवाद—माताको जैसे बालकके मल-मूत्र लगनेपर भी उसमें घृणा उत्पन्न नहीं होती, अपितु महासुखकी प्राप्ति होती है। जिस प्रकार लाल्यका मल-मूत्र लालकको चन्दनकी भाँति लगता है, उसी प्रकार सनातनके शरीरसे निकलनेवाली पीबके लगनेपर मुझमें किसी प्रकारकी कोई घृणा उत्पन्न नहीं होती ॥” 186–187 ॥ अनुभाष्य—'लाल्यामेध्य',—लाल्यकी [मल-मूत्र] अपवित्र वस्तु ॥ 187 ॥ विविध घटनाओंके द्वारा श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुकी अतुल कृपा और भक्तवात्सल्यका वर्णन :— हरिदास कहे,—“तुमि ईश्वर दयामय। तोमार गम्भीर हृदय बुझन ना याय ॥ 188 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“आप ईश्वर हैं और हमारे प्रति दयामय हैं। आपके गम्भीर हृदयको कोई नहीं समझ सकता ॥ 188 ॥
[ 4/189-193 चौथा अध्याय 131 कोढ़ग्रस्त वासुदेव ब्राह्मणकी घटना :- वासुदेव—गलत्कुष्ठी, ताते अङ्ग—कीड़ामय। तारे आलिङ्गन कैला हञा सदय ॥ 189 ॥ आलिङ्गिया कैला तार कन्दर्प-सम अङ्ग । बुझिते ना पारि तोमार कृपार तरङ्ग ॥" 190 ॥ अनुवाद-वासुदेव नामक एक ब्राह्मण थे जिनके पूरे शरीरमें कोढ़का रोग था और उनके अङ्ग गल रहे थे तथा उसपर उनके अङ्गोंमें कीड़े भी भरे हुए थे, परन्तु आपने दयावान होकर उसे भी आलिङ्गन किया था। आलिङ्गन करके आपने उसके अङ्गोंको कामदेवके समान सुन्दर बना दिया था, मैं आपकी कृपाकी तरङ्गको समझ नहीं पाता हूँ॥"189-190 ॥ अनुभाष्य- 'वासुदेवका गलित्कुष्ठ', - मध्यलीला 7/136-148 संख्या देखें; 'कीड़ामय', - कीड़ोंसे पूर्ण ॥ 189 ॥ महाप्रभुके द्वारा वैष्णवोंके अप्राकृत स्वरूपका वर्णन :- प्रभु कहे,- "वैष्णव-देह 'प्राकृत' कभु नय। 'अप्राकृत' देह भक्तेर 'चिदानन्दमय' ॥ 191 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "वैष्णवकी देह कभी भी 'प्राकृत' नहीं होती, भक्तोंकी 'अप्राकृत' देह चिदानन्दमय होती है॥ 191 ॥ अनुभाष्य-श्रीगौरसुन्दरने अपने पदाश्रित जनोंको यही समझाया कि कर्मी, ज्ञानी अथवा अन्याभिलाषी व्यक्तियोंकी भोगमय जड़ानन्दयुक्त प्राकृत-देहकी भाँति वैष्णवोंकी देह कभी भी भोगपरक प्राकृत नहीं है। भक्त-देह-चिदानन्दमय अर्थात् श्रीकृष्णकी सेवाके उपयोगी और प्रकृतिसे अतीत भावमय है, उसमें सच्चिदानन्दत्व विराजित है॥ 191 ॥ वैष्णव विष्णुके द्वारा अङ्गीकार किये गये 'आश्रय' होनेके कारण उनके अभिन्न चिद्विलास; गुरुके द्वारा ब्राह्मण जानकर दीक्षित व्यक्तिकी अच्युतात्मता :- दीक्षाकाले भक्त करे आत्मसमर्पण। सेइकाले कृष्ण तारे करे आत्मसम ॥ 192 ॥ दीक्षित अथवा भगवत्-सम्बन्धज्ञान प्राप्त ब्राह्मणोंका ही अभिधेय विष्णुभक्तियोगमें वैष्णव कहलाना, इसलिये वैष्णवतामें ब्राह्मणता ग्रथित :- सेइ देह करे तार चिदानन्दमय। अप्राकृत-देहे ताँर चरण भजय ॥ 193 ॥ अनुवाद-दीक्षाके समय भक्त आत्मसमर्पण करता है, उसी समयसे ही श्रीकृष्ण उसे अपने समान मानकर उसे स्वीकार कर लेते हैं। जब श्रीकृष्ण भक्तकी उसी देहको ही चिदानन्दमय बना देते हैं, तब भक्त अपनी अप्राकृत देहसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंका भजन करता है॥ 192-193 ॥ अनुभाष्य-दीक्षाके समय भक्त अपनी प्राकृत- अनुभूतियोंको समर्पित करके अप्राकृत-सम्बन्धज्ञानसे युक्त होते हैं। अप्राकृत दिव्यज्ञान प्राप्त करके वे अप्राकृत स्वरूपमें श्रीकृष्णकी सेवाके अधिकारको प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्णसे भिन्न मायाके आश्रयको त्याग करनेपर ही श्रीकृष्ण शरणागत भक्तको आत्मसात् करते हैं। तब उनका मायिक जगत्के 'भोक्ता' होनेका जड़ीय अभिमान दूर होता है और उन्हें अपने शुद्ध अभिमानमें नित्य-कृष्णदास्य-स्फूर्तिकी प्राप्ति होती है। तब भक्त सच्चिदानन्दमय अपने स्वरूपमें नित्य-सेवक-विग्रह होनेकी उपलब्धि करके अप्राकृत देहमें श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवाके अधिकारी होते हैं। भक्तकी तत्कालोचित अप्राकृत-देहके द्वारा अप्राकृत-भावसे की गयी सेवाको भी प्राकृत-बुद्धिके दोषके कारण कर्मीगण अपनी ही भाँति भोगपरायण प्राकृत-कर्मानुष्ठान समझते हैं; इसी अपराधके फलस्वरूप वे अप्राकृत-गुरुकी कृपाकी प्राप्तिसे वञ्चित हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें बृहद्भागवतामृतमें 1/3/45 एवं 2/3/139 संख्यामें श्रीसनातनप्रभुका विचार इस प्रकार है- (बृहद्भागवतामृतमें 1/3/45में श्रीनारदके प्रति श्रीशिव-वाक्य)- तत्र ये सच्चिदानन्ददेहाः परमवैभवम्। संप्राप्तं सच्चिदानन्दं हरेर्साङ्घ्रिंश्च नाभजन्॥
132 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/193-198 ] [अर्थात् "उस वैकुण्ठलोकमें जो वास करते हैं, उन सभीकी सच्चिदानन्द देह है। वे उस स्थानमें रहनेपर भी सच्चिदानन्दमय परम वैभव स्वरूप श्रीहरिके समान ऐश्वर्यको प्राप्तकर उस वैभवका तनिक भी आदर नहीं करते।"] (बृहद्भागवतामृतमें 2/3/139में श्रीगोपकुमारके प्रति भगवद्-पार्षदोंका वाक्य)— भक्तानां सच्चिदानन्दरूपेष्वङ्गेन्द्रियात्मसु। घटते स्वानुरूपेषु वैकुण्ठेऽन्यत्र च स्वतः॥ [अर्थात् "भक्त वैकुण्ठमें वास करें अथवा अन्य किसी स्थानपर, उनकी सच्चिदानन्दघनरूपा भक्तिके अनुरूप सच्चिदानन्दरूप देह-इन्द्रियादि स्वतः ही प्रकाशित होती हैं।"] ॥193॥ श्रीमद्भागवत (11/29/34) में— मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे। तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयात्मभूयाय च कल्पते वै॥194॥ अनुवाद—मरणशील जीव जब समस्त कर्मोंका परित्याग करके स्वयंको मेरे (भगवान्के) प्रति सम्पूर्णरूपसे निवेदन करके मेरी इच्छासे क्रिया करता है, तब वह अमृतत्वको (मोक्षको) प्राप्त करता है। इस प्रकार वह मेरे साथ मेरे समान चित्स्वरूप रस-भोग करनेके योग्य होता है॥194॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 22/100 संख्या देखें॥194॥ प्राकृत अक्षजदर्शन और सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी इच्छासे परिचालित अप्राकृत वैष्णवाचार :- सनातनेर देहे कृष्ण कण्डु उपजाञा। आमा परीक्षिते इँहा दिला पाठाञा॥195॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने सनातनकी देहमें पीबको उत्पन्न करके उसे मेरी परीक्षाके लिये यहाँ भेजा है॥195॥ मर्त्यबुद्धिसे गुणातीत गुरु-वैष्णवोंके किसी प्रकारके दोषदर्शनसे अपराध होनेके कारण नरककी प्राप्ति :- घृणा करि' आलिङ्गन ना करिताम यबे। कृष्ण-ठाञि अपराधी हइताम तबे॥196॥ अनुवाद—मैं यदि घृणा करके सनातनको आलिङ्गन नहीं करता, तब मैं कृष्णके प्रति अपराधी बनता॥196॥ भगवत्पार्षद गुरु-वैष्णव-गौण इन्द्रिय धर्मसे अतीत वैकुण्ठ-वस्तु :- पारिषद-देह एइ, ना हय दुर्गन्ध। प्रथम दिवसे पाइलुँ चतुःसम-गन्ध॥"197॥ अनुवाद—सनातन तो कृष्णका पार्षद है, उसकी पार्षद-देहमें दुर्गन्ध हो ही नहीं सकती। पहले दिन ही आलिङ्गन करते समय मुझे सनातनकी देहसे चतुःसमकी सुगन्ध प्राप्त हुई थी॥"197॥ अनुभाष्य—पारिषद-देह ही श्रीकृष्णसेवामय देह है; प्राकृत भोगपरायण मनके द्वारा चलायमान नाकके द्वारा महाभागवत परमहंसकुलचूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीकी देह दुर्गन्धयुक्त जैसे प्रतीत होनेपर भी स्वयं महाप्रभु कह रहे हैं कि,—'कृष्णसेवापरायणताके कारण सनातनकी इस अप्राकृत पारिषद-देहमें मुझे पहले दिन ही चतुःसम अर्थात् चन्दन, कर्पूर अथवा अगरु, कस्तूरी और कुङ्कुम मिश्रित द्रव्यकी गन्ध आयी थी।' चतुःसम,–(गरुड़ पुराणमें)— “कस्तूरिकाया द्वौ भागौ चत्वारश्चन्दनस्य तु। कुङ्कुमस्य त्रयश्चैकः शशिनः स्यात् चतुःसमम्॥” अर्थात् “दो भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन, तीन भाग कुङ्कुम अथवा केसर और एक भाग शशी अर्थात् कर्पूर एकत्रित करके 'चतुःसम'-नामक सुगन्धित द्रव्य बनता है।" हरिभक्तिविलासमें 6/115 संख्या देखें॥197॥ महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शसे श्रीसनातनके अङ्गोंकी सुगन्ध :- वस्तुतः प्रभु यबे कैला आलिङ्गन। ताँर स्पर्शे गन्ध हैल चन्दनेर सम॥198॥
[ 4/198–207 चौथा अध्याय 133 अनुवाद—वास्तवमें महाप्रभुने जब पहले दिन श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन किया था, उन्हींके स्पर्शसे श्रीसनातनके शरीरकी गन्ध चन्दन जैसी हो गयी थी ॥ 198 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको सान्त्वना देना, श्रीसनातनके स्पर्शसे महाप्रभुको सुख :— प्रभु कहे,—“सनातन, ना मानिह दुःख। तोमार आलिङ्गने आमि पाइ बड़ सुख ॥ 199 ॥ उस वर्ष श्रीसनातनको अपने निकट रखनेके बाद अगले वर्ष वृन्दावन जानेकी आज्ञा प्रदान :— एइ–वत्सर तुमि इँहा रह आमा–सने। वत्सर रहिं' तोमारे आमि पाठाइमु वृन्दावने ॥"200 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन ! तुम दुःखी मत होओ, तुम्हें आलिङ्गन करके मुझे बहुत अधिक सुखकी प्राप्ति होती है। तुम इस वर्ष यहाँ मेरे पास रहो। एक वर्ष यहाँ रहनेके बाद मैं तुम्हें वृन्दावन भेज दूँगा॥" 199–200 ॥ महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शके फलसे श्रीसनातनकी देहकी स्वर्णकान्ति :— एत बलि' पुनः ताँरे कैला आलिङ्गन। कण्डु गेल, अङ्ग हैल सुवर्णेर सम ॥ 201 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने पुनः श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन किया। श्रीसनातन गोस्वामीकी देहसे खाज-पीब नष्ट हो गये और उनके सभी अङ्ग स्वर्णकी भाँति उज्ज्वल हो गये ॥ 201 ॥ ऐसा देखकर श्रीहरिदासका विस्मय और सम्पूर्णरूपसे महाप्रभुकी इच्छासे परिचालित श्रीसनातनकी देहमें जड़ेन्द्रियोंसे दिखलायी देनेवाले खाज-पीबके कष्टको प्रदर्शित करनेकी लीलाके वास्तविक मर्मार्थका वर्णन :— देखि' हरिदास मने हैल चमत्कार। प्रभुरे कहेन, —“एइ भङ्गी ये तोमार ॥ 202 ॥ सेइ झारिखण्डेर पानी तुमि खाओआइला। सेइ पानी–लक्ष्ये इँहार कण्डु उपजिला ॥ 203 ॥ कण्डु करि' परीक्षा कराइले सनातने। एइ लीला–भङ्गी तोमार केह नाहि जाने ॥" 204 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीकी देहमें परिवर्तनको देखकर श्रीहरिदास ठाकुरके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ। श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुसे कहा, —“यह आपकी लीला है। आपने ही सनातनको झारिखण्डके जलका पान कराया तथा उसी जलके द्वारा इनकी देहमें खाज-पीबको उत्पन्न कराया। खाज-पीब उत्पन्न कराके आपने ही सनातनकी परीक्षा ली। आपकी इस लीलाकी रीतिको कोई नहीं जान सकता ॥”202–204 ॥ अनुभाष्य—'पानी-लक्ष्ये',—झारिखण्डके पानीय जलको उपलक्ष्य करके ॥ 203 ॥ महाप्रभुका प्रस्थान और दोनों भक्तोंके द्वारा भगवान्की कृपापर विचार :— दुँहे आलिङ्गिया प्रभु गेला निजालय। प्रभुर गुण कहे दुँहे हञा प्रेममय ॥ 205 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामी, उन दोनोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट गये। वे दोनों प्रेममय होकर महाप्रभुके गुणोंका गान करने लगे ॥ 205 ॥ प्रतिदिन श्रीसनातनके द्वारा श्रीहरिदासके साथ महाप्रभुकी कथाकी चर्चा :— एइमत सनातन रहे प्रभु–स्थाने। कृष्णचैतन्य–गुण–कथा हरिदास–सने ॥ 206 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके आश्रयमें श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। उनकी श्रीहरिदास ठाकुरके साथ निरन्तर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके गुणोंकी चर्चा चलती रहती ॥ 206 ॥ दोलयात्राके बाद श्रीसनातनको वृन्दावन भेजना :— दोलयात्रा देखि' प्रभु ताँरे विदाय दिला। वृन्दावने ये करिबेन, सब शिखाइला ॥ 207 ॥
134 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/207-215 ] अनुवाद-दोलयात्राके दर्शन करनेके पश्चात् महाप्रभुने श्रीसनातनको वृन्दावनमें जाकर उनको क्या-क्या करना है, वह सब सिखलाकर विदायी दी ॥ 207 ॥ विदायीके समय भक्त और भगवान्का तीव्र विरह-दुःख :- ये-काले विदाय हैला प्रभुर चरणे। दुइजनार विच्छेद-दशा ना याय वर्णने ॥ 208 ॥ अनुवाद-जिस समय श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंसे विदा हुए, उस समय उन दोनोंकी कैसी विच्छेद-दशा हुई उसका वर्णन करना सम्भव नहीं है ॥ 208 ॥ महाप्रभुके पथका अनुगमन करते हुए वृन्दावन-यात्रा :- येइ वन-पथे प्रभु गेला वृन्दावन। सेइपथे याइते मन कैला सनातन ॥ 209 ॥ अनुवाद-जिस वनमार्गसे महाप्रभु वृन्दावन गये थे, श्रीसनातन गोस्वामीने भी उसी मार्गसे वृन्दावन जानेकी इच्छा की ॥ 209 ॥ बलभद्रसे जानेवाले मार्गकी सूचना सङ्कलित करना :- ये-पथे, ये-ग्राम-नदी-शैल, याँहा येइ लीला। बलभद्रभट्ट-स्थाने सब लिखि' निला ॥ 210 ॥ अनुवाद-जिस मार्गपर, जिस ग्राममें, जिस नदीमें, जिस पर्वतपर-महाप्रभुने जहाँपर जो-जो लीला की थी, श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबलभद्र भट्टाचार्यसे पूछकर सब लिख लिया ॥ 210 ॥ मार्गमें भक्तोंके साथ मिलनके बाद यात्रा :- महाप्रभुर भक्तगणे सबारे मिलिया। सेइपथे चलि' याय से-स्थान देखिया ॥ 211 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके समस्त भक्तोंसे मिले तथा तत्पश्चात् महाप्रभु जिस मार्गसे गये थे, उस मार्गपर चलते हुए उन्होंने उन स्थानोंके दर्शन किये जहाँ महाप्रभुने अद्भुत लीलाएँ कीं थीं ॥ 211 ॥ महाप्रभुके लीला-स्थानोंके दर्शनसे श्रीसनातनमें प्रेमावेश :- ये-ये-लीला प्रभु पथे कैला ये-ये-स्थाने। ताहा देखि' प्रेमावेश हय सनातने ॥ 212 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने जो-जो लीला जिस-जिस स्थानपर की थी, उस उस स्थानको देखकर श्रीसनातन गोस्वामी प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 212 ॥ पहले श्रीसनातनका, बादमें श्रीरूपका वृन्दावनमें आगमन :- एमते सनातन वृन्दावने आइला। पाछे आसि' रूप-गोसाञि ताँहारे मिलिला ॥ 213 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी श्रीवृन्दावन आ गये। बादमें श्रीरूप गोस्वामी भी वृन्दावनमें आकर उनसे मिले ॥ 213 ॥ श्रीरूपके वृन्दावन आगमनमें विलम्बका कारण :- एकवत्सर रूपगोसाञिर गौड़े विलम्ब हैल। कुटुम्बरे 'स्थिति'-अर्थ विभाग करि' दिल ॥ 214 ॥ अनुवाद-उनके परिवारवालोंको कोई असुविधा न हो, इसलिये श्रीरूप गोस्वामीने भू-सम्पत्ति और अर्थका विभाजन करके उन्हें प्रदान किया। इस कार्यके लिये वे गौड़देशमें एक वर्ष रहे और उनको वृन्दावन जानेमें विलम्ब हुआ ॥ 214 ॥ अनुभाष्य- 'स्थिति-अर्थ', - भू-सम्पत्ति और अर्थ अथवा सञ्चित धन। [श्रीरूप गोस्वामीने] चल और अचल सम्पत्तिको कुटुम्बियोंके बीच उनकी योग्यताके अनुसार विभाजित कर दिया ॥ 214 ॥ गौड़े ये अर्थ छिल, ताहा आनाइला। कुटुम्ब-ब्राह्मण-देवालये बाँटि दिला ॥ 215 ॥ अनुवाद-गौड़देशमें जिस स्थानपर उनका जो भी
[ 4/215-221 चौथा अध्याय 135
धन था, श्रीरूप गोस्वामीने वहाँसे एकत्रित करके उसे अपने कुटुम्बियों, ब्राह्मणों और मन्दिरोंमें विभाजित कर दिया ॥ 215 ॥ नित्यसिद्धकुलशिरोमणि श्रीरूपके द्वारा विषय-विभाग करनेके बाद निश्चिन्त मनसे व्रजवास तथा अनर्थयुक्त साधकका गृहव्रत-बुद्धिसे उत्पन्न जनशैथिल्य 'एक' नहीं :- सब मनःकथा गोसाञि करि' निर्वाण। निश्चिन्त हञा शीघ्र आइला वृन्दावन ॥ 216 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने अपने मनमें जिन सब कार्योंका सङ्कल्प किया था, उन्हें पूर्ण करके वे निश्चिन्त होकर शीघ्र वृन्दावन लौट आये ॥ 216 ॥ अनुभाष्य—'मनःकथा',—जो-जो उनकी इच्छा थी ॥ 216 ॥ दोनों भाइयोंका व्रजवास और महाप्रभुकी चार प्रकारकी आज्ञारूपी सेवाका पालन :- दुइ भाइ मिलि' वृन्दावने वास कैला। प्रभुर ये आज्ञा, दुँहे सब निर्वाहिला ॥ 217 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामी—ये दोनों भाई वृन्दावनमें मिले और वहाँ वास करके महाप्रभुने जो आज्ञा दी थी, उसका उन दोनोंने सम्पूर्णरूपसे पालन किया ॥ 217 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/31-45 संख्या और अनुभाष्य एवं भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्ग देखें ॥ 217-231 ॥ नाना शास्त्र आनि' लुप्त-तीर्थ उद्धारिला। वृन्दावने कृष्णसेवा प्रकाश करिला ॥ 218 ॥ अनुवाद—उन दोनोंने अनेक शास्त्रोंको एकत्रित करके उन्हींके आधारपर लुप्त तीर्थोंका पुनः प्रकाश किया। इस प्रकार उन्होंने वृन्दावनमें मन्दिरोंकी स्थापना करके श्रीकृष्णकी सेवाको प्रकाशित किया ॥ 218 ॥ अनुभाष्य—'नाना शास्त्र',—भक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें इन समस्त शास्त्रोंकी प्रमाणावली उद्धृत हुई है। वृन्दावनमें श्रीरूप गोस्वामीने श्रीगोविन्दकी सेवा एवं श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीमदनमोहनकी सेवाको प्रकाशित किया ॥ 218 ॥ श्रीसनातनके द्वारा ग्रन्थ-रचनादि कार्य :- सनातन ग्रन्थ कैला 'भागवतामृते' । भक्त-भक्ति-कृष्ण-तत्त्व जानि याहा हैते ॥ 219 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने 'बृहद्भागवतामृत' नामक ग्रन्थकी रचना की। इस ग्रन्थके द्वारा भक्त, भक्ति तथा कृष्णतत्त्वके विषयमें जाना जा सकता है ॥ 219 ॥ अनुभाष्य—'भागवतामृत',—बृहद्भागवतामृत; मध्यलीला 1/35 संख्या देखें ॥ 219 ॥ सिद्धान्तसार ग्रन्थ कैला 'दशम-टिप्पणी' । कृष्णलीलारस-प्रेम याहा हैते जानि ॥ 220 ॥ अनुवाद—उन्होंने सिद्धान्तके सार-स्वरूप 'दशम- टिप्पणी' अर्थात् श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धकी बृहद्-वैष्णवतोषणी-टीकाकी रचना की जिसके द्वारा हम श्रीकृष्णलीलारस तथा प्रेमके विषयमें जान सकते हैं ॥ 220 ॥ अनुभाष्य—'दशम-टिप्पणी',—बृहद्वैष्णवतोषणी टीका ॥ 220 ॥ 'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ कैला वैष्णव-आचार। वैष्णवेर कर्त्तव्य याँहा पाइये पार ॥ 221 ॥ अनुवाद—उन्होंने हरिभक्तिविलास नामक ग्रन्थकी रचना की, जिसके द्वारा वैष्णवोंके आचारको समझा जा सकता है और वैष्णवोंके कर्त्तव्योंको पूर्णरूपमें जाना जा सकता है ॥ 221 ॥ अनुभाष्य—'हरिभक्तिविलास',—इस ग्रन्थका बादमें श्रीमद्गोपाल-भट्ट-गोस्वामी प्रभुने श्रील सनातन-गोस्वामी प्रभुके द्वारा संगृहीत 'दिग्दर्शिनी-टीका' सहित सङ्कलन किया। कोई-कोई जिज्ञासा करते हैं कि कर्मी स्मार्त्तगणोंने 'हरिभक्तिविलास'में उद्धृत सात्वत शास्त्रोंके मतको ग्रहण नहीं करके उन-उन शास्त्रोंसे ही किस प्रकार अन्य
136 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/221-229 ] मतोंकी कल्पना की? उसका उत्तर यह है कि हरिभक्तिविलासका मत शास्त्र-सम्मत और पूर्ण विशुद्ध होनेपर भी कर्मी लोग शुद्ध शास्त्रीय मतको त्याग करके केवलमात्र अपने-अपने प्राकृत-अशुद्ध विष्णुभक्ति विरोधी मतोंके प्रमाणोंको ही स्वीकार करते हैं। मध्यलीला 1/35 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 221 ॥ आर यत ग्रन्थ कैला, ताहा के करे गणन। 'मदनगोपाल-गोविन्देर सेवा'-प्रकाशन ॥ 222 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने अन्य जितने ग्रन्थोंकी रचना की, उनकी गणना कौन कर सकता है? ये ग्रन्थ श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्ददेवकी सेवाकी पद्धतिको प्रकाशित करते हैं ॥ 222 ॥ श्रीरूपका ग्रन्थ-रचना आदि कार्य :- रूप-गोसाञि कैला 'रसामृतसिन्धु' सार। कृष्णभक्ति-रसेर याँहा पाइये विस्तार ॥ 223 ॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसके सारस्वरूप 'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थकी रचना की, जिसमें कृष्णभक्तिरसका विस्तारसे वर्णन प्राप्त होता है ॥ 223 ॥ अनुभाष्य- 'रसामृतसिन्धु',- भक्तिरसामृतसिन्धु; उज्ज्वलनीलमणि, विदग्धमाधव और ललितमाधव- मध्यलीला 1/38 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 223 ॥ 'उज्ज्वलनीलमणि'-नाम ग्रन्थ आर। राधाकृष्ण-लीलारस ताँहा पाइये पार ॥ 224 ॥ अनुवाद-उन्होंने उज्ज्वलनीलमणि नामक एक और ग्रन्थकी रचना की जिसके द्वारा श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंके रसको पूर्णरूपसे समझा जा सकता है ॥ 224 ॥ 'विदग्धमाधव', 'ललितमाधव',-नाटकयुगल। कृष्णलीला-रस ताँहा पाइये सकल ॥ 225 ॥ अनुवाद-उन्होंने विदग्धमाधव तथा ललितमाधव नामक दो नाटकोंकी रचना भी की जिसके द्वारा कृष्णलीला-रसको सम्पूर्ण रूपसे समझा जा सकता है ॥ 225 ॥ 'दानकेलिकौमुदी' आदि लक्षग्रन्थ कैल। सेइ सब ग्रन्थे व्रजेर रस विचारिल ॥ 226 ॥ अनुवाद-उन्होंने दानकेलि-कौमुदी आदि ग्रन्थोंमें एक लाख श्लोकोंकी रचना की। उन्होंने उन समस्त ग्रन्थोंमें व्रजरसकी ही विस्तृत व्याख्या की है ॥ 226 ॥ अनुभाष्य- 'लक्षग्रन्थ',-श्रीरूप-रचित ग्रन्थसमूहमें प्राय एक लाख श्लोक हैं; पद्यकी संख्याके अतिरिक्त गद्यकी गणना करनेकी भी प्रणाली है। लिपिकार अपने-अपने परिश्रमके परिमाणके निर्णयके समय गद्य और पद्यके श्लोकग्रन्थ (अर्थात् श्लोकों)की संख्याकी गणना करते हैं। कोई भ्रममें पड़कर ऐसा न सोचे कि श्रीरूप प्रभुने एक लाख पुस्तकोंकी रचना की थी। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें- “श्रीरूप-गोस्वामी ग्रन्थ षोड़श करिल।” [अर्थात् श्रीरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की।] आदिलीला 10/84 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 226 ॥ श्रीजीवका परिचय और ग्रन्थ-रचनादि-कार्य :- ताँर लघुभ्राता-श्रीवल्लभ-अनुपम। ताँर पुत्र महापण्डित-श्रीजीव-नाम ॥ 227 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके छोटे भाई श्रीवल्लभ अथवा अनुपमके पुत्र श्रीजीव गोस्वामी महापण्डित थे ॥ 227 ॥ सर्व त्यजि' तँहो पाछे आइला वृन्दावन। तँह भक्तिशास्त्र बहु कैला प्रचारण ॥ 228 ॥ अनुवाद-सब कुछ त्यागकर श्रीजीव गोस्वामी भी श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके पीछे वृन्दावनमें आये। उन्होंने भी अनेक भक्तिशास्त्रोंकी रचना की और उनका प्रचार किया ॥ 228 ॥ 'भागवत-सन्दर्भ'-नाम कैला ग्रन्थ-सार। भागवत-सिद्धान्तेर ताँहा पाइये पार ॥ 229 ॥
[ 4/229-237 चौथा अध्याय 137
[बायाँ स्तम्भ] अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामीने 'भागवत-सन्दर्भ' नामक ग्रन्थकी रचना की जो समस्त शास्त्रोंका सार है। उसके द्वारा भक्ति और भगवान्के तत्त्वका पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है॥ 229॥ अनुभाष्य—'भागवत-सन्दर्भ',—इसका दूसरा नाम 'षट्सन्दर्भ' है; मध्यलीला 1/43 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 229॥ 'गोपालचम्पू' आर नाना ग्रन्थ कैला। व्रज-प्रेम-लीला-रससार देखाइला॥ 230॥ अनुवाद—उन्होंने गोपालचम्पू और अन्य अनेक ग्रन्थोंकी रचना की, जिनमें उन्होंने व्रज-प्रेम-लीला-रसके सारको प्रदर्शित किया॥ 230॥ 'षट्सन्दर्भे' कृष्णप्रेम-तत्त्व प्रकाशिला। चारिलक्ष ग्रन्थ तैं हो विस्तार करिला॥ 231॥ अनुवाद—उन्होंने 'षट्सन्दर्भ'में कृष्णप्रेमतत्त्वको प्रकाशित किया, इस प्रकार उन्होंने कुल मिलाकर चार लाख श्लोकोंमें इन समस्त तत्त्वोंकी व्याख्या की॥ 231॥ श्रीजीवगोस्वामीका पूर्व-वृत्तान्त; मथुरा जानेसे पहले श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और आज्ञाकी प्राप्ति :- जीव-गोसाञि गौड़ हैते मथुरा चलिला। नित्यानन्दप्रभु-ठाञि आज्ञा मागिला॥ 232॥ अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामी जब गौड़देशसे मथुराकी ओर जाना चाह रहे थे, तब उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा माँगी॥ 232॥ प्रभु प्रीत्ये ताँर माथे धरिला चरण। रूप-सनातन-सम्बन्धे कैला आलिङ्गन॥ 233॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने प्रसन्न होकर श्रीरूप-सनातन गोस्वामीके सम्बन्धसे श्रीजीव गोस्वामीके सिरपर अपने चरणकमल रखे और उनका आलिङ्गन किया॥ 233॥
[दायाँ स्तम्भ] श्रीसनातनसे युक्त श्रीरूपानुग गणोंका ही वृन्दावन-वासमें अधिकार :- आज्ञा दिला, —"शीघ्र तुमि याह वृन्दावने। तोमार वंशे प्रभु दियाछेन सेइस्थाने॥" 234॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीजीव गोस्वामीको आज्ञा दी,—"तुम शीघ्र वृन्दावन जाओ, महाप्रभुने तुम्हारे वंशको वही स्थान प्रदान किया है॥" 234॥ श्रीनित्यानन्दकृपा और आज्ञा-प्राप्तिके फलस्वरूप श्रीजीवका आचार्यत्व :- ताँर आज्ञाय आइला, आज्ञा-फल पाइला। शास्त्र करि' कतकाल 'भक्ति' प्रचारिला॥ 235॥ अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामी श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा प्राप्तकर वृन्दावनमें आये। वहाँ उन्हें उस आज्ञाके फलकी प्राप्ति हुई अर्थात् उन्होंने बहुत समय तक वृन्दावनमें रहकर अनेक शास्त्रोंकी रचना की और भक्तिका प्रचार किया॥ 235॥ ग्रन्थकारके तीन शिक्षागुरु :- एइ तिनगुरु, आर रघुनाथदास। इँहा-सबार चरण वन्दौँ, याँर मुञि 'दास'॥ 236॥ अनुवाद—मैं इन तीन गुरुओं (श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी) तथा श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, मैं इन सबका दास हूँ॥ 236॥ अनुभाष्य—'एइ तिनगुरु',—(1) श्रीरूप, (2) श्रीसनातन और (3) श्रीजीव-गोस्वामी प्रभु॥ 236॥ चौथे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभु-श्रीसनातन-मिलन-संवादको सुनकर महाप्रभुके द्वारा दी गयी लोकशिक्षाके अभिप्रायका अनुभव :- एइ त' कहिलुँ पुनः सनातन-सङ्गमे। प्रभुर आशय जानि याहार श्रवणे॥ 237॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास
138 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/237-239 ] कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुसे श्रीसनातन गोस्वामीके पुनः मिलनेके विषयमें बतलाया है जिसके श्रवणसे मैंने महाप्रभुके हृदयके अभिप्रायको जाना है॥237॥ निरन्तर अनुशीलनरूप मन्थनके फलसे चैतन्यचरितसिन्धुसे कृष्ण-प्रीति रूपी अमृतकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र एइ-इक्षुदण्ड-सम। चर्वण करिते हय रस-आस्वादन॥238॥ अनुवाद-यह श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र गन्नेके समान है, इसका चर्वण करनेसे रसका आस्वादन होता है॥238॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥239॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे पुनः सनातनसङ्गोत्सवो नाम चतुर्थः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥239॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें पुनः सनातनसङ्ग-उत्सव नामक चौथे अध्यायका अनुवाद समाप्त।
पाँचवाँ अध्याय कथासार—श्रीहट्ट-निवासी श्रीप्रद्युम्न मिश्रके द्वारा महाप्रभुसे श्रीकृष्णकथाको श्रवण करनेकी इच्छा करनेपर, महाप्रभुने उन्हें श्रीराय रामानन्दके पास भेजा। देवदासियोंके साथ श्रीरामानन्दके व्यवहारको सुनकर श्रीप्रद्युम्न मिश्र वहाँसे लौट आये। बादमें महाप्रभुने श्रीप्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्दके तत्त्वके विषयमें भली-भाँति समझा दिया। श्रीमिश्रने पुनः जाकर श्रीरामानन्दसे तत्त्व-उपदेश ग्रहण किये। बङ्गाल-देशके एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुकी लीलाके सम्बन्धमें एक नाटककी रचना करके लानेपर श्रीस्वरूप-गोस्वामीने उसे श्रवण करके उसमें मायावाद-दोष दिखला दिये, तथापि उन ब्राह्मणके द्वारा रचित कविताका दूसरा अर्थ करके उन्हें सन्तुष्ट किया; तब वे कवि चरितार्थ होकर सर्वस्व त्याग करके नीलाचलमें वैष्णवोंके आश्रयमें ही रहे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) भवरोगग्रस्त संसार-समुद्रमें पतित अचैतन्य जीवोंका श्रीचैतन्यके चरणाश्रयसे ही मङ्गल :- वैगुण्यकीटकलिनः पैशुन्य-व्रणपीड़ितः। दैन्यार्णवे निमग्नोऽहं चैतन्य-वैद्यमाश्रये॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बुरे कर्मफलरूपी कीटसे दंशित, ईर्ष्यारूपी फोड़ेसे पीड़ित और दैन्य समुद्रमें निमग्न होकर मैंने चैतन्यरूपी वैद्यका आश्रय किया है॥ 1 ॥ अनुभाष्य— वैगुण्यकीटकलिनः (वैगुण्यं कर्म-विपाकः तद्रूपेण कीटेन कलिनः दष्टः) पैशुन्यव्रणपीड़ितः (पैशुन्यं खलत्वं तद्रूपेण व्रणेन क्षतेन पीड़ितः) दैन्यार्णवे (दैन्यसमुद्रे) निमग्नः अहं चैतन्यवैद्यं (महाप्रभुरूपं चिकित्सकम्) आश्रये (आश्रितोऽस्मि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय शचीसुत श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय कृपामय नित्यानन्द धन्य॥ 2 ॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। कृपामय श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जयाद्वैत कृपासिन्धु जय भक्तगण। जय स्वरूप, गदाधर, रूप, सनातन॥ 3 ॥ अनुवाद—कृपासिन्धु श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो, समस्त भक्तोंकी जय हो। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुकी जय हो॥ 3 ॥ महाप्रभु और श्रीप्रद्युम्नमिश्रका संवाद; श्रीमिश्रके द्वारा महाप्रभुसे कृष्णकथा श्रवण करनेके लिये दीनतापूर्वक प्रार्थना :- एकदिन प्रद्युम्न-मिश्र प्रभुर चरणे। दण्डवत् करि' किछु करे निवेदने॥ 4 ॥ "शुन, प्रभु, मुञि दीन गृहस्थ अधम ! कोन भाग्ये पाञाछौँ तोमार दुर्लभ चरण॥ 5 ॥ कृष्णकथा शुनिवारे मोर इच्छा हय। कृष्णकथा कह मोरे हञा सदय॥" 6 ॥ अनुवाद—एक दिन श्रीप्रद्युम्न-मिश्रने महाप्रभुके चरणोंमें दण्डवत् करके उनसे निवेदन किया,—"हे महाप्रभो ! मेरा निवेदन सुनिये। मैं एक दीन-हीन अधम गृहस्थ हूँ! मुझे किसी सौभाग्यसे आपके दुर्लभ चरणकमलोंके आश्रयकी प्राप्ति हुई है। मेरी श्रीकृष्णकथाको सुननेकी अभिलाषा है, आप मुझे श्रीकृष्णकथा सुनाकर मुझपर दया करें॥" 4-6 ॥
140 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/7-11 ] महाप्रभुके द्वारा कृष्णकथाकी अनभिज्ञताका नाटक, शौक्र विप्रकुलमें जन्में श्रीमिश्रको अशौक्र विप्रकुलमें जन्में चारों वर्णों और आश्रमोंके गुरु श्रीरामानन्दके समीप सेवा-भावनायुक्त शिष्यके रूपमें जानेकी आज्ञा :- प्रभु कहेन, - “कृष्णकथा आमि नाहि जानि। सबे रामानन्द जाने, ताँर मुखे शुनि ॥ 7 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “मैं कृष्णकथाके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। मेरा विचार है कि उसे एकमात्र रामानन्द राय ही जानते हैं, क्योंकि मैं स्वयं भी उन्हींके मुखसे कृष्णकथा श्रवण करता हूँ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'प्रभु कहेन', - महाप्रभुने कहा ॥ 7 ॥ कृष्णकथा-श्रवण-इच्छुकके सौभाग्यकी प्रशंसा :- भाग्ये तोमार कृष्णकथा शुनिते हय मन। रामानन्द-पाश याइ' करह श्रवण ॥ 8 ॥ अनुवाद-यह तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम्हारे मनमें कृष्णकथा सुननेकी इच्छा हो रही है। तुम रामानन्द रायके पास जाकर कृष्णकथा श्रवण करो ॥ 8 ॥ वास्तविक भाग्यवान् व्यक्तिकी परिभाषाका निर्देश :- कृष्णकथाय रुचि तोमार - बड़ भाग्यवान्। यार कृष्णकथाय रुचि, सेइ भाग्यवान् ॥ 9 ॥ अनुवाद-कृष्णकथामें तुम्हारी रुचि है, इसलिये तुम बहुत भाग्यवान् हो। वास्तवमें जिस किसीकी भी कृष्णकथामें रुचि होती है, वही भाग्यवान् है ॥ 9 ॥ बिना वैध-धर्माचरणके साध्यभक्ति कृष्णरति निष्फल :- श्रीमद्भागवत (1/2/8) में- धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः। नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥” 10 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पुरुषके द्वारा उत्तमरूपसे अनुष्ठित वर्णाश्रम-धर्म यदि कृष्णकथामें रति उत्पन्न नहीं करे, तो वह धर्म भी श्रममात्र ही है ॥ 10 ॥ अनुभाष्य-शौनकादि ऋषियोंने श्रीशुकदेवके शिष्य श्रीसूतसे श्रीमद्भागवत-श्रवणके प्रारम्भमें जो छह प्रश्न किये, उनमें-से "मनुष्यका एकान्तिक श्रेय क्या है?” - इस प्रथम प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूत गोस्वामी अधोक्षज भजनकी कर्त्तव्यताके वर्णनके प्रसङ्गमें वैधधर्मकी सार्थकताकी प्राप्तिका उपाय बतला रहे हैं- पुंसां (नराणां) यः स्वनुष्ठितः (सुष्ठु सम्पादित धर्मः दैववर्णाश्रमपालनादिः साधनभक्तिरूपः सन् अपि) यदि विष्वक्सेनकथासु (विष्वक्सेनस्य भगवतः भागवतस्य कथासु तन्नामरूपगुणलीलाकीर्त्तनादिषु) रतिं (रुचिं) न उत्पादयेत् (न जनयेत्) [तर्हि सः स्वधर्मः] केवलं (कार्त्स्न्येन) हि (निश्चितं) श्रमः एव (पण्डश्रमः निष्फलः, तस्य धर्मस्य किञ्चिदपि साफल्यं नास्ति, निश्चितं स व्यर्थः भवतीत्यर्थः- “नेह यत् कर्म धर्मार्य न विरागाय कल्पते। न तीर्थपादसेवाये जीवन्नपि मृतो हि सः॥” इति वचनात्) । श्लोक-भावानुवाद-पुरुषके द्वारा सुन्दररूपसे सम्पादित दैववर्णाश्रम पालनादि साधनभक्तिरूप धर्म भी यदि भगवान्की कथाओं अर्थात् उनके नाम-रूप-गुण-लीलाके कीर्त्तनादिमें रुचि नहीं उत्पन्न करता, तो वह स्वधर्म निश्चित ही केवल श्रम है (उस धर्मकी किञ्चित् मात्र भी सफलता नहीं होती, वह निश्चित ही व्यर्थ जाता है। जैसे भागवत 3/23/56- "इस संसारमें जिस पुरुषके कर्म धर्म-अर्थ-कामरूप धर्मकी ओर उन्मुख होकर नहीं किये जाते, जिसका धर्म निष्काम होकर कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न नहीं करता और जिसका वैराग्य तीर्थपद श्रीहरिकी सेवामें पर्यवसित नहीं होता, वह व्यक्ति जीवित होनेपर भी मृत ही है।") ॥ 10 ॥ श्रीराधा-गोविन्दकी साक्षात् सेवामें भली-भाँति रत श्रीरामानन्दके घरपर श्रीप्रद्युम्न-मिश्रका गमन, श्रीरायके सेवकके द्वारा उनका सत्कार :- तबे प्रद्युम्नमिश्र गेला रामानन्देर स्थाने। रायेर सेवक ताँरे बसाइल आसने ॥ 11 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके आदेशानुसार श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीरामानन्द रायके वासस्थानपर गये। श्रीरामानन्द रायके सेवकने श्रीप्रद्युम्न मिश्रको आसनपर बैठाया ॥ 11 ॥
[ 5/12-20 पाँचवाँ अध्याय 141
[बायाँ स्तम्भ] श्रीमिश्रके द्वारा पूछे जानेपर सेवकके द्वारा महाभागवत परमहंस आत्माराम श्रीरायके कृत्यका वर्णन :- रायेर दर्शन ना पाञा सेवके पुछिल। रायेर वृत्तान्त सेवक कहिते लागिल ॥ 12 ॥ “दुइ देवकन्या हय परम सुन्दरी। नृत्य-गीते सुनिपुणा, वयसे किशोरी ॥ 13 ॥ सेइ दुँहे लञा राय निभृत उद्याने। निज-नाटक-गीतेर शिखाय नर्त्तने ॥ 14 ॥ श्रीमिश्रसे थोड़ी देर बैठनेके लिये प्रार्थना :- तुमि इँहा बसि’ रह, क्षणेके आसिबेन। ताँरे येइ आज्ञा देह, सेइ करिबेन॥” 15 ॥ अनुवाद—श्रीप्रद्युम्न मिश्रने श्रीरामानन्द रायको नहीं देखकर उनके सेवकसे उनके विषयमें पूछा। सेवक श्रीरामानन्द रायके वहाँ उपस्थित न होनेका कारण बतलाते हुए कहने लगा,—“दो देवकन्याएँ (देवदासियाँ) जो परम सुन्दरी हैं, नृत्य-गीतमें सुनिपुण तथा आयुमें किशोरी हैं। उन्हीं दोनों देवकन्याओंको एकान्त उद्यानमें ले जाकर श्रीरामानन्द राय स्वरचित नाटकके गीतके अनुरूप नृत्य करनेकी शिक्षा दे रहे हैं। आप यहींपर बैठे रहिये, वे कुछ ही क्षणमें आ जायेंगे। तब आप उन्हें जो भी आज्ञा देंगे, वे वैसा ही करेंगे॥” 12-15 ॥ अनुभाष्य—‘निज-नाटक’,—श्रीरामानन्दराय-रचित संस्कृत भाषामें लिखित ‘जगन्नाथवल्लभ’-नाटक ॥ 14 ॥ श्रीमिश्रके द्वारा प्रतीक्षा :- तबे प्रद्युम्न मिश्र ताँहा रहिल बसिया। रामानन्द राय सेइ दुइ-जन लञा ॥ 16 ॥ आत्माराम श्रीरामानन्दके द्वारा साक्षात् श्रीराधाकी चिन्मयी सेवा :- स्वहस्ते करेन तार अभ्यङ्ग-मर्द्दन। स्वहस्ते करान स्नान, गात्र-सम्मार्ज्जन ॥ 17 ॥ अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न मिश्र वहींपर बैठे रहे। उधर श्रीरामानन्द रायने उन दोनों देवदासियोंको एकान्त
[दायाँ स्तम्भ] उद्यानमें ले जाकर अपने हाथोंसे उन दोनोंकी तेलसे मालिश की और अपने हाथोंसे ही उन्हें स्नान करवाया। वास्तवमें श्रीरामानन्दने अपने हाथोंसे उनके सम्पूर्ण शरीरका मार्जन किया॥ 16-17 ॥ अनुभाष्य—‘अभ्यङ्ग-मर्द्दन’,—तेलकी मालिश॥ 17 ॥ स्वहस्ते परान वस्त्र, सर्वाङ्ग मण्डन। तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने यद्यपि अपने हाथोंसे ही उन देवदासियोंको वस्त्र पहनाये और उनके समस्त अङ्गोंको अलङ्कारादिके द्वारा विभूषित किया, तथापि उनका मन सम्पूर्णरूपसे विकाररहित था॥ 18 ॥ अनुभाष्य—‘मण्डन’,—अलङ्कारादिके द्वारा भूषित करना; ‘निर्विकार’,—स्त्री दर्शनादिके द्वारा प्राकृत-पुरुषाभिमानियोंके समान अपनी इन्द्रियोंके तर्पणके निमित्त सर्वत्र अधोक्षज श्रीराधाकृष्णके दर्शन करनेवाले (मध्यलीला 8/273, 274 और 276 संख्या देखें) परमहंसकुलचूड़ामणि विद्वत्- संन्यासियोंके भी गुरु श्रीरामानन्दप्रभु जड़भोगपरायण होकर कायिक अथवा मानसिक विकारके वशीभूत नहीं हुए॥ 18 ॥ जड़भोगोंसे विरक्त विद्वत्-संन्यासी शिरोमणि, छह वेगोंको जीतनेवाले श्रीरामानन्द-गोस्वामीका स्वभाव :- काष्ठ-पाषाण-स्पर्शे हय यैछे भाव। तरुणी-स्पर्शे रामानन्देर तैछे ‘स्वभाव’ ॥ 19 ॥ अनुवाद—युवती कन्याओंको स्पर्श करनेपर श्रीरामानन्द रायका ऐसा भाव था मानो वे लकड़ी अथवा पत्थरको स्पर्श कर रहे हों, इसलिये उनके शरीर और मनमें कोई विकार नहीं आया॥ 19 ॥ अपनी अप्राकृत सिद्धदेहमें गोपीभावसे रागात्मिका-भक्तिका पालन करनेवाले महाभागवत श्रीरायका अपनी ईश्वरी श्रीराधाका अप्राकृत चिद्विलास-कैङ्कर्य :- सेव्य-बुद्धि आरोपिया करेन सेवन। स्वाभाविक दासीभाव करेन आरोपण ॥ 20 ॥
142 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/20-26 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय उन देवदासियोंके प्रति सेव्य-बुद्धि रखकर उनकी सेवा कर रहे थे और अपने आपको स्वाभाविक रूपसे उनकी दासी मान रहे थे॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राय रामानन्दने 'जगन्नाथवल्लभ' नामक एक नाटककी रचना की थी। वे उस नाटकका श्रीजगन्नाथदेवके समक्ष अभिनय करवानेके लिये दो देवकन्याओं अर्थात् नवीना देवदासियोंको (जिन्हें अब 'माहारी' कहते हैं, उन्हें) लाकर उस नाटकके अभिनय-योग्य गोपीभावकी शिक्षा दे रहे थे। वे दो कन्याएँ प्रधाना-गोपियोंकी लीलाका अभिनय करेंगी, इसलिये उनमें प्रधाना गोपियोंके रूपमें सेव्य-बुद्धि करके और स्वयंमें उनकी अनुगत दासीका भाव ग्रहण करके श्रीरामानन्द उन्हें भावी अभिनयके गीत-सेवादिकी शिक्षा दे रहे थे। श्रीरामानन्द स्वयंको श्रीमतीकी दासी जानकर श्रीमतीका अभिनय करनेवाली देवदासियोंके प्रति सेव्यबुद्धिको ग्रहण करके उनकी देहका मार्जन और मण्डनादि कर रहे थे॥ 20 ॥ गौरभक्तोंका अचिन्त्य माहात्म्य, उनमेंसे श्रीरायमें भाव-प्रेम-भक्तिकी चरम सीमा विद्यमान :— महाप्रभुर भक्तगणेर दुर्गम महिमा। ताहे रामानन्देर भाव—भक्ति-प्रेम—सीमा॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंकी महिमा अचिन्त्य है। श्रीरामानन्द रायका भाव तो प्रेमभक्तिकी भी चरम सीमा है॥ 21 ॥ श्रीजगन्नाथके सामने स्वरचित 'जगन्नाथवल्लभ'-नाटकके अभिनयके लिये जगन्नाथवल्लभ-उद्यानमें अभिनयकी शिक्षा देना :— तबे सेइ दुइजने नृत्य शिखाइला। गीतेर गूढ़ अर्थ अभिनय कराइला॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने उन दोनों देवदासियोंको नृत्य सिखाया और उसके द्वारा स्वरचित गीतके गूढ़ अर्थके अनुरूप अभिनय करनेकी शिक्षा प्रदान की॥ 22 ॥
अनुभाष्य—नाटकमें लिखित गीतके अन्तर्निहित भावोंको अभिनेत्री देवदासियोंके द्वारा अप्राकृत व्रजरस-रसिकोंके समक्ष सुन्दररूपसे प्रकाशित करना सिखलाया॥ 22 ॥ सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायि-भावेर लक्षण। मुखे-नेत्रे अभिनय करे प्रकटन॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने उन दोनोंको सञ्चारी, सात्त्विक तथा स्थायी भावके लक्षणोंको अपने मुख और नेत्रोंके अभिनयके द्वारा व्यक्त करना सिखाया॥ 23 ॥ भावप्रकटन-लास्य राय ये शिखाय। जगन्नाथेर आगे दुँहे प्रकट देखाय॥ 24 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय उन दोनोंको भाव-प्रकाशक स्त्री-नृत्यके विषयमें जो कुछ भी सिखलाते, वे दोनों देवदासियाँ उसे भगवान् श्रीजगन्नाथके सामने प्रकट करके दिखलातीं॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'भावप्रकटन-लास्य',—भावप्रकाश करनेवाला स्त्री-नृत्य॥ 24 ॥ भोजन पानेके बाद दोनों देवदासियोंको अज्ञानी जड़-दर्शन करनेवाले समालोचकोंके मङ्गलके उद्देश्यसे गुप्तरूपमें घरमें भेजना :— तबे सेइ दुइजने प्रसाद खाओयाइला। निभृते दुँहारे निज-घरे पाठाइला॥ 25 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने उन दोनोंको प्रसाद खिलाया और उन्हें गुप्तरूपसे उनके घर भेज दिया॥ 25 ॥ महाभागवत श्रीरायके द्वारा सिद्धदेहसे अपनी ईश्वरीकी सेवा-चेष्टा, वह तर्कपन्थी जीवोंके जड़ीय-दर्शनसे अगम्य :— प्रतिदिन राय ऐछे कराय साधन। कोन् जाने क्षुद्र जीव काँहा ताँर मन?? 26 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय प्रतिदिन उन देवदासियोंको
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[ 5/26-35 ] पाँचवाँ अध्याय 143
[बायाँ स्तम्भ]
इसी प्रकार नृत्य सिखलाते थे। कोई मायाबद्ध क्षुद्र जीव किस प्रकार श्रीराय रामानन्दके मनके भावोंको जान सकता है ? 26 ॥ अनुभाष्य—[श्रीरामानन्द राय] प्रतिदिन देवदासियोंको इस प्रकारके अप्राकृत अभिनयका साधन करनेकी शिक्षा देते थे। क्षुद्र प्राकृत-विषयी, इन्द्रियतर्पणमें रत मनुष्य अपने अचित्-भोगपरायण मनके द्वारा प्रभु रामानन्दके श्रीकृष्णसेवापरायण अलौकिक अप्राकृत- शुद्धसत्त्व-मनोभावोंका निर्णय करनेमें समर्थ नहीं होते ॥ 26 ॥
सेवकके मुखसे श्रीमिश्रके आगमनके विषयमें सुनकर सबको यथायोग्य सम्मान देनेवाले श्रीरायका सभागृहमें आगमन :— मिश्रेर आगमन राये सेवक कहिला। शीघ्र रामानन्द तबे सभाते आइला ॥ 27 ॥
**अनुवाद—**जब श्रीरामानन्द रायके सेवकने उन्हें श्रीप्रद्युम्न मिश्रके आगमनके विषयमें बतलाया, तब श्रीरामानन्द राय शीघ्र ही अपने सभागृहमें आ गये ॥ 27 ॥
अमानी और मान देनेवाले श्रीरायके द्वारा श्रीमिश्रका यथोचित अभिनन्दन और दैन्य-ज्ञापन :— मिश्रेरे नमस्कार करे सम्मान करिया। निवेदन करे किछु विनीत हञा ॥ 28 ॥ “बहुक्षण आइला, मोरे কেহ ना कहिल। तोमार चरणे मोर अपराध हइल ॥ 29 ॥ तोमार आगमने मोर पवित्र हैल घर। आज्ञा कर, क्या करूँ तोमार किङ्कर ॥” 30 ॥
**अनुवाद—**श्रीरामानन्द रायने सम्मानपूर्वक श्रीप्रद्युम्न मिश्रको नमस्कार किया और विनीत होकर निवेदन किया,—“आप बहुत देरसे आये हुए हैं, किन्तु मुझे इस विषयमें किसीने कुछ भी नहीं बतलाया। इससे मेरा आपके चरणोंमें अपराध हुआ है। आपके आगमनसे मेरा घर पवित्र हो गया है। आप आज्ञा प्रदान कीजिये कि यह दास आपके लिये क्या करे ?” 28-30 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
मिश्रका सविनय प्रत्युत्तर देना :— मिश्र कहे,—“तोमा देखिते हैल आगमने। आपना पवित्र कैलुँ तोमार दरशने ॥” 31 ॥
**अनुवाद—**श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा,—“मैं आपके दर्शन करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। मैंने आपके दर्शनसे स्वयंको पवित्र किया है ॥” 31 ॥
अधिक समय हो गया—ऐसा देखकर उस दिन श्रीमिश्रका घरपर लौट आना :— अतिकाल देखि' मिश्र किछु ना कहिल। विदाय हइया मिश्र निजघर गेल ॥ 32 ॥
**अनुवाद—**बहुत समय हो गया है, ऐसा देखकर श्रीप्रद्युम्न मिश्रने और कुछ भी नहीं कहा। वे श्रीरामानन्द रायसे विदायी लेकर अपने घरपर लौट गये ॥ 32 ॥
अनुभाष्य—‘अतिकाल’,—वार्तालाप करनेका समय बीत गया है अर्थात् असमयमें वार्तालापके आरम्भ होनेसे दोनोंके लिये ही असुविधा होगी ॥ 32 ॥
अगले दिन महाप्रभुका श्रीमिश्रसे श्रीरायसे कृष्णकथा सुननेके विषयमें जिज्ञासा करना :— आर दिन मिश्र आइल प्रभु-विद्यमाने। प्रभु कहे,—“कृष्णकथा शुनिला रायस्थाने??” 33 ॥
**अनुवाद—**अगले दिन जब श्रीप्रद्युम्न मिश्र महाप्रभुसे आकर मिले, तब महाप्रभुने उनसे पूछा,—“क्या आपने रामानन्द रायसे कृष्णकथा सुनी?” 33 ॥
महाप्रभुसे मिश्रके द्वारा श्रीरायके वृत्तान्तका वर्णन :— तबे मिश्र रामानन्देर वृत्तान्त कहिला। शुनि' महाप्रभु तबे कहिते लागिला ॥ 34 ॥
अमानी धर्मके आदर्श-शिक्षक भगवान्का दीनतासहित अपनी अपेक्षा अपने भक्तोंके अधिकतर कृष्णानुरागके माहात्म्यका कीर्तन :— “आमि त' संन्यासी, आपनारे विरक्त करि' मानि। दर्शन दूरे, 'प्रकृतिर' नाम यदि शुनि ॥ 35 ॥
144 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/34-43 ] तबहिँ विकार पाय मोर तनु-मन। प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन?? 36॥ अनुवाद-तब श्रीप्रद्युम्न मिश्रने श्रीरामानन्द रायके कार्यकलापको कह सुनाया। श्रीप्रद्युम्न मिश्रकी बात सुनकर महाप्रभु उनसे कहने लगे, - 'मैं तो संन्यासी हूँ और अपनेको विरक्त मानता हूँ। दर्शनकी बात तो दूर रहे, स्त्रीका नाम श्रवण करनेसे ही मेरे तन और मनमें विकार हो जाता है। स्त्रीके दर्शनसे कौन व्यक्ति स्थिर रह सकता है? 34-36 ॥ अनुभाष्य- 'प्रकृति', - पुरुषभोग-योग्य 'योषित्' अथवा स्त्री ॥ 35 ॥ इन्द्रियसुखकी लालसा और स्त्री-दर्शनकी प्रवृत्तिसे रहित विरक्त विद्वत्-संन्यासी शिरोमणि अधोक्षज-द्रष्टा महाभागवत आत्माराम श्रीरामानन्द-गोस्वामीके चरित्रका वर्णन :- रामानन्द रायेर कथा शुन, सर्वजन। कहिवार कथा नहे, याहा आश्चर्य-कथन ॥ 37 ॥ अनुवाद-सभी राय रामानन्दके विषयमें श्रवण कीजिये, यह बात ऐसी आश्चर्यजनक है कि वह कहने योग्य नहीं है ॥ 37 ॥ एके देवदासी, आर सुन्दरी तरुणी। ताहादेर सब सेवा करेन आपनि ॥ 38 ॥ अनुवाद-वे देवदासियाँ अति सुन्दरी और नवयुवती हैं, उसपर रामानन्द राय स्वयं उनकी सब प्रकारकी सेवाएँ करते हैं॥ 38॥ अनुभाष्य- 'सब सेवा', - सब प्रकारकी सेवा (39 संख्या देखें) ॥ 38॥ स्नानादि कराय, पराय वास-विभूषण। गुह्य अङ्ग यत, तार दर्शन-स्पर्शन ॥ 39 ॥ तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन। नानाभावोद्गम तारे कराय शिक्षण ॥ 40 ॥ निर्विकार देह-मन-काष्ठ-पाषाण सम! आश्चर्य, - तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥ 41 ॥ अनुवाद-वे स्वयं उन देवदासियोंको स्नानादि कराते हैं, उन्हें वस्त्र-आभूषणादिसे विभूषित करते हैं। यद्यपि ऐसा करते समय उनका देवदासियोंके गुप्त अङ्गोंका दर्शन तथा स्पर्श करना भी होता है, तथापि रामानन्द रायका मन निर्विकार रहता है। रामानन्द राय उन देवदासियोंको अनेक प्रकारके भावोंको प्रकाशित करनेकी शिक्षा प्रदान करते हैं। परन्तु लकड़ी अथवा पत्थरके समान रामानन्द रायका शरीर तथा मन विकाररहित होता है। अति आश्चर्यकी बात है कि नवयुवती कन्याओंका स्पर्श करनेपर भी उनका मन निर्विकार रहता है॥ 39-41 ॥ अनुभाष्य- 'नानाभावोद्गम', - कृष्णलीलाके अभिनयके उपयोगी तैंतीस प्रकारके भावोंका प्रकाश। वर्धित होनेके धर्मसे रहित अचेतन लकड़ी और द्रवीभूत होनेके धर्मसे रहित कठोर पत्थरकी भाँति रामानन्दके शरीर एवं मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता ॥ 40-41 ॥ फलके द्वारा कारणका अनुमान; गुणातीत शुद्धसत्त्व चिद्वस्तुका प्राकृत गुणके स्पर्श-रहित होनेके कारण श्रीरामानन्दकी देह-अप्राकृत चिदानन्द :- एक रामानन्देर हय एइ अधिकार। ताते जानि अप्राकृत-देह ताँहार ॥ 42 ॥ अनुवाद-एकमात्र रामानन्द रायका ऐसा अधिकार है। इसके द्वारा मैं समझता हूँ कि रामानन्द रायका शरीर अप्राकृत है॥ 42 ॥ अधोक्षज भक्तकी चित्तवृत्ति-जड़ीय-ज्ञानसे अतीत :- ताँहार मनेर भाव तँह जाने मात्र। ताहा जानिवारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥ 43 ॥ अनुवाद-एकमात्र रामानन्द राय ही अपने मनके भावोंको जानते हैं, उनके मनके भावोंको जाननेवाला दूसरा कोई योग्य व्यक्ति नहीं है॥ 43 ॥
[ 5/44-47 पाँचवाँ अध्याय 145 अमल शब्द-प्रमाण श्रीभागवतके आनुगत्यमें ही अनुमानकी सार्थकता; श्रीरायकी अप्राकृत चित्तवृत्तिके हेतु निर्देशरूपी सिद्धान्त :- किन्तु शास्त्रदृष्ट्ये करि एक अनुमान। श्रीभागवत-शास्त्र-ताहाते प्रमाण ॥ 44 ॥ अनुवाद-किन्तु शास्त्रोंके निर्देशानुसार मैं एक अनुमान कर रहा हूँ। श्रीभागवत शास्त्र उस विषयमें प्रमाण प्रदान करता है ॥ 44 ॥ अप्राकृत श्रद्धा अथवा रागानुगा भक्तिका पालन करनेवालेको श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनके फलसे सिद्धि अथवा गोस्वामित्वकी प्राप्ति :- व्रजवधु-सङ्गे कृष्णेर रासादि-विलास। येइ जन कहे, सुने करिया विश्वास ॥ 45 ॥ हृद्रोग-काम ताँर तत्काले हय क्षय। तिनगुण-क्षोभ नहे, 'महाधीर' हय ॥ 46 ॥ अनुवाद-जो भी व्यक्ति व्रजगोपियोंके साथ श्रीकृष्णके रासादि विलासका विश्वासपूर्वक श्रवण अथवा कीर्तन करता है, उसके हृदयका रोग अर्थात् काम तत्काल क्षय हो जाता है। उसमें मायाके तीन गुणोंसे उत्पन्न होनेवाले क्षोभ (विकार) नहीं रहते और वह व्यक्ति महाधीर बन जाता है ॥ 45-46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तिनगुण',-सत्त्व, रजः और तमः,-इन तीन गुणोंके क्षोभसे जो स्त्री-पुरुषके व्यवहारकी इच्छा होती है, ऐसी इच्छा उसमें नहीं रहती ॥ 46 ॥ अनुभाष्य-जो व्यक्ति श्रीमद्भागवतमें वर्णित श्रीकृष्णकी अप्राकृत-रासादि मधुर लीलाका अपने अप्राकृत-हृदयके द्वारा विश्वास करके वर्णन करते हैं अथवा श्रवण करते हैं, उनका प्राकृत मनके द्वारा सृजित काम सम्पूर्णरूपसे क्षीण हो जाता है। अप्राकृत श्रीकृष्णलीलाके वक्ता अथवा श्रोता अप्राकृत-राज्यमें अपने अस्तित्वका अनुभव करते हैं, जिसके फलस्वरूप प्रकृतिके तीन गुण उन्हें पराजित करनेमें समर्थ नहीं होते। वे जड़ वस्तुओंमें परम निर्गुण-भावसे युक्त होकर स्थिरमति एवं श्रीकृष्णकी सेवामें अपना अधिकार समझनेमें समर्थ होते हैं। प्राकृत सहजिया लोगोंकी भाँति इस प्रसङ्गमें कोई इस प्रकार नहीं समझे कि, 'प्राकृत कामसे लुब्ध जीव यदि सम्बन्ध-ज्ञान प्राप्त करनेके स्थानपर प्राकृत-बुद्धिसे युक्त होकर अपने भोगमय राज्यमें वास करते हुए साधनभक्तिका परित्याग करके श्रीकृष्णके रासादि अप्राकृत विहार अथवा लीलाको अपने जैसे प्राकृत-भोगका आदर्श जानकर, उसका श्रवण और कीर्तनादि करे तो उसका जड़़ीय काम विनष्ट हो जायेगा।' इसका निषेध करनेके लिये ही महाप्रभुने 'विश्वास'-शब्दके द्वारा प्राकृत सहजिया लोगोंकी प्राकृत बुद्धिका खण्डन किया है। श्रीशुकने भी (भाः 10/33/30 श्लोकमें) कहा है,- “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथा-रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥" [अर्थात् “परन्तु जो अनीश्वर-असमर्थ हैं, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वरकी इस लीलाका अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट-पतित हो जायेगा। भगवान् शिवने समुद्रसे उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।"] ॥ 45-46 ॥ श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनसे कृष्णप्रेमानन्दके सिन्धुकी वृद्धि :- उज्ज्वल मधुर-रस प्रेमभक्ति पाय। आनन्दे कृष्णमाधुर्य विहरे सदाय ॥ 47 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनसे भक्तको उज्ज्वल मधुर-रसरूपी प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है और वह सदैव आनन्दपूर्वक कृष्णके माधुर्यमें ही विहार करता है ॥ 47 ॥
146 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/48-51 ] भागवत-शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (10/33/39) में— विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ 48 ॥ अनुवाद—जो धीरपुरुष व्रजदेवियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रासविलासका श्रद्धाके साथ बारम्बार श्रवण या वर्णन करता है, उसे प्रथमतः भगवान्के चरणोंमें पराभक्तिकी प्राप्ति होती है और फिर वह बहुत शीघ्र ही जितेन्द्रिय होकर अपने हृदयके रोग अर्थात् लौकिक कामभावसे सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो अप्राकृत-श्रद्धासे युक्त होकर इस रासपञ्चाध्यायमें व्रजवधुओंके साथ श्रीकृष्णकी अप्राकृत क्रीड़ाके वर्णनको सुनता अथवा वर्णन करता है, वह धीर पुरुष भगवान्में यथेष्ट परा-भक्ति प्राप्त करके हृदयरोगरूपी जड़्रीय कामको शीघ्र ही दूर करता है। तात्पर्य यह है कि, श्रीकृष्णलीला—सम्पूर्णतः 'चिन्मय' है। चिन्मयी गोपियोंके साथ पूर्ण चिन्मय (अधोक्षज) श्रीकृष्णकी लीला श्रद्धापूर्वक अर्थात् चिन्मय-तत्त्वकी उपलब्धि करनेके यत्नसहित विवेचन करते-करते चिद्-प्रेमके उदित होनेके परिमाणानुसार जड़्रीय आसक्ति एवं जड़्रीय काम आदि दूर होते रहते हैं; सम्पूर्ण चिन्मय-लीलाके उदित होनेपर फिर किञ्चित् भी जड़्रीय कामकी गन्ध नहीं रहती॥ 48 ॥ अनुभाष्य— यः पुमान् श्रद्धान्वितः (श्रद्धया अप्राकृतसुदृढ़विश्वासेन युक्तः सेवोन्मुखः सन्) व्रजवधूभिः (गोपीभिः सह) विष्णोः (नन्दनन्दनस्य परमस्य विभोः) इदं (पूर्वोक्त-रासपञ्चाध्यायोक्तं) च विक्रीड़ितं (रासाख्यां विशिष्टां क्रीड़ां) अनुशृणुयात् (अनु निरन्तरं गुरुमुखात् प्राकृतव्यवधानराहित्येन शृणुयात्) अथ (अनन्तरं) वर्णयेत् (रूपानुक्रमपथा कृष्णनामरूपगुणलीलादिकं सङ्कीर्त्तनं कुर्यात् सः) धीरः (षड्वेगजयी अचञ्चल रागानुगः गोस्वामी) अचिरेण भगवति (कृष्णे) परां भक्तिम् (उत्कृष्टां प्रेमभक्तिं) प्रतिलभ्य (प्राप्य) हृद्रोगं (मनोभवकामरूपाधिम्) आशु (शीघ्रम्) अपहिनोति (दूरीकरोति)। श्लोक-भावानुवाद—जो पुरुष अप्राकृत सुदृढ़विश्वासयुक्त अर्थात् सेवोन्मुख होकर गोपियोंके साथ स्वयं भगवान् नन्दनन्दनकी रासपञ्चाध्यायमें उक्त रास-नामक विशेष क्रीड़ाको गुरुमुखसे सांसारिक बाधासे रहित श्रवण करके बादमें रूपानुक्रम पथसे श्रीकृष्णनामरूपगुणलीलादिका कीर्तन करता है, वह षड्वेगजयी रागानुग गोस्वामी होकर शीघ्र ही श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट प्रेमभक्ति प्राप्त करके मनोभवकामरूप व्याधिको शीघ्र ही दूर करता है॥ 48 ॥ रागानुगजनोंकी निरन्तर श्रीकृष्णलीलाके अनुशीलनसे स्वरूपसिद्धि और चिदानन्द देहकी प्राप्ति :— ये शुने, ये पड़े, ताँर फल एतादृशी। सेइ भावाविष्ट, येइ सेवे अहर्निशि॥ 49 ॥ ताँर फल कि कहिमु, कहने ना याय। नित्यसिद्ध सेइ, प्राय-सिद्ध ताँर काय॥ 50 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 49-50 ॥ अनुभाष्य—जो श्रीकृष्णके अप्राकृत रासादि विलासका श्रवण और कीर्तन करता है एवं श्रीरूपके अप्राकृत भावानुसार सदा ही शुद्ध अकृत्रिम-रागमें आविष्ट होकर मनसे श्रीकृष्णसेवा करता है, उसके अपूर्व फलकी प्राप्ति प्राकृत-भाषाके द्वारा वर्णनीय नहीं है। वह नित्यसिद्ध पार्षद है, अथवा उसका सिद्धप्राय शरीर लोगोंके नेत्रोंसे दिखलायी देनेपर भी स्वरूपसिद्धि-प्राप्त श्रीकृष्णसेवापरायण भावोंका आश्रय होनेके कारण अप्राकृत क्रियामें लगा होता है। श्रीकृष्णकी इच्छासे वस्तुसिद्धिकी अपेक्षा करनेवाला उसका शरीर सिद्धप्राय और अप्राकृत होता है॥ 49-50 ॥ रागात्मिका-भक्तिका पालन करनेवाले नित्यसिद्ध श्रीराय :— रागानुग-मार्गे जानि रायेर भजन। सिद्धदेह-तुल्य, ताते 'प्राकृत' नहे मन॥ 51 ॥