श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें140 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/7-11 ] महाप्रभुके द्वारा कृष्णकथाकी अनभिज्ञताका नाटक, शौक्र विप्रकुलमें जन्में श्रीमिश्रको अशौक्र विप्रकुलमें जन्में चारों वर्णों और आश्रमोंके गुरु श्रीरामानन्दके समीप सेवा-भावनायुक्त शिष्यके रूपमें जानेकी आज्ञा :- प्रभु कहेन, - “कृष्णकथा आमि नाहि जानि। सबे रामानन्द जाने, ताँर मुखे शुनि ॥ 7 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “मैं कृष्णकथाके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। मेरा विचार है कि उसे एकमात्र रामानन्द राय ही जानते हैं, क्योंकि मैं स्वयं भी उन्हींके मुखसे कृष्णकथा श्रवण करता हूँ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'प्रभु कहेन', - महाप्रभुने कहा ॥ 7 ॥ कृष्णकथा-श्रवण-इच्छुकके सौभाग्यकी प्रशंसा :- भाग्ये तोमार कृष्णकथा शुनिते हय मन। रामानन्द-पाश याइ' करह श्रवण ॥ 8 ॥ अनुवाद-यह तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम्हारे मनमें कृष्णकथा सुननेकी इच्छा हो रही है। तुम रामानन्द रायके पास जाकर कृष्णकथा श्रवण करो ॥ 8 ॥ वास्तविक भाग्यवान् व्यक्तिकी परिभाषाका निर्देश :- कृष्णकथाय रुचि तोमार - बड़ भाग्यवान्। यार कृष्णकथाय रुचि, सेइ भाग्यवान् ॥ 9 ॥ अनुवाद-कृष्णकथामें तुम्हारी रुचि है, इसलिये तुम बहुत भाग्यवान् हो। वास्तवमें जिस किसीकी भी कृष्णकथामें रुचि होती है, वही भाग्यवान् है ॥ 9 ॥ बिना वैध-धर्माचरणके साध्यभक्ति कृष्णरति निष्फल :- श्रीमद्भागवत (1/2/8) में- धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः। नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥” 10 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पुरुषके द्वारा उत्तमरूपसे अनुष्ठित वर्णाश्रम-धर्म यदि कृष्णकथामें रति उत्पन्न नहीं करे, तो वह धर्म भी श्रममात्र ही है ॥ 10 ॥ अनुभाष्य-शौनकादि ऋषियोंने श्रीशुकदेवके शिष्य श्रीसूतसे श्रीमद्भागवत-श्रवणके प्रारम्भमें जो छह प्रश्न किये, उनमें-से "मनुष्यका एकान्तिक श्रेय क्या है?” - इस प्रथम प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूत गोस्वामी अधोक्षज भजनकी कर्त्तव्यताके वर्णनके प्रसङ्गमें वैधधर्मकी सार्थकताकी प्राप्तिका उपाय बतला रहे हैं- पुंसां (नराणां) यः स्वनुष्ठितः (सुष्ठु सम्पादित धर्मः दैववर्णाश्रमपालनादिः साधनभक्तिरूपः सन् अपि) यदि विष्वक्सेनकथासु (विष्वक्सेनस्य भगवतः भागवतस्य कथासु तन्नामरूपगुणलीलाकीर्त्तनादिषु) रतिं (रुचिं) न उत्पादयेत् (न जनयेत्) [तर्हि सः स्वधर्मः] केवलं (कार्त्स्न्येन) हि (निश्चितं) श्रमः एव (पण्डश्रमः निष्फलः, तस्य धर्मस्य किञ्चिदपि साफल्यं नास्ति, निश्चितं स व्यर्थः भवतीत्यर्थः- “नेह यत् कर्म धर्मार्य न विरागाय कल्पते। न तीर्थपादसेवाये जीवन्नपि मृतो हि सः॥” इति वचनात्) । श्लोक-भावानुवाद-पुरुषके द्वारा सुन्दररूपसे सम्पादित दैववर्णाश्रम पालनादि साधनभक्तिरूप धर्म भी यदि भगवान्की कथाओं अर्थात् उनके नाम-रूप-गुण-लीलाके कीर्त्तनादिमें रुचि नहीं उत्पन्न करता, तो वह स्वधर्म निश्चित ही केवल श्रम है (उस धर्मकी किञ्चित् मात्र भी सफलता नहीं होती, वह निश्चित ही व्यर्थ जाता है। जैसे भागवत 3/23/56- "इस संसारमें जिस पुरुषके कर्म धर्म-अर्थ-कामरूप धर्मकी ओर उन्मुख होकर नहीं किये जाते, जिसका धर्म निष्काम होकर कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न नहीं करता और जिसका वैराग्य तीर्थपद श्रीहरिकी सेवामें पर्यवसित नहीं होता, वह व्यक्ति जीवित होनेपर भी मृत ही है।") ॥ 10 ॥ श्रीराधा-गोविन्दकी साक्षात् सेवामें भली-भाँति रत श्रीरामानन्दके घरपर श्रीप्रद्युम्न-मिश्रका गमन, श्रीरायके सेवकके द्वारा उनका सत्कार :- तबे प्रद्युम्नमिश्र गेला रामानन्देर स्थाने। रायेर सेवक ताँरे बसाइल आसने ॥ 11 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके आदेशानुसार श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीरामानन्द रायके वासस्थानपर गये। श्रीरामानन्द रायके सेवकने श्रीप्रद्युम्न मिश्रको आसनपर बैठाया ॥ 11 ॥