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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

140 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/7-11 ] महाप्रभुके द्वारा कृष्णकथाकी अनभिज्ञताका नाटक, शौक्र विप्रकुलमें जन्में श्रीमिश्रको अशौक्र विप्रकुलमें जन्में चारों वर्णों और आश्रमोंके गुरु श्रीरामानन्दके समीप सेवा-भावनायुक्त शिष्यके रूपमें जानेकी आज्ञा :- प्रभु कहेन, - “कृष्णकथा आमि नाहि जानि। सबे रामानन्द जाने, ताँर मुखे शुनि ॥ 7 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “मैं कृष्णकथाके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। मेरा विचार है कि उसे एकमात्र रामानन्द राय ही जानते हैं, क्योंकि मैं स्वयं भी उन्हींके मुखसे कृष्णकथा श्रवण करता हूँ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'प्रभु कहेन', - महाप्रभुने कहा ॥ 7 ॥ कृष्णकथा-श्रवण-इच्छुकके सौभाग्यकी प्रशंसा :- भाग्ये तोमार कृष्णकथा शुनिते हय मन। रामानन्द-पाश याइ' करह श्रवण ॥ 8 ॥ अनुवाद-यह तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम्हारे मनमें कृष्णकथा सुननेकी इच्छा हो रही है। तुम रामानन्द रायके पास जाकर कृष्णकथा श्रवण करो ॥ 8 ॥ वास्तविक भाग्यवान् व्यक्तिकी परिभाषाका निर्देश :- कृष्णकथाय रुचि तोमार - बड़ भाग्यवान्। यार कृष्णकथाय रुचि, सेइ भाग्यवान् ॥ 9 ॥ अनुवाद-कृष्णकथामें तुम्हारी रुचि है, इसलिये तुम बहुत भाग्यवान् हो। वास्तवमें जिस किसीकी भी कृष्णकथामें रुचि होती है, वही भाग्यवान् है ॥ 9 ॥ बिना वैध-धर्माचरणके साध्यभक्ति कृष्णरति निष्फल :- श्रीमद्भागवत (1/2/8) में- धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः। नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥” 10 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पुरुषके द्वारा उत्तमरूपसे अनुष्ठित वर्णाश्रम-धर्म यदि कृष्णकथामें रति उत्पन्न नहीं करे, तो वह धर्म भी श्रममात्र ही है ॥ 10 ॥ अनुभाष्य-शौनकादि ऋषियोंने श्रीशुकदेवके शिष्य श्रीसूतसे श्रीमद्भागवत-श्रवणके प्रारम्भमें जो छह प्रश्न किये, उनमें-से "मनुष्यका एकान्तिक श्रेय क्या है?” - इस प्रथम प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूत गोस्वामी अधोक्षज भजनकी कर्त्तव्यताके वर्णनके प्रसङ्गमें वैधधर्मकी सार्थकताकी प्राप्तिका उपाय बतला रहे हैं- पुंसां (नराणां) यः स्वनुष्ठितः (सुष्ठु सम्पादित धर्मः दैववर्णाश्रमपालनादिः साधनभक्तिरूपः सन् अपि) यदि विष्वक्सेनकथासु (विष्वक्सेनस्य भगवतः भागवतस्य कथासु तन्नामरूपगुणलीलाकीर्त्तनादिषु) रतिं (रुचिं) न उत्पादयेत् (न जनयेत्) [तर्हि सः स्वधर्मः] केवलं (कार्त्स्न्येन) हि (निश्चितं) श्रमः एव (पण्डश्रमः निष्फलः, तस्य धर्मस्य किञ्चिदपि साफल्यं नास्ति, निश्चितं स व्यर्थः भवतीत्यर्थः- “नेह यत् कर्म धर्मार्य न विरागाय कल्पते। न तीर्थपादसेवाये जीवन्नपि मृतो हि सः॥” इति वचनात्) । श्लोक-भावानुवाद-पुरुषके द्वारा सुन्दररूपसे सम्पादित दैववर्णाश्रम पालनादि साधनभक्तिरूप धर्म भी यदि भगवान्की कथाओं अर्थात् उनके नाम-रूप-गुण-लीलाके कीर्त्तनादिमें रुचि नहीं उत्पन्न करता, तो वह स्वधर्म निश्चित ही केवल श्रम है (उस धर्मकी किञ्चित् मात्र भी सफलता नहीं होती, वह निश्चित ही व्यर्थ जाता है। जैसे भागवत 3/23/56- "इस संसारमें जिस पुरुषके कर्म धर्म-अर्थ-कामरूप धर्मकी ओर उन्मुख होकर नहीं किये जाते, जिसका धर्म निष्काम होकर कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे वैराग्य उत्पन्न नहीं करता और जिसका वैराग्य तीर्थपद श्रीहरिकी सेवामें पर्यवसित नहीं होता, वह व्यक्ति जीवित होनेपर भी मृत ही है।") ॥ 10 ॥ श्रीराधा-गोविन्दकी साक्षात् सेवामें भली-भाँति रत श्रीरामानन्दके घरपर श्रीप्रद्युम्न-मिश्रका गमन, श्रीरायके सेवकके द्वारा उनका सत्कार :- तबे प्रद्युम्नमिश्र गेला रामानन्देर स्थाने। रायेर सेवक ताँरे बसाइल आसने ॥ 11 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके आदेशानुसार श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीरामानन्द रायके वासस्थानपर गये। श्रीरामानन्द रायके सेवकने श्रीप्रद्युम्न मिश्रको आसनपर बैठाया ॥ 11 ॥

[ 5/12-20 पाँचवाँ अध्याय 141

[बायाँ स्तम्भ] श्रीमिश्रके द्वारा पूछे जानेपर सेवकके द्वारा महाभागवत परमहंस आत्माराम श्रीरायके कृत्यका वर्णन :- रायेर दर्शन ना पाञा सेवके पुछिल। रायेर वृत्तान्त सेवक कहिते लागिल ॥ 12 ॥ “दुइ देवकन्या हय परम सुन्दरी। नृत्य-गीते सुनिपुणा, वयसे किशोरी ॥ 13 ॥ सेइ दुँहे लञा राय निभृत उद्याने। निज-नाटक-गीतेर शिखाय नर्त्तने ॥ 14 ॥ श्रीमिश्रसे थोड़ी देर बैठनेके लिये प्रार्थना :- तुमि इँहा बसि’ रह, क्षणेके आसिबेन। ताँरे येइ आज्ञा देह, सेइ करिबेन॥” 15 ॥ अनुवाद—श्रीप्रद्युम्न मिश्रने श्रीरामानन्द रायको नहीं देखकर उनके सेवकसे उनके विषयमें पूछा। सेवक श्रीरामानन्द रायके वहाँ उपस्थित न होनेका कारण बतलाते हुए कहने लगा,—“दो देवकन्याएँ (देवदासियाँ) जो परम सुन्दरी हैं, नृत्य-गीतमें सुनिपुण तथा आयुमें किशोरी हैं। उन्हीं दोनों देवकन्याओंको एकान्त उद्यानमें ले जाकर श्रीरामानन्द राय स्वरचित नाटकके गीतके अनुरूप नृत्य करनेकी शिक्षा दे रहे हैं। आप यहींपर बैठे रहिये, वे कुछ ही क्षणमें आ जायेंगे। तब आप उन्हें जो भी आज्ञा देंगे, वे वैसा ही करेंगे॥” 12-15 ॥ अनुभाष्य—‘निज-नाटक’,—श्रीरामानन्दराय-रचित संस्कृत भाषामें लिखित ‘जगन्नाथवल्लभ’-नाटक ॥ 14 ॥ श्रीमिश्रके द्वारा प्रतीक्षा :- तबे प्रद्युम्न मिश्र ताँहा रहिल बसिया। रामानन्द राय सेइ दुइ-जन लञा ॥ 16 ॥ आत्माराम श्रीरामानन्दके द्वारा साक्षात् श्रीराधाकी चिन्मयी सेवा :- स्वहस्ते करेन तार अभ्यङ्ग-मर्द्दन। स्वहस्ते करान स्नान, गात्र-सम्मार्ज्जन ॥ 17 ॥ अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न मिश्र वहींपर बैठे रहे। उधर श्रीरामानन्द रायने उन दोनों देवदासियोंको एकान्त

[दायाँ स्तम्भ] उद्यानमें ले जाकर अपने हाथोंसे उन दोनोंकी तेलसे मालिश की और अपने हाथोंसे ही उन्हें स्नान करवाया। वास्तवमें श्रीरामानन्दने अपने हाथोंसे उनके सम्पूर्ण शरीरका मार्जन किया॥ 16-17 ॥ अनुभाष्य—‘अभ्यङ्ग-मर्द्दन’,—तेलकी मालिश॥ 17 ॥ स्वहस्ते परान वस्त्र, सर्वाङ्ग मण्डन। तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने यद्यपि अपने हाथोंसे ही उन देवदासियोंको वस्त्र पहनाये और उनके समस्त अङ्गोंको अलङ्कारादिके द्वारा विभूषित किया, तथापि उनका मन सम्पूर्णरूपसे विकाररहित था॥ 18 ॥ अनुभाष्य—‘मण्डन’,—अलङ्कारादिके द्वारा भूषित करना; ‘निर्विकार’,—स्त्री दर्शनादिके द्वारा प्राकृत-पुरुषाभिमानियोंके समान अपनी इन्द्रियोंके तर्पणके निमित्त सर्वत्र अधोक्षज श्रीराधाकृष्णके दर्शन करनेवाले (मध्यलीला 8/273, 274 और 276 संख्या देखें) परमहंसकुलचूड़ामणि विद्वत्- संन्यासियोंके भी गुरु श्रीरामानन्दप्रभु जड़भोगपरायण होकर कायिक अथवा मानसिक विकारके वशीभूत नहीं हुए॥ 18 ॥ जड़भोगोंसे विरक्त विद्वत्-संन्यासी शिरोमणि, छह वेगोंको जीतनेवाले श्रीरामानन्द-गोस्वामीका स्वभाव :- काष्ठ-पाषाण-स्पर्शे हय यैछे भाव। तरुणी-स्पर्शे रामानन्देर तैछे ‘स्वभाव’ ॥ 19 ॥ अनुवाद—युवती कन्याओंको स्पर्श करनेपर श्रीरामानन्द रायका ऐसा भाव था मानो वे लकड़ी अथवा पत्थरको स्पर्श कर रहे हों, इसलिये उनके शरीर और मनमें कोई विकार नहीं आया॥ 19 ॥ अपनी अप्राकृत सिद्धदेहमें गोपीभावसे रागात्मिका-भक्तिका पालन करनेवाले महाभागवत श्रीरायका अपनी ईश्वरी श्रीराधाका अप्राकृत चिद्विलास-कैङ्कर्य :- सेव्य-बुद्धि आरोपिया करेन सेवन। स्वाभाविक दासीभाव करेन आरोपण ॥ 20 ॥

142 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/20-26 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय उन देवदासियोंके प्रति सेव्य-बुद्धि रखकर उनकी सेवा कर रहे थे और अपने आपको स्वाभाविक रूपसे उनकी दासी मान रहे थे॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राय रामानन्दने 'जगन्नाथवल्लभ' नामक एक नाटककी रचना की थी। वे उस नाटकका श्रीजगन्नाथदेवके समक्ष अभिनय करवानेके लिये दो देवकन्याओं अर्थात् नवीना देवदासियोंको (जिन्हें अब 'माहारी' कहते हैं, उन्हें) लाकर उस नाटकके अभिनय-योग्य गोपीभावकी शिक्षा दे रहे थे। वे दो कन्याएँ प्रधाना-गोपियोंकी लीलाका अभिनय करेंगी, इसलिये उनमें प्रधाना गोपियोंके रूपमें सेव्य-बुद्धि करके और स्वयंमें उनकी अनुगत दासीका भाव ग्रहण करके श्रीरामानन्द उन्हें भावी अभिनयके गीत-सेवादिकी शिक्षा दे रहे थे। श्रीरामानन्द स्वयंको श्रीमतीकी दासी जानकर श्रीमतीका अभिनय करनेवाली देवदासियोंके प्रति सेव्यबुद्धिको ग्रहण करके उनकी देहका मार्जन और मण्डनादि कर रहे थे॥ 20 ॥ गौरभक्तोंका अचिन्त्य माहात्म्य, उनमेंसे श्रीरायमें भाव-प्रेम-भक्तिकी चरम सीमा विद्यमान :— महाप्रभुर भक्तगणेर दुर्गम महिमा। ताहे रामानन्देर भाव—भक्ति-प्रेम—सीमा॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंकी महिमा अचिन्त्य है। श्रीरामानन्द रायका भाव तो प्रेमभक्तिकी भी चरम सीमा है॥ 21 ॥ श्रीजगन्नाथके सामने स्वरचित 'जगन्नाथवल्लभ'-नाटकके अभिनयके लिये जगन्नाथवल्लभ-उद्यानमें अभिनयकी शिक्षा देना :— तबे सेइ दुइजने नृत्य शिखाइला। गीतेर गूढ़ अर्थ अभिनय कराइला॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने उन दोनों देवदासियोंको नृत्य सिखाया और उसके द्वारा स्वरचित गीतके गूढ़ अर्थके अनुरूप अभिनय करनेकी शिक्षा प्रदान की॥ 22 ॥

अनुभाष्य—नाटकमें लिखित गीतके अन्तर्निहित भावोंको अभिनेत्री देवदासियोंके द्वारा अप्राकृत व्रजरस-रसिकोंके समक्ष सुन्दररूपसे प्रकाशित करना सिखलाया॥ 22 ॥ सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायि-भावेर लक्षण। मुखे-नेत्रे अभिनय करे प्रकटन॥ 23 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने उन दोनोंको सञ्चारी, सात्त्विक तथा स्थायी भावके लक्षणोंको अपने मुख और नेत्रोंके अभिनयके द्वारा व्यक्त करना सिखाया॥ 23 ॥ भावप्रकटन-लास्य राय ये शिखाय। जगन्नाथेर आगे दुँहे प्रकट देखाय॥ 24 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय उन दोनोंको भाव-प्रकाशक स्त्री-नृत्यके विषयमें जो कुछ भी सिखलाते, वे दोनों देवदासियाँ उसे भगवान् श्रीजगन्नाथके सामने प्रकट करके दिखलातीं॥ 24 ॥ अनुभाष्य—'भावप्रकटन-लास्य',—भावप्रकाश करनेवाला स्त्री-नृत्य॥ 24 ॥ भोजन पानेके बाद दोनों देवदासियोंको अज्ञानी जड़-दर्शन करनेवाले समालोचकोंके मङ्गलके उद्देश्यसे गुप्तरूपमें घरमें भेजना :— तबे सेइ दुइजने प्रसाद खाओयाइला। निभृते दुँहारे निज-घरे पाठाइला॥ 25 ॥ अनुवाद—तब श्रीरामानन्द रायने उन दोनोंको प्रसाद खिलाया और उन्हें गुप्तरूपसे उनके घर भेज दिया॥ 25 ॥ महाभागवत श्रीरायके द्वारा सिद्धदेहसे अपनी ईश्वरीकी सेवा-चेष्टा, वह तर्कपन्थी जीवोंके जड़ीय-दर्शनसे अगम्य :— प्रतिदिन राय ऐछे कराय साधन। कोन् जाने क्षुद्र जीव काँहा ताँर मन?? 26 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय प्रतिदिन उन देवदासियोंको

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[ 5/26-35 ] पाँचवाँ अध्याय 143


[बायाँ स्तम्भ]

इसी प्रकार नृत्य सिखलाते थे। कोई मायाबद्ध क्षुद्र जीव किस प्रकार श्रीराय रामानन्दके मनके भावोंको जान सकता है ? 26 ॥ अनुभाष्य—[श्रीरामानन्द राय] प्रतिदिन देवदासियोंको इस प्रकारके अप्राकृत अभिनयका साधन करनेकी शिक्षा देते थे। क्षुद्र प्राकृत-विषयी, इन्द्रियतर्पणमें रत मनुष्य अपने अचित्-भोगपरायण मनके द्वारा प्रभु रामानन्दके श्रीकृष्णसेवापरायण अलौकिक अप्राकृत- शुद्धसत्त्व-मनोभावोंका निर्णय करनेमें समर्थ नहीं होते ॥ 26 ॥

सेवकके मुखसे श्रीमिश्रके आगमनके विषयमें सुनकर सबको यथायोग्य सम्मान देनेवाले श्रीरायका सभागृहमें आगमन :— मिश्रेर आगमन राये सेवक कहिला। शीघ्र रामानन्द तबे सभाते आइला ॥ 27 ॥

**अनुवाद—**जब श्रीरामानन्द रायके सेवकने उन्हें श्रीप्रद्युम्न मिश्रके आगमनके विषयमें बतलाया, तब श्रीरामानन्द राय शीघ्र ही अपने सभागृहमें आ गये ॥ 27 ॥

अमानी और मान देनेवाले श्रीरायके द्वारा श्रीमिश्रका यथोचित अभिनन्दन और दैन्य-ज्ञापन :— मिश्रेरे नमस्कार करे सम्मान करिया। निवेदन करे किछु विनीत हञा ॥ 28 ॥ “बहुक्षण आइला, मोरे কেহ ना कहिल। तोमार चरणे मोर अपराध हइल ॥ 29 ॥ तोमार आगमने मोर पवित्र हैल घर। आज्ञा कर, क्या करूँ तोमार किङ्कर ॥” 30 ॥

**अनुवाद—**श्रीरामानन्द रायने सम्मानपूर्वक श्रीप्रद्युम्न मिश्रको नमस्कार किया और विनीत होकर निवेदन किया,—“आप बहुत देरसे आये हुए हैं, किन्तु मुझे इस विषयमें किसीने कुछ भी नहीं बतलाया। इससे मेरा आपके चरणोंमें अपराध हुआ है। आपके आगमनसे मेरा घर पवित्र हो गया है। आप आज्ञा प्रदान कीजिये कि यह दास आपके लिये क्या करे ?” 28-30 ॥


[दायाँ स्तम्भ]

मिश्रका सविनय प्रत्युत्तर देना :— मिश्र कहे,—“तोमा देखिते हैल आगमने। आपना पवित्र कैलुँ तोमार दरशने ॥” 31 ॥

**अनुवाद—**श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा,—“मैं आपके दर्शन करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। मैंने आपके दर्शनसे स्वयंको पवित्र किया है ॥” 31 ॥

अधिक समय हो गया—ऐसा देखकर उस दिन श्रीमिश्रका घरपर लौट आना :— अतिकाल देखि' मिश्र किछु ना कहिल। विदाय हइया मिश्र निजघर गेल ॥ 32 ॥

**अनुवाद—**बहुत समय हो गया है, ऐसा देखकर श्रीप्रद्युम्न मिश्रने और कुछ भी नहीं कहा। वे श्रीरामानन्द रायसे विदायी लेकर अपने घरपर लौट गये ॥ 32 ॥

अनुभाष्य—‘अतिकाल’,—वार्तालाप करनेका समय बीत गया है अर्थात् असमयमें वार्तालापके आरम्भ होनेसे दोनोंके लिये ही असुविधा होगी ॥ 32 ॥

अगले दिन महाप्रभुका श्रीमिश्रसे श्रीरायसे कृष्णकथा सुननेके विषयमें जिज्ञासा करना :— आर दिन मिश्र आइल प्रभु-विद्यमाने। प्रभु कहे,—“कृष्णकथा शुनिला रायस्थाने??” 33 ॥

**अनुवाद—**अगले दिन जब श्रीप्रद्युम्न मिश्र महाप्रभुसे आकर मिले, तब महाप्रभुने उनसे पूछा,—“क्या आपने रामानन्द रायसे कृष्णकथा सुनी?” 33 ॥

महाप्रभुसे मिश्रके द्वारा श्रीरायके वृत्तान्तका वर्णन :— तबे मिश्र रामानन्देर वृत्तान्त कहिला। शुनि' महाप्रभु तबे कहिते लागिला ॥ 34 ॥

अमानी धर्मके आदर्श-शिक्षक भगवान्‌का दीनतासहित अपनी अपेक्षा अपने भक्तोंके अधिकतर कृष्णानुरागके माहात्म्यका कीर्तन :— “आमि त' संन्यासी, आपनारे विरक्त करि' मानि। दर्शन दूरे, 'प्रकृतिर' नाम यदि शुनि ॥ 35 ॥

144 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/34-43 ] तबहिँ विकार पाय मोर तनु-मन। प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन?? 36॥ अनुवाद-तब श्रीप्रद्युम्न मिश्रने श्रीरामानन्द रायके कार्यकलापको कह सुनाया। श्रीप्रद्युम्न मिश्रकी बात सुनकर महाप्रभु उनसे कहने लगे, - 'मैं तो संन्यासी हूँ और अपनेको विरक्त मानता हूँ। दर्शनकी बात तो दूर रहे, स्त्रीका नाम श्रवण करनेसे ही मेरे तन और मनमें विकार हो जाता है। स्त्रीके दर्शनसे कौन व्यक्ति स्थिर रह सकता है? 34-36 ॥ अनुभाष्य- 'प्रकृति', - पुरुषभोग-योग्य 'योषित्' अथवा स्त्री ॥ 35 ॥ इन्द्रियसुखकी लालसा और स्त्री-दर्शनकी प्रवृत्तिसे रहित विरक्त विद्वत्-संन्यासी शिरोमणि अधोक्षज-द्रष्टा महाभागवत आत्माराम श्रीरामानन्द-गोस्वामीके चरित्रका वर्णन :- रामानन्द रायेर कथा शुन, सर्वजन। कहिवार कथा नहे, याहा आश्चर्य-कथन ॥ 37 ॥ अनुवाद-सभी राय रामानन्दके विषयमें श्रवण कीजिये, यह बात ऐसी आश्चर्यजनक है कि वह कहने योग्य नहीं है ॥ 37 ॥ एके देवदासी, आर सुन्दरी तरुणी। ताहादेर सब सेवा करेन आपनि ॥ 38 ॥ अनुवाद-वे देवदासियाँ अति सुन्दरी और नवयुवती हैं, उसपर रामानन्द राय स्वयं उनकी सब प्रकारकी सेवाएँ करते हैं॥ 38॥ अनुभाष्य- 'सब सेवा', - सब प्रकारकी सेवा (39 संख्या देखें) ॥ 38॥ स्नानादि कराय, पराय वास-विभूषण। गुह्य अङ्ग यत, तार दर्शन-स्पर्शन ॥ 39 ॥ तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन। नानाभावोद्गम तारे कराय शिक्षण ॥ 40 ॥ निर्विकार देह-मन-काष्ठ-पाषाण सम! आश्चर्य, - तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥ 41 ॥ अनुवाद-वे स्वयं उन देवदासियोंको स्नानादि कराते हैं, उन्हें वस्त्र-आभूषणादिसे विभूषित करते हैं। यद्यपि ऐसा करते समय उनका देवदासियोंके गुप्त अङ्गोंका दर्शन तथा स्पर्श करना भी होता है, तथापि रामानन्द रायका मन निर्विकार रहता है। रामानन्द राय उन देवदासियोंको अनेक प्रकारके भावोंको प्रकाशित करनेकी शिक्षा प्रदान करते हैं। परन्तु लकड़ी अथवा पत्थरके समान रामानन्द रायका शरीर तथा मन विकाररहित होता है। अति आश्चर्यकी बात है कि नवयुवती कन्याओंका स्पर्श करनेपर भी उनका मन निर्विकार रहता है॥ 39-41 ॥ अनुभाष्य- 'नानाभावोद्गम', - कृष्णलीलाके अभिनयके उपयोगी तैंतीस प्रकारके भावोंका प्रकाश। वर्धित होनेके धर्मसे रहित अचेतन लकड़ी और द्रवीभूत होनेके धर्मसे रहित कठोर पत्थरकी भाँति रामानन्दके शरीर एवं मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता ॥ 40-41 ॥ फलके द्वारा कारणका अनुमान; गुणातीत शुद्धसत्त्व चिद्वस्तुका प्राकृत गुणके स्पर्श-रहित होनेके कारण श्रीरामानन्दकी देह-अप्राकृत चिदानन्द :- एक रामानन्देर हय एइ अधिकार। ताते जानि अप्राकृत-देह ताँहार ॥ 42 ॥ अनुवाद-एकमात्र रामानन्द रायका ऐसा अधिकार है। इसके द्वारा मैं समझता हूँ कि रामानन्द रायका शरीर अप्राकृत है॥ 42 ॥ अधोक्षज भक्तकी चित्तवृत्ति-जड़ीय-ज्ञानसे अतीत :- ताँहार मनेर भाव तँह जाने मात्र। ताहा जानिवारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥ 43 ॥ अनुवाद-एकमात्र रामानन्द राय ही अपने मनके भावोंको जानते हैं, उनके मनके भावोंको जाननेवाला दूसरा कोई योग्य व्यक्ति नहीं है॥ 43 ॥

[ 5/44-47 पाँचवाँ अध्याय 145 अमल शब्द-प्रमाण श्रीभागवतके आनुगत्यमें ही अनुमानकी सार्थकता; श्रीरायकी अप्राकृत चित्तवृत्तिके हेतु निर्देशरूपी सिद्धान्त :- किन्तु शास्त्रदृष्ट्ये करि एक अनुमान। श्रीभागवत-शास्त्र-ताहाते प्रमाण ॥ 44 ॥ अनुवाद-किन्तु शास्त्रोंके निर्देशानुसार मैं एक अनुमान कर रहा हूँ। श्रीभागवत शास्त्र उस विषयमें प्रमाण प्रदान करता है ॥ 44 ॥ अप्राकृत श्रद्धा अथवा रागानुगा भक्तिका पालन करनेवालेको श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनके फलसे सिद्धि अथवा गोस्वामित्वकी प्राप्ति :- व्रजवधु-सङ्गे कृष्णेर रासादि-विलास। येइ जन कहे, सुने करिया विश्वास ॥ 45 ॥ हृद्रोग-काम ताँर तत्काले हय क्षय। तिनगुण-क्षोभ नहे, 'महाधीर' हय ॥ 46 ॥ अनुवाद-जो भी व्यक्ति व्रजगोपियोंके साथ श्रीकृष्णके रासादि विलासका विश्वासपूर्वक श्रवण अथवा कीर्तन करता है, उसके हृदयका रोग अर्थात् काम तत्काल क्षय हो जाता है। उसमें मायाके तीन गुणोंसे उत्पन्न होनेवाले क्षोभ (विकार) नहीं रहते और वह व्यक्ति महाधीर बन जाता है ॥ 45-46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तिनगुण',-सत्त्व, रजः और तमः,-इन तीन गुणोंके क्षोभसे जो स्त्री-पुरुषके व्यवहारकी इच्छा होती है, ऐसी इच्छा उसमें नहीं रहती ॥ 46 ॥ अनुभाष्य-जो व्यक्ति श्रीमद्भागवतमें वर्णित श्रीकृष्णकी अप्राकृत-रासादि मधुर लीलाका अपने अप्राकृत-हृदयके द्वारा विश्वास करके वर्णन करते हैं अथवा श्रवण करते हैं, उनका प्राकृत मनके द्वारा सृजित काम सम्पूर्णरूपसे क्षीण हो जाता है। अप्राकृत श्रीकृष्णलीलाके वक्ता अथवा श्रोता अप्राकृत-राज्यमें अपने अस्तित्वका अनुभव करते हैं, जिसके फलस्वरूप प्रकृतिके तीन गुण उन्हें पराजित करनेमें समर्थ नहीं होते। वे जड़ वस्तुओंमें परम निर्गुण-भावसे युक्त होकर स्थिरमति एवं श्रीकृष्णकी सेवामें अपना अधिकार समझनेमें समर्थ होते हैं। प्राकृत सहजिया लोगोंकी भाँति इस प्रसङ्गमें कोई इस प्रकार नहीं समझे कि, 'प्राकृत कामसे लुब्ध जीव यदि सम्बन्ध-ज्ञान प्राप्त करनेके स्थानपर प्राकृत-बुद्धिसे युक्त होकर अपने भोगमय राज्यमें वास करते हुए साधनभक्तिका परित्याग करके श्रीकृष्णके रासादि अप्राकृत विहार अथवा लीलाको अपने जैसे प्राकृत-भोगका आदर्श जानकर, उसका श्रवण और कीर्तनादि करे तो उसका जड़़ीय काम विनष्ट हो जायेगा।' इसका निषेध करनेके लिये ही महाप्रभुने 'विश्वास'-शब्दके द्वारा प्राकृत सहजिया लोगोंकी प्राकृत बुद्धिका खण्डन किया है। श्रीशुकने भी (भाः 10/33/30 श्लोकमें) कहा है,- “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथा-रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥" [अर्थात् “परन्तु जो अनीश्वर-असमर्थ हैं, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वरकी इस लीलाका अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट-पतित हो जायेगा। भगवान् शिवने समुद्रसे उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।"] ॥ 45-46 ॥ श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनसे कृष्णप्रेमानन्दके सिन्धुकी वृद्धि :- उज्ज्वल मधुर-रस प्रेमभक्ति पाय। आनन्दे कृष्णमाधुर्य विहरे सदाय ॥ 47 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनसे भक्तको उज्ज्वल मधुर-रसरूपी प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है और वह सदैव आनन्दपूर्वक कृष्णके माधुर्यमें ही विहार करता है ॥ 47 ॥

146 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/48-51 ] भागवत-शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (10/33/39) में— विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ 48 ॥ अनुवाद—जो धीरपुरुष व्रजदेवियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रासविलासका श्रद्धाके साथ बारम्बार श्रवण या वर्णन करता है, उसे प्रथमतः भगवान्‌के चरणोंमें पराभक्तिकी प्राप्ति होती है और फिर वह बहुत शीघ्र ही जितेन्द्रिय होकर अपने हृदयके रोग अर्थात् लौकिक कामभावसे सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो अप्राकृत-श्रद्धासे युक्त होकर इस रासपञ्चाध्यायमें व्रजवधुओंके साथ श्रीकृष्णकी अप्राकृत क्रीड़ाके वर्णनको सुनता अथवा वर्णन करता है, वह धीर पुरुष भगवान्‌में यथेष्ट परा-भक्ति प्राप्त करके हृदयरोगरूपी जड़्रीय कामको शीघ्र ही दूर करता है। तात्पर्य यह है कि, श्रीकृष्णलीला—सम्पूर्णतः 'चिन्मय' है। चिन्मयी गोपियोंके साथ पूर्ण चिन्मय (अधोक्षज) श्रीकृष्णकी लीला श्रद्धापूर्वक अर्थात् चिन्मय-तत्त्वकी उपलब्धि करनेके यत्नसहित विवेचन करते-करते चिद्-प्रेमके उदित होनेके परिमाणानुसार जड़्रीय आसक्ति एवं जड़्रीय काम आदि दूर होते रहते हैं; सम्पूर्ण चिन्मय-लीलाके उदित होनेपर फिर किञ्चित् भी जड़्रीय कामकी गन्ध नहीं रहती॥ 48 ॥ अनुभाष्य— यः पुमान् श्रद्धान्वितः (श्रद्धया अप्राकृतसुदृढ़विश्वासेन युक्तः सेवोन्मुखः सन्) व्रजवधूभिः (गोपीभिः सह) विष्णोः (नन्दनन्दनस्य परमस्य विभोः) इदं (पूर्वोक्त-रासपञ्चाध्यायोक्तं) च विक्रीड़ितं (रासाख्यां विशिष्टां क्रीड़ां) अनुशृणुयात् (अनु निरन्तरं गुरुमुखात् प्राकृतव्यवधानराहित्येन शृणुयात्) अथ (अनन्तरं) वर्णयेत् (रूपानुक्रमपथा कृष्णनामरूपगुणलीलादिकं सङ्कीर्त्तनं कुर्यात् सः) धीरः (षड्वेगजयी अचञ्चल रागानुगः गोस्वामी) अचिरेण भगवति (कृष्णे) परां भक्तिम् (उत्कृष्टां प्रेमभक्तिं) प्रतिलभ्य (प्राप्य) हृद्रोगं (मनोभवकामरूपाधिम्) आशु (शीघ्रम्) अपहिनोति (दूरीकरोति)। श्लोक-भावानुवाद—जो पुरुष अप्राकृत सुदृढ़विश्वासयुक्त अर्थात् सेवोन्मुख होकर गोपियोंके साथ स्वयं भगवान् नन्दनन्दनकी रासपञ्चाध्यायमें उक्त रास-नामक विशेष क्रीड़ाको गुरुमुखसे सांसारिक बाधासे रहित श्रवण करके बादमें रूपानुक्रम पथसे श्रीकृष्णनामरूपगुणलीलादिका कीर्तन करता है, वह षड्वेगजयी रागानुग गोस्वामी होकर शीघ्र ही श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट प्रेमभक्ति प्राप्त करके मनोभवकामरूप व्याधिको शीघ्र ही दूर करता है॥ 48 ॥ रागानुगजनोंकी निरन्तर श्रीकृष्णलीलाके अनुशीलनसे स्वरूपसिद्धि और चिदानन्द देहकी प्राप्ति :— ये शुने, ये पड़े, ताँर फल एतादृशी। सेइ भावाविष्ट, येइ सेवे अहर्निशि॥ 49 ॥ ताँर फल कि कहिमु, कहने ना याय। नित्यसिद्ध सेइ, प्राय-सिद्ध ताँर काय॥ 50 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 49-50 ॥ अनुभाष्य—जो श्रीकृष्णके अप्राकृत रासादि विलासका श्रवण और कीर्तन करता है एवं श्रीरूपके अप्राकृत भावानुसार सदा ही शुद्ध अकृत्रिम-रागमें आविष्ट होकर मनसे श्रीकृष्णसेवा करता है, उसके अपूर्व फलकी प्राप्ति प्राकृत-भाषाके द्वारा वर्णनीय नहीं है। वह नित्यसिद्ध पार्षद है, अथवा उसका सिद्धप्राय शरीर लोगोंके नेत्रोंसे दिखलायी देनेपर भी स्वरूपसिद्धि-प्राप्त श्रीकृष्णसेवापरायण भावोंका आश्रय होनेके कारण अप्राकृत क्रियामें लगा होता है। श्रीकृष्णकी इच्छासे वस्तुसिद्धिकी अपेक्षा करनेवाला उसका शरीर सिद्धप्राय और अप्राकृत होता है॥ 49-50 ॥ रागात्मिका-भक्तिका पालन करनेवाले नित्यसिद्ध श्रीराय :— रागानुग-मार्गे जानि रायेर भजन। सिद्धदेह-तुल्य, ताते 'प्राकृत' नहे मन॥ 51 ॥

[ 5/51-60 पाँचवाँ अध्याय 147 अनुवाद-रामानन्द रायका भजन रागानुग-मार्गीय है। वे सिद्धदेहमें हैं, इसलिये उनका मन प्राकृत विषयोंसे क्षुब्ध नहीं होता ॥ ५१ ॥ श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीति-चेष्टामयी श्रीकृष्णतत्त्व-विद्या ही गुरुत्वका प्रमाण है, उच्चकुलमें जन्म नहीं :- आमिह रायेर स्थाने शुनि कृष्णकथा। शुनिते इच्छा हय यदि, पुनः याह तथा ॥ ५२ ॥ अनुवाद-मैं स्वयं भी रामानन्द रायसे कृष्णकथा श्रवण करता हूँ। यदि तुम्हारी कृष्णकथा सुननेकी इच्छा हो, तो पुनः उन्हींके पास जाओ॥ ५२ ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमिश्रको श्रीरायके समीप शिष्यत्व प्राप्त करनेके लिये पुनः भेजना :- मोर नाम कहिह, - 'तेँहो पाठाइला मोरे। तोमार स्थाने कृष्णकथा शुनिवार तरे ॥ '५३ ॥ अनुवाद-तुम रामानन्द रायके पास जाकर मेरा नाम लेकर कहना, - 'उन्होंने मुझे आपके पास कृष्णकथा सुननेके लिये भेजा है॥'५३ ॥ शीघ्र याह, यावत् तेँहो आछेन सभाते।" एत शुनि' प्रद्युम्न-मिश्र चलिला त्वरिते ॥ ५४ ॥ अनुवाद-तुम शीघ्र जाओ जब तक रामानन्द राय सभामें है।" यह सुनकर श्रीप्रद्युम्न मिश्र तुरन्त चल पड़े॥ ५४॥ श्रीमिश्रका श्रीरायके घरमें जाना, अमानी और मानद श्रीरायके द्वारा श्रीमिश्रका अभिनन्दन :- राय-पाशे गेल, राय प्रणति करिल। “आज्ञा कर, ये लागि' आगमन हैल ॥ ”५५ ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीरामानन्द रायके पास पहुँचे। श्रीरामानन्द रायने उन्हें प्रणाम किया और पूछा, - “कृपया आज्ञा कीजिये। आपका किस उद्देश्यसे यहाँ आगमन हुआ है॥” ५५ ॥ श्रीमिश्रके द्वारा महाप्रभुका परिचय प्रदान :- मिश्र कहे, - “महाप्रभु पाठाइला मोरे। तोमार स्थाने कृष्णकथा शुनिवार तरे ॥ ”५६ ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा, - “महाप्रभुने मुझे आपसे श्रीकृष्णकथा सुननेके लिये भेजा है॥” ५६ ॥ श्रीरायका आनन्द :- शुनि' रामानन्द राय हइला सन्तोषे। कहिते लागिला किछु मनेर हरिषे ॥ ५७ ॥ महाप्रभुकी आदेश-वाणीके श्रवणसे श्रीरायके द्वारा अपने सौभाग्यका वर्णन :- “प्रभुर आज्ञाय कृष्णकथा शुनिते आइला एथा। इहा वइ महाभाग्य आमि पाब कोथा ? ?' ५८ ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीरामानन्द राय बहुत प्रसन्न हुए। वे हर्षित होकर कहने लगे, - “आप महाप्रभुकी आज्ञासे कृष्णकथा सुननेके लिये यहाँपर आये हैं। इससे बढ़कर परम सौभाग्य मुझे और कहाँपर मिलेगा ?” ५७-58 ॥ एकान्तमें श्रीमिश्रसे जिज्ञासा :- एत कहि' तारे लञा निभृते बसिला। “कि कथा शुनिते चाह?” मिश्रे पुछिला ॥ ५९ ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीरामानन्द राय श्रीप्रद्युम्न मिश्रको एकान्त स्थानपर ले जाकर बैठ गये और उनसे पूछा, - “आप किस विषयको सुनना चाहते हैं?” ५९ ॥ पहले श्रीराय-महाप्रभु-संवादमें वर्णित सम्बन्ध-अभिधेय- प्रयोजनात्मक श्रीकृष्णकथाको पुनः सुनानेकी प्रार्थना :- तेँहो कहे, - “ये कहिला विद्यानगरे। सेइ कथा क्रमे तुमि कहिबा आमारे ॥ ६० ॥ अनुवाद-श्रीमिश्रने कहा, - “आपने जिस विषयको विद्यानगरमें सुनाया था, वही कथा आप क्रमसे मुझे सुनाइये ॥ ६० ॥

148 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/61-70 ] श्रीमिश्रकी दैन्योक्ति :- आनेर कि कथा, तुमि-प्रभुर उपदेष्टा ! आमि त' भिक्षुक विप्र, तुमि-मोर पोष्टा ॥ 61 ॥ अनुवाद-औरोंकी तो बात ही क्या, आप तो महाप्रभुको भी उपदेश देनेवाले हैं! मैं तो एक भिक्षुक ब्राह्मण हूँ और आप मेरे पालनकर्त्ता हैं ॥ 61 ॥ भाल-मन्द-किछु आमि पुछिते ना जानि। 'दीन' देखि' कृपा करि' कहिबा आपनि ॥” 62 ॥ अनुवाद-मुझे पूछना नहीं आता, क्योंकि मैं अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं जानता हूँ। आप मुझे दीन जानकर कृपा करके मेरे लिये जो श्रेयस्कर हो वह कहिये ॥” 62 ॥ श्रीरामानन्दके द्वारा कृष्णकथाका कीर्तन :- तबे रामानन्द क्रमे कहिते लागिला। कृष्णकथा-रसामृत-सिन्धु उथलिला ॥ 63 ॥ अनुवाद-तब श्रीरामानन्द राय क्रमसे श्रीकृष्णकथा कहने लगे, जिससे श्रीकृष्णकथारूपी रसामृत-सिन्धुमें उत्ताल तरङ्गों उठने लगीं ॥ 63 ॥ शिष्यका अधिकार समझकर स्वयं ही प्रश्न करने और उत्तर देनेवाले :- आपने प्रश्न करि' पाछे करेन सिद्धान्त। तृतीय प्रहर हैल, नहे कथा-अन्त ॥ 64 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द राय स्वयं ही प्रश्न करते और फिर सिद्धान्तके अनुसार उसका उत्तर देते। इस प्रकार तीसरा प्रहर हो गया, किन्तु तब भी कथा समाप्त नहीं हुई ॥ 64 ॥ दोनोंको ही श्रीकृष्णकथामें आत्म-विस्मृति :- वक्ता श्रोता कहे शुने दुँहे प्रेमावेशे। आत्मस्मृति नाहि, काहाँ जाने दिन-शेषे ॥ 65 ॥ अनुवाद-वक्ता और श्रोता, दोनों श्रीकृष्णकथाके कीर्तन-श्रवणसे प्रेममें आविष्ट हो गये तथा जब उन्हें आत्मस्मृति ही नहीं रहीं, तब वे कैसे जानते कि दिन समाप्त हो गया है ॥ 65 ॥ श्रीकृष्णकी कथामें दिनका ढलना :- सेवक कहिल, - “दिन हैल अवसान।” तबे राय कृष्णकथार करिला विश्राम ॥ 66 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायके सेवकने आकर कहा, - “दिन समाप्त हो गया है।” तब श्रीरामानन्द रायने श्रीकृष्णकथाको विश्राम दिया ॥ 66 ॥ श्रीमिश्रको विदायी देना और श्रीमिश्रका हर्ष :- बहुसम्मान करि' मिश्रे विदाय दिला। 'कृतार्थ हइलाङ' बलि' नाचिते लागिला ॥ 67 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने बहुत सम्मानके साथ श्रीप्रद्युम्न मिश्रको विदायी दी। 'मैं कृतार्थ हुआ'- ऐसा कहकर श्रीप्रद्युम्न मिश्र नृत्य करने लगे ॥ 67 ॥ सन्ध्याके समय महाप्रभुके निकट श्रीमिश्रका आगमन :- घरे गिया मिश्र कैल स्नान, भोजन। सन्ध्याकाले देखिते आइल प्रभुर चरण ॥ 68 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्रने घर जाकर स्नान और भोजन किया। वे सन्ध्याके समय महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शन करनेके लिये आये ॥ 68 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमिश्रसे कृष्णकथाके श्रवणके विषयमें जिज्ञासा :- प्रभुर चरण वन्दे उल्लसित-मने। प्रभु कहे,-“कृष्णकथा हइल श्रवणे??” 69 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्रने उल्लसित मनसे महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की। महाप्रभुने उनसे पूछा,-“क्या कृष्णकथाका श्रवण किया?” 69 ॥ श्रीमिश्रके द्वारा अपनी कृतार्थता जतलाना :- मिश्र कहे,-“प्रभु, मोरे कृतार्थ करिला। कृष्णकथामृतार्णवे मोरे डुबाइला ॥ 70 ॥

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[ 5/70-80 पाँचवाँ अध्याय 149 अनुवाद—श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा,—“हे प्रभो, आपने मुझे श्रीकृष्णकथामृतके समुद्रमें डुबाकर कृतार्थ कर दिया॥ 70 ॥ श्रीकृष्णकीर्तनकारी गुरुमें मर्त्य-बुद्धिकी निषिद्धता :- रामानन्द-राय-कथा कहिले ना हय। 'मनुष्य' नहे राय, कृष्णभक्तिरसमय॥ 71 ॥ अनुवाद—मैं श्रीरामानन्द रायकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकता। वे कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वे श्रीकृष्णभक्तिरसके साक्षात् विग्रह हैं॥ 71 ॥ गुरुदेव श्रीरामानन्दके मुखसे वक्ता स्वयं महाप्रभु :- आर एक कथा राय कहिला आमारे। 'कृष्णकथा-वक्ता करि' ना जानिह मोरे॥ 72 ॥ मोर मुखे कथा कहेन आपने गौरचन्द्र। यैछे कहाय, तैछे कहि,-येन वीणायन्त्र॥ 73 ॥ योग्यपात्र श्रीरामानन्दके मुखसे महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकथाका प्रचार :- मोर मुखे कथा इँहा करे परचार। पृथिवीते के जानिबे ए-लीला ताँहार??' 74 ॥ अनुवाद—एक और बात श्रीरायने मुझसे कही,—‘मुझे कृष्णकथाका वक्ता मत समझना। मेरे मुखसे स्वयं श्रीगौरचन्द्र कथा बोलते हैं। वे मुझसे जैसा कहलवाते हैं, मैं वीणाकी भाँति वैसा ही कहता हूँ। श्रीगौरचन्द्र मेरे मुखसे कथा कहलवाकर उनका प्रचार करवाते हैं। उनकी इस लीलाको जगत्में कौन जान सकता है?' 72-74 ॥ श्रीरायके मुखसे कही गयी और मेरे द्वारा सुनी गयी श्रीकृष्णकथा ब्रह्माके भी अगोचर :- ये-सब शुनिलुँ, कृष्ण-रसेर सागर। ब्रह्मादि-देवेरे ए सब ना हय गोचर॥ 75 ॥ अनुवाद—जो सब मैंने श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्रवण किया है, उससे यह जाना है कि श्रीकृष्ण रसके सागर हैं। ब्रह्मादि देवताओं तकको यह सब गोचर नहीं होता॥ 75 ॥ महाप्रभुके चरणकमलोंमें श्रीमिश्रका आत्म-निवेदन :- हेन 'रस' पान मोरे कराइला तुमि। जन्मे जन्मे तोमार पाय बिकाइलाङ आमि॥" 76 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके मुखसे आपने मुझे ऐसे अद्भुत रसका पान कराया है कि मैं जन्म-जन्मान्तरके लिये आपके श्रीचरणकमलोंमें बिक गया हूँ॥" 76 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायके आदर्शके अनुसार शुद्धवैष्णवके स्वभावका कीर्तन :- प्रभु कहे,—“रामानन्द विनयेर खनि। आपणार कथा परमुण्डे देन आनि'॥ 77 ॥ साधु-सज्जन, महान पुरुषों अथवा वैष्णवोंका स्वभाव :- महानुभवेर एइमत 'स्वभाव' हय। आपणार गुण नाहि आपने कहय॥" 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रामानन्द राय विनयकी खान हैं। वे अपनी महिमाका श्रेय अन्यको दे देते हैं। महापुरुषोंका यह सहज स्वभाव होता है कि वे स्वयं अपने गुणोंका वर्णन नहीं करते॥” 77-78 ॥ ब्राह्मणकुलमें नहीं उत्पन्न होनेपर भी समस्त ब्राह्मणकुलके गुरु श्रीकृष्णकीर्तनकारी श्रीरायके श्रोता-शिष्य श्रीमिश्र :- रामानन्द-रायेर एइ कहिलुँ गुण-लेश। प्रद्युम्न मिश्रेरे यैछे कैला उपदेश॥ 79 ॥ अनुवाद—मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) श्रीरामानन्द रायके गुणोंके लेशमात्रका वर्णन किया जिनका प्रकाश उनके द्वारा श्रीप्रद्युम्न मिश्रको दिये गये उपदेशोंके माध्यमसे हुआ॥ 79 ॥ श्रीरायके महान गुणोंसे शिक्षणीय विषय-बाह्य-वर्णाश्रम-आचार कृष्णभक्ति अथवा गुरुत्वका उदाहरण नहीं :- 'गृहस्थ' हञा नहे राय षड्वर्गेर वशे। 'विषयी' हञा संन्यासीरे उपदेशे॥ 80 ॥

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150 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/80-84 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय गृहस्थाश्रममें स्थित होनेपर भी काम-क्रोधादि छह वेगोंके वशीभूत नहीं थे। बाहरी लोगोंकी दृष्टिमें 'विषयी' जैसे दिखलायी देनेपर भी वे संन्यासी तकको उपदेश प्रदान करनेमें समर्थ थे॥80॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्द प्रभु-प्राकृत लोगोंकी दृष्टिमें प्रवृत्ति-मार्गीय गृहस्थ थे। वे संयत-इन्द्रिय ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा भिक्षु (संन्यासी) नहीं थे, ऐसा प्रतीत होता था। प्राकृत-गृहस्थ लोग इन्द्रियोंके वशीभूत होकर गृहव्रत धर्म ग्रहण करते हैं, किन्तु गृहस्थित अप्राकृत-वैष्णव अवैष्णव-गृहस्थोंकी भाँति असंयत इन्द्रियोंवाले नहीं होते, वे छह वेगोंके तनिक भी वशीभूत नहीं होते। गृहस्थाश्रमीकी लीला करते हुए श्रीरामानन्दप्रभु सांसारिक लोगोंकी भोगमयी दृष्टिमें 'विषयी' होनेपर भी अप्राकृत श्रीकृष्णलीला ही उनके शुद्ध-सत्त्व अप्राकृत मनका प्रतिक्षण उपास्य-विषय था। इसलिये वे-कृष्णविषयी थे, भगवान्‌के चिद्विलासके विरोधी निर्विशेषवादी तार्किक नहीं थे। विषयोंका त्याग करनेवाले निर्गुण संन्यासियोंको भी वे कृष्ण-प्रतीतिरहित जड़विषय त्याग करवाकर कृष्ण-विषयानुशीलनमें प्रवृत्त करवानेमें समर्थ थे॥80॥ श्रीरायके द्वारा कृष्णभक्त अथवा गुरुके माहात्म्यका प्रदर्शन :- एइसब गुण ताँर प्रकाश करिते। मिश्रेरे पाठाइला ताँहा श्रवण करिते॥81॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके इन समस्त गुणोंको प्रकाशित करनेके लिये ही श्रीप्रद्युम्न मिश्रको उनके पास कृष्णकथा श्रवण करनेके लिये भेजा था॥81॥ भक्तगुणोंके कीर्तनकारी भगवान् :- भक्तगुण प्रकाशिते प्रभु भाल जाने। नाना-भङ्गीते प्रकाशि' निज-लाभ माने॥82॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंके गुणोंको भली-भाँति प्रकाशित करना जानते हैं। वे अनेक प्रकारके कौशलके द्वारा अपने भक्तोंकी महिमाको प्रकाशित करके स्वयंको लाभान्वित मानते हैं॥82॥ अनुभाष्य—'भङ्गी',—चित्र, कौशल, उदाहरण॥82॥ जगद्गुरु श्रीगौरकी लोकशिक्षाका रहस्य :- आर एक 'स्वभाव' गौरेर शुन, भक्तगण। गूढ़ ऐश्वर्य-स्वभाव करे प्रकटन॥83॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरका एक और स्वभाव है। हे भक्तों ! इस विषयमें ध्यानपूर्वक श्रवण करो कि वे कैसे अपनी ईश्वरीय-शक्तिको प्रकटित करते हैं, जो अति गूढ़ है॥83॥ अनुभाष्य—'गूढ़',—अन्तर्निहित, अप्रकाशित; ऐश्वर्य- स्वभाव',—ऐशीशक्ति, ऐश्वरिक बल॥83॥ प्राकृत वर्णाश्रम और पाण्डित्यादि-सत्यधर्मके वक्ता होनेका प्रमाण नहीं :- संन्यासी, पण्डितगणे करिते गर्व नाश। नीच-शूद्र-द्वारा करेन धर्मेर प्रकाश॥84॥ अनुवाद—महाप्रभु तथाकथित संन्यासियों और विद्वानोंके गर्वको नष्ट करनेके उद्देश्यसे ही बाहरी रूपसे नीचवर्णमें जन्म ग्रहण करनेवाले अथवा शूद्र वर्णके व्यक्तिके द्वारा धर्मको प्रकाशित करते हैं॥84॥ अनुभाष्य—'पण्डित',—वेदाधिकार-सम्पन्न ब्राह्मण; 'संन्यासी',—ब्राह्मणोंके चार आश्रमोंमें सर्वश्रेष्ठ आश्रम। लौकिक धारणाके अनुसार ब्राह्मणकुलमें जन्में व्यक्तिका ही सावित्र्यमें अधिकार है; सावित्र्य जन्मसे वेदाधिकार होता है और सावित्र्य-ब्राह्मणजन्म प्राप्त करके तीन अन्य आश्रमोंको लाँघ करके संन्यासीकी उन्नत पदवी है। ब्राह्मण-तीनों वर्णोंके गुरु हैं और संन्यासी-तीनों आश्रमोंमें अवस्थित ब्राह्मणोंके गुरु हैं। उनके इस उपाधिके मदसे उत्पन्न प्राकृत गर्वको नष्ट करनेके उद्देश्यसे महाप्रभुने प्राकृत लौकिक-दृष्टिसे सबसे निम्नवर्ण 'शूद्र' और सबसे निम्न आश्रम 'गृहस्थ'के रूपमें परिचित श्रीरामानन्द-रायप्रभुके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में

[ 5/84-87 पाँचवाँ अध्याय 151 प्रद्युम्नमिश्रको उपदेश प्रदान करवाया। यहाँ तक कि संन्यास ग्रहण करनेवाले स्वयं महाप्रभुने भी श्रीरामानन्दके द्वारा प्रचारित धर्मको अङ्गीकार किया। श्रीगौरहरिने आश्रमके सम्बन्धमें शास्त्रोंके सार सिद्धान्तको लोगोंमें प्रकट करनेके उद्देश्यसे प्राकृत-पण्डिताभिमानी और त्यागाभिमानी गणोंकी भ्रमपूर्ण धारणाके प्रतिकूलमें अपने स्वाभाविक ऐश्वर्य प्रभावका विस्तार किया था। साधारण मूर्ख लोग शास्त्रोंके तात्पर्यसे अवगत नहीं हैं। इसलिये, वे गौरसुन्दरके आश्रित सेवकोंके विशुद्ध सदाचार और योग्यताका दर्शन करके वर्णाश्रमके विषयमें शास्त्रोंके वास्तविक तात्पर्यको समझ सकते हैं। हरिपरायण अप्राकृत-वैष्णवके किसी भी कुलमें जन्म लेने अथवा किसी भी आश्रममें अवस्थित होनेपर भी वे चारों वर्णों और आश्रमोंके प्राकृत लोगोंके प्रति नित्य दया प्रकाश करनेवाले गुरुदेवरूपमें सर्वोच्च सत्य-धर्माचार्य हो सकते हैं-यह बात शास्त्रोंमें भली-भाँति रूपसे उल्लिखित है। भगवान् श्रीगौरहरिने शास्त्रोंके गूढ़ और यथार्थ उद्देश्यको लोगोंमें बिना किसी विवादके प्रचारित करके अपने ऐश्वर्य-स्वभावको प्रकटित किया ॥ 84 ॥ दृष्टान्त- (1) संन्यासी-वेशधारी स्वयं महाप्रभु और ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न श्रीमिश्र-दोनोंके ही द्वारा सेवाभिलाषी- शिष्यके रूपमें गृहस्थ-वेशधारी और अशौक्र (स्वाभाविक) ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत कृष्णकथा-कीर्तनकारी श्रीरायको गुरुके रूपमें वरण करके लोकशिक्षा :- 'भक्ति', 'प्रेम', 'तत्त्व' कहे राये करि' 'वक्ता'। आपनि प्रद्युम्नमिश्र-सह हय 'श्रोता' ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीप्रद्युम्न मिश्रके साथ श्रोता बनकर और श्रीरामानन्द रायको वक्ता बनाकर उनके मुखके माध्यमसे स्वयं भक्ति, प्रेम एवं अन्य-अन्य तत्त्वोंका वर्णन करते हैं ॥ 85 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- (शाङ्कर) संन्यासीगण मानते हैं कि वे संसारमें ब्राह्मणोचित समस्त-कर्म निर्वाह करके वेदान्त-तत्त्वका अनुशीलन करनेके कारण जगत्के 'गुरु' हुए हैं। ब्राह्मणकुलजात पण्डितगण मानते हैं कि (कर्मकाण्डीय) स्मृतिके अनुसार उनके जैसे ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए ब्राह्मण ही सभी वर्णोंके गुरु हैं; अतएव उनके जैसे ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए पण्डितोंके अतिरिक्त परमार्थतत्त्वकी शिक्षा देनेका अन्य किसीको अधिकार नहीं है। इन दोनों गर्वोंमें गर्वित होकर संन्यासी और पण्डित अपनेसे अनन्त गुणा श्रेष्ठ और उच्चतम, शूद्र-कुलमें आविर्भूत शुद्धभक्तोंसे धर्मकी शिक्षा प्राप्त करनेके अनिच्छुक बनकर बहुत बार निम्न मतिवाले हो जाते हैं। वैष्णव धर्ममें यही स्वीकृत है कि जिन्होंने प्राकृत और अप्राकृत तत्त्वके भेदको जानकर अप्राकृत कृष्णभक्तिकी शिक्षा प्राप्त की है, वे ही समस्त जीवोंके उपदेष्टा हैं, -इसमें जन्मगत वर्णादि और संस्कारगत आश्रमादिकी अपेक्षा नहीं है। जगत्-तारण महाप्रभुने इसी तत्त्वकी शिक्षा प्रदान करनेके लिये ही अपने पूर्वाश्रमके सम्बन्धीकी सन्तान प्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्दके पास तत्त्वकी शिक्षाके लिये भेजा था ॥ 85 ॥ (2) यवनकुलमें उत्पन्न ठाकुर-श्रीहरिदासको जगद्गुरु और नामाचार्यकी पदवी-दान; (म्लेच्छोंके साथ वास करनेपर भी)-(3) श्रीसनातन-कृष्णभक्तिसिद्धान्त अथवा सम्बन्धज्ञानके आचार्य और (4) श्रीरूप-व्रजप्रेमभक्तिरस अथवा अभिधेयके आचार्य :- हरिदास-द्वारा नाम-माहात्म्य-प्रकाश। सनातनद्वारा भक्तिसिद्धान्तविलास ॥ 86 ॥ श्रीरूप-द्वारा व्रजेर रस-प्रेम-लीला। के कहिते पारे गम्भीर चैतन्येर खेला ? ? 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यवनकुलमें उत्पन्न श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा नामके माहात्म्यको प्रकाशित किया। उन्होंने यवनोंका सङ्ग करनेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा भक्तिसिद्धान्त-विलासको प्रकाशित किया और श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा व्रजकी रसमयी प्रेम लीलाओंको प्रकाशित करवाया। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़ लीलाओंका कौन वर्णन कर सकता है ? 86-87 ॥

152 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/88–96 ] श्रीचैतन्यलीलासिन्धुकी बिन्दुप्तिसे ही जगत्का उद्धार :- श्रीचैतन्यलीला एइ-अमृतेर सिन्धु। जगत् भासाइते पारे यार एक बिन्दु॥ ८८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला अमृतके सिन्धुकी भाँति है, उसकी एक बूँद जगत्को प्रेममें निमग्न कर सकती है॥ ८८॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यलीलामृतरूपी सिन्धुकी एक बूँद ही जगत्को प्रेममें आप्लावित करनेमें समर्थ है। श्रीदास-गोस्वामी, परवर्ती कालमें श्रीठाकुर नरोत्तम, श्रील श्यामानन्द प्रभु आदि भी श्रीमन्महाप्रभुकी वैसी उदारताके विकास-स्वरूप हैं॥ ८८॥ श्रद्धासे श्रीचैतन्यलीलामृतके पानके फलसे चिद्वृत्तिके उदित होनेपर सम्बन्धज्ञान, अभिधेय और प्रयोजनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरितामृत नित्य कर पान। याहा हैते 'प्रेमानन्द', 'भक्तितत्त्व-ज्ञान'॥ ८९॥ अनुवाद-हे भक्तों! श्रीचैतन्यचरितामृतका प्रतिदिन पान करो, जिससे आपको प्रेमानन्दकी प्राप्ति और भक्तितत्त्वका ज्ञान प्राप्त होगा॥ ८९॥ महाप्रभुकी ऐसी नीलाचल-लीला :- एइमत महाप्रभु भक्तगण लञा। नीलाचले विहरये भक्ति प्रचारिया॥ ९०॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंको लेकर भक्तिका प्रचार करते हुए नीलाचलमें विहार किया॥ ९०॥ पूर्वबङ्गालवासी ब्राह्मणवेशी प्राकृत-कविका वृत्तान्त :- बङ्गदेशी एक विप्र प्रभुर चरिते। नाटक करि' लञा आइला शुनाइते॥ ९१॥ अनुवाद-बङ्गालके एक ब्राह्मणने महाप्रभुके चरित्रपर आधारित एक नाटककी रचना की और उसे महाप्रभुको सुनानेके लिये नीलाचलमें लेकर आया॥ ९१॥ भगवान्-आचार्य-सने तार परिचय। ताँरे मिलि' ताँर घरे करिल आलय॥ ९२॥ अनुवाद-उसका श्रीभगवान् आचार्यके साथ पहलेसे परिचय था, इसलिये वह उनसे मिला और उनके घरपर ही रहने लगा॥ ९२॥ प्रथमे नाटक तैं हो ताँरे शुनाइल। ताँर सङ्गे अनेक वैष्णव नाटक शुनिल॥ ९३॥ अनुवाद-उसने सबसे पहले अपने नाटकको श्रीभगवान् आचार्यको सुनाया। फिर श्रीभगवान् आचार्यके साथ बैठकर अनेक वैष्णवोंने उस नाटकको सुना॥ ९३॥ सबेइ प्रशंसे नाटक 'परम उत्तम'। महाप्रभुरे शुनाइते सबार हैल मन॥ ९४॥ अनुवाद-सभी वैष्णवोंने 'परम उत्तम' कहकर उस नाटककी प्रशंसा की। सभीके मनमें उस नाटकको महाप्रभुको श्रवण करानेकी इच्छा हुई॥ ९४॥ श्रीस्वरूपदामोदरके द्वारा परीक्षा लेनेका नियम :- गीत, श्लोक, ग्रन्थ, कवित्व, -येइ करि' आने। प्रथमे शुनाय सेइ स्वरूपेर स्थाने॥ ९५॥ अनुवाद-जो कोई भी व्यक्ति गीत, श्लोक, ग्रन्थ अथवा कवितादिकी रचना करके लाता, तो पहले उसे श्रीस्वरूप दामोदरको सुनाना होता॥ ९५॥ श्रीस्वरूपके अनुमोदन अथवा परीक्षामें उत्तीर्ण होनेके बाद ही महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- स्वरूप-ठाञि उत्तरे यदि, लय ताँर मन। तबे महाप्रभु-ठाञि कराय श्रवण॥ ९६॥ अनुवाद-यदि वह रचना श्रीस्वरूप दामोदरको सन्तुष्ट करके उनकी परीक्षामें उत्तीर्ण हो जाती, तभी वह महाप्रभुको श्रवण करायी जाती थी॥ ९६॥

[ 5/97-101 पाँचवाँ अध्याय 153 भक्तिसिद्धान्त-वाणीका विरोध ही महावदान्य महाप्रभुके क्रोधका एकमात्र कारण :- 'रसाभास' हय यदि 'सिद्धान्तविरोध' । सहिते ना पारे प्रभु, मने हय क्रोध ॥ 97 ॥ अनुवाद—यदि किसी रचनामें रसाभास-दोष अथवा भक्तिसिद्धान्तोंका विरोध होता, तब महाप्रभु उसे सुनकर सहन नहीं कर पाते, उनको क्रोध आ जाता ॥ 97 ॥ अनुभाष्य—रसाभास,—(भःरःसिः उःविः 9म लः)— “पूर्वमेवानुशिष्टेन विकला रसलक्षणाः । रसा एव रसाभासा रसज्ञैरनुकीर्त्तिताः ॥ स्युस्त्रिधोपरसाश्चानुरसाश्चापरसाश्च ते । उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चेत्यमी क्रमात् ॥ प्राप्तैः स्थायिविभावानुभावाद्यैस्तु विरूपताम् । शान्तादयो रसा एव द्वादशोपरसा मताः ॥ भक्तादिभिर्विभावाद्यैः कृष्णसम्बन्धवर्जितैः । रसा हास्यादयः सप्त शान्तश्चानुरसा मताः ॥ कृष्ण-तत्प्रतिपक्षश्रेद्विषयाश्रयतां गताः। हासादीनां तदा तेऽत्र प्राज्ञैरपरसा मताः ॥ भावाः सर्वे तदाभासा रसाभासाश्च केचन । अमी प्रोक्ता रसाभिज्ञैः सर्वेऽपि रसनाद्रसाः ॥” आपात रस प्रतीत होनेपर भी जो पूर्वकथित रसके लक्षणोंके द्वारा अङ्गहीन होता है, रसिकगण उसे 'रसाभास' कहते हैं। 'उपरस', 'अनुरस' और 'अपरस'के भेदसे रसाभास भी 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ'के रूपमें कथित होता है। विरूपताको प्राप्त स्थायी-भाव, विभाव और अनुभाव आदिके द्वारा उपलक्षित शान्तादि बारह रस 'उपरस'के नामसे कहे गये हैं; श्रीकृष्णसे सम्बन्धहीन भक्तादि विभावसमूहके द्वारा उत्पन्न हास्यादि सात रस और रुक्ष शान्तरस ही 'अनुरस' कहलाते हैं; परस्पर विरुद्धभावयुक्त होकर श्रीकृष्ण और उनके विरोधी असुर यदि हास्यादि रसके क्रमशः विषय और आश्रय होते हैं, तब रसतत्त्व-ज्ञाता पण्डित उसे 'अपरस' कहते हैं। सभी भावोंको कोई कोई 'तदाभास' अथवा 'रसाभास' कहते हैं; रसतत्त्व अभिज्ञ व्यक्ति स्वादिष्ट अथवा आनन्द प्रदान करनेवाले होनेके कारण ही इन सभीको 'रस' कहते हैं। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्तीपाद कहते हैं,—“परस्पर-वैरयोर्यदि योगस्तदा रसाभासः” अर्थात् दो प्रकारके विरोधी रसोंके योग होनेपर 'रसाभास' होता है। 'सिद्धान्तविरोध',—भक्तिमार्गीय सिद्धान्तके साथ विरोध, तत्त्वविरोध ॥ 97 ॥ अतएव प्रभु किछु आगे नाहि सुने । एइ मर्यादा प्रभु करियाछे नियमे ॥ 98 ॥ अनुवाद—अतएव महाप्रभु किसीकी भी रचनाको श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा पहले सुने बिना स्वयं नहीं सुनते थे। महाप्रभुने इस मर्यादाके पालनका नियम बनाकर रखा था ॥ 98 ॥ श्रीस्वरूपसे श्रीभगवान्-आचार्यका प्राकृत कविके काव्यकी प्रशंसा करते हुए निवेदन :- स्वरूपेर ठाञि आचार्य कैला निवेदन। “एक कवि प्रभुर नाटक करियाछे उत्तम ॥ 99 ॥ आदौ तुमि शुन, यदि तोमार मन माने। पाछे महाप्रभुरे तब कराइमु श्रवणे ॥” 100 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप दामोदरसे निवेदन करते हुए कहा,—“एक कविने महाप्रभुके चरित्रपर आधारित एक उत्तम नाटककी रचना की है। पहले आप उसका श्रवण कीजिये और यदि वह आपके द्वारा स्वीकृत होगा, तभी बादमें महाप्रभुको उसका श्रवण कराऊँगा ॥” 99-100 ॥ श्रीकृष्णतत्त्वको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ अन्तर्यामी श्रीस्वरूपके द्वारा भगवान्-आचार्यकी भर्त्सना :- स्वरूप कहे,—“तुमि 'गोप' परम-उदार। ये-से शास्त्र शुनिते इच्छा उपजे तोमार ॥ 101 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“तुम गोप होनेके कारण परम उदार हो। इसलिये तुममें जिस-किसी भी शास्त्रको सुननेकी इच्छा उदित हो जाती है ॥ 101 ॥

154 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/102-110 ] श्रीगौरकृष्णकी अप्रीतिके एकमात्र कारणका निर्देश :- 'यद्वा-तद्वा' कविर वाक्ये हय 'रसाभास'। सिद्धान्तविरुद्ध शुनिते ना हय उल्लास ॥ 102 ॥ अनुवाद—जैसे-तैसे कवियोंकी कवितामें 'रसाभास' दोष होता है। सिद्धान्तविरुद्ध वाक्य सुननेसे हृदयमें उल्लास नहीं होता ॥ 102 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'यद्वा तद्वा कवि',—जैसे-तैसे कवि अर्थात् जो रसतत्त्व और वैष्णवसिद्धान्त-तत्त्वको भली-भाँति नहीं जानकर कविताकी रचना करते हैं॥ 102 ॥ 'रस', 'रसाभास' यार नाहिक विचार। भक्तिसिद्धान्त-सिन्धु नाहि पाय पार ॥ 103 ॥ अनुवाद—जैसा-तैसा कवि जिसे 'रस' और 'रसाभास' आदिका ज्ञान नहीं है, वह भक्तिसिद्धान्तरूपी सिन्धुका पार नहीं पा सकता ॥ 103 ॥ 'व्याकरण' नाहि जाने, ना जाने 'अलङ्कार'। 'नाटकालङ्कार'-ज्ञान नाहिक याहार ॥ 104 ॥ कृष्णलीला वर्णिते ना जाने सेइ छार ! विशेषे दुर्गम एइ चैतन्य-विहार ॥ 105 ॥ अनुवाद—जो कवि 'व्याकरण' नहीं जानता और 'अलङ्कार'के विषयमें नहीं जानता एवं जिसे नाटकके प्रयुक्त अलङ्कार आदिका भी कोई ज्ञान नहीं है तथा श्रीकृष्णलीलाका किस प्रकारसे वर्णन करना चाहिये, इसे नहीं जानता, वह निन्दनीय है! विशेषरूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला तो अति दुर्गम है॥ 104-105 ॥ श्रीगौरगतप्राण कृष्णभक्तका ही गौरलीला-वर्णनमें अधिकार :- कृष्णलीला, गौरलीला से करे वर्णन। गौर-पादपद्म याँर हय प्राण-धन ॥ 106 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिके चरणकमल जिनके प्राणधन हैं, वे ही श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाका वर्णन कर सकते हैं॥ 106 ॥ कृष्णसुखतात्पर्य्यरहित प्राकृत-कविका बहिरङ्ग होना, कृष्णसुखतत्पर अप्राकृत कविका अन्तरङ्ग होना :- ग्राम्य-कविर कवित्व शुनिते हय 'दुःख'। विदग्ध-आत्मीय-वाक्य शुनिते हय 'सुख' ॥ 107 ॥ अनुवाद—ग्राम्य कवियोंकी कविताएँ सुननेसे दुःख होता है, जबकि विदग्ध-आत्मीय व्यक्तियोंके द्वारा रचित वाक्योंको सुननेसे सुख होता है॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ग्राम्य-कवि',—जो सब कवि ग्राम्य (सांसारिक) स्त्री-पुरुषोंके विषयमें कविताकी रचना करते हैं। विदग्ध-आत्मीय-वाक्य',—तत्त्वज्ञान-चतुर शुद्धभक्त-सम्प्रदायमें प्रविष्ट आत्मीय (अर्थात् सजातीयाशयस्निग्ध) व्यक्तिकी रचना॥ 107 ॥ अप्राकृत कविशिरोमणि श्रीरूपका उदाहरण :- रूप यैछे दुइ नाटक करियाछे आरम्भे। शुनिते आनन्द बाड़े यार मुखबन्धे॥ ”108 ॥ अनुवाद—जैसे रूपने दो नाटकोंको लिखना आरम्भ किया उसकी भूमिकाको भी सुनते ही आनन्द वर्धित होता है॥ ”108 ॥ तथापि भगवान्-आचार्यका अनुरोध :- भगवान्-आचार्य कहे,—“शुन एकबार। तुमि शुनिले भाल-मन्द जानिबे विचार॥ ”109 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरके यह सब बतलानेपर भी श्रीभगवान्-आचार्यने प्रार्थना की,—“आप उसे एकबार तो सुन लीजिये। उसे सुननेपर आप विचार कर सकते हैं कि वह अच्छा है या बुरा॥ ”109 ॥ बन्धु आचार्यके अनुरोधके कारण श्रीस्वरूपकी श्रवणकी इच्छा :- दुइ-तिन-दिन आचार्य आग्रह करिल। ताँर आग्रहे स्वरूपेर शुनिते इच्छा हैल ॥ 110 ॥

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[ 5/110-115 पाँचवाँ अध्याय 155 अनुवाद—श्रीभगवान्-आचार्य इस प्रकार दो-तीन दिन तक श्रीस्वरूप दामोदरसे आग्रह करते रहे। उनके पुनः पुनः आग्रह करनेपर श्रीस्वरूप दामोदरके मनमें उसे सुननेकी इच्छा हो गयी ॥ 110 ॥ श्रीस्वरूपके निकट कविके द्वारा नान्दी-श्लोकका पाठ :- सबा लञा स्वरूप गोसाञि शुनिते बसिला। तबे सेइ कवि नान्दी-श्लोक पड़िला ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी अन्य भक्तोंको साथमें लेकर सुननेके लिये बैठ गये। तब उस कविने नान्दी-श्लोकका पाठ किया ॥ 111 ॥ नान्दी श्लोक :- बङ्गदेशके ब्राह्मणके द्वारा रचित श्लोक- विकचकमलनेत्रे श्रीजगन्नाथसंज्ञे कनकरुचिरिहात्मन्यात्मतां यः प्रपन्नः। प्रकृतिजडमशेषं चेतयन्नाविरासीत् स दिशतु तव भव्यं कृष्णचैतन्यदेवः ॥ 112 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो स्वर्णकान्तिको स्वयंमें न्यस्त अथवा विस्तृत करके विकसित कमलनेत्र-स्वरूप श्रीजगन्नाथमें आत्मताको प्राप्त हुए हैं और जो जड़-प्रकृति (काष्ठ) को पूर्ण चेतना प्रदान करके आविर्भूत हुए हैं, वे श्रीकृष्णचैतन्यदेव तुम्हारा मङ्गल विधान करें ॥ 112 ॥ अनुभाष्य- कनकरुचिः (कनकस्य स्वर्णस्य इव रुचिः कान्तिः यस्य सः) यः (गौरः) इह (अस्मिन् पुरुषोत्तम-क्षेत्रे) विकचकमलनेत्रे (विकचे प्रफुल्ले कमले इव नेत्रे यस्य तस्मिन्) श्रीजगन्नाथसंज्ञे (श्रीजगन्नाथः इति संज्ञा नामधेयं यस्य तस्मिन्) आत्मनि (शरीरे) आत्मतां (देहित्वं) प्रपन्नः (प्राप्तः सन्) प्रकृतिजडं (प्रकृत्या जड़ं श्रीजगन्नाथविग्रहम् अर्च्ये दारुधीत्वात्) अशेषं चेतयन् आविरासीत् (प्रकटो बभूव), सः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) तव भव्यं (कल्याणं) दिशतु (विदधातु)। [सरस्वती-पक्षे तु,-यः श्रीकृष्णः श्रीजगन्नाथ-संज्ञे मायाधीशे दारुब्रह्मणि षडैश्वर्यपूर्णे परमात्मनि कनकरुचिना गौररूपेण आत्मतां सर्वथा तदभेदतां जगन्नाथरूपतां प्रपन्नः, सः इत्यादिकं स्पष्टम्]। श्लोक-भावानुवाद-स्वर्णकी कान्तिवाले श्रीगौरसुन्दर इस पुरुषोत्तम क्षेत्रमें प्रफुल्लित कमलनेत्र-स्वरूप श्रीजगन्नाथकी देहमें देही रूपको प्राप्त हुए हैं और काष्ठके श्रीजगन्नाथ अर्चा-विग्रहको पूर्ण चेतना प्रदान करके प्रकट हुए हैं, वे श्रीकृष्णचैतन्यदेव तुम्हारा मङ्गल विधान करें। [सरस्वती-पक्षमें-जो श्रीकृष्ण श्रीजगन्नाथदेवके 'आत्म-स्वरूप' हैं, उन्होंने नीलाचलमें दारु-ब्रह्म स्थावर-स्वरूप धारण किया है। वे ही षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण स्वर्णकान्तियुक्त होकर जङ्गम श्रीगौरसुन्दर रूपमें अवतरित हुए हैं। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव और श्रीकृष्ण (श्रीगौरसुन्दर) में एकताकी प्राप्ति होती है-यह स्पष्ट है] ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूपके अतिरिक्त अन्य सभीके द्वारा प्रशंसा :- श्लोक शुनि' सर्वलोक ताहारे बाखाने। स्वरूप कहे,–“एइ श्लोक करह व्याख्याने ॥” 113 ॥ अनुवाद—कविके मुखसे नान्दी-श्लोक सुनकर सभी लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने उस कविसे कहा,–"इस श्लोककी व्याख्या तो करो ॥” 113 ॥ मूर्ख-कविका शुद्धभक्ति-सिद्धान्तविरुद्ध मायावाद-दोष :- कवि कहे,–“जगन्नाथ-सुन्दर-शरीर । चैतन्य-गोसाञि-शरीरी महाधीर ॥ 114 ॥ अनुवाद—कविने कहा,—"श्रीजगन्नाथदेवका शरीर अति सुन्दर है और श्रीचैतन्य गोसाई जो महाधीर हैं, वे शरीरी हैं ॥ 114 ॥ अनुभाष्य- 'शरीरी', - जिनका शरीर है वे अर्थात् देही ॥ 114 ॥ सहज जड़जगतेर चेतन कराइते। नीलाचले महाप्रभु हैला आविर्भूते ॥” 115 ॥ अनुवाद—सहज ही इस जड़-जगत्को चेतन बनानेके लिये महाप्रभु नीलाचलमें आविर्भूत हुए हैं॥” 115 ॥

156 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/116-120 ] सभीके प्रसन्न होनेपर भी जगद्गुरु वैष्णवाचार्य श्रीस्वरूपका क्रोध और शास्त्र-सिद्धान्तरूपी तलवारके द्वारा कुमतका खण्डनरूपी दया :- शुनिया सबार हैल आनन्दित मन। दुःख पाञा स्वरूप कहे सक्रोध वचन ॥ 116 ॥ क्रोधके कारणका निर्देश- (1) विष्णुमें जीवबुद्धि-नरकगामी :- “आरे मूर्ख, आपनार कैलि सर्वनाश ! दुइ त' ईश्वरे तोर नाहिक विश्वास ! ! 117 ॥ पूर्णानन्द-चित्स्वरूप जगन्नाथ-राय। ताँरे कैलि जड़-नश्वर-प्राकृत-काय ! ! 118 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सभीके मनमें आनन्द हुआ। किन्तु श्रीस्वरूप दामोदर उसे सुनकर दुःखी हुए और क्रोधित होकर कहा, -“अरे मूर्ख! तुमने अपना सर्वनाश कर लिया है! दोनों ईश्वरोंके प्रति ही तुम्हारा विश्वास नहीं है। भगवान् श्रीजगन्नाथ-राय पूर्णानन्द चित् स्वरूप हैं और तुमने उन्हें जड़ीय-नश्वर-प्राकृत शरीरवाला कहकर वर्णन किया है! 116-118 ॥ अनुभाष्य-श्रीजगन्नाथ-विग्रहको काष्ठकी प्रतिमा जानकर विनाशशील और प्राकृत द्रव्योंसे गठित जड़ीय-वस्तुमात्र माननेसे “अर्च्ये विष्णौ शिलाधीः ×× यस्य वा नारकी सः॥” इस पद्मपुराणके वचनानुसार वैसे माननेवालेका अपराध होता है। इसलिये भगवद्भक्त सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्णसे सम्पूर्णतः अभिन्न उनके अर्चा-विग्रहको प्रेमानन्दसे रञ्जित भक्तिमय नेत्रोंके द्वारा साक्षात् पूर्ण सच्चिदानन्द- विग्रहस्वरूपमें दर्शन करते हैं॥ 118 ॥ पूर्ण-षडैश्वर्य चैतन्य-स्वयं भगवान्। ताँरे कैलि क्षुद्र जीव स्फुलिङ्ग-समान ! ! 119 ॥ अनुवाद-षडैश्वर्यपूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं भगवान् हैं और तुमने उनकी अग्निकी चिङ्गारीके समान क्षुद्र जीव कहकर व्याख्या की !119 ॥ अनुभाष्य-“यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गा व्युचरन्ति"-इस श्रुति वचनसे जाना जाता है कि जीव बृहत् विष्णुरूप अग्निकी चिङ्गारीके समान अर्थात् चित्कण हैं। मायावश जीवकी जड़ीय शरीरमें बन्धनकी योग्यता रहनेपर भी सच्चिदानन्दविग्रह समस्त कारणोंके कारण परमेश्वर श्रीचैतन्यदेवने नर-शरीर धारण किया है, ऐसा कहनेसे क्या वे जड़के अधीन क्षुद्र जीव हैं, -ऐसा नहीं है; वे मायाधीश षडैश्वर्यपूर्ण स्वयं भगवान् यशोदानन्दन हैं; (भाः 1/11/38)- “एतदीशनामीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥” [अर्थात् “ईश्वरकी ईश्वरता यह है कि प्रकृतिस्थ अर्थात् प्राकृत जगत्में प्रवेश करके भी वे प्राकृत गुणोंके द्वारा युक्त नहीं होते। वे स्वयं अपने स्वरूपमें सर्वदा अवस्थित रहते हैं। उनके आश्रित जीवोंकी बुद्धि भी उसी प्रकारकी होती है।”]॥ 119 ॥ जड़ज्ञानी तर्कपन्थी भक्तिसिद्धान्तके विषयमें अनभिज्ञ व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण-वर्णनकी चेष्टा-दुःसाहसिकता :- दुइ-ठाञि अपराधे पाइबि दुर्गति ! अतत्त्वज्ञ 'तत्त्व' वर्णे, तार एइ गति ! ! 120 ॥ अनुवाद-तुम दोनोंके प्रति अपराध करनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त करोगे! अतत्त्वज्ञ व्यक्तिके द्वारा तत्त्वका वर्णन करनेपर उसकी ऐसी ही गति होती है! 120 ॥ अनुभाष्य-'दुइ-ठाञि',-श्रीजगन्नाथदेव और श्रीचैतन्य- देव, दोनोंको प्रपञ्चके अन्तर्गत जड़ और जीवके रूपमें विचार करनेसे-एककी प्राकृत देहमें स्थित चित्कण अन्यकी प्राकृत देहमें प्रविष्ट हुआ है, ऐसा माननेसे- दोनों स्थानोंपर अपराध होता है। 'अतत्त्वज्ञ',-जिसे तत्त्वका कोई ज्ञान नहीं है अर्थात् अहंग्रहोपासक मायावादी, फलभोगी कर्मी अथवा स्वेच्छाचारी सत्-असत्- विवेकरहित इन्द्रियपरायण व्यक्ति; 'तत्त्व-वर्णे',-तत्त्व अर्थात् भगवान्के विषयमें वर्णन करता है॥ 120 ॥

[ 5/121-123 पाँचवाँ अध्याय 157 (2) ईश्वरका देह-देही-भेद-निर्देशरूप अपराध ही प्रमाद :- आर एक करियाछ परम 'प्रमाद' ! देह-देहि-भेद ईश्वरे कैले 'अपराध' ! ! 121 ॥ अनुवाद-तुमने अन्य एक बहुत बड़ी भूल की है, ईश्वरमें देह और देहीका भेद करना अपराध है ! 121 ॥ अनुभाष्य-बद्धजीवकी भाँति मानकर ईश्वरके देह और देहीको परस्पर भिन्न वस्तुके रूपमें स्वीकार करनेसे 'अपराध' होता है। प्राकृत-जगत्में गुणमायाके द्वारा गठित बद्धजीवकी देहकी सत्ता और जीवमाया अथवा तटस्थ-शक्तिसे गठित जीवकी अनुभूति होती है। ईश्वर और बद्धजीवमें भेद यह है कि ईश्वर-कर्मफलके दाता और कर्मफलके अधीश अर्थात् समस्त कारणोंके कारण मायाधीश महाप्रभु और विभुतत्त्व हैं; जीव-बद्धावस्थामें कर्मफलका भोक्ता और कर्मफलके अधीन है और मुक्तावस्थामें भी अपने स्वरूपमें ईश्वरसेवामें सम्पूर्ण रूपसे रत होता है अर्थात् ईश्वर किसी भी कालमें मायाके वशमें नहीं होते और जीव-मायाधीनता-योग्य होता है; ईश्वर-अपरिमेय (जिसे मापा नहीं जा सके) अथवा अखण्ड चेतन हैं, जीव-परिमेय अथवा खण्ड चेतन है। बद्धजीवकी नश्वर अनित्य देह-मायिक अथवा जड़ है; मुक्त अथवा शुद्धजीवकी अप्राकृत-देह भी नित्य है और मायातीत ईश्वर भी नित्य सविशेष-विग्रह हैं। प्रपञ्चमें उनके नित्यविग्रहके अचिन्त्य निज-शक्तिके बलसे उदित होनेपर भी वे कभी भी प्रापञ्चिक-धर्मयुक्त मायिक अथवा प्राकृत नहीं हैं; (भाः 1/11/38)- “एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । न युज्यते सदात्मस्थैर्यथाबुद्धिस्तदाश्रया ॥” [अर्थात् “ईश्वरकी ईश्वरता यह है कि प्रकृतिस्थ अर्थात् प्राकृत जगत्में प्रवेश करके भी वे प्राकृत गुणोंके द्वारा युक्त नहीं होते। वे स्वयं अपने स्वरूपमें सर्वदा अवस्थित रहते हैं। उनके आश्रित जीवोंकी बुद्धि भी उसी प्रकारकी होती है।”] नित्यविग्रहको 'निर्विशेष' करनेके छलसे देह और देहीमें भेद-चेष्टा-महा अपराधका कार्य है ॥ 121 ॥ अद्वयज्ञान विष्णुका नाम, विग्रह और स्वरूप-अभिन्न :- ईश्वरेर नाहि कभु देह-देहि-भेद। स्वरूप, देह, - चिदानन्द, नाहिक विभेद ॥ 122 ॥ अनुवाद-ईश्वरमें कदापि देह-देहीका भेद नहीं होता। ईश्वरका स्वरूप और उनकी देह-दोनों ही चिदानन्द हैं, उनमें कोई विभेद नहीं होता ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-अद्वयज्ञान ही व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं; 'वदन्ति तत्तत्त्वविदः' श्लोकमें तत्त्वस्वरूपके निर्णयमें एकमात्र अद्वितीय परमेश्वरमें द्वैतवस्तु-बुद्धिका निवारण हुआ है। वे-अद्वयज्ञान हैं, इसलिये उनका नाम, रूप, गुण और लीला जड़-जगत्की वस्तुओंकी भाँति भिन्न-भिन्न नहीं है, उसे एकान्तिक 'अभिन्न' जानना होगा। ईश्वरमें देह-देही-भेद ज्ञान ही उन्हें 'बद्धजीव' माननेके भ्रमका कारण है, क्योंकि बद्धजीवमें अद्वय-ज्ञान-प्रतीतिका अभाव है ॥ 122 ॥ लघुभागवतामृत (1/5/342) में उद्धृत कूर्मपुराणका वचन- “देह-देहि-विभागोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥”123 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 123 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ईश्वरमें (कभी भी यह) देह- देहीका भेद नहीं है ॥ 123 ॥ अनुभाष्य- ईश्वरे (परमात्मनि सविशेषतत्त्ववस्तुनि भगवति) अयं देहदेहिविभागः (नाम एकं नामी च अन्यः, रूपं एकं रूपी च भिन्नः, गुणः एकः गुणी च भिन्नः, लीला एका लीलामयो भिन्नः, -एवम्भूतो मायाकृतः खण्डः) [अद्वयज्ञाने शुद्धसत्त्वमये विष्णौ] क्वचित् (गोलोके परव्योम्नि देवीधाम्नि वा चतुर्दश- भुवनान्तर्मध्ये च) न विद्यते। श्लोक-भावानुवाद-सविशेषतत्त्ववस्तु भगवान्में [अद्वयज्ञान शुद्धसत्त्वमय विष्णुमें] गोलोकमें अथवा परव्योममें अथवा देवीधाममें चौदह भुवनोंके मध्य कहीं

158 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/123-129 ] भी और कभी भी यह देह-देहीका भेद [अर्थात् नाम एक और नामी अन्य, रूप एक और रूपी उससे भिन्न, गुण एक और गुणी भिन्न, लीला एक और लीलामय भिन्न,—इस प्रकार मायाके द्वारा खण्डित भेद] नहीं होता ॥ 123 ॥ श्रीमद्भागवत (3/9/3-4) में- नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः। पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकपदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ 124 ॥ तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभागिभिरसत्प्रसङ्गैः ॥ 125 ॥ अनुवाद-हे परम, आपके इस आनन्दमात्र, अद्वयज्ञान और मायातीत तेजःस्वरूप,—जिस स्वरूपको मैं अब देख रहा हूँ, इससे श्रेष्ठ स्वरूप और कोई नहीं है। हे आत्मन्, विश्वसृजनकारी होनेपर भी विश्वसे पृथक् भूतेन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपका यह जो रूप देख रहा हूँ, मैं इसके ही शरणागत हो रहा हूँ। हे भुवनमङ्गल, हमारे मङ्गलके लिये हमारी उपासनाके योग्य आपका यह स्वरूप,—जिसे आपने ध्यानमें दिखलाया है, उसी भगवद्-स्वरूपको-हम नमस्कार करते हैं और उसीकी सेवा करते हैं। असत् प्रसङ्गसे दूषित नरकगामी व्यक्ति इस नित्यमूर्तिका आदर नहीं करते ॥ 124-125 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 25/36-37 संख्या देखें ॥ 124-125 ॥ परमेश्वर विष्णु और वश्य-जीवमें 'भेद' :- काँहा 'पूर्णानन्दैश्वर्य' कृष्ण 'महेश्वर' ! काँहा 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी', 'मायार किङ्कर' ! ! 126 ॥ अनुवाद-कहाँ तो 'पूर्णानन्द-ऐश्वर्यमय' श्रीकृष्ण 'महेश्वर' हैं और कहाँ 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी' और मायाका दास है !” 126 ॥ अनुभाष्य-कहाँ महा-परमेश्वर श्रीकृष्णका पूर्णानन्दमय ऐश्वर्य-विग्रह और कहाँ क्षुद्र बद्धजीवका महा-क्लेशपूर्ण मायापदवीका दास्य ! इन दोनोंकी समता तो दूर रहे, तुलना भी असम्भव है ॥ 126 ॥ भगवद्-सन्दर्भमें उद्धृत सर्वज्ञसूक्त-वाक्य, भाः (1/7/6) श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीविष्णुस्वामि-वाक्य :- ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः। स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः ॥ 127 ॥ अनुवाद-ईश्वर-सदैव सच्चिदानन्द और 'ह्लादिनी' एवं 'सम्वित्'-शक्तिके द्वारा आश्लिष्ट (आलिङ्गित) हैं; किन्तु जीव सर्वदा ही अपनी (आरोपित) अविद्याके द्वारा पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह सब प्रकारके क्लेशोंका उद्गम-स्थल है ॥ 127 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 18/114 संख्या देखें ॥ 127 ॥ सभीका विस्मय :- शुनि' सभासदेर हैल महा-चमत्कार। 'सत्य कहे गोसाञि, करियाछे तिरस्कार ॥ ' 128 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरकी व्याख्याको सुनकर सभी उपस्थित व्यक्ति अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने माना, —'श्रीस्वरूप गोस्वामी सत्य ही कह रहे हैं कि इस कविने श्रीजगन्नाथदेव और महाप्रभुका तिरस्कार अथवा अनादर किया है ॥ ' 128 ॥ जड़ज्ञानी, प्राकृत कविकि लज्जा, भय और विस्मय :- शुनिया कविर हैल लज्जा, भय, विस्मय। हंस-मध्ये बक येन किछु नाहि कय ॥ 129 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरके तिरस्कारपूर्ण वचनोंको सुनकर कवि लज्जित हो गया और उसमें भय तथा विस्मय उत्पन्न हुआ। हंसोंकी सभाके बीचमें बगुलेके

[ 5/129-135 पाँचवाँ अध्याय 159 समान वह कुछ भी कह न पाया ॥ 129 ॥ महावदान्य श्रीस्वरूपकी अमन्दोदया दया :- तार दुःख देखि' स्वरूप परम-सदय। उपदेश कैला तारे यैछे 'हित' हय ॥ 130 ॥ अनुवाद-उस कविके दुःखको देखकर श्रीस्वरूप दामोदरको उसपर बहुत दया आयी, तब उन्होंने उसे ऐसा उपदेश दिया जिससे उसका हित हो ॥ 130 ॥ इसीके उद्देश्यसे समस्त जीवोंके प्रति वैष्णवाचार्य अभिन्न-गौर श्रीस्वरूपका चरम हितोपदेश :- “याह, भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने। एकान्त आश्रय कर चैतन्य-चरणे ॥ 131 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,- 'परमहंस वैष्णवके पास जाकर श्रीमद्भागवत पढ़ो। एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय करके ही तुम ऐसा कर पाओगे ॥ 131 ॥ अनुभाष्य-निर्विशेष केवलाद्वैत-मतनिष्ठ मायावादीसे अथवा भक्तिहीन शब्द-चतुर वैयाकरणसे (व्याकरणके अध्यापकसे) अथवा धनपर गिद्ध जैसी दृष्टि रखनेवाले विषयसेवीसे भागवत पढ़ने अथवा सुननेके लिये जानेपर उसके फलस्वरूप श्रीकृष्णप्रेम तो प्राप्त होगा नहीं, परन्तु श्रीकृष्णरसके बदले केवल जड़रसभोग वृद्धि प्राप्त करेगा। विषयोंसे विरक्त परमहंस वैष्णवोंसे ही भागवत पढ़नी चाहिये। श्रीचैतन्यचन्द्रके एकान्तिक चरणाश्रित होकर उनके द्वारा प्रदर्शित भागवतके अर्थ ही वैष्णवोंकी एकमात्र सम्पत्ति हैं ॥ 131 ॥ चैतन्यभक्त अथवा शुद्धचिद्-वृत्तिके अनुशीलनकारीके सङ्गके फलसे ही शुद्धभक्तिसिद्धान्तके ज्ञानकी प्राप्ति :- चैतन्येर भक्तगणेर नित्य कर 'सङ्ग'। तबे जानिबा सिद्धान्तसमुद्र-तरङ्ग ॥ 132 ॥ भक्तिसिद्धान्त-ज्ञान ही विद्या और पाण्डित्यका फल :- तबे पाण्डित्य तोमार हइबे सफल। कृष्णेर स्वरूप-लीला वर्णिबा निर्मल ॥ 133 ॥ अनुवाद-तुम नित्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तोंका सङ्ग करो। तभी तुम सिद्धान्तरूपी समुद्रकी तरङ्गोंको जान पाओगे। इसके द्वारा तुम्हारा ज्ञान प्राप्त करना सफल होगा। तभी तुम श्रीकृष्णके स्वरूप तथा उनकी लीलाओंका निर्मल वर्णन कर पाओगे ॥ 132-133 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीचैतन्येर भक्तगण',-नित्य-हरिपार्षद और अप्राकृत तत्त्वके एकमात्र ज्ञाता। उनका सम्पूर्ण रूपसे निरन्तर सङ्ग करनेसे जीवोंके सांसारिक-भोगोंसे उत्पन्न अज्ञानसमूह दूर होंगे और उन्हें यथार्थ शुद्धभक्तिके सिद्धान्तकी उपलब्धि होगी ॥ 132 ॥ एइ श्लोक करियाछ पाञा सन्तोष। तोमार हृदयेर अर्थे दुँहाय लागे 'दोष' ॥ 134 ॥ अनुवाद-तुम इस श्लोककी रचना करके बड़े सन्तुष्ट हुए, किन्तु तुमने अपने विचारसे जो इस श्लोककी व्याख्या की, उसके द्वारा ही दोनों ईश्वरोंके प्रति तुम्हारा अपराध होता है ॥ 134 ॥ अनुभाष्य - 'दुँहाय',-श्रीजगन्नाथदेवमें एवं श्रीगौरहरिमें ॥ 134 ॥ मूर्ख अथवा विद्वेषीके द्वारा श्रीकृष्णनिन्दारूपी उक्तिके द्वारा भी श्रीकृष्णसेविका भक्तिसिद्धान्त-वाणी-रूपिणी शुद्ध-सरस्वतीकी श्रीगौर-कृष्ण-सेवा :- तुमि यैछे-तैछे कह, ना जानिया रीति। सरस्वती सेइ-शब्दे करियाछे स्तुति ॥ 135 ॥ अनुवाद-तुमने भक्तिसिद्धान्तको नहीं जानकर जैसे-तैसे इस नान्दी श्लोककी रचना की है, किन्तु सरस्वती देवीने तुम्हारे द्वारा रचित उन्हीं शब्दोंके द्वारा भगवान्‌की स्तुति कर दी है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य-अज्ञानतावशतः तुम्हें मायावाद और भक्तिमार्गके पार्थक्यकी उपलब्धि नहीं है, इसलिये तुमने जिस प्रणालीसे अपने भावोंको व्यक्त किया है, वह अच्छा नहीं हुआ, जैसा-तैसा हुआ है; किन्तु सरस्वतीदेवीने रचनाकी अधिष्ठात्री होकर तुम्हारे इन जैसे-तैसे वाक्योंके