श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2174, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/121-123 पाँचवाँ अध्याय 157 (2) ईश्वरका देह-देही-भेद-निर्देशरूप अपराध ही प्रमाद :- आर एक करियाछ परम 'प्रमाद' ! देह-देहि-भेद ईश्वरे कैले 'अपराध' ! ! 121 ॥ अनुवाद-तुमने अन्य एक बहुत बड़ी भूल की है, ईश्वरमें देह और देहीका भेद करना अपराध है ! 121 ॥ अनुभाष्य-बद्धजीवकी भाँति मानकर ईश्वरके देह और देहीको परस्पर भिन्न वस्तुके रूपमें स्वीकार करनेसे 'अपराध' होता है। प्राकृत-जगत्में गुणमायाके द्वारा गठित बद्धजीवकी देहकी सत्ता और जीवमाया अथवा तटस्थ-शक्तिसे गठित जीवकी अनुभूति होती है। ईश्वर और बद्धजीवमें भेद यह है कि ईश्वर-कर्मफलके दाता और कर्मफलके अधीश अर्थात् समस्त कारणोंके कारण मायाधीश महाप्रभु और विभुतत्त्व हैं; जीव-बद्धावस्थामें कर्मफलका भोक्ता और कर्मफलके अधीन है और मुक्तावस्थामें भी अपने स्वरूपमें ईश्वरसेवामें सम्पूर्ण रूपसे रत होता है अर्थात् ईश्वर किसी भी कालमें मायाके वशमें नहीं होते और जीव-मायाधीनता-योग्य होता है; ईश्वर-अपरिमेय (जिसे मापा नहीं जा सके) अथवा अखण्ड चेतन हैं, जीव-परिमेय अथवा खण्ड चेतन है। बद्धजीवकी नश्वर अनित्य देह-मायिक अथवा जड़ है; मुक्त अथवा शुद्धजीवकी अप्राकृत-देह भी नित्य है और मायातीत ईश्वर भी नित्य सविशेष-विग्रह हैं। प्रपञ्चमें उनके नित्यविग्रहके अचिन्त्य निज-शक्तिके बलसे उदित होनेपर भी वे कभी भी प्रापञ्चिक-धर्मयुक्त मायिक अथवा प्राकृत नहीं हैं; (भाः 1/11/38)- “एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । न युज्यते सदात्मस्थैर्यथाबुद्धिस्तदाश्रया ॥” [अर्थात् “ईश्वरकी ईश्वरता यह है कि प्रकृतिस्थ अर्थात् प्राकृत जगत्में प्रवेश करके भी वे प्राकृत गुणोंके द्वारा युक्त नहीं होते। वे स्वयं अपने स्वरूपमें सर्वदा अवस्थित रहते हैं। उनके आश्रित जीवोंकी बुद्धि भी उसी प्रकारकी होती है।”] नित्यविग्रहको 'निर्विशेष' करनेके छलसे देह और देहीमें भेद-चेष्टा-महा अपराधका कार्य है ॥ 121 ॥ अद्वयज्ञान विष्णुका नाम, विग्रह और स्वरूप-अभिन्न :- ईश्वरेर नाहि कभु देह-देहि-भेद। स्वरूप, देह, - चिदानन्द, नाहिक विभेद ॥ 122 ॥ अनुवाद-ईश्वरमें कदापि देह-देहीका भेद नहीं होता। ईश्वरका स्वरूप और उनकी देह-दोनों ही चिदानन्द हैं, उनमें कोई विभेद नहीं होता ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-अद्वयज्ञान ही व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं; 'वदन्ति तत्तत्त्वविदः' श्लोकमें तत्त्वस्वरूपके निर्णयमें एकमात्र अद्वितीय परमेश्वरमें द्वैतवस्तु-बुद्धिका निवारण हुआ है। वे-अद्वयज्ञान हैं, इसलिये उनका नाम, रूप, गुण और लीला जड़-जगत्की वस्तुओंकी भाँति भिन्न-भिन्न नहीं है, उसे एकान्तिक 'अभिन्न' जानना होगा। ईश्वरमें देह-देही-भेद ज्ञान ही उन्हें 'बद्धजीव' माननेके भ्रमका कारण है, क्योंकि बद्धजीवमें अद्वय-ज्ञान-प्रतीतिका अभाव है ॥ 122 ॥ लघुभागवतामृत (1/5/342) में उद्धृत कूर्मपुराणका वचन- “देह-देहि-विभागोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥”123 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 123 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ईश्वरमें (कभी भी यह) देह- देहीका भेद नहीं है ॥ 123 ॥ अनुभाष्य- ईश्वरे (परमात्मनि सविशेषतत्त्ववस्तुनि भगवति) अयं देहदेहिविभागः (नाम एकं नामी च अन्यः, रूपं एकं रूपी च भिन्नः, गुणः एकः गुणी च भिन्नः, लीला एका लीलामयो भिन्नः, -एवम्भूतो मायाकृतः खण्डः) [अद्वयज्ञाने शुद्धसत्त्वमये विष्णौ] क्वचित् (गोलोके परव्योम्नि देवीधाम्नि वा चतुर्दश- भुवनान्तर्मध्ये च) न विद्यते। श्लोक-भावानुवाद-सविशेषतत्त्ववस्तु भगवान्में [अद्वयज्ञान शुद्धसत्त्वमय विष्णुमें] गोलोकमें अथवा परव्योममें अथवा देवीधाममें चौदह भुवनोंके मध्य कहीं