भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2175

158 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/123-129 ] भी और कभी भी यह देह-देहीका भेद [अर्थात् नाम एक और नामी अन्य, रूप एक और रूपी उससे भिन्न, गुण एक और गुणी भिन्न, लीला एक और लीलामय भिन्न,—इस प्रकार मायाके द्वारा खण्डित भेद] नहीं होता ॥ 123 ॥ श्रीमद्भागवत (3/9/3-4) में- नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः। पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकपदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ 124 ॥ तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभागिभिरसत्प्रसङ्गैः ॥ 125 ॥ अनुवाद-हे परम, आपके इस आनन्दमात्र, अद्वयज्ञान और मायातीत तेजःस्वरूप,—जिस स्वरूपको मैं अब देख रहा हूँ, इससे श्रेष्ठ स्वरूप और कोई नहीं है। हे आत्मन्, विश्वसृजनकारी होनेपर भी विश्वसे पृथक् भूतेन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपका यह जो रूप देख रहा हूँ, मैं इसके ही शरणागत हो रहा हूँ। हे भुवनमङ्गल, हमारे मङ्गलके लिये हमारी उपासनाके योग्य आपका यह स्वरूप,—जिसे आपने ध्यानमें दिखलाया है, उसी भगवद्-स्वरूपको-हम नमस्कार करते हैं और उसीकी सेवा करते हैं। असत् प्रसङ्गसे दूषित नरकगामी व्यक्ति इस नित्यमूर्तिका आदर नहीं करते ॥ 124-125 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 25/36-37 संख्या देखें ॥ 124-125 ॥ परमेश्वर विष्णु और वश्य-जीवमें 'भेद' :- काँहा 'पूर्णानन्दैश्वर्य' कृष्ण 'महेश्वर' ! काँहा 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी', 'मायार किङ्कर' ! ! 126 ॥ अनुवाद-कहाँ तो 'पूर्णानन्द-ऐश्वर्यमय' श्रीकृष्ण 'महेश्वर' हैं और कहाँ 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी' और मायाका दास है !” 126 ॥ अनुभाष्य-कहाँ महा-परमेश्वर श्रीकृष्णका पूर्णानन्दमय ऐश्वर्य-विग्रह और कहाँ क्षुद्र बद्धजीवका महा-क्लेशपूर्ण मायापदवीका दास्य ! इन दोनोंकी समता तो दूर रहे, तुलना भी असम्भव है ॥ 126 ॥ भगवद्-सन्दर्भमें उद्धृत सर्वज्ञसूक्त-वाक्य, भाः (1/7/6) श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीविष्णुस्वामि-वाक्य :- ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः। स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः ॥ 127 ॥ अनुवाद-ईश्वर-सदैव सच्चिदानन्द और 'ह्लादिनी' एवं 'सम्वित्'-शक्तिके द्वारा आश्लिष्ट (आलिङ्गित) हैं; किन्तु जीव सर्वदा ही अपनी (आरोपित) अविद्याके द्वारा पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह सब प्रकारके क्लेशोंका उद्गम-स्थल है ॥ 127 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 18/114 संख्या देखें ॥ 127 ॥ सभीका विस्मय :- शुनि' सभासदेर हैल महा-चमत्कार। 'सत्य कहे गोसाञि, करियाछे तिरस्कार ॥ ' 128 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरकी व्याख्याको सुनकर सभी उपस्थित व्यक्ति अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने माना, —'श्रीस्वरूप गोस्वामी सत्य ही कह रहे हैं कि इस कविने श्रीजगन्नाथदेव और महाप्रभुका तिरस्कार अथवा अनादर किया है ॥ ' 128 ॥ जड़ज्ञानी, प्राकृत कविकि लज्जा, भय और विस्मय :- शुनिया कविर हैल लज्जा, भय, विस्मय। हंस-मध्ये बक येन किछु नाहि कय ॥ 129 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरके तिरस्कारपूर्ण वचनोंको सुनकर कवि लज्जित हो गया और उसमें भय तथा विस्मय उत्पन्न हुआ। हंसोंकी सभाके बीचमें बगुलेके