भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2176, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2176

[ 5/129-135 पाँचवाँ अध्याय 159 समान वह कुछ भी कह न पाया ॥ 129 ॥ महावदान्य श्रीस्वरूपकी अमन्दोदया दया :- तार दुःख देखि' स्वरूप परम-सदय। उपदेश कैला तारे यैछे 'हित' हय ॥ 130 ॥ अनुवाद-उस कविके दुःखको देखकर श्रीस्वरूप दामोदरको उसपर बहुत दया आयी, तब उन्होंने उसे ऐसा उपदेश दिया जिससे उसका हित हो ॥ 130 ॥ इसीके उद्देश्यसे समस्त जीवोंके प्रति वैष्णवाचार्य अभिन्न-गौर श्रीस्वरूपका चरम हितोपदेश :- “याह, भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने। एकान्त आश्रय कर चैतन्य-चरणे ॥ 131 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,- 'परमहंस वैष्णवके पास जाकर श्रीमद्भागवत पढ़ो। एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय करके ही तुम ऐसा कर पाओगे ॥ 131 ॥ अनुभाष्य-निर्विशेष केवलाद्वैत-मतनिष्ठ मायावादीसे अथवा भक्तिहीन शब्द-चतुर वैयाकरणसे (व्याकरणके अध्यापकसे) अथवा धनपर गिद्ध जैसी दृष्टि रखनेवाले विषयसेवीसे भागवत पढ़ने अथवा सुननेके लिये जानेपर उसके फलस्वरूप श्रीकृष्णप्रेम तो प्राप्त होगा नहीं, परन्तु श्रीकृष्णरसके बदले केवल जड़रसभोग वृद्धि प्राप्त करेगा। विषयोंसे विरक्त परमहंस वैष्णवोंसे ही भागवत पढ़नी चाहिये। श्रीचैतन्यचन्द्रके एकान्तिक चरणाश्रित होकर उनके द्वारा प्रदर्शित भागवतके अर्थ ही वैष्णवोंकी एकमात्र सम्पत्ति हैं ॥ 131 ॥ चैतन्यभक्त अथवा शुद्धचिद्-वृत्तिके अनुशीलनकारीके सङ्गके फलसे ही शुद्धभक्तिसिद्धान्तके ज्ञानकी प्राप्ति :- चैतन्येर भक्तगणेर नित्य कर 'सङ्ग'। तबे जानिबा सिद्धान्तसमुद्र-तरङ्ग ॥ 132 ॥ भक्तिसिद्धान्त-ज्ञान ही विद्या और पाण्डित्यका फल :- तबे पाण्डित्य तोमार हइबे सफल। कृष्णेर स्वरूप-लीला वर्णिबा निर्मल ॥ 133 ॥ अनुवाद-तुम नित्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तोंका सङ्ग करो। तभी तुम सिद्धान्तरूपी समुद्रकी तरङ्गोंको जान पाओगे। इसके द्वारा तुम्हारा ज्ञान प्राप्त करना सफल होगा। तभी तुम श्रीकृष्णके स्वरूप तथा उनकी लीलाओंका निर्मल वर्णन कर पाओगे ॥ 132-133 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीचैतन्येर भक्तगण',-नित्य-हरिपार्षद और अप्राकृत तत्त्वके एकमात्र ज्ञाता। उनका सम्पूर्ण रूपसे निरन्तर सङ्ग करनेसे जीवोंके सांसारिक-भोगोंसे उत्पन्न अज्ञानसमूह दूर होंगे और उन्हें यथार्थ शुद्धभक्तिके सिद्धान्तकी उपलब्धि होगी ॥ 132 ॥ एइ श्लोक करियाछ पाञा सन्तोष। तोमार हृदयेर अर्थे दुँहाय लागे 'दोष' ॥ 134 ॥ अनुवाद-तुम इस श्लोककी रचना करके बड़े सन्तुष्ट हुए, किन्तु तुमने अपने विचारसे जो इस श्लोककी व्याख्या की, उसके द्वारा ही दोनों ईश्वरोंके प्रति तुम्हारा अपराध होता है ॥ 134 ॥ अनुभाष्य - 'दुँहाय',-श्रीजगन्नाथदेवमें एवं श्रीगौरहरिमें ॥ 134 ॥ मूर्ख अथवा विद्वेषीके द्वारा श्रीकृष्णनिन्दारूपी उक्तिके द्वारा भी श्रीकृष्णसेविका भक्तिसिद्धान्त-वाणी-रूपिणी शुद्ध-सरस्वतीकी श्रीगौर-कृष्ण-सेवा :- तुमि यैछे-तैछे कह, ना जानिया रीति। सरस्वती सेइ-शब्दे करियाछे स्तुति ॥ 135 ॥ अनुवाद-तुमने भक्तिसिद्धान्तको नहीं जानकर जैसे-तैसे इस नान्दी श्लोककी रचना की है, किन्तु सरस्वती देवीने तुम्हारे द्वारा रचित उन्हीं शब्दोंके द्वारा भगवान्‌की स्तुति कर दी है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य-अज्ञानतावशतः तुम्हें मायावाद और भक्तिमार्गके पार्थक्यकी उपलब्धि नहीं है, इसलिये तुमने जिस प्रणालीसे अपने भावोंको व्यक्त किया है, वह अच्छा नहीं हुआ, जैसा-तैसा हुआ है; किन्तु सरस्वतीदेवीने रचनाकी अधिष्ठात्री होकर तुम्हारे इन जैसे-तैसे वाक्योंके

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