भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2173

156 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/116-120 ] सभीके प्रसन्न होनेपर भी जगद्गुरु वैष्णवाचार्य श्रीस्वरूपका क्रोध और शास्त्र-सिद्धान्तरूपी तलवारके द्वारा कुमतका खण्डनरूपी दया :- शुनिया सबार हैल आनन्दित मन। दुःख पाञा स्वरूप कहे सक्रोध वचन ॥ 116 ॥ क्रोधके कारणका निर्देश- (1) विष्णुमें जीवबुद्धि-नरकगामी :- “आरे मूर्ख, आपनार कैलि सर्वनाश ! दुइ त' ईश्वरे तोर नाहिक विश्वास ! ! 117 ॥ पूर्णानन्द-चित्स्वरूप जगन्नाथ-राय। ताँरे कैलि जड़-नश्वर-प्राकृत-काय ! ! 118 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सभीके मनमें आनन्द हुआ। किन्तु श्रीस्वरूप दामोदर उसे सुनकर दुःखी हुए और क्रोधित होकर कहा, -“अरे मूर्ख! तुमने अपना सर्वनाश कर लिया है! दोनों ईश्वरोंके प्रति ही तुम्हारा विश्वास नहीं है। भगवान् श्रीजगन्नाथ-राय पूर्णानन्द चित् स्वरूप हैं और तुमने उन्हें जड़ीय-नश्वर-प्राकृत शरीरवाला कहकर वर्णन किया है! 116-118 ॥ अनुभाष्य-श्रीजगन्नाथ-विग्रहको काष्ठकी प्रतिमा जानकर विनाशशील और प्राकृत द्रव्योंसे गठित जड़ीय-वस्तुमात्र माननेसे “अर्च्ये विष्णौ शिलाधीः ×× यस्य वा नारकी सः॥” इस पद्मपुराणके वचनानुसार वैसे माननेवालेका अपराध होता है। इसलिये भगवद्भक्त सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्णसे सम्पूर्णतः अभिन्न उनके अर्चा-विग्रहको प्रेमानन्दसे रञ्जित भक्तिमय नेत्रोंके द्वारा साक्षात् पूर्ण सच्चिदानन्द- विग्रहस्वरूपमें दर्शन करते हैं॥ 118 ॥ पूर्ण-षडैश्वर्य चैतन्य-स्वयं भगवान्। ताँरे कैलि क्षुद्र जीव स्फुलिङ्ग-समान ! ! 119 ॥ अनुवाद-षडैश्वर्यपूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं भगवान् हैं और तुमने उनकी अग्निकी चिङ्गारीके समान क्षुद्र जीव कहकर व्याख्या की !119 ॥ अनुभाष्य-“यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गा व्युचरन्ति"-इस श्रुति वचनसे जाना जाता है कि जीव बृहत् विष्णुरूप अग्निकी चिङ्गारीके समान अर्थात् चित्कण हैं। मायावश जीवकी जड़ीय शरीरमें बन्धनकी योग्यता रहनेपर भी सच्चिदानन्दविग्रह समस्त कारणोंके कारण परमेश्वर श्रीचैतन्यदेवने नर-शरीर धारण किया है, ऐसा कहनेसे क्या वे जड़के अधीन क्षुद्र जीव हैं, -ऐसा नहीं है; वे मायाधीश षडैश्वर्यपूर्ण स्वयं भगवान् यशोदानन्दन हैं; (भाः 1/11/38)- “एतदीशनामीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥” [अर्थात् “ईश्वरकी ईश्वरता यह है कि प्रकृतिस्थ अर्थात् प्राकृत जगत्में प्रवेश करके भी वे प्राकृत गुणोंके द्वारा युक्त नहीं होते। वे स्वयं अपने स्वरूपमें सर्वदा अवस्थित रहते हैं। उनके आश्रित जीवोंकी बुद्धि भी उसी प्रकारकी होती है।”]॥ 119 ॥ जड़ज्ञानी तर्कपन्थी भक्तिसिद्धान्तके विषयमें अनभिज्ञ व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण-वर्णनकी चेष्टा-दुःसाहसिकता :- दुइ-ठाञि अपराधे पाइबि दुर्गति ! अतत्त्वज्ञ 'तत्त्व' वर्णे, तार एइ गति ! ! 120 ॥ अनुवाद-तुम दोनोंके प्रति अपराध करनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त करोगे! अतत्त्वज्ञ व्यक्तिके द्वारा तत्त्वका वर्णन करनेपर उसकी ऐसी ही गति होती है! 120 ॥ अनुभाष्य-'दुइ-ठाञि',-श्रीजगन्नाथदेव और श्रीचैतन्य- देव, दोनोंको प्रपञ्चके अन्तर्गत जड़ और जीवके रूपमें विचार करनेसे-एककी प्राकृत देहमें स्थित चित्कण अन्यकी प्राकृत देहमें प्रविष्ट हुआ है, ऐसा माननेसे- दोनों स्थानोंपर अपराध होता है। 'अतत्त्वज्ञ',-जिसे तत्त्वका कोई ज्ञान नहीं है अर्थात् अहंग्रहोपासक मायावादी, फलभोगी कर्मी अथवा स्वेच्छाचारी सत्-असत्- विवेकरहित इन्द्रियपरायण व्यक्ति; 'तत्त्व-वर्णे',-तत्त्व अर्थात् भगवान्के विषयमें वर्णन करता है॥ 120 ॥

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