भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2172

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[ 5/110-115 पाँचवाँ अध्याय 155 अनुवाद—श्रीभगवान्-आचार्य इस प्रकार दो-तीन दिन तक श्रीस्वरूप दामोदरसे आग्रह करते रहे। उनके पुनः पुनः आग्रह करनेपर श्रीस्वरूप दामोदरके मनमें उसे सुननेकी इच्छा हो गयी ॥ 110 ॥ श्रीस्वरूपके निकट कविके द्वारा नान्दी-श्लोकका पाठ :- सबा लञा स्वरूप गोसाञि शुनिते बसिला। तबे सेइ कवि नान्दी-श्लोक पड़िला ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी अन्य भक्तोंको साथमें लेकर सुननेके लिये बैठ गये। तब उस कविने नान्दी-श्लोकका पाठ किया ॥ 111 ॥ नान्दी श्लोक :- बङ्गदेशके ब्राह्मणके द्वारा रचित श्लोक- विकचकमलनेत्रे श्रीजगन्नाथसंज्ञे कनकरुचिरिहात्मन्यात्मतां यः प्रपन्नः। प्रकृतिजडमशेषं चेतयन्नाविरासीत् स दिशतु तव भव्यं कृष्णचैतन्यदेवः ॥ 112 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो स्वर्णकान्तिको स्वयंमें न्यस्त अथवा विस्तृत करके विकसित कमलनेत्र-स्वरूप श्रीजगन्नाथमें आत्मताको प्राप्त हुए हैं और जो जड़-प्रकृति (काष्ठ) को पूर्ण चेतना प्रदान करके आविर्भूत हुए हैं, वे श्रीकृष्णचैतन्यदेव तुम्हारा मङ्गल विधान करें ॥ 112 ॥ अनुभाष्य- कनकरुचिः (कनकस्य स्वर्णस्य इव रुचिः कान्तिः यस्य सः) यः (गौरः) इह (अस्मिन् पुरुषोत्तम-क्षेत्रे) विकचकमलनेत्रे (विकचे प्रफुल्ले कमले इव नेत्रे यस्य तस्मिन्) श्रीजगन्नाथसंज्ञे (श्रीजगन्नाथः इति संज्ञा नामधेयं यस्य तस्मिन्) आत्मनि (शरीरे) आत्मतां (देहित्वं) प्रपन्नः (प्राप्तः सन्) प्रकृतिजडं (प्रकृत्या जड़ं श्रीजगन्नाथविग्रहम् अर्च्ये दारुधीत्वात्) अशेषं चेतयन् आविरासीत् (प्रकटो बभूव), सः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) तव भव्यं (कल्याणं) दिशतु (विदधातु)। [सरस्वती-पक्षे तु,-यः श्रीकृष्णः श्रीजगन्नाथ-संज्ञे मायाधीशे दारुब्रह्मणि षडैश्वर्यपूर्णे परमात्मनि कनकरुचिना गौररूपेण आत्मतां सर्वथा तदभेदतां जगन्नाथरूपतां प्रपन्नः, सः इत्यादिकं स्पष्टम्]। श्लोक-भावानुवाद-स्वर्णकी कान्तिवाले श्रीगौरसुन्दर इस पुरुषोत्तम क्षेत्रमें प्रफुल्लित कमलनेत्र-स्वरूप श्रीजगन्नाथकी देहमें देही रूपको प्राप्त हुए हैं और काष्ठके श्रीजगन्नाथ अर्चा-विग्रहको पूर्ण चेतना प्रदान करके प्रकट हुए हैं, वे श्रीकृष्णचैतन्यदेव तुम्हारा मङ्गल विधान करें। [सरस्वती-पक्षमें-जो श्रीकृष्ण श्रीजगन्नाथदेवके 'आत्म-स्वरूप' हैं, उन्होंने नीलाचलमें दारु-ब्रह्म स्थावर-स्वरूप धारण किया है। वे ही षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण स्वर्णकान्तियुक्त होकर जङ्गम श्रीगौरसुन्दर रूपमें अवतरित हुए हैं। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव और श्रीकृष्ण (श्रीगौरसुन्दर) में एकताकी प्राप्ति होती है-यह स्पष्ट है] ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूपके अतिरिक्त अन्य सभीके द्वारा प्रशंसा :- श्लोक शुनि' सर्वलोक ताहारे बाखाने। स्वरूप कहे,–“एइ श्लोक करह व्याख्याने ॥” 113 ॥ अनुवाद—कविके मुखसे नान्दी-श्लोक सुनकर सभी लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने उस कविसे कहा,–"इस श्लोककी व्याख्या तो करो ॥” 113 ॥ मूर्ख-कविका शुद्धभक्ति-सिद्धान्तविरुद्ध मायावाद-दोष :- कवि कहे,–“जगन्नाथ-सुन्दर-शरीर । चैतन्य-गोसाञि-शरीरी महाधीर ॥ 114 ॥ अनुवाद—कविने कहा,—"श्रीजगन्नाथदेवका शरीर अति सुन्दर है और श्रीचैतन्य गोसाई जो महाधीर हैं, वे शरीरी हैं ॥ 114 ॥ अनुभाष्य- 'शरीरी', - जिनका शरीर है वे अर्थात् देही ॥ 114 ॥ सहज जड़जगतेर चेतन कराइते। नीलाचले महाप्रभु हैला आविर्भूते ॥” 115 ॥ अनुवाद—सहज ही इस जड़-जगत्को चेतन बनानेके लिये महाप्रभु नीलाचलमें आविर्भूत हुए हैं॥” 115 ॥