श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें154 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/102-110 ] श्रीगौरकृष्णकी अप्रीतिके एकमात्र कारणका निर्देश :- 'यद्वा-तद्वा' कविर वाक्ये हय 'रसाभास'। सिद्धान्तविरुद्ध शुनिते ना हय उल्लास ॥ 102 ॥ अनुवाद—जैसे-तैसे कवियोंकी कवितामें 'रसाभास' दोष होता है। सिद्धान्तविरुद्ध वाक्य सुननेसे हृदयमें उल्लास नहीं होता ॥ 102 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'यद्वा तद्वा कवि',—जैसे-तैसे कवि अर्थात् जो रसतत्त्व और वैष्णवसिद्धान्त-तत्त्वको भली-भाँति नहीं जानकर कविताकी रचना करते हैं॥ 102 ॥ 'रस', 'रसाभास' यार नाहिक विचार। भक्तिसिद्धान्त-सिन्धु नाहि पाय पार ॥ 103 ॥ अनुवाद—जैसा-तैसा कवि जिसे 'रस' और 'रसाभास' आदिका ज्ञान नहीं है, वह भक्तिसिद्धान्तरूपी सिन्धुका पार नहीं पा सकता ॥ 103 ॥ 'व्याकरण' नाहि जाने, ना जाने 'अलङ्कार'। 'नाटकालङ्कार'-ज्ञान नाहिक याहार ॥ 104 ॥ कृष्णलीला वर्णिते ना जाने सेइ छार ! विशेषे दुर्गम एइ चैतन्य-विहार ॥ 105 ॥ अनुवाद—जो कवि 'व्याकरण' नहीं जानता और 'अलङ्कार'के विषयमें नहीं जानता एवं जिसे नाटकके प्रयुक्त अलङ्कार आदिका भी कोई ज्ञान नहीं है तथा श्रीकृष्णलीलाका किस प्रकारसे वर्णन करना चाहिये, इसे नहीं जानता, वह निन्दनीय है! विशेषरूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला तो अति दुर्गम है॥ 104-105 ॥ श्रीगौरगतप्राण कृष्णभक्तका ही गौरलीला-वर्णनमें अधिकार :- कृष्णलीला, गौरलीला से करे वर्णन। गौर-पादपद्म याँर हय प्राण-धन ॥ 106 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिके चरणकमल जिनके प्राणधन हैं, वे ही श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाका वर्णन कर सकते हैं॥ 106 ॥ कृष्णसुखतात्पर्य्यरहित प्राकृत-कविका बहिरङ्ग होना, कृष्णसुखतत्पर अप्राकृत कविका अन्तरङ्ग होना :- ग्राम्य-कविर कवित्व शुनिते हय 'दुःख'। विदग्ध-आत्मीय-वाक्य शुनिते हय 'सुख' ॥ 107 ॥ अनुवाद—ग्राम्य कवियोंकी कविताएँ सुननेसे दुःख होता है, जबकि विदग्ध-आत्मीय व्यक्तियोंके द्वारा रचित वाक्योंको सुननेसे सुख होता है॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ग्राम्य-कवि',—जो सब कवि ग्राम्य (सांसारिक) स्त्री-पुरुषोंके विषयमें कविताकी रचना करते हैं। विदग्ध-आत्मीय-वाक्य',—तत्त्वज्ञान-चतुर शुद्धभक्त-सम्प्रदायमें प्रविष्ट आत्मीय (अर्थात् सजातीयाशयस्निग्ध) व्यक्तिकी रचना॥ 107 ॥ अप्राकृत कविशिरोमणि श्रीरूपका उदाहरण :- रूप यैछे दुइ नाटक करियाछे आरम्भे। शुनिते आनन्द बाड़े यार मुखबन्धे॥ ”108 ॥ अनुवाद—जैसे रूपने दो नाटकोंको लिखना आरम्भ किया उसकी भूमिकाको भी सुनते ही आनन्द वर्धित होता है॥ ”108 ॥ तथापि भगवान्-आचार्यका अनुरोध :- भगवान्-आचार्य कहे,—“शुन एकबार। तुमि शुनिले भाल-मन्द जानिबे विचार॥ ”109 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरके यह सब बतलानेपर भी श्रीभगवान्-आचार्यने प्रार्थना की,—“आप उसे एकबार तो सुन लीजिये। उसे सुननेपर आप विचार कर सकते हैं कि वह अच्छा है या बुरा॥ ”109 ॥ बन्धु आचार्यके अनुरोधके कारण श्रीस्वरूपकी श्रवणकी इच्छा :- दुइ-तिन-दिन आचार्य आग्रह करिल। ताँर आग्रहे स्वरूपेर शुनिते इच्छा हैल ॥ 110 ॥