श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2170, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/97-101 पाँचवाँ अध्याय 153 भक्तिसिद्धान्त-वाणीका विरोध ही महावदान्य महाप्रभुके क्रोधका एकमात्र कारण :- 'रसाभास' हय यदि 'सिद्धान्तविरोध' । सहिते ना पारे प्रभु, मने हय क्रोध ॥ 97 ॥ अनुवाद—यदि किसी रचनामें रसाभास-दोष अथवा भक्तिसिद्धान्तोंका विरोध होता, तब महाप्रभु उसे सुनकर सहन नहीं कर पाते, उनको क्रोध आ जाता ॥ 97 ॥ अनुभाष्य—रसाभास,—(भःरःसिः उःविः 9म लः)— “पूर्वमेवानुशिष्टेन विकला रसलक्षणाः । रसा एव रसाभासा रसज्ञैरनुकीर्त्तिताः ॥ स्युस्त्रिधोपरसाश्चानुरसाश्चापरसाश्च ते । उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चेत्यमी क्रमात् ॥ प्राप्तैः स्थायिविभावानुभावाद्यैस्तु विरूपताम् । शान्तादयो रसा एव द्वादशोपरसा मताः ॥ भक्तादिभिर्विभावाद्यैः कृष्णसम्बन्धवर्जितैः । रसा हास्यादयः सप्त शान्तश्चानुरसा मताः ॥ कृष्ण-तत्प्रतिपक्षश्रेद्विषयाश्रयतां गताः। हासादीनां तदा तेऽत्र प्राज्ञैरपरसा मताः ॥ भावाः सर्वे तदाभासा रसाभासाश्च केचन । अमी प्रोक्ता रसाभिज्ञैः सर्वेऽपि रसनाद्रसाः ॥” आपात रस प्रतीत होनेपर भी जो पूर्वकथित रसके लक्षणोंके द्वारा अङ्गहीन होता है, रसिकगण उसे 'रसाभास' कहते हैं। 'उपरस', 'अनुरस' और 'अपरस'के भेदसे रसाभास भी 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ'के रूपमें कथित होता है। विरूपताको प्राप्त स्थायी-भाव, विभाव और अनुभाव आदिके द्वारा उपलक्षित शान्तादि बारह रस 'उपरस'के नामसे कहे गये हैं; श्रीकृष्णसे सम्बन्धहीन भक्तादि विभावसमूहके द्वारा उत्पन्न हास्यादि सात रस और रुक्ष शान्तरस ही 'अनुरस' कहलाते हैं; परस्पर विरुद्धभावयुक्त होकर श्रीकृष्ण और उनके विरोधी असुर यदि हास्यादि रसके क्रमशः विषय और आश्रय होते हैं, तब रसतत्त्व-ज्ञाता पण्डित उसे 'अपरस' कहते हैं। सभी भावोंको कोई कोई 'तदाभास' अथवा 'रसाभास' कहते हैं; रसतत्त्व अभिज्ञ व्यक्ति स्वादिष्ट अथवा आनन्द प्रदान करनेवाले होनेके कारण ही इन सभीको 'रस' कहते हैं। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्तीपाद कहते हैं,—“परस्पर-वैरयोर्यदि योगस्तदा रसाभासः” अर्थात् दो प्रकारके विरोधी रसोंके योग होनेपर 'रसाभास' होता है। 'सिद्धान्तविरोध',—भक्तिमार्गीय सिद्धान्तके साथ विरोध, तत्त्वविरोध ॥ 97 ॥ अतएव प्रभु किछु आगे नाहि सुने । एइ मर्यादा प्रभु करियाछे नियमे ॥ 98 ॥ अनुवाद—अतएव महाप्रभु किसीकी भी रचनाको श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा पहले सुने बिना स्वयं नहीं सुनते थे। महाप्रभुने इस मर्यादाके पालनका नियम बनाकर रखा था ॥ 98 ॥ श्रीस्वरूपसे श्रीभगवान्-आचार्यका प्राकृत कविके काव्यकी प्रशंसा करते हुए निवेदन :- स्वरूपेर ठाञि आचार्य कैला निवेदन। “एक कवि प्रभुर नाटक करियाछे उत्तम ॥ 99 ॥ आदौ तुमि शुन, यदि तोमार मन माने। पाछे महाप्रभुरे तब कराइमु श्रवणे ॥” 100 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप दामोदरसे निवेदन करते हुए कहा,—“एक कविने महाप्रभुके चरित्रपर आधारित एक उत्तम नाटककी रचना की है। पहले आप उसका श्रवण कीजिये और यदि वह आपके द्वारा स्वीकृत होगा, तभी बादमें महाप्रभुको उसका श्रवण कराऊँगा ॥” 99-100 ॥ श्रीकृष्णतत्त्वको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ अन्तर्यामी श्रीस्वरूपके द्वारा भगवान्-आचार्यकी भर्त्सना :- स्वरूप कहे,—“तुमि 'गोप' परम-उदार। ये-से शास्त्र शुनिते इच्छा उपजे तोमार ॥ 101 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“तुम गोप होनेके कारण परम उदार हो। इसलिये तुममें जिस-किसी भी शास्त्रको सुननेकी इच्छा उदित हो जाती है ॥ 101 ॥