भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2169

152 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/88–96 ] श्रीचैतन्यलीलासिन्धुकी बिन्दुप्तिसे ही जगत्का उद्धार :- श्रीचैतन्यलीला एइ-अमृतेर सिन्धु। जगत् भासाइते पारे यार एक बिन्दु॥ ८८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला अमृतके सिन्धुकी भाँति है, उसकी एक बूँद जगत्को प्रेममें निमग्न कर सकती है॥ ८८॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यलीलामृतरूपी सिन्धुकी एक बूँद ही जगत्को प्रेममें आप्लावित करनेमें समर्थ है। श्रीदास-गोस्वामी, परवर्ती कालमें श्रीठाकुर नरोत्तम, श्रील श्यामानन्द प्रभु आदि भी श्रीमन्महाप्रभुकी वैसी उदारताके विकास-स्वरूप हैं॥ ८८॥ श्रद्धासे श्रीचैतन्यलीलामृतके पानके फलसे चिद्वृत्तिके उदित होनेपर सम्बन्धज्ञान, अभिधेय और प्रयोजनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरितामृत नित्य कर पान। याहा हैते 'प्रेमानन्द', 'भक्तितत्त्व-ज्ञान'॥ ८९॥ अनुवाद-हे भक्तों! श्रीचैतन्यचरितामृतका प्रतिदिन पान करो, जिससे आपको प्रेमानन्दकी प्राप्ति और भक्तितत्त्वका ज्ञान प्राप्त होगा॥ ८९॥ महाप्रभुकी ऐसी नीलाचल-लीला :- एइमत महाप्रभु भक्तगण लञा। नीलाचले विहरये भक्ति प्रचारिया॥ ९०॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंको लेकर भक्तिका प्रचार करते हुए नीलाचलमें विहार किया॥ ९०॥ पूर्वबङ्गालवासी ब्राह्मणवेशी प्राकृत-कविका वृत्तान्त :- बङ्गदेशी एक विप्र प्रभुर चरिते। नाटक करि' लञा आइला शुनाइते॥ ९१॥ अनुवाद-बङ्गालके एक ब्राह्मणने महाप्रभुके चरित्रपर आधारित एक नाटककी रचना की और उसे महाप्रभुको सुनानेके लिये नीलाचलमें लेकर आया॥ ९१॥ भगवान्-आचार्य-सने तार परिचय। ताँरे मिलि' ताँर घरे करिल आलय॥ ९२॥ अनुवाद-उसका श्रीभगवान् आचार्यके साथ पहलेसे परिचय था, इसलिये वह उनसे मिला और उनके घरपर ही रहने लगा॥ ९२॥ प्रथमे नाटक तैं हो ताँरे शुनाइल। ताँर सङ्गे अनेक वैष्णव नाटक शुनिल॥ ९३॥ अनुवाद-उसने सबसे पहले अपने नाटकको श्रीभगवान् आचार्यको सुनाया। फिर श्रीभगवान् आचार्यके साथ बैठकर अनेक वैष्णवोंने उस नाटकको सुना॥ ९३॥ सबेइ प्रशंसे नाटक 'परम उत्तम'। महाप्रभुरे शुनाइते सबार हैल मन॥ ९४॥ अनुवाद-सभी वैष्णवोंने 'परम उत्तम' कहकर उस नाटककी प्रशंसा की। सभीके मनमें उस नाटकको महाप्रभुको श्रवण करानेकी इच्छा हुई॥ ९४॥ श्रीस्वरूपदामोदरके द्वारा परीक्षा लेनेका नियम :- गीत, श्लोक, ग्रन्थ, कवित्व, -येइ करि' आने। प्रथमे शुनाय सेइ स्वरूपेर स्थाने॥ ९५॥ अनुवाद-जो कोई भी व्यक्ति गीत, श्लोक, ग्रन्थ अथवा कवितादिकी रचना करके लाता, तो पहले उसे श्रीस्वरूप दामोदरको सुनाना होता॥ ९५॥ श्रीस्वरूपके अनुमोदन अथवा परीक्षामें उत्तीर्ण होनेके बाद ही महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- स्वरूप-ठाञि उत्तरे यदि, लय ताँर मन। तबे महाप्रभु-ठाञि कराय श्रवण॥ ९६॥ अनुवाद-यदि वह रचना श्रीस्वरूप दामोदरको सन्तुष्ट करके उनकी परीक्षामें उत्तीर्ण हो जाती, तभी वह महाप्रभुको श्रवण करायी जाती थी॥ ९६॥