श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 5/84-87 पाँचवाँ अध्याय 151 प्रद्युम्नमिश्रको उपदेश प्रदान करवाया। यहाँ तक कि संन्यास ग्रहण करनेवाले स्वयं महाप्रभुने भी श्रीरामानन्दके द्वारा प्रचारित धर्मको अङ्गीकार किया। श्रीगौरहरिने आश्रमके सम्बन्धमें शास्त्रोंके सार सिद्धान्तको लोगोंमें प्रकट करनेके उद्देश्यसे प्राकृत-पण्डिताभिमानी और त्यागाभिमानी गणोंकी भ्रमपूर्ण धारणाके प्रतिकूलमें अपने स्वाभाविक ऐश्वर्य प्रभावका विस्तार किया था। साधारण मूर्ख लोग शास्त्रोंके तात्पर्यसे अवगत नहीं हैं। इसलिये, वे गौरसुन्दरके आश्रित सेवकोंके विशुद्ध सदाचार और योग्यताका दर्शन करके वर्णाश्रमके विषयमें शास्त्रोंके वास्तविक तात्पर्यको समझ सकते हैं। हरिपरायण अप्राकृत-वैष्णवके किसी भी कुलमें जन्म लेने अथवा किसी भी आश्रममें अवस्थित होनेपर भी वे चारों वर्णों और आश्रमोंके प्राकृत लोगोंके प्रति नित्य दया प्रकाश करनेवाले गुरुदेवरूपमें सर्वोच्च सत्य-धर्माचार्य हो सकते हैं-यह बात शास्त्रोंमें भली-भाँति रूपसे उल्लिखित है। भगवान् श्रीगौरहरिने शास्त्रोंके गूढ़ और यथार्थ उद्देश्यको लोगोंमें बिना किसी विवादके प्रचारित करके अपने ऐश्वर्य-स्वभावको प्रकटित किया ॥ 84 ॥ दृष्टान्त- (1) संन्यासी-वेशधारी स्वयं महाप्रभु और ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न श्रीमिश्र-दोनोंके ही द्वारा सेवाभिलाषी- शिष्यके रूपमें गृहस्थ-वेशधारी और अशौक्र (स्वाभाविक) ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत कृष्णकथा-कीर्तनकारी श्रीरायको गुरुके रूपमें वरण करके लोकशिक्षा :- 'भक्ति', 'प्रेम', 'तत्त्व' कहे राये करि' 'वक्ता'। आपनि प्रद्युम्नमिश्र-सह हय 'श्रोता' ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीप्रद्युम्न मिश्रके साथ श्रोता बनकर और श्रीरामानन्द रायको वक्ता बनाकर उनके मुखके माध्यमसे स्वयं भक्ति, प्रेम एवं अन्य-अन्य तत्त्वोंका वर्णन करते हैं ॥ 85 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- (शाङ्कर) संन्यासीगण मानते हैं कि वे संसारमें ब्राह्मणोचित समस्त-कर्म निर्वाह करके वेदान्त-तत्त्वका अनुशीलन करनेके कारण जगत्के 'गुरु' हुए हैं। ब्राह्मणकुलजात पण्डितगण मानते हैं कि (कर्मकाण्डीय) स्मृतिके अनुसार उनके जैसे ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए ब्राह्मण ही सभी वर्णोंके गुरु हैं; अतएव उनके जैसे ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए पण्डितोंके अतिरिक्त परमार्थतत्त्वकी शिक्षा देनेका अन्य किसीको अधिकार नहीं है। इन दोनों गर्वोंमें गर्वित होकर संन्यासी और पण्डित अपनेसे अनन्त गुणा श्रेष्ठ और उच्चतम, शूद्र-कुलमें आविर्भूत शुद्धभक्तोंसे धर्मकी शिक्षा प्राप्त करनेके अनिच्छुक बनकर बहुत बार निम्न मतिवाले हो जाते हैं। वैष्णव धर्ममें यही स्वीकृत है कि जिन्होंने प्राकृत और अप्राकृत तत्त्वके भेदको जानकर अप्राकृत कृष्णभक्तिकी शिक्षा प्राप्त की है, वे ही समस्त जीवोंके उपदेष्टा हैं, -इसमें जन्मगत वर्णादि और संस्कारगत आश्रमादिकी अपेक्षा नहीं है। जगत्-तारण महाप्रभुने इसी तत्त्वकी शिक्षा प्रदान करनेके लिये ही अपने पूर्वाश्रमके सम्बन्धीकी सन्तान प्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्दके पास तत्त्वकी शिक्षाके लिये भेजा था ॥ 85 ॥ (2) यवनकुलमें उत्पन्न ठाकुर-श्रीहरिदासको जगद्गुरु और नामाचार्यकी पदवी-दान; (म्लेच्छोंके साथ वास करनेपर भी)-(3) श्रीसनातन-कृष्णभक्तिसिद्धान्त अथवा सम्बन्धज्ञानके आचार्य और (4) श्रीरूप-व्रजप्रेमभक्तिरस अथवा अभिधेयके आचार्य :- हरिदास-द्वारा नाम-माहात्म्य-प्रकाश। सनातनद्वारा भक्तिसिद्धान्तविलास ॥ 86 ॥ श्रीरूप-द्वारा व्रजेर रस-प्रेम-लीला। के कहिते पारे गम्भीर चैतन्येर खेला ? ? 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यवनकुलमें उत्पन्न श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा नामके माहात्म्यको प्रकाशित किया। उन्होंने यवनोंका सङ्ग करनेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा भक्तिसिद्धान्त-विलासको प्रकाशित किया और श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा व्रजकी रसमयी प्रेम लीलाओंको प्रकाशित करवाया। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़ लीलाओंका कौन वर्णन कर सकता है ? 86-87 ॥