श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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150 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/80-84 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय गृहस्थाश्रममें स्थित होनेपर भी काम-क्रोधादि छह वेगोंके वशीभूत नहीं थे। बाहरी लोगोंकी दृष्टिमें 'विषयी' जैसे दिखलायी देनेपर भी वे संन्यासी तकको उपदेश प्रदान करनेमें समर्थ थे॥80॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्द प्रभु-प्राकृत लोगोंकी दृष्टिमें प्रवृत्ति-मार्गीय गृहस्थ थे। वे संयत-इन्द्रिय ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा भिक्षु (संन्यासी) नहीं थे, ऐसा प्रतीत होता था। प्राकृत-गृहस्थ लोग इन्द्रियोंके वशीभूत होकर गृहव्रत धर्म ग्रहण करते हैं, किन्तु गृहस्थित अप्राकृत-वैष्णव अवैष्णव-गृहस्थोंकी भाँति असंयत इन्द्रियोंवाले नहीं होते, वे छह वेगोंके तनिक भी वशीभूत नहीं होते। गृहस्थाश्रमीकी लीला करते हुए श्रीरामानन्दप्रभु सांसारिक लोगोंकी भोगमयी दृष्टिमें 'विषयी' होनेपर भी अप्राकृत श्रीकृष्णलीला ही उनके शुद्ध-सत्त्व अप्राकृत मनका प्रतिक्षण उपास्य-विषय था। इसलिये वे-कृष्णविषयी थे, भगवान्के चिद्विलासके विरोधी निर्विशेषवादी तार्किक नहीं थे। विषयोंका त्याग करनेवाले निर्गुण संन्यासियोंको भी वे कृष्ण-प्रतीतिरहित जड़विषय त्याग करवाकर कृष्ण-विषयानुशीलनमें प्रवृत्त करवानेमें समर्थ थे॥80॥ श्रीरायके द्वारा कृष्णभक्त अथवा गुरुके माहात्म्यका प्रदर्शन :- एइसब गुण ताँर प्रकाश करिते। मिश्रेरे पाठाइला ताँहा श्रवण करिते॥81॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके इन समस्त गुणोंको प्रकाशित करनेके लिये ही श्रीप्रद्युम्न मिश्रको उनके पास कृष्णकथा श्रवण करनेके लिये भेजा था॥81॥ भक्तगुणोंके कीर्तनकारी भगवान् :- भक्तगुण प्रकाशिते प्रभु भाल जाने। नाना-भङ्गीते प्रकाशि' निज-लाभ माने॥82॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंके गुणोंको भली-भाँति प्रकाशित करना जानते हैं। वे अनेक प्रकारके कौशलके द्वारा अपने भक्तोंकी महिमाको प्रकाशित करके स्वयंको लाभान्वित मानते हैं॥82॥ अनुभाष्य—'भङ्गी',—चित्र, कौशल, उदाहरण॥82॥ जगद्गुरु श्रीगौरकी लोकशिक्षाका रहस्य :- आर एक 'स्वभाव' गौरेर शुन, भक्तगण। गूढ़ ऐश्वर्य-स्वभाव करे प्रकटन॥83॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरका एक और स्वभाव है। हे भक्तों ! इस विषयमें ध्यानपूर्वक श्रवण करो कि वे कैसे अपनी ईश्वरीय-शक्तिको प्रकटित करते हैं, जो अति गूढ़ है॥83॥ अनुभाष्य—'गूढ़',—अन्तर्निहित, अप्रकाशित; ऐश्वर्य- स्वभाव',—ऐशीशक्ति, ऐश्वरिक बल॥83॥ प्राकृत वर्णाश्रम और पाण्डित्यादि-सत्यधर्मके वक्ता होनेका प्रमाण नहीं :- संन्यासी, पण्डितगणे करिते गर्व नाश। नीच-शूद्र-द्वारा करेन धर्मेर प्रकाश॥84॥ अनुवाद—महाप्रभु तथाकथित संन्यासियों और विद्वानोंके गर्वको नष्ट करनेके उद्देश्यसे ही बाहरी रूपसे नीचवर्णमें जन्म ग्रहण करनेवाले अथवा शूद्र वर्णके व्यक्तिके द्वारा धर्मको प्रकाशित करते हैं॥84॥ अनुभाष्य—'पण्डित',—वेदाधिकार-सम्पन्न ब्राह्मण; 'संन्यासी',—ब्राह्मणोंके चार आश्रमोंमें सर्वश्रेष्ठ आश्रम। लौकिक धारणाके अनुसार ब्राह्मणकुलमें जन्में व्यक्तिका ही सावित्र्यमें अधिकार है; सावित्र्य जन्मसे वेदाधिकार होता है और सावित्र्य-ब्राह्मणजन्म प्राप्त करके तीन अन्य आश्रमोंको लाँघ करके संन्यासीकी उन्नत पदवी है। ब्राह्मण-तीनों वर्णोंके गुरु हैं और संन्यासी-तीनों आश्रमोंमें अवस्थित ब्राह्मणोंके गुरु हैं। उनके इस उपाधिके मदसे उत्पन्न प्राकृत गर्वको नष्ट करनेके उद्देश्यसे महाप्रभुने प्राकृत लौकिक-दृष्टिसे सबसे निम्नवर्ण 'शूद्र' और सबसे निम्न आश्रम 'गृहस्थ'के रूपमें परिचित श्रीरामानन्द-रायप्रभुके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में