भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2166

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[ 5/70-80 पाँचवाँ अध्याय 149 अनुवाद—श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा,—“हे प्रभो, आपने मुझे श्रीकृष्णकथामृतके समुद्रमें डुबाकर कृतार्थ कर दिया॥ 70 ॥ श्रीकृष्णकीर्तनकारी गुरुमें मर्त्य-बुद्धिकी निषिद्धता :- रामानन्द-राय-कथा कहिले ना हय। 'मनुष्य' नहे राय, कृष्णभक्तिरसमय॥ 71 ॥ अनुवाद—मैं श्रीरामानन्द रायकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकता। वे कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वे श्रीकृष्णभक्तिरसके साक्षात् विग्रह हैं॥ 71 ॥ गुरुदेव श्रीरामानन्दके मुखसे वक्ता स्वयं महाप्रभु :- आर एक कथा राय कहिला आमारे। 'कृष्णकथा-वक्ता करि' ना जानिह मोरे॥ 72 ॥ मोर मुखे कथा कहेन आपने गौरचन्द्र। यैछे कहाय, तैछे कहि,-येन वीणायन्त्र॥ 73 ॥ योग्यपात्र श्रीरामानन्दके मुखसे महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकथाका प्रचार :- मोर मुखे कथा इँहा करे परचार। पृथिवीते के जानिबे ए-लीला ताँहार??' 74 ॥ अनुवाद—एक और बात श्रीरायने मुझसे कही,—‘मुझे कृष्णकथाका वक्ता मत समझना। मेरे मुखसे स्वयं श्रीगौरचन्द्र कथा बोलते हैं। वे मुझसे जैसा कहलवाते हैं, मैं वीणाकी भाँति वैसा ही कहता हूँ। श्रीगौरचन्द्र मेरे मुखसे कथा कहलवाकर उनका प्रचार करवाते हैं। उनकी इस लीलाको जगत्में कौन जान सकता है?' 72-74 ॥ श्रीरायके मुखसे कही गयी और मेरे द्वारा सुनी गयी श्रीकृष्णकथा ब्रह्माके भी अगोचर :- ये-सब शुनिलुँ, कृष्ण-रसेर सागर। ब्रह्मादि-देवेरे ए सब ना हय गोचर॥ 75 ॥ अनुवाद—जो सब मैंने श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्रवण किया है, उससे यह जाना है कि श्रीकृष्ण रसके सागर हैं। ब्रह्मादि देवताओं तकको यह सब गोचर नहीं होता॥ 75 ॥ महाप्रभुके चरणकमलोंमें श्रीमिश्रका आत्म-निवेदन :- हेन 'रस' पान मोरे कराइला तुमि। जन्मे जन्मे तोमार पाय बिकाइलाङ आमि॥" 76 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके मुखसे आपने मुझे ऐसे अद्भुत रसका पान कराया है कि मैं जन्म-जन्मान्तरके लिये आपके श्रीचरणकमलोंमें बिक गया हूँ॥" 76 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायके आदर्शके अनुसार शुद्धवैष्णवके स्वभावका कीर्तन :- प्रभु कहे,—“रामानन्द विनयेर खनि। आपणार कथा परमुण्डे देन आनि'॥ 77 ॥ साधु-सज्जन, महान पुरुषों अथवा वैष्णवोंका स्वभाव :- महानुभवेर एइमत 'स्वभाव' हय। आपणार गुण नाहि आपने कहय॥" 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रामानन्द राय विनयकी खान हैं। वे अपनी महिमाका श्रेय अन्यको दे देते हैं। महापुरुषोंका यह सहज स्वभाव होता है कि वे स्वयं अपने गुणोंका वर्णन नहीं करते॥” 77-78 ॥ ब्राह्मणकुलमें नहीं उत्पन्न होनेपर भी समस्त ब्राह्मणकुलके गुरु श्रीकृष्णकीर्तनकारी श्रीरायके श्रोता-शिष्य श्रीमिश्र :- रामानन्द-रायेर एइ कहिलुँ गुण-लेश। प्रद्युम्न मिश्रेरे यैछे कैला उपदेश॥ 79 ॥ अनुवाद—मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) श्रीरामानन्द रायके गुणोंके लेशमात्रका वर्णन किया जिनका प्रकाश उनके द्वारा श्रीप्रद्युम्न मिश्रको दिये गये उपदेशोंके माध्यमसे हुआ॥ 79 ॥ श्रीरायके महान गुणोंसे शिक्षणीय विषय-बाह्य-वर्णाश्रम-आचार कृष्णभक्ति अथवा गुरुत्वका उदाहरण नहीं :- 'गृहस्थ' हञा नहे राय षड्वर्गेर वशे। 'विषयी' हञा संन्यासीरे उपदेशे॥ 80 ॥