श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 5/70-80 पाँचवाँ अध्याय 149 अनुवाद—श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा,—“हे प्रभो, आपने मुझे श्रीकृष्णकथामृतके समुद्रमें डुबाकर कृतार्थ कर दिया॥ 70 ॥ श्रीकृष्णकीर्तनकारी गुरुमें मर्त्य-बुद्धिकी निषिद्धता :- रामानन्द-राय-कथा कहिले ना हय। 'मनुष्य' नहे राय, कृष्णभक्तिरसमय॥ 71 ॥ अनुवाद—मैं श्रीरामानन्द रायकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकता। वे कोई साधारण मनुष्य नहीं है, वे श्रीकृष्णभक्तिरसके साक्षात् विग्रह हैं॥ 71 ॥ गुरुदेव श्रीरामानन्दके मुखसे वक्ता स्वयं महाप्रभु :- आर एक कथा राय कहिला आमारे। 'कृष्णकथा-वक्ता करि' ना जानिह मोरे॥ 72 ॥ मोर मुखे कथा कहेन आपने गौरचन्द्र। यैछे कहाय, तैछे कहि,-येन वीणायन्त्र॥ 73 ॥ योग्यपात्र श्रीरामानन्दके मुखसे महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकथाका प्रचार :- मोर मुखे कथा इँहा करे परचार। पृथिवीते के जानिबे ए-लीला ताँहार??' 74 ॥ अनुवाद—एक और बात श्रीरायने मुझसे कही,—‘मुझे कृष्णकथाका वक्ता मत समझना। मेरे मुखसे स्वयं श्रीगौरचन्द्र कथा बोलते हैं। वे मुझसे जैसा कहलवाते हैं, मैं वीणाकी भाँति वैसा ही कहता हूँ। श्रीगौरचन्द्र मेरे मुखसे कथा कहलवाकर उनका प्रचार करवाते हैं। उनकी इस लीलाको जगत्में कौन जान सकता है?' 72-74 ॥ श्रीरायके मुखसे कही गयी और मेरे द्वारा सुनी गयी श्रीकृष्णकथा ब्रह्माके भी अगोचर :- ये-सब शुनिलुँ, कृष्ण-रसेर सागर। ब्रह्मादि-देवेरे ए सब ना हय गोचर॥ 75 ॥ अनुवाद—जो सब मैंने श्रीरामानन्द रायके मुखसे श्रवण किया है, उससे यह जाना है कि श्रीकृष्ण रसके सागर हैं। ब्रह्मादि देवताओं तकको यह सब गोचर नहीं होता॥ 75 ॥ महाप्रभुके चरणकमलोंमें श्रीमिश्रका आत्म-निवेदन :- हेन 'रस' पान मोरे कराइला तुमि। जन्मे जन्मे तोमार पाय बिकाइलाङ आमि॥" 76 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायके मुखसे आपने मुझे ऐसे अद्भुत रसका पान कराया है कि मैं जन्म-जन्मान्तरके लिये आपके श्रीचरणकमलोंमें बिक गया हूँ॥" 76 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरायके आदर्शके अनुसार शुद्धवैष्णवके स्वभावका कीर्तन :- प्रभु कहे,—“रामानन्द विनयेर खनि। आपणार कथा परमुण्डे देन आनि'॥ 77 ॥ साधु-सज्जन, महान पुरुषों अथवा वैष्णवोंका स्वभाव :- महानुभवेर एइमत 'स्वभाव' हय। आपणार गुण नाहि आपने कहय॥" 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रामानन्द राय विनयकी खान हैं। वे अपनी महिमाका श्रेय अन्यको दे देते हैं। महापुरुषोंका यह सहज स्वभाव होता है कि वे स्वयं अपने गुणोंका वर्णन नहीं करते॥” 77-78 ॥ ब्राह्मणकुलमें नहीं उत्पन्न होनेपर भी समस्त ब्राह्मणकुलके गुरु श्रीकृष्णकीर्तनकारी श्रीरायके श्रोता-शिष्य श्रीमिश्र :- रामानन्द-रायेर एइ कहिलुँ गुण-लेश। प्रद्युम्न मिश्रेरे यैछे कैला उपदेश॥ 79 ॥ अनुवाद—मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने) श्रीरामानन्द रायके गुणोंके लेशमात्रका वर्णन किया जिनका प्रकाश उनके द्वारा श्रीप्रद्युम्न मिश्रको दिये गये उपदेशोंके माध्यमसे हुआ॥ 79 ॥ श्रीरायके महान गुणोंसे शिक्षणीय विषय-बाह्य-वर्णाश्रम-आचार कृष्णभक्ति अथवा गुरुत्वका उदाहरण नहीं :- 'गृहस्थ' हञा नहे राय षड्वर्गेर वशे। 'विषयी' हञा संन्यासीरे उपदेशे॥ 80 ॥
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150 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/80-84 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय गृहस्थाश्रममें स्थित होनेपर भी काम-क्रोधादि छह वेगोंके वशीभूत नहीं थे। बाहरी लोगोंकी दृष्टिमें 'विषयी' जैसे दिखलायी देनेपर भी वे संन्यासी तकको उपदेश प्रदान करनेमें समर्थ थे॥80॥ अनुभाष्य—श्रीरामानन्द प्रभु-प्राकृत लोगोंकी दृष्टिमें प्रवृत्ति-मार्गीय गृहस्थ थे। वे संयत-इन्द्रिय ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा भिक्षु (संन्यासी) नहीं थे, ऐसा प्रतीत होता था। प्राकृत-गृहस्थ लोग इन्द्रियोंके वशीभूत होकर गृहव्रत धर्म ग्रहण करते हैं, किन्तु गृहस्थित अप्राकृत-वैष्णव अवैष्णव-गृहस्थोंकी भाँति असंयत इन्द्रियोंवाले नहीं होते, वे छह वेगोंके तनिक भी वशीभूत नहीं होते। गृहस्थाश्रमीकी लीला करते हुए श्रीरामानन्दप्रभु सांसारिक लोगोंकी भोगमयी दृष्टिमें 'विषयी' होनेपर भी अप्राकृत श्रीकृष्णलीला ही उनके शुद्ध-सत्त्व अप्राकृत मनका प्रतिक्षण उपास्य-विषय था। इसलिये वे-कृष्णविषयी थे, भगवान्के चिद्विलासके विरोधी निर्विशेषवादी तार्किक नहीं थे। विषयोंका त्याग करनेवाले निर्गुण संन्यासियोंको भी वे कृष्ण-प्रतीतिरहित जड़विषय त्याग करवाकर कृष्ण-विषयानुशीलनमें प्रवृत्त करवानेमें समर्थ थे॥80॥ श्रीरायके द्वारा कृष्णभक्त अथवा गुरुके माहात्म्यका प्रदर्शन :- एइसब गुण ताँर प्रकाश करिते। मिश्रेरे पाठाइला ताँहा श्रवण करिते॥81॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीरामानन्द रायके इन समस्त गुणोंको प्रकाशित करनेके लिये ही श्रीप्रद्युम्न मिश्रको उनके पास कृष्णकथा श्रवण करनेके लिये भेजा था॥81॥ भक्तगुणोंके कीर्तनकारी भगवान् :- भक्तगुण प्रकाशिते प्रभु भाल जाने। नाना-भङ्गीते प्रकाशि' निज-लाभ माने॥82॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंके गुणोंको भली-भाँति प्रकाशित करना जानते हैं। वे अनेक प्रकारके कौशलके द्वारा अपने भक्तोंकी महिमाको प्रकाशित करके स्वयंको लाभान्वित मानते हैं॥82॥ अनुभाष्य—'भङ्गी',—चित्र, कौशल, उदाहरण॥82॥ जगद्गुरु श्रीगौरकी लोकशिक्षाका रहस्य :- आर एक 'स्वभाव' गौरेर शुन, भक्तगण। गूढ़ ऐश्वर्य-स्वभाव करे प्रकटन॥83॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरका एक और स्वभाव है। हे भक्तों ! इस विषयमें ध्यानपूर्वक श्रवण करो कि वे कैसे अपनी ईश्वरीय-शक्तिको प्रकटित करते हैं, जो अति गूढ़ है॥83॥ अनुभाष्य—'गूढ़',—अन्तर्निहित, अप्रकाशित; ऐश्वर्य- स्वभाव',—ऐशीशक्ति, ऐश्वरिक बल॥83॥ प्राकृत वर्णाश्रम और पाण्डित्यादि-सत्यधर्मके वक्ता होनेका प्रमाण नहीं :- संन्यासी, पण्डितगणे करिते गर्व नाश। नीच-शूद्र-द्वारा करेन धर्मेर प्रकाश॥84॥ अनुवाद—महाप्रभु तथाकथित संन्यासियों और विद्वानोंके गर्वको नष्ट करनेके उद्देश्यसे ही बाहरी रूपसे नीचवर्णमें जन्म ग्रहण करनेवाले अथवा शूद्र वर्णके व्यक्तिके द्वारा धर्मको प्रकाशित करते हैं॥84॥ अनुभाष्य—'पण्डित',—वेदाधिकार-सम्पन्न ब्राह्मण; 'संन्यासी',—ब्राह्मणोंके चार आश्रमोंमें सर्वश्रेष्ठ आश्रम। लौकिक धारणाके अनुसार ब्राह्मणकुलमें जन्में व्यक्तिका ही सावित्र्यमें अधिकार है; सावित्र्य जन्मसे वेदाधिकार होता है और सावित्र्य-ब्राह्मणजन्म प्राप्त करके तीन अन्य आश्रमोंको लाँघ करके संन्यासीकी उन्नत पदवी है। ब्राह्मण-तीनों वर्णोंके गुरु हैं और संन्यासी-तीनों आश्रमोंमें अवस्थित ब्राह्मणोंके गुरु हैं। उनके इस उपाधिके मदसे उत्पन्न प्राकृत गर्वको नष्ट करनेके उद्देश्यसे महाप्रभुने प्राकृत लौकिक-दृष्टिसे सबसे निम्नवर्ण 'शूद्र' और सबसे निम्न आश्रम 'गृहस्थ'के रूपमें परिचित श्रीरामानन्द-रायप्रभुके द्वारा ब्राह्मणकुलमें जन्में
[ 5/84-87 पाँचवाँ अध्याय 151 प्रद्युम्नमिश्रको उपदेश प्रदान करवाया। यहाँ तक कि संन्यास ग्रहण करनेवाले स्वयं महाप्रभुने भी श्रीरामानन्दके द्वारा प्रचारित धर्मको अङ्गीकार किया। श्रीगौरहरिने आश्रमके सम्बन्धमें शास्त्रोंके सार सिद्धान्तको लोगोंमें प्रकट करनेके उद्देश्यसे प्राकृत-पण्डिताभिमानी और त्यागाभिमानी गणोंकी भ्रमपूर्ण धारणाके प्रतिकूलमें अपने स्वाभाविक ऐश्वर्य प्रभावका विस्तार किया था। साधारण मूर्ख लोग शास्त्रोंके तात्पर्यसे अवगत नहीं हैं। इसलिये, वे गौरसुन्दरके आश्रित सेवकोंके विशुद्ध सदाचार और योग्यताका दर्शन करके वर्णाश्रमके विषयमें शास्त्रोंके वास्तविक तात्पर्यको समझ सकते हैं। हरिपरायण अप्राकृत-वैष्णवके किसी भी कुलमें जन्म लेने अथवा किसी भी आश्रममें अवस्थित होनेपर भी वे चारों वर्णों और आश्रमोंके प्राकृत लोगोंके प्रति नित्य दया प्रकाश करनेवाले गुरुदेवरूपमें सर्वोच्च सत्य-धर्माचार्य हो सकते हैं-यह बात शास्त्रोंमें भली-भाँति रूपसे उल्लिखित है। भगवान् श्रीगौरहरिने शास्त्रोंके गूढ़ और यथार्थ उद्देश्यको लोगोंमें बिना किसी विवादके प्रचारित करके अपने ऐश्वर्य-स्वभावको प्रकटित किया ॥ 84 ॥ दृष्टान्त- (1) संन्यासी-वेशधारी स्वयं महाप्रभु और ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न श्रीमिश्र-दोनोंके ही द्वारा सेवाभिलाषी- शिष्यके रूपमें गृहस्थ-वेशधारी और अशौक्र (स्वाभाविक) ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत कृष्णकथा-कीर्तनकारी श्रीरायको गुरुके रूपमें वरण करके लोकशिक्षा :- 'भक्ति', 'प्रेम', 'तत्त्व' कहे राये करि' 'वक्ता'। आपनि प्रद्युम्नमिश्र-सह हय 'श्रोता' ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीप्रद्युम्न मिश्रके साथ श्रोता बनकर और श्रीरामानन्द रायको वक्ता बनाकर उनके मुखके माध्यमसे स्वयं भक्ति, प्रेम एवं अन्य-अन्य तत्त्वोंका वर्णन करते हैं ॥ 85 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- (शाङ्कर) संन्यासीगण मानते हैं कि वे संसारमें ब्राह्मणोचित समस्त-कर्म निर्वाह करके वेदान्त-तत्त्वका अनुशीलन करनेके कारण जगत्के 'गुरु' हुए हैं। ब्राह्मणकुलजात पण्डितगण मानते हैं कि (कर्मकाण्डीय) स्मृतिके अनुसार उनके जैसे ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए ब्राह्मण ही सभी वर्णोंके गुरु हैं; अतएव उनके जैसे ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए पण्डितोंके अतिरिक्त परमार्थतत्त्वकी शिक्षा देनेका अन्य किसीको अधिकार नहीं है। इन दोनों गर्वोंमें गर्वित होकर संन्यासी और पण्डित अपनेसे अनन्त गुणा श्रेष्ठ और उच्चतम, शूद्र-कुलमें आविर्भूत शुद्धभक्तोंसे धर्मकी शिक्षा प्राप्त करनेके अनिच्छुक बनकर बहुत बार निम्न मतिवाले हो जाते हैं। वैष्णव धर्ममें यही स्वीकृत है कि जिन्होंने प्राकृत और अप्राकृत तत्त्वके भेदको जानकर अप्राकृत कृष्णभक्तिकी शिक्षा प्राप्त की है, वे ही समस्त जीवोंके उपदेष्टा हैं, -इसमें जन्मगत वर्णादि और संस्कारगत आश्रमादिकी अपेक्षा नहीं है। जगत्-तारण महाप्रभुने इसी तत्त्वकी शिक्षा प्रदान करनेके लिये ही अपने पूर्वाश्रमके सम्बन्धीकी सन्तान प्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्दके पास तत्त्वकी शिक्षाके लिये भेजा था ॥ 85 ॥ (2) यवनकुलमें उत्पन्न ठाकुर-श्रीहरिदासको जगद्गुरु और नामाचार्यकी पदवी-दान; (म्लेच्छोंके साथ वास करनेपर भी)-(3) श्रीसनातन-कृष्णभक्तिसिद्धान्त अथवा सम्बन्धज्ञानके आचार्य और (4) श्रीरूप-व्रजप्रेमभक्तिरस अथवा अभिधेयके आचार्य :- हरिदास-द्वारा नाम-माहात्म्य-प्रकाश। सनातनद्वारा भक्तिसिद्धान्तविलास ॥ 86 ॥ श्रीरूप-द्वारा व्रजेर रस-प्रेम-लीला। के कहिते पारे गम्भीर चैतन्येर खेला ? ? 87 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने यवनकुलमें उत्पन्न श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा नामके माहात्म्यको प्रकाशित किया। उन्होंने यवनोंका सङ्ग करनेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा भक्तिसिद्धान्त-विलासको प्रकाशित किया और श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा व्रजकी रसमयी प्रेम लीलाओंको प्रकाशित करवाया। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी गूढ़ लीलाओंका कौन वर्णन कर सकता है ? 86-87 ॥
152 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/88–96 ] श्रीचैतन्यलीलासिन्धुकी बिन्दुप्तिसे ही जगत्का उद्धार :- श्रीचैतन्यलीला एइ-अमृतेर सिन्धु। जगत् भासाइते पारे यार एक बिन्दु॥ ८८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला अमृतके सिन्धुकी भाँति है, उसकी एक बूँद जगत्को प्रेममें निमग्न कर सकती है॥ ८८॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यलीलामृतरूपी सिन्धुकी एक बूँद ही जगत्को प्रेममें आप्लावित करनेमें समर्थ है। श्रीदास-गोस्वामी, परवर्ती कालमें श्रीठाकुर नरोत्तम, श्रील श्यामानन्द प्रभु आदि भी श्रीमन्महाप्रभुकी वैसी उदारताके विकास-स्वरूप हैं॥ ८८॥ श्रद्धासे श्रीचैतन्यलीलामृतके पानके फलसे चिद्वृत्तिके उदित होनेपर सम्बन्धज्ञान, अभिधेय और प्रयोजनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरितामृत नित्य कर पान। याहा हैते 'प्रेमानन्द', 'भक्तितत्त्व-ज्ञान'॥ ८९॥ अनुवाद-हे भक्तों! श्रीचैतन्यचरितामृतका प्रतिदिन पान करो, जिससे आपको प्रेमानन्दकी प्राप्ति और भक्तितत्त्वका ज्ञान प्राप्त होगा॥ ८९॥ महाप्रभुकी ऐसी नीलाचल-लीला :- एइमत महाप्रभु भक्तगण लञा। नीलाचले विहरये भक्ति प्रचारिया॥ ९०॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंको लेकर भक्तिका प्रचार करते हुए नीलाचलमें विहार किया॥ ९०॥ पूर्वबङ्गालवासी ब्राह्मणवेशी प्राकृत-कविका वृत्तान्त :- बङ्गदेशी एक विप्र प्रभुर चरिते। नाटक करि' लञा आइला शुनाइते॥ ९१॥ अनुवाद-बङ्गालके एक ब्राह्मणने महाप्रभुके चरित्रपर आधारित एक नाटककी रचना की और उसे महाप्रभुको सुनानेके लिये नीलाचलमें लेकर आया॥ ९१॥ भगवान्-आचार्य-सने तार परिचय। ताँरे मिलि' ताँर घरे करिल आलय॥ ९२॥ अनुवाद-उसका श्रीभगवान् आचार्यके साथ पहलेसे परिचय था, इसलिये वह उनसे मिला और उनके घरपर ही रहने लगा॥ ९२॥ प्रथमे नाटक तैं हो ताँरे शुनाइल। ताँर सङ्गे अनेक वैष्णव नाटक शुनिल॥ ९३॥ अनुवाद-उसने सबसे पहले अपने नाटकको श्रीभगवान् आचार्यको सुनाया। फिर श्रीभगवान् आचार्यके साथ बैठकर अनेक वैष्णवोंने उस नाटकको सुना॥ ९३॥ सबेइ प्रशंसे नाटक 'परम उत्तम'। महाप्रभुरे शुनाइते सबार हैल मन॥ ९४॥ अनुवाद-सभी वैष्णवोंने 'परम उत्तम' कहकर उस नाटककी प्रशंसा की। सभीके मनमें उस नाटकको महाप्रभुको श्रवण करानेकी इच्छा हुई॥ ९४॥ श्रीस्वरूपदामोदरके द्वारा परीक्षा लेनेका नियम :- गीत, श्लोक, ग्रन्थ, कवित्व, -येइ करि' आने। प्रथमे शुनाय सेइ स्वरूपेर स्थाने॥ ९५॥ अनुवाद-जो कोई भी व्यक्ति गीत, श्लोक, ग्रन्थ अथवा कवितादिकी रचना करके लाता, तो पहले उसे श्रीस्वरूप दामोदरको सुनाना होता॥ ९५॥ श्रीस्वरूपके अनुमोदन अथवा परीक्षामें उत्तीर्ण होनेके बाद ही महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- स्वरूप-ठाञि उत्तरे यदि, लय ताँर मन। तबे महाप्रभु-ठाञि कराय श्रवण॥ ९६॥ अनुवाद-यदि वह रचना श्रीस्वरूप दामोदरको सन्तुष्ट करके उनकी परीक्षामें उत्तीर्ण हो जाती, तभी वह महाप्रभुको श्रवण करायी जाती थी॥ ९६॥
[ 5/97-101 पाँचवाँ अध्याय 153 भक्तिसिद्धान्त-वाणीका विरोध ही महावदान्य महाप्रभुके क्रोधका एकमात्र कारण :- 'रसाभास' हय यदि 'सिद्धान्तविरोध' । सहिते ना पारे प्रभु, मने हय क्रोध ॥ 97 ॥ अनुवाद—यदि किसी रचनामें रसाभास-दोष अथवा भक्तिसिद्धान्तोंका विरोध होता, तब महाप्रभु उसे सुनकर सहन नहीं कर पाते, उनको क्रोध आ जाता ॥ 97 ॥ अनुभाष्य—रसाभास,—(भःरःसिः उःविः 9म लः)— “पूर्वमेवानुशिष्टेन विकला रसलक्षणाः । रसा एव रसाभासा रसज्ञैरनुकीर्त्तिताः ॥ स्युस्त्रिधोपरसाश्चानुरसाश्चापरसाश्च ते । उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चेत्यमी क्रमात् ॥ प्राप्तैः स्थायिविभावानुभावाद्यैस्तु विरूपताम् । शान्तादयो रसा एव द्वादशोपरसा मताः ॥ भक्तादिभिर्विभावाद्यैः कृष्णसम्बन्धवर्जितैः । रसा हास्यादयः सप्त शान्तश्चानुरसा मताः ॥ कृष्ण-तत्प्रतिपक्षश्रेद्विषयाश्रयतां गताः। हासादीनां तदा तेऽत्र प्राज्ञैरपरसा मताः ॥ भावाः सर्वे तदाभासा रसाभासाश्च केचन । अमी प्रोक्ता रसाभिज्ञैः सर्वेऽपि रसनाद्रसाः ॥” आपात रस प्रतीत होनेपर भी जो पूर्वकथित रसके लक्षणोंके द्वारा अङ्गहीन होता है, रसिकगण उसे 'रसाभास' कहते हैं। 'उपरस', 'अनुरस' और 'अपरस'के भेदसे रसाभास भी 'उत्तम', 'मध्यम' और 'कनिष्ठ'के रूपमें कथित होता है। विरूपताको प्राप्त स्थायी-भाव, विभाव और अनुभाव आदिके द्वारा उपलक्षित शान्तादि बारह रस 'उपरस'के नामसे कहे गये हैं; श्रीकृष्णसे सम्बन्धहीन भक्तादि विभावसमूहके द्वारा उत्पन्न हास्यादि सात रस और रुक्ष शान्तरस ही 'अनुरस' कहलाते हैं; परस्पर विरुद्धभावयुक्त होकर श्रीकृष्ण और उनके विरोधी असुर यदि हास्यादि रसके क्रमशः विषय और आश्रय होते हैं, तब रसतत्त्व-ज्ञाता पण्डित उसे 'अपरस' कहते हैं। सभी भावोंको कोई कोई 'तदाभास' अथवा 'रसाभास' कहते हैं; रसतत्त्व अभिज्ञ व्यक्ति स्वादिष्ट अथवा आनन्द प्रदान करनेवाले होनेके कारण ही इन सभीको 'रस' कहते हैं। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्त्तीपाद कहते हैं,—“परस्पर-वैरयोर्यदि योगस्तदा रसाभासः” अर्थात् दो प्रकारके विरोधी रसोंके योग होनेपर 'रसाभास' होता है। 'सिद्धान्तविरोध',—भक्तिमार्गीय सिद्धान्तके साथ विरोध, तत्त्वविरोध ॥ 97 ॥ अतएव प्रभु किछु आगे नाहि सुने । एइ मर्यादा प्रभु करियाछे नियमे ॥ 98 ॥ अनुवाद—अतएव महाप्रभु किसीकी भी रचनाको श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा पहले सुने बिना स्वयं नहीं सुनते थे। महाप्रभुने इस मर्यादाके पालनका नियम बनाकर रखा था ॥ 98 ॥ श्रीस्वरूपसे श्रीभगवान्-आचार्यका प्राकृत कविके काव्यकी प्रशंसा करते हुए निवेदन :- स्वरूपेर ठाञि आचार्य कैला निवेदन। “एक कवि प्रभुर नाटक करियाछे उत्तम ॥ 99 ॥ आदौ तुमि शुन, यदि तोमार मन माने। पाछे महाप्रभुरे तब कराइमु श्रवणे ॥” 100 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप दामोदरसे निवेदन करते हुए कहा,—“एक कविने महाप्रभुके चरित्रपर आधारित एक उत्तम नाटककी रचना की है। पहले आप उसका श्रवण कीजिये और यदि वह आपके द्वारा स्वीकृत होगा, तभी बादमें महाप्रभुको उसका श्रवण कराऊँगा ॥” 99-100 ॥ श्रीकृष्णतत्त्वको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ अन्तर्यामी श्रीस्वरूपके द्वारा भगवान्-आचार्यकी भर्त्सना :- स्वरूप कहे,—“तुमि 'गोप' परम-उदार। ये-से शास्त्र शुनिते इच्छा उपजे तोमार ॥ 101 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“तुम गोप होनेके कारण परम उदार हो। इसलिये तुममें जिस-किसी भी शास्त्रको सुननेकी इच्छा उदित हो जाती है ॥ 101 ॥
154 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/102-110 ] श्रीगौरकृष्णकी अप्रीतिके एकमात्र कारणका निर्देश :- 'यद्वा-तद्वा' कविर वाक्ये हय 'रसाभास'। सिद्धान्तविरुद्ध शुनिते ना हय उल्लास ॥ 102 ॥ अनुवाद—जैसे-तैसे कवियोंकी कवितामें 'रसाभास' दोष होता है। सिद्धान्तविरुद्ध वाक्य सुननेसे हृदयमें उल्लास नहीं होता ॥ 102 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'यद्वा तद्वा कवि',—जैसे-तैसे कवि अर्थात् जो रसतत्त्व और वैष्णवसिद्धान्त-तत्त्वको भली-भाँति नहीं जानकर कविताकी रचना करते हैं॥ 102 ॥ 'रस', 'रसाभास' यार नाहिक विचार। भक्तिसिद्धान्त-सिन्धु नाहि पाय पार ॥ 103 ॥ अनुवाद—जैसा-तैसा कवि जिसे 'रस' और 'रसाभास' आदिका ज्ञान नहीं है, वह भक्तिसिद्धान्तरूपी सिन्धुका पार नहीं पा सकता ॥ 103 ॥ 'व्याकरण' नाहि जाने, ना जाने 'अलङ्कार'। 'नाटकालङ्कार'-ज्ञान नाहिक याहार ॥ 104 ॥ कृष्णलीला वर्णिते ना जाने सेइ छार ! विशेषे दुर्गम एइ चैतन्य-विहार ॥ 105 ॥ अनुवाद—जो कवि 'व्याकरण' नहीं जानता और 'अलङ्कार'के विषयमें नहीं जानता एवं जिसे नाटकके प्रयुक्त अलङ्कार आदिका भी कोई ज्ञान नहीं है तथा श्रीकृष्णलीलाका किस प्रकारसे वर्णन करना चाहिये, इसे नहीं जानता, वह निन्दनीय है! विशेषरूपसे श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीला तो अति दुर्गम है॥ 104-105 ॥ श्रीगौरगतप्राण कृष्णभक्तका ही गौरलीला-वर्णनमें अधिकार :- कृष्णलीला, गौरलीला से करे वर्णन। गौर-पादपद्म याँर हय प्राण-धन ॥ 106 ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिके चरणकमल जिनके प्राणधन हैं, वे ही श्रीकृष्णलीला और श्रीगौरलीलाका वर्णन कर सकते हैं॥ 106 ॥ कृष्णसुखतात्पर्य्यरहित प्राकृत-कविका बहिरङ्ग होना, कृष्णसुखतत्पर अप्राकृत कविका अन्तरङ्ग होना :- ग्राम्य-कविर कवित्व शुनिते हय 'दुःख'। विदग्ध-आत्मीय-वाक्य शुनिते हय 'सुख' ॥ 107 ॥ अनुवाद—ग्राम्य कवियोंकी कविताएँ सुननेसे दुःख होता है, जबकि विदग्ध-आत्मीय व्यक्तियोंके द्वारा रचित वाक्योंको सुननेसे सुख होता है॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ग्राम्य-कवि',—जो सब कवि ग्राम्य (सांसारिक) स्त्री-पुरुषोंके विषयमें कविताकी रचना करते हैं। विदग्ध-आत्मीय-वाक्य',—तत्त्वज्ञान-चतुर शुद्धभक्त-सम्प्रदायमें प्रविष्ट आत्मीय (अर्थात् सजातीयाशयस्निग्ध) व्यक्तिकी रचना॥ 107 ॥ अप्राकृत कविशिरोमणि श्रीरूपका उदाहरण :- रूप यैछे दुइ नाटक करियाछे आरम्भे। शुनिते आनन्द बाड़े यार मुखबन्धे॥ ”108 ॥ अनुवाद—जैसे रूपने दो नाटकोंको लिखना आरम्भ किया उसकी भूमिकाको भी सुनते ही आनन्द वर्धित होता है॥ ”108 ॥ तथापि भगवान्-आचार्यका अनुरोध :- भगवान्-आचार्य कहे,—“शुन एकबार। तुमि शुनिले भाल-मन्द जानिबे विचार॥ ”109 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरके यह सब बतलानेपर भी श्रीभगवान्-आचार्यने प्रार्थना की,—“आप उसे एकबार तो सुन लीजिये। उसे सुननेपर आप विचार कर सकते हैं कि वह अच्छा है या बुरा॥ ”109 ॥ बन्धु आचार्यके अनुरोधके कारण श्रीस्वरूपकी श्रवणकी इच्छा :- दुइ-तिन-दिन आचार्य आग्रह करिल। ताँर आग्रहे स्वरूपेर शुनिते इच्छा हैल ॥ 110 ॥
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[ 5/110-115 पाँचवाँ अध्याय 155 अनुवाद—श्रीभगवान्-आचार्य इस प्रकार दो-तीन दिन तक श्रीस्वरूप दामोदरसे आग्रह करते रहे। उनके पुनः पुनः आग्रह करनेपर श्रीस्वरूप दामोदरके मनमें उसे सुननेकी इच्छा हो गयी ॥ 110 ॥ श्रीस्वरूपके निकट कविके द्वारा नान्दी-श्लोकका पाठ :- सबा लञा स्वरूप गोसाञि शुनिते बसिला। तबे सेइ कवि नान्दी-श्लोक पड़िला ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी अन्य भक्तोंको साथमें लेकर सुननेके लिये बैठ गये। तब उस कविने नान्दी-श्लोकका पाठ किया ॥ 111 ॥ नान्दी श्लोक :- बङ्गदेशके ब्राह्मणके द्वारा रचित श्लोक- विकचकमलनेत्रे श्रीजगन्नाथसंज्ञे कनकरुचिरिहात्मन्यात्मतां यः प्रपन्नः। प्रकृतिजडमशेषं चेतयन्नाविरासीत् स दिशतु तव भव्यं कृष्णचैतन्यदेवः ॥ 112 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 112 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो स्वर्णकान्तिको स्वयंमें न्यस्त अथवा विस्तृत करके विकसित कमलनेत्र-स्वरूप श्रीजगन्नाथमें आत्मताको प्राप्त हुए हैं और जो जड़-प्रकृति (काष्ठ) को पूर्ण चेतना प्रदान करके आविर्भूत हुए हैं, वे श्रीकृष्णचैतन्यदेव तुम्हारा मङ्गल विधान करें ॥ 112 ॥ अनुभाष्य- कनकरुचिः (कनकस्य स्वर्णस्य इव रुचिः कान्तिः यस्य सः) यः (गौरः) इह (अस्मिन् पुरुषोत्तम-क्षेत्रे) विकचकमलनेत्रे (विकचे प्रफुल्ले कमले इव नेत्रे यस्य तस्मिन्) श्रीजगन्नाथसंज्ञे (श्रीजगन्नाथः इति संज्ञा नामधेयं यस्य तस्मिन्) आत्मनि (शरीरे) आत्मतां (देहित्वं) प्रपन्नः (प्राप्तः सन्) प्रकृतिजडं (प्रकृत्या जड़ं श्रीजगन्नाथविग्रहम् अर्च्ये दारुधीत्वात्) अशेषं चेतयन् आविरासीत् (प्रकटो बभूव), सः (श्रीकृष्णचैतन्यदेवः) तव भव्यं (कल्याणं) दिशतु (विदधातु)। [सरस्वती-पक्षे तु,-यः श्रीकृष्णः श्रीजगन्नाथ-संज्ञे मायाधीशे दारुब्रह्मणि षडैश्वर्यपूर्णे परमात्मनि कनकरुचिना गौररूपेण आत्मतां सर्वथा तदभेदतां जगन्नाथरूपतां प्रपन्नः, सः इत्यादिकं स्पष्टम्]। श्लोक-भावानुवाद-स्वर्णकी कान्तिवाले श्रीगौरसुन्दर इस पुरुषोत्तम क्षेत्रमें प्रफुल्लित कमलनेत्र-स्वरूप श्रीजगन्नाथकी देहमें देही रूपको प्राप्त हुए हैं और काष्ठके श्रीजगन्नाथ अर्चा-विग्रहको पूर्ण चेतना प्रदान करके प्रकट हुए हैं, वे श्रीकृष्णचैतन्यदेव तुम्हारा मङ्गल विधान करें। [सरस्वती-पक्षमें-जो श्रीकृष्ण श्रीजगन्नाथदेवके 'आत्म-स्वरूप' हैं, उन्होंने नीलाचलमें दारु-ब्रह्म स्थावर-स्वरूप धारण किया है। वे ही षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण स्वर्णकान्तियुक्त होकर जङ्गम श्रीगौरसुन्दर रूपमें अवतरित हुए हैं। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव और श्रीकृष्ण (श्रीगौरसुन्दर) में एकताकी प्राप्ति होती है-यह स्पष्ट है] ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूपके अतिरिक्त अन्य सभीके द्वारा प्रशंसा :- श्लोक शुनि' सर्वलोक ताहारे बाखाने। स्वरूप कहे,–“एइ श्लोक करह व्याख्याने ॥” 113 ॥ अनुवाद—कविके मुखसे नान्दी-श्लोक सुनकर सभी लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। किन्तु श्रीस्वरूप दामोदरने उस कविसे कहा,–"इस श्लोककी व्याख्या तो करो ॥” 113 ॥ मूर्ख-कविका शुद्धभक्ति-सिद्धान्तविरुद्ध मायावाद-दोष :- कवि कहे,–“जगन्नाथ-सुन्दर-शरीर । चैतन्य-गोसाञि-शरीरी महाधीर ॥ 114 ॥ अनुवाद—कविने कहा,—"श्रीजगन्नाथदेवका शरीर अति सुन्दर है और श्रीचैतन्य गोसाई जो महाधीर हैं, वे शरीरी हैं ॥ 114 ॥ अनुभाष्य- 'शरीरी', - जिनका शरीर है वे अर्थात् देही ॥ 114 ॥ सहज जड़जगतेर चेतन कराइते। नीलाचले महाप्रभु हैला आविर्भूते ॥” 115 ॥ अनुवाद—सहज ही इस जड़-जगत्को चेतन बनानेके लिये महाप्रभु नीलाचलमें आविर्भूत हुए हैं॥” 115 ॥
156 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/116-120 ] सभीके प्रसन्न होनेपर भी जगद्गुरु वैष्णवाचार्य श्रीस्वरूपका क्रोध और शास्त्र-सिद्धान्तरूपी तलवारके द्वारा कुमतका खण्डनरूपी दया :- शुनिया सबार हैल आनन्दित मन। दुःख पाञा स्वरूप कहे सक्रोध वचन ॥ 116 ॥ क्रोधके कारणका निर्देश- (1) विष्णुमें जीवबुद्धि-नरकगामी :- “आरे मूर्ख, आपनार कैलि सर्वनाश ! दुइ त' ईश्वरे तोर नाहिक विश्वास ! ! 117 ॥ पूर्णानन्द-चित्स्वरूप जगन्नाथ-राय। ताँरे कैलि जड़-नश्वर-प्राकृत-काय ! ! 118 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सभीके मनमें आनन्द हुआ। किन्तु श्रीस्वरूप दामोदर उसे सुनकर दुःखी हुए और क्रोधित होकर कहा, -“अरे मूर्ख! तुमने अपना सर्वनाश कर लिया है! दोनों ईश्वरोंके प्रति ही तुम्हारा विश्वास नहीं है। भगवान् श्रीजगन्नाथ-राय पूर्णानन्द चित् स्वरूप हैं और तुमने उन्हें जड़ीय-नश्वर-प्राकृत शरीरवाला कहकर वर्णन किया है! 116-118 ॥ अनुभाष्य-श्रीजगन्नाथ-विग्रहको काष्ठकी प्रतिमा जानकर विनाशशील और प्राकृत द्रव्योंसे गठित जड़ीय-वस्तुमात्र माननेसे “अर्च्ये विष्णौ शिलाधीः ×× यस्य वा नारकी सः॥” इस पद्मपुराणके वचनानुसार वैसे माननेवालेका अपराध होता है। इसलिये भगवद्भक्त सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्णसे सम्पूर्णतः अभिन्न उनके अर्चा-विग्रहको प्रेमानन्दसे रञ्जित भक्तिमय नेत्रोंके द्वारा साक्षात् पूर्ण सच्चिदानन्द- विग्रहस्वरूपमें दर्शन करते हैं॥ 118 ॥ पूर्ण-षडैश्वर्य चैतन्य-स्वयं भगवान्। ताँरे कैलि क्षुद्र जीव स्फुलिङ्ग-समान ! ! 119 ॥ अनुवाद-षडैश्वर्यपूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं भगवान् हैं और तुमने उनकी अग्निकी चिङ्गारीके समान क्षुद्र जीव कहकर व्याख्या की !119 ॥ अनुभाष्य-“यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गा व्युचरन्ति"-इस श्रुति वचनसे जाना जाता है कि जीव बृहत् विष्णुरूप अग्निकी चिङ्गारीके समान अर्थात् चित्कण हैं। मायावश जीवकी जड़ीय शरीरमें बन्धनकी योग्यता रहनेपर भी सच्चिदानन्दविग्रह समस्त कारणोंके कारण परमेश्वर श्रीचैतन्यदेवने नर-शरीर धारण किया है, ऐसा कहनेसे क्या वे जड़के अधीन क्षुद्र जीव हैं, -ऐसा नहीं है; वे मायाधीश षडैश्वर्यपूर्ण स्वयं भगवान् यशोदानन्दन हैं; (भाः 1/11/38)- “एतदीशनामीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥” [अर्थात् “ईश्वरकी ईश्वरता यह है कि प्रकृतिस्थ अर्थात् प्राकृत जगत्में प्रवेश करके भी वे प्राकृत गुणोंके द्वारा युक्त नहीं होते। वे स्वयं अपने स्वरूपमें सर्वदा अवस्थित रहते हैं। उनके आश्रित जीवोंकी बुद्धि भी उसी प्रकारकी होती है।”]॥ 119 ॥ जड़ज्ञानी तर्कपन्थी भक्तिसिद्धान्तके विषयमें अनभिज्ञ व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण-वर्णनकी चेष्टा-दुःसाहसिकता :- दुइ-ठाञि अपराधे पाइबि दुर्गति ! अतत्त्वज्ञ 'तत्त्व' वर्णे, तार एइ गति ! ! 120 ॥ अनुवाद-तुम दोनोंके प्रति अपराध करनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त करोगे! अतत्त्वज्ञ व्यक्तिके द्वारा तत्त्वका वर्णन करनेपर उसकी ऐसी ही गति होती है! 120 ॥ अनुभाष्य-'दुइ-ठाञि',-श्रीजगन्नाथदेव और श्रीचैतन्य- देव, दोनोंको प्रपञ्चके अन्तर्गत जड़ और जीवके रूपमें विचार करनेसे-एककी प्राकृत देहमें स्थित चित्कण अन्यकी प्राकृत देहमें प्रविष्ट हुआ है, ऐसा माननेसे- दोनों स्थानोंपर अपराध होता है। 'अतत्त्वज्ञ',-जिसे तत्त्वका कोई ज्ञान नहीं है अर्थात् अहंग्रहोपासक मायावादी, फलभोगी कर्मी अथवा स्वेच्छाचारी सत्-असत्- विवेकरहित इन्द्रियपरायण व्यक्ति; 'तत्त्व-वर्णे',-तत्त्व अर्थात् भगवान्के विषयमें वर्णन करता है॥ 120 ॥
[ 5/121-123 पाँचवाँ अध्याय 157 (2) ईश्वरका देह-देही-भेद-निर्देशरूप अपराध ही प्रमाद :- आर एक करियाछ परम 'प्रमाद' ! देह-देहि-भेद ईश्वरे कैले 'अपराध' ! ! 121 ॥ अनुवाद-तुमने अन्य एक बहुत बड़ी भूल की है, ईश्वरमें देह और देहीका भेद करना अपराध है ! 121 ॥ अनुभाष्य-बद्धजीवकी भाँति मानकर ईश्वरके देह और देहीको परस्पर भिन्न वस्तुके रूपमें स्वीकार करनेसे 'अपराध' होता है। प्राकृत-जगत्में गुणमायाके द्वारा गठित बद्धजीवकी देहकी सत्ता और जीवमाया अथवा तटस्थ-शक्तिसे गठित जीवकी अनुभूति होती है। ईश्वर और बद्धजीवमें भेद यह है कि ईश्वर-कर्मफलके दाता और कर्मफलके अधीश अर्थात् समस्त कारणोंके कारण मायाधीश महाप्रभु और विभुतत्त्व हैं; जीव-बद्धावस्थामें कर्मफलका भोक्ता और कर्मफलके अधीन है और मुक्तावस्थामें भी अपने स्वरूपमें ईश्वरसेवामें सम्पूर्ण रूपसे रत होता है अर्थात् ईश्वर किसी भी कालमें मायाके वशमें नहीं होते और जीव-मायाधीनता-योग्य होता है; ईश्वर-अपरिमेय (जिसे मापा नहीं जा सके) अथवा अखण्ड चेतन हैं, जीव-परिमेय अथवा खण्ड चेतन है। बद्धजीवकी नश्वर अनित्य देह-मायिक अथवा जड़ है; मुक्त अथवा शुद्धजीवकी अप्राकृत-देह भी नित्य है और मायातीत ईश्वर भी नित्य सविशेष-विग्रह हैं। प्रपञ्चमें उनके नित्यविग्रहके अचिन्त्य निज-शक्तिके बलसे उदित होनेपर भी वे कभी भी प्रापञ्चिक-धर्मयुक्त मायिक अथवा प्राकृत नहीं हैं; (भाः 1/11/38)- “एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । न युज्यते सदात्मस्थैर्यथाबुद्धिस्तदाश्रया ॥” [अर्थात् “ईश्वरकी ईश्वरता यह है कि प्रकृतिस्थ अर्थात् प्राकृत जगत्में प्रवेश करके भी वे प्राकृत गुणोंके द्वारा युक्त नहीं होते। वे स्वयं अपने स्वरूपमें सर्वदा अवस्थित रहते हैं। उनके आश्रित जीवोंकी बुद्धि भी उसी प्रकारकी होती है।”] नित्यविग्रहको 'निर्विशेष' करनेके छलसे देह और देहीमें भेद-चेष्टा-महा अपराधका कार्य है ॥ 121 ॥ अद्वयज्ञान विष्णुका नाम, विग्रह और स्वरूप-अभिन्न :- ईश्वरेर नाहि कभु देह-देहि-भेद। स्वरूप, देह, - चिदानन्द, नाहिक विभेद ॥ 122 ॥ अनुवाद-ईश्वरमें कदापि देह-देहीका भेद नहीं होता। ईश्वरका स्वरूप और उनकी देह-दोनों ही चिदानन्द हैं, उनमें कोई विभेद नहीं होता ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-अद्वयज्ञान ही व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं; 'वदन्ति तत्तत्त्वविदः' श्लोकमें तत्त्वस्वरूपके निर्णयमें एकमात्र अद्वितीय परमेश्वरमें द्वैतवस्तु-बुद्धिका निवारण हुआ है। वे-अद्वयज्ञान हैं, इसलिये उनका नाम, रूप, गुण और लीला जड़-जगत्की वस्तुओंकी भाँति भिन्न-भिन्न नहीं है, उसे एकान्तिक 'अभिन्न' जानना होगा। ईश्वरमें देह-देही-भेद ज्ञान ही उन्हें 'बद्धजीव' माननेके भ्रमका कारण है, क्योंकि बद्धजीवमें अद्वय-ज्ञान-प्रतीतिका अभाव है ॥ 122 ॥ लघुभागवतामृत (1/5/342) में उद्धृत कूर्मपुराणका वचन- “देह-देहि-विभागोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित् ॥”123 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 123 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“ईश्वरमें (कभी भी यह) देह- देहीका भेद नहीं है ॥ 123 ॥ अनुभाष्य- ईश्वरे (परमात्मनि सविशेषतत्त्ववस्तुनि भगवति) अयं देहदेहिविभागः (नाम एकं नामी च अन्यः, रूपं एकं रूपी च भिन्नः, गुणः एकः गुणी च भिन्नः, लीला एका लीलामयो भिन्नः, -एवम्भूतो मायाकृतः खण्डः) [अद्वयज्ञाने शुद्धसत्त्वमये विष्णौ] क्वचित् (गोलोके परव्योम्नि देवीधाम्नि वा चतुर्दश- भुवनान्तर्मध्ये च) न विद्यते। श्लोक-भावानुवाद-सविशेषतत्त्ववस्तु भगवान्में [अद्वयज्ञान शुद्धसत्त्वमय विष्णुमें] गोलोकमें अथवा परव्योममें अथवा देवीधाममें चौदह भुवनोंके मध्य कहीं
158 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/123-129 ] भी और कभी भी यह देह-देहीका भेद [अर्थात् नाम एक और नामी अन्य, रूप एक और रूपी उससे भिन्न, गुण एक और गुणी भिन्न, लीला एक और लीलामय भिन्न,—इस प्रकार मायाके द्वारा खण्डित भेद] नहीं होता ॥ 123 ॥ श्रीमद्भागवत (3/9/3-4) में- नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः। पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकपदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ 124 ॥ तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभागिभिरसत्प्रसङ्गैः ॥ 125 ॥ अनुवाद-हे परम, आपके इस आनन्दमात्र, अद्वयज्ञान और मायातीत तेजःस्वरूप,—जिस स्वरूपको मैं अब देख रहा हूँ, इससे श्रेष्ठ स्वरूप और कोई नहीं है। हे आत्मन्, विश्वसृजनकारी होनेपर भी विश्वसे पृथक् भूतेन्द्रियोंके कारणस्वरूप आपका यह जो रूप देख रहा हूँ, मैं इसके ही शरणागत हो रहा हूँ। हे भुवनमङ्गल, हमारे मङ्गलके लिये हमारी उपासनाके योग्य आपका यह स्वरूप,—जिसे आपने ध्यानमें दिखलाया है, उसी भगवद्-स्वरूपको-हम नमस्कार करते हैं और उसीकी सेवा करते हैं। असत् प्रसङ्गसे दूषित नरकगामी व्यक्ति इस नित्यमूर्तिका आदर नहीं करते ॥ 124-125 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 25/36-37 संख्या देखें ॥ 124-125 ॥ परमेश्वर विष्णु और वश्य-जीवमें 'भेद' :- काँहा 'पूर्णानन्दैश्वर्य' कृष्ण 'महेश्वर' ! काँहा 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी', 'मायार किङ्कर' ! ! 126 ॥ अनुवाद-कहाँ तो 'पूर्णानन्द-ऐश्वर्यमय' श्रीकृष्ण 'महेश्वर' हैं और कहाँ 'क्षुद्र' जीव 'दुःखी' और मायाका दास है !” 126 ॥ अनुभाष्य-कहाँ महा-परमेश्वर श्रीकृष्णका पूर्णानन्दमय ऐश्वर्य-विग्रह और कहाँ क्षुद्र बद्धजीवका महा-क्लेशपूर्ण मायापदवीका दास्य ! इन दोनोंकी समता तो दूर रहे, तुलना भी असम्भव है ॥ 126 ॥ भगवद्-सन्दर्भमें उद्धृत सर्वज्ञसूक्त-वाक्य, भाः (1/7/6) श्लोककी टीकामें श्रीधरस्वामीके द्वारा उद्धृत श्रीविष्णुस्वामि-वाक्य :- ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः। स्वाविद्या-संवृतो जीवः संक्लेशनिकराकरः ॥ 127 ॥ अनुवाद-ईश्वर-सदैव सच्चिदानन्द और 'ह्लादिनी' एवं 'सम्वित्'-शक्तिके द्वारा आश्लिष्ट (आलिङ्गित) हैं; किन्तु जीव सर्वदा ही अपनी (आरोपित) अविद्याके द्वारा पूरा ढका हुआ है, इसलिये वह सब प्रकारके क्लेशोंका उद्गम-स्थल है ॥ 127 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 18/114 संख्या देखें ॥ 127 ॥ सभीका विस्मय :- शुनि' सभासदेर हैल महा-चमत्कार। 'सत्य कहे गोसाञि, करियाछे तिरस्कार ॥ ' 128 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरकी व्याख्याको सुनकर सभी उपस्थित व्यक्ति अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने माना, —'श्रीस्वरूप गोस्वामी सत्य ही कह रहे हैं कि इस कविने श्रीजगन्नाथदेव और महाप्रभुका तिरस्कार अथवा अनादर किया है ॥ ' 128 ॥ जड़ज्ञानी, प्राकृत कविकि लज्जा, भय और विस्मय :- शुनिया कविर हैल लज्जा, भय, विस्मय। हंस-मध्ये बक येन किछु नाहि कय ॥ 129 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरके तिरस्कारपूर्ण वचनोंको सुनकर कवि लज्जित हो गया और उसमें भय तथा विस्मय उत्पन्न हुआ। हंसोंकी सभाके बीचमें बगुलेके
[ 5/129-135 पाँचवाँ अध्याय 159 समान वह कुछ भी कह न पाया ॥ 129 ॥ महावदान्य श्रीस्वरूपकी अमन्दोदया दया :- तार दुःख देखि' स्वरूप परम-सदय। उपदेश कैला तारे यैछे 'हित' हय ॥ 130 ॥ अनुवाद-उस कविके दुःखको देखकर श्रीस्वरूप दामोदरको उसपर बहुत दया आयी, तब उन्होंने उसे ऐसा उपदेश दिया जिससे उसका हित हो ॥ 130 ॥ इसीके उद्देश्यसे समस्त जीवोंके प्रति वैष्णवाचार्य अभिन्न-गौर श्रीस्वरूपका चरम हितोपदेश :- “याह, भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने। एकान्त आश्रय कर चैतन्य-चरणे ॥ 131 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,- 'परमहंस वैष्णवके पास जाकर श्रीमद्भागवत पढ़ो। एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय करके ही तुम ऐसा कर पाओगे ॥ 131 ॥ अनुभाष्य-निर्विशेष केवलाद्वैत-मतनिष्ठ मायावादीसे अथवा भक्तिहीन शब्द-चतुर वैयाकरणसे (व्याकरणके अध्यापकसे) अथवा धनपर गिद्ध जैसी दृष्टि रखनेवाले विषयसेवीसे भागवत पढ़ने अथवा सुननेके लिये जानेपर उसके फलस्वरूप श्रीकृष्णप्रेम तो प्राप्त होगा नहीं, परन्तु श्रीकृष्णरसके बदले केवल जड़रसभोग वृद्धि प्राप्त करेगा। विषयोंसे विरक्त परमहंस वैष्णवोंसे ही भागवत पढ़नी चाहिये। श्रीचैतन्यचन्द्रके एकान्तिक चरणाश्रित होकर उनके द्वारा प्रदर्शित भागवतके अर्थ ही वैष्णवोंकी एकमात्र सम्पत्ति हैं ॥ 131 ॥ चैतन्यभक्त अथवा शुद्धचिद्-वृत्तिके अनुशीलनकारीके सङ्गके फलसे ही शुद्धभक्तिसिद्धान्तके ज्ञानकी प्राप्ति :- चैतन्येर भक्तगणेर नित्य कर 'सङ्ग'। तबे जानिबा सिद्धान्तसमुद्र-तरङ्ग ॥ 132 ॥ भक्तिसिद्धान्त-ज्ञान ही विद्या और पाण्डित्यका फल :- तबे पाण्डित्य तोमार हइबे सफल। कृष्णेर स्वरूप-लीला वर्णिबा निर्मल ॥ 133 ॥ अनुवाद-तुम नित्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तोंका सङ्ग करो। तभी तुम सिद्धान्तरूपी समुद्रकी तरङ्गोंको जान पाओगे। इसके द्वारा तुम्हारा ज्ञान प्राप्त करना सफल होगा। तभी तुम श्रीकृष्णके स्वरूप तथा उनकी लीलाओंका निर्मल वर्णन कर पाओगे ॥ 132-133 ॥ अनुभाष्य- 'श्रीचैतन्येर भक्तगण',-नित्य-हरिपार्षद और अप्राकृत तत्त्वके एकमात्र ज्ञाता। उनका सम्पूर्ण रूपसे निरन्तर सङ्ग करनेसे जीवोंके सांसारिक-भोगोंसे उत्पन्न अज्ञानसमूह दूर होंगे और उन्हें यथार्थ शुद्धभक्तिके सिद्धान्तकी उपलब्धि होगी ॥ 132 ॥ एइ श्लोक करियाछ पाञा सन्तोष। तोमार हृदयेर अर्थे दुँहाय लागे 'दोष' ॥ 134 ॥ अनुवाद-तुम इस श्लोककी रचना करके बड़े सन्तुष्ट हुए, किन्तु तुमने अपने विचारसे जो इस श्लोककी व्याख्या की, उसके द्वारा ही दोनों ईश्वरोंके प्रति तुम्हारा अपराध होता है ॥ 134 ॥ अनुभाष्य - 'दुँहाय',-श्रीजगन्नाथदेवमें एवं श्रीगौरहरिमें ॥ 134 ॥ मूर्ख अथवा विद्वेषीके द्वारा श्रीकृष्णनिन्दारूपी उक्तिके द्वारा भी श्रीकृष्णसेविका भक्तिसिद्धान्त-वाणी-रूपिणी शुद्ध-सरस्वतीकी श्रीगौर-कृष्ण-सेवा :- तुमि यैछे-तैछे कह, ना जानिया रीति। सरस्वती सेइ-शब्दे करियाछे स्तुति ॥ 135 ॥ अनुवाद-तुमने भक्तिसिद्धान्तको नहीं जानकर जैसे-तैसे इस नान्दी श्लोककी रचना की है, किन्तु सरस्वती देवीने तुम्हारे द्वारा रचित उन्हीं शब्दोंके द्वारा भगवान्की स्तुति कर दी है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य-अज्ञानतावशतः तुम्हें मायावाद और भक्तिमार्गके पार्थक्यकी उपलब्धि नहीं है, इसलिये तुमने जिस प्रणालीसे अपने भावोंको व्यक्त किया है, वह अच्छा नहीं हुआ, जैसा-तैसा हुआ है; किन्तु सरस्वतीदेवीने रचनाकी अधिष्ठात्री होकर तुम्हारे इन जैसे-तैसे वाक्योंके
160 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/135-140 ] द्वारा ही अपने आराध्य श्रीगौर-कृष्णका स्तव किया है॥ 135॥ यैछे दैत्यादि करे कृष्णेर भर्त्सन। सेइ-शब्दे सरस्वती करेन स्तवन॥ 136॥ अनुवाद-जैसे दैत्यादि अथवा कभी इन्द्र भी श्रीकृष्णका तिरस्कार करते हैं, किन्तु सरस्वतीदेवी उन्हीं शब्दोंके द्वारा ही श्रीकृष्णकी स्तुति कर देती हैं॥ 136॥ अक्षजज्ञानी इन्द्रकी निन्दा-उक्तिका दृष्टान्त :- श्रीमद्भागवत (10/25/5) में- वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्। कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रु अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 137॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इन्द्रने कहा,-इस वाचाल, मूर्ख, स्तब्ध, अज्ञ, पण्डिताभिमानी मरणशील कृष्णका आश्रय करके सभी गोपोंने मेरा अप्रिय कार्य किया है॥ 137॥ अनुभाष्य- गोपाः वाचालं (बहुभाषिणं) बालिशं (शिशुं मूर्खं वा) स्तब्धम् (अविनीतम्) अज्ञं (परिणामदर्शनहीनं) पण्डितमानिनं (पण्डितम्मन्यं) मर्त्यं (मरणशीलं मानवं) कृष्णम् उपाश्रित्य (अवलम्ब्य) मे (मम) अप्रियम् (अभिलषित-विरुद्धम् अपमानं) चक्रु स्तौति]-वाचालं (वाचा हेतुना अलं समर्थं शास्त्रयोनिं वेद-प्रवर्त्तकं) बालिशं (शिशुवत् निरभिमानं गर्वहीनं) स्तब्धम् (अन्यस्य वन्द्यस्य अभावात् अनम्रम्) अज्ञं (नास्ति ज्ञः बुद्धिमान् यस्मात् सर्वज्ञं) पण्डितमानिनं (पण्डितानां ब्रह्मविदां बन्धमोक्षविदां वा बहुसेव्यं बहुमाननीयमित्यर्थः) मर्त्यं (भक्तवात्सल्यान्मनुष्यतया प्रतीयमानं) कृष्णं (सच्चिदानन्दरूपं परं ब्रह्म इत्यादिकं स्फुटम्)। श्लोक-भावानुवाद-सभी गोपोंने इस वाचाल, मूर्ख शिशु, अविनीत, परिणामका विचार नहीं करनेवाले, पण्डिताभिमानी, मरणशील मानव कृष्णका आश्रय करके मेरे विरुद्ध कार्य (अपमान) किया है। [इन्द्रने जो श्रीकृष्णकी निन्दा की है, वाग्-अधिष्ठात्री शुद्धा सरस्वतीने उसके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति की है]-वाचाल (वेद-शास्त्रोंके प्रवर्त्तक), बालिश (शिशुके समान गर्वहीन), स्तब्ध (जिनके लिये कोई भी पूजनीय नहीं), अज्ञ (जिनके समान ज्ञानी और कोई नहीं, इसलिये सर्वज्ञ), पण्डिताभिमानी (संसार बन्धन और मोक्षके कारणको जाननेवाले होनेके कारण पण्डितोंके द्वारा सम्मानित), मर्त्य (भक्तवात्सल्यवशतः मनुष्यरूपमें प्रतीत होनेवाले) श्रीकृष्ण सच्चिदानन्दरूप परंब्रह्म हैं॥ 137॥ प्राकृत अहङ्कारसे गर्वित इन्द्र :- ऐश्वर्य-मदे मत्त इन्द्र,–येन मातोयाल। बुद्धिनाश हैल, केवल नाहिक साम्भाल॥ 138॥ अनुवाद-ऐश्वर्यके मदमें इन्द्र ऐसा मतवाला हो गया था जैसे मद्यपान करनेवालेको भले-बुरेका ज्ञान नहीं रहता। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और वह अपने जिह्वावेगको सम्भाल नहीं पाया, इसलिये वह श्रीकृष्णकी निन्दा करने लगा॥ 138॥ अनुभाष्य- 'साम्भाल',- (हिन्दी शब्द), व्यवहारिक ज्ञान अथवा सावधानता; चलती [बङ्गला] भाषामें 'सामाल' [हिन्दी अर्थ-सावधान होना]॥ 138॥ इन्द्रके मुखसे निकली निन्दारूपी उक्तिके द्वारा ही शुद्धा-सरस्वतीकी कृष्णस्तुति :- इन्द्र बले,–“मुञि कृष्णेर करियाछि निन्दन।” तारइ मुखे सरस्वती करेन स्तवन॥ 139॥ अनुवाद-इन्द्रने विचार किया, – “मैंने कृष्णकी निन्दा की है।” किन्तु सरस्वती देवीने उसीके मुखसे परोक्षरूपसे श्रीकृष्णकी स्तुति करवा दी॥ 139॥ शुद्धासरस्वतीके द्वारा शब्दोंकी व्याख्या- (1) 'वाचाल' और (2) 'बालिश' :- 'वाचाल' कहिये–'वेदप्रवर्त्तक' धन्य। 'बालिश'-तथापि 'शिशुप्राय' गर्वशून्य॥ 140॥ अनुवाद-सरस्वती देवीने 'वाचाल' शब्दका अर्थ
[ 5/140-145 पाँचवाँ अध्याय 161 'वेद-प्रवर्त्तक' किया और 'बालिश' शब्दका अर्थ 'बालक जैसे अभिमान रहित' किया। इसलिये इन्द्रके इन दो शब्दोंका अर्थ इस प्रकार हुआ कि श्रीकृष्ण वेद-प्रवर्त्तक होनेपर भी सरल गर्वहीन बालकके समान व्यवहार करते हैं॥ 140॥ (3) 'स्तब्ध', (4) 'अज्ञ' :- वन्द्याभावे 'अनम्र'—'स्तब्ध'-शब्दे कय। याहा हैते अन्य 'विज्ञ' नाहि—से 'अज्ञ' हय॥ 141॥ अनुवाद—'अनम्र' अर्थात् जो किसीकी वन्दना नहीं करते, सरस्वती देवीने 'स्तब्ध' शब्दका यह अर्थ किया। सर्वश्रेष्ठ होनेके कारण श्रीकृष्णका कोई वन्दनीय नहीं है, इसलिये वे अनम्र हैं। जिनसे अधिक विज्ञ कोई नहीं हैं, वे ही अज्ञ हैं—ऐसा सरस्वतीदेवीने अर्थ किया॥ 141॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वन्द्याभावे 'अनम्र'—'स्तब्ध'-शब्दे कय',— जिनका वन्दनीय अन्य कोई नहीं है, इसलिये वे अनम्र हैं,—यह स्तब्ध-शब्दसे प्रकाशित होता है॥ 141॥ (5) 'पण्डिताभिमानी' और (6) 'मर्त्त्य' :- पण्डितेर मान्य पात्र—हय 'पण्डितमानी'। तथापि भक्तवात्सल्ये 'मनुष्य'-अभिमानी॥ 142॥ अनुवाद—'पण्डित मानिनम्' शब्दका ऐसा अर्थ भी होगा कि श्रीकृष्ण विद्वानोंके भी सम्मानके पात्र हैं। भक्तवात्सल्य गुणके कारण श्रीकृष्ण साधारण मनुष्यके जैसे प्रकट होते हैं, इसलिये उनके लिये 'मर्त्त्य' शब्दका भी प्रयोग किया जा सकता है॥ 142॥ विद्वेषी जरासन्धकी निन्दारूपी उक्तिका दृष्टान्त :- जरासन्ध कहे,—“कृष्ण—पुरुष-अधम। तोमार सङ्गे ना युझिमु, 'याहि बन्धुहन्'॥” 143॥ अनुवाद—जरासन्धने भी श्रीकृष्णकी निन्दा करते हुए कहा,—“कृष्ण, तुम पुरुषोंमें अधम हो। मैं तुम्हारे साथ युद्ध नहीं करूँगा, क्योंकि तुम अपने बन्धुओंका वध करने वाले हो॥” 143॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'ना युझिमु, 'याहि बन्धुहन्'',—हे बन्धुनाशक, तुम जाओ; तुम्हारे साथ युद्ध नहीं करूँगा॥ 143॥ पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य—जरासन्धने श्रीकृष्णको सम्बोधन करके कहा,—“हे पुरुषाधम, हे बन्धुहन्, जाओ, मैं तुम्हारे साथ युद्ध नहीं करूँगा।” जरासन्धके इन वचनोंके द्वारा शुद्धा सरस्वती श्रीकृष्णका स्तव कर रही हैं—पुरुषाधम शब्दका अर्थ (बहुव्रीहि-समास)—जिनसे समस्त पुरुष अधम हैं अर्थात् 'पुरुषोत्तम'। [अमरकोष 3/1/68 के अनुसार] संसारमें जो व्यक्ति उन्नतिकी आशा करता है, वह 'बन्धु' कहलाता है, [बन्धन करनेके कारण] माया अथवा अविद्या ही 'बन्धु' है; माया अथवा अविद्याका हननकारी व्यक्ति ही 'बन्धुहा' है; सम्बोधनमें उसको ही—'बन्धुहन्' कहा गया है॥ 143॥ शुद्धासरस्वतीके द्वारा इस प्रकारकी निन्दारूपी उक्तिसे भी श्रीकृष्णस्तुति (1) 'पुरुषाधम' :- याहा हैते अन्य पुरुषसकल—'अधम'। सेइ हय 'पुरुषोत्तम'—सरस्वतीर मन॥ 144॥ अनुवाद—सरस्वती देवीने 'पुरुषाधम' शब्दका अर्थ किया—जिनसे अन्य सभी पुरुष अधम हैं, वे 'पुरुषोत्तम' हैं॥ 144॥ (2) 'बन्धुहन्' :- 'बान्धे सबारे'—ताते अविद्या 'बन्धु' हय। 'अविद्या-नाशक'—'बन्धुहन्'-शब्दे कय॥ 145॥ अनुवाद—सरस्वती देवीने अर्थ किया—'सभीको बाँधकर रखनेवाली' होनेके कारण अविद्या 'बन्धु' है और उस 'अविद्या-नाशक'को 'बन्धुहन्'-शब्दसे सम्बोधन करते हैं॥ 145॥
162 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/146-154 ] विद्वेषी शिशुपालकी निन्दारूपी उक्तिका दृष्टान्त :- एइमत शिशुपाल करिल निन्दन। सेइवाक्ये सरस्वती करेन स्तवन॥146॥ अनुवाद—इसी प्रकार शिशुपालने भी श्रीकृष्णकी निन्दा की थी, सरस्वती देवीने शिशुपालके उन्हीं वाक्योंके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति कर दी॥146॥ अनुभाष्य—शिशुपालने जिन वाक्योंसे श्रीकृष्णकी निन्दा की थी, उनसे भी इसी प्रकारसे शुद्धा सरस्वतीने श्रीकृष्णकी स्तुति की थी॥146॥ पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीस्वरूपके द्वारा प्राकृत कविके व्यवहृत शब्दसमूहके द्वारा कृष्णस्तुतिकी व्याख्या, श्रीजगन्नाथरूपी दारु-ब्रह्म और श्रीगौरहरिरूप जङ्गम-ब्रह्ममें अभेद-संस्थापन :- तैछे एइ श्लोके तोमार अर्थ 'निन्दा' आइसे। सरस्वतीर अर्थ शुन, याते 'स्तुति' भासे॥147॥ अनुवाद—[श्रीस्वरूप दामोदरने उस ब्राह्मण कविसे कहा—] उसी प्रकार तुम्हारे इस श्लोककी तुम्हारे द्वारा की गयी व्याख्यासे भगवान्की 'निन्दा' होती है, किन्तु अब तुम सरस्वती देवीके द्वारा किये गये अर्थको श्रवण करो, जिसमें स्तुति प्रकाशित होती है॥147॥ जगन्नाथ हन कृष्णेर 'आत्मस्वरूप'। किन्तु इँहा दारुब्रह्म—स्थावर-स्वरूप॥148॥ एक ही विग्रह जगत्के उद्धारके लिये इच्छाशक्तिके प्रभावसे दो रूपोंमें प्रकटित :- ताँहा-सह आत्मता एकरूप हञा। कृष्ण एकतत्त्वरूप—दुइरूप हञा॥149॥ संसारतारण-हेतु येइ इच्छा शक्ति। ताहार मिलन करि एकेते ऐछे प्राप्ति॥150॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीजगन्नाथदेव श्रीकृष्णके 'आत्म-स्वरूप' हैं, तथापि यहाँ श्रीजगन्नाथ पुरीमें उन्होंने दारु-ब्रह्म स्थावर-स्वरूप धारण किया है। वह दारुब्रह्म स्थावर-स्वरूप आत्म-स्वरूपके साथ एक रूप है। श्रीकृष्ण एक ही तत्त्व होनेपर भी दो रूप (स्थावर-स्वरूप और आत्म-स्वरूप) हुए हैं। संसारका उद्धार करनेके लिये श्रीकृष्णकी जो इच्छा-शक्ति है, वह दोनों रूपोंमें विराजमान है, इसलिये श्रीजगन्नाथदेव और श्रीकृष्ण (श्रीगौरसुन्दर)में एकताकी प्राप्ति होती है॥148-150॥ सकल संसारी-लोकेर करिते उद्धार। गौर-जङ्गम-रूपे कैला अवतार॥151॥ अनुवाद—समस्त जगत्-वासियोंका उद्धार करनेके लिये श्रीकृष्ण जङ्गम श्रीगौरचन्द्रके रूपमें अवतरित हुए हैं॥151॥ श्रीजगन्नाथके दर्शनसे और श्रीगौरके प्रचारसे जीवोंका उद्धार :- जगन्नाथेर दर्शने खण्डाय संसार। सब देशेर सब-लोक नारे आसिबार॥152॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनसे जीवका संसार-बन्धन कट जाता है, किन्तु समस्त देशोंके सभी लोग उनके दर्शनके लिये नहीं आ पाते॥152॥ श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु देशे देशे याञा। सब-लोके निस्तारिला जङ्गम-ब्रह्म हञा॥153॥ अनुवाद—इसलिये जङ्गम ब्रह्मके रूपमें अवतरित श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने देश-देशमें जाकर समस्त जगत्-वासियोंका उद्धार किया॥153॥ सरस्वतीर अर्थ एइ कहिलुँ विवरण। एहो भाग्य तोमार, यैछे करिला वर्णन॥154॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने सरस्वतीदेवी जो तुम्हारे श्लोकका स्तुतिपरक अर्थ करेंगी, उसका वर्णन किया है। यह तुम्हारा सौभाग्य ही है कि तुमने श्रीजगन्नाथदेव और श्रीचैतन्य महाप्रभुका अपने श्लोकमें ऐसा वर्णन किया है॥154॥
[ 5/155-164 पाँचवाँ अध्याय 163 कृष्णनिन्दामें 'स्तोभ'रूपी नामाभासके उच्चारणसे ही मुक्ति :- कृष्णे गालि दिते करे नाम उच्चारण। सेइ नाम हय तार 'मुक्तिर' कारण ॥"155 ॥ अनुवाद—कोई यदि श्रीकृष्णको गाली देनेके लिये भी उनके नामका उच्चारण करता है, तो वही नाम ही उसकी मुक्तिका कारण बन जाता है ॥"155 ॥ कविका वैष्णवोंके चरणोंमें आत्मसमर्पण :- तबे सेइ कवि सबार चरणे पड़िया। सबार शरण लैल दन्ते तृण लञा ॥ 156 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे सिद्धान्त सम्मत व्याख्या सुनकर उस कविने सभी भक्तोंके चरणोंमें गिरकर प्रणाम किया। तब उसने अपने दाँतोंमें तिनका दबाकर दैन्यभावसे उनकी शरण ग्रहण की ॥ 156 ॥ पहले भक्तोंकी कृपासे महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- तबे सब भक्त तारे अङ्गीकार कैला। तार गुण कहिं महाप्रभुरे मिलाइला ॥ 157 ॥ अनुवाद—उसकी दीनता और शरणागत भावको देखकर सभी भक्तोंने उसे अङ्गीकार किया। तब उन्होंने महाप्रभुसे उसके दीनतादि गुणोंका वर्णन करके उनसे मिलवाया ॥ 157 ॥ कविके द्वारा संन्यास-धर्म ग्रहण और पुरीमें वास :- सेइ कवि सर्व त्यजि' रहिला नीलाचले। गौरभक्तगणेर कृपा के कहिते पारे? ? 158 ॥ अनुवाद—उस कविने अपना सबकुछ त्याग कर दिया और नीलाचलमें ही रहने लगा। श्रीगौरभक्तोंकी कृपाका कौन वर्णन कर सकता है ? 158 ॥ श्रीमिश्रकी कृष्णकथा-श्रवण-लीला और श्रीरामानन्दके माहात्म्यका वर्णन :- एइ त' कहिलुँ प्रद्युम्नमिश्र-विवरण। प्रभुर आज्ञाय कैल कृष्णकथार श्रवण ॥ 159 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीप्रद्युम्न मिश्रका विवरण प्रस्तुत किया, महाप्रभुके उपदेशानुसार उन्होंने श्रीकृष्णकथाका श्रवण किया ॥ 159 ॥ तार मध्ये कहिलुँ रामानन्देर महिमा। आपने श्रीमुखे प्रभु वर्णे याँर सीमा ॥ 160 ॥ अनुवाद—उसी विवरणके मध्य मैंने श्रीरामानन्द रायकी महिमाका वर्णन किया जिसकी सीमाका वर्णन स्वयं महाप्रभु अपने मुखसे करते हैं ॥ 160 ॥ वैष्णवोंमें श्रद्धाके कारण अनभिज्ञ कविको भी महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- प्रस्तावे कहिलुँ कविर नाटक-विवरण। अज्ञ हञा श्रद्धाय पाइल प्रभुर चरण ॥ 161 ॥ अनुवाद—प्रसङ्गवशतः मैंने कविके द्वारा रचित नाटकका भी वर्णन किया, अज्ञ होनेपर भी श्रद्धा होनेके कारण उसने महाप्रभुके चरणोंका आश्रय प्राप्त किया ॥ 161 ॥ श्रद्धापूर्वक चैतन्यलीलाके श्रवण और कीर्तनसे सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजनकी प्राप्ति :- श्रीकृष्णचैतन्य-लीला—अमृतेर सार। एकलीला-प्रवाहे बहे शत-शत धार ॥ 162 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अमृतका सार हैं। उनकी एक लीलाके प्रवाहमें ही सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ प्रवाहित होती हैं ॥ 162 ॥ श्रद्धा करि' एइ लीला येइ पड़े, सुने। गौरलीला, भक्ति-भक्त-रस-तत्त्व जाने ॥ 163 ॥ अनुवाद—जो कोई भी महाप्रभुकी लीलाओंको श्रद्धापूर्वक पढ़ता, सुनता है, वह भक्तितत्त्व, भक्ततत्त्व और गौर-लीलाके रसतत्त्वको समझ जाता है ॥ 163 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 164 ॥
164 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/164 ] इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे प्रद्युम्न-मिश्रोपाख्यानं वर्णन कर रहा है॥164॥ नाम पञ्चमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें प्रद्युम्न-मिश्र-उपाख्यान कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका नामक पाँचवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
छठा अध्याय कथासार—महाप्रभुमें कृष्णप्रेमके तीव्र भावोंके उदय होनेके समय श्रीस्वरूप और श्रीरामानन्द उन्हें अनेक प्रकारसे सान्त्वना प्रदान करते थे। उसी समय श्रीरघुनाथदास भी पुरीमें आ गये। श्रीरघुनाथदास बहुत दिनोंसे महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय करनेका प्रयत्न कर रहे थे। महाप्रभु वृन्दावन जानेके छलसे जिस समय शान्तिपुर गये, तब उनके चरणोंका आश्रय करनेकी प्रार्थना करनेपर महाप्रभुने उन्हें [श्रीरघुनाथदासको] युक्त-वैराग्यका आश्रय करनेका उपदेश दिया। उन्हीं दिनों किसी म्लेच्छ-चौधरीने श्रीहिरण्यदासके प्रति ईर्ष्या करके गौड़से वजीरको बुलवाया, श्रीहिरण्यदास वहाँसे भाग गये। श्रीरघुनाथदासकी बुद्धिके बलसे श्रीहिरण्यदासका वह सङ्कट दूर हो गया। श्रीरघुनाथदासने पाणिहाटी जाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे चिड़वा-दहीका महोत्सव किया। उस महोत्सवके अगले दिन श्रीनित्यानन्द प्रभुने कृपा करके श्रीरघुनाथको श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेका आशीर्वाद दिया। उसके बाद रात्रिमें श्रीवासुदेव-दत्तके अनुगृहीत और अपने गुरु एवं पुरोहित श्रीयदुनन्दन आचार्यके श्रीरघुनाथके घरपर आनेसे श्रीरघुनाथ उनके साथ कुछ दूरी तक जाकर वहाँसे अकेले भाग गये। गुप्त मार्गसे जाकर बारह दिनोंमें पुरुषोत्तम क्षेत्रमें पहुँचकर महाप्रभुके चरणकमलोंमें जाकर पड़े। महाप्रभुने उन्हें 'स्वरूपके रघु' यह नाम देकर श्रीस्वरूप गोस्वामीके हाथोंमें समर्पित किया। श्रीरघुनाथने वहाँ पाँच दिन तक प्रसाद पाया और उसके बाद बहुत दिनों तक सिंहद्वारपर अयाचक-वृत्तिका पालन किया। बादमें छत्रमें महाप्रसाद माँगकर खाने लगे। श्रीरघुनाथके पिताने [उनके पुरीमें होनेका] संवाद पाकर कुछ सेवक और धन भेजा, किन्तु श्रीरघुनाथने उनसे कोई स्थूल धन-जनादि ग्रहण नहीं किया। महाप्रभुने श्रीरघुनाथके छत्रमें भिक्षा करनेकी बातको सुनकर उन्हें अपनी गुञ्जामाला और गोवर्धन शिला प्रदान की। बादमें श्रीदास गोस्वामीने मार्गमें फेंके गये बासी-सड़े हुए प्रसादको धोकर खाना आरम्भ किया, उससे श्रीस्वरूप और महाप्रभुने सन्तुष्ट होकर एकदिन उस प्रसादको बलपूर्वक आस्वादन करके श्रीरघुनाथपर कृपा की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीरघुनाथको श्रीस्वरूपके हाथोंमें अर्पण करनेके बाद आत्मसात् करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :- कृपागुणैर्यः कुगृहान्धकूपादुद्धृत्य भंग्या रघुनाथदासम्। न्यस्य स्वरूपे विदधेऽन्तरङ्गं श्रीकृष्णचैतन्यममुं प्रपद्ये॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपनी कृपारूपी रस्सीके द्वारा श्रीरघुनाथदासका गृहरूपी अन्धकूपसे कुशलतासे उद्धार करके उन्हें श्रीस्वरूपके निकट अर्पण करके अपना अन्तरङ्ग भक्त बनाया था, मैं उन्हीं श्रीकृष्णचैतन्यके चरणकमलोंमें शरणागत होता हूँ॥१॥ अनुभाष्य— यः (चैतन्यदेवः) कृपागुणैः (अनुकम्पा-वितरणैः) कुगृहान्धकूपात् (कु कुत्सितं पुंस्त्रीपुत्रादिकथाबहुलं गृहमेव अन्धकूपः निर्गमनपथरहितः, तस्मात्) रघुनाथदासं (दासगोस्वामिनं) भंग्या (कौशलेन) उद्धृत्य (उत्थाप्य) स्वरूपे (दामोदर-स्वरूप-गोस्वामिनि) न्यस्य (समर्प्य) अन्तरङ्गं (निजजनं) विदधे (चकार), अमुं तं श्रीकृष्णचैतन्यम् अहं प्रपद्ये (शरणं व्रजामि)। श्लोक-भावानुवाद—जिन्होंने अनुकम्पा करके श्रीदासगोस्वामीका गृहान्धकूपसे (निन्दित पुरुष-स्त्री-पुत्रादिकी बातोंके आधिक्यवाले गृहरूपी अन्धकूप जिससे बाहर निकलनेका मार्ग नहीं है, उससे) कुशलतापूर्वक उद्धार करके श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीको समर्पित करके अन्तरङ्ग-भक्त बनाया, उन श्रीकृष्णचैतन्यके मैं शरणागत होता हूँ।
166 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/1-8 ] श्रीरघुनाथदास गोस्वामी रचित विलापकुसुमाञ्जलि स्तवमें— “यो मां दुस्तरनिर्जलमहाकूपादपारक्लमात् सद्यः सान्द्रदयाम्बुधिः प्रकृतितः स्वैरीकृपारज्जुभिः। उद्धृत्यात्मसरोजनिन्दिचरणप्रान्तं प्रपाद्य स्वयं श्रीदामोदरसाच्चकार तमहं चैतन्यचन्द्रं भजे॥” [अर्थात् “स्वभावतः घनीभूत दयाके सागर जिन्होंने मुझे अत्यन्त क्लेशपूर्ण, बड़ी कठिनाईसे पार होनेवाले गृहरूपी जलशून्य महाकूपसे स्वतन्त्र कृपारूपी रस्सीके द्वारा उद्धार करके कमलकी शोभाको भी धिक्कार देनेवाले अपने चरणोंमें आश्रय प्रदान करके बादमें श्रीस्वरूप-दामोदर प्रभुके हाथोंमें समर्पित किया था, मैं उन्हीं श्रीचैतन्यचन्द्रका भजन करता हूँ।"]॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥ नीलाचलमें गौरलीला :- एइमत गौरचन्द्र भक्तगण-सङ्गे। नीलाचले नाना लीला करे नाना रङ्गे ॥3॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र भक्तोंके साथ नीलाचलमें अनेक प्रकारकी आनन्द प्रदान करनेवाली लीलाएँ कर रहे थे॥3॥ अपने भक्तोंके कष्टकी आशङ्कासे अपने कृष्ण-विरहरूपी दुःखका सङ्गोपन करना :- यद्यपि अन्तरे कृष्णवियोग बाधये। बाहिरे ना प्रकाशय भक्त-दुःख-भये ॥4॥ अनुवाद-यद्यपि कृष्ण-वियोग भीतरसे महाप्रभुके हृदयको पीड़ित करता था, तथापि भक्तोंके दुःखके भयसे उसे बाहरमें प्रकाशित नहीं करते थे॥4॥ सुतीव्र कृष्ण-विच्छेद-दुःखमें महाप्रभुकी अवर्णनीय व्याकुलता :- उत्कट विरह-दुःख यबे बाहिराय। तबे ये वैकल्य प्रभुर वर्णन ना याय॥5॥ अनुवाद-जब महाप्रभुके हृदयका तीव्र विरह-दुःख बाहर निकलता, उस समय उनमें कैसी व्याकुलता होती, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥5॥ विप्रलम्भ दशामें श्रीरायका कृष्णकथाका संलाप और श्रीस्वरूपका गान ही महाप्रभुके लिये जीवन-स्वरूप :- रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर गान। विरह-वेदनाव् प्रभुर राखये पराण ॥6॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-वेदनामें श्रीराम force-वेदनामें श्रीराम forceानन्द रायकी श्रीकृष्णकथा तथा श्रीस्वरूप दामोदरका गान ही उनके प्राणोंकी रक्षा करते थे॥6॥ अनेक लोगोंके साथ नाना प्रकारके कृष्ण-प्रसङ्गोंमें विरहके गुरुत्वका कम होना, रात्रिमें निर्जनमें कृष्णविरह-दुःखकी वृद्धि :- दिने प्रभु नाना-सङ्गे हय अन्य मन। रात्रिकाले बाड़े प्रभुर विरह-वेदन ॥7॥ अनुवाद-दिनके समय तो अनेक भक्तोंके साथ मिलनेके कारण महाप्रभुका मन विरहसे कुछ हट जाता था, किन्तु रात्रिके समय महाप्रभुकी विरह-वेदना बहुत बढ़ जाती॥7॥ श्रीस्वरूप और श्रीरामरायके द्वारा उनके भावोंके उपयोगी वचन और गानके द्वारा महाप्रभुको आश्वासन :- ताँर सुखहेतु सङ्गे रहे दुइजना। कृष्णरस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥8॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-वेदनाको शान्त करनेके लिये श्रीस्वरूप दामोदर तथा श्रीराम forceानन्द राय-दोनों उनके साथ रहते और श्रीकृष्णरससे परिपूर्ण श्लोक एवं गीत सुनाकर महाप्रभुको सान्त्वना प्रदान करते ॥8॥
[ 6/9-15 छठा अध्याय 167 श्रीकृष्णके जैसे सुबल सखा हैं, महाप्रभुके भी वैसे श्रीराम-राय :- सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय। गौरसुखदान-हेतु तैछे राम-राय॥9॥ अनुवाद—श्रीकृष्णलीलाके समय जैसे सुबल सखा उनकी श्रीराधासे विरहके समय उन्हें सुखी करनेके लिये सहायता प्रदान करते थे, उसी प्रकार श्रीरामानन्द राय श्रीगौरसुन्दरको सुखी करनेके लिये सहायता करते॥9॥ श्रीराधाकी जैसे ललिता सखी, महाप्रभुके लिये भी वैसे श्रीस्वरूप-दामोदर :- पूर्वे यैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान। तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे प्रभुर प्राण॥10॥ अनुवाद—पहले जैसे श्रीराधाकी विरह दशामें उनके प्राणोंकी रक्षाके लिये श्रीललिता प्रधान सहायिका थीं, उसी प्रकार श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा करते थे॥10॥ दोनों ही महाप्रभुके परमप्रेष्ठ अन्तरङ्ग :- दुइ जनार सौभाग्य कहन ना याय। प्रभुर 'अन्तरङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय॥11॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदरके सौभाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे महाप्रभुके अन्तरङ्गके रूपमें जगत्में प्रसिद्ध थे॥11॥ महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथके मिलनके वृत्तान्तका वर्णन :- एइमत विहरे गौर लञा भक्तगण। रघुनाथ-मिलन एबे सुन, भक्तगण॥12॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर अपने भक्तोंके साथ विहार करते थे। हे भक्तों! अब महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके मिलनेका प्रसङ्ग सुनो॥12॥ पूर्वकालमें कानाइ-नाटशालासे पुरी लौटते समय मार्गमें शान्तिपुरमें महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको शिक्षा :- पूर्वे शान्तिपुरे रघुनाथ यबे आइला। महाप्रभु कृपा करि' ताँरे शिखाइला॥13॥ अनुवाद—पहले जब श्रीरघुनाथदास शान्तिपुरमें महाप्रभुके दर्शनके लिये आये थे, तब महाप्रभुने उन्हें कृपा करके शिक्षा प्रदान की थी॥13॥ महाप्रभुकी शिक्षाके अनुसार श्रीरघुनाथके द्वारा घरमें युक्त- वैराग्यका आचरण, बाहरी रूपमें विषयीकी भाँति और भीतरमें निर्विषय निष्किञ्चन और श्रीकृष्णके लिये अखिल चेष्टासे युक्त :- प्रभुर शिक्षाते तैं हो निज-घरे याय। मर्कट-वैराग्य छाड़ि' हइला 'विषयी-प्राय'॥14॥ अनुवाद—महाप्रभुकी शिक्षानुसार श्रीरघुनाथदास अपने घर लौट गये और वे मर्कट-वैराग्यको छोड़कर बाहरी रूपसे विषयीकी भाँति व्यवहार करने लगे॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मर्कट-वैराग्य',—गृहस्थ व्यक्तिके द्वारा वैरागीके वेषादिको धारण करके रहनेपर भी उसे 'मर्कट-वैरागी' कहते हैं॥14॥ अनुभाष्य—श्रीरघुनाथको शिक्षा,—मध्यलीला 16/238-243 संख्या देखें। लोगोंकी दृष्टिमें 'विषयी'के जैसे श्रीरघुनाथने भोगोंमें आसक्त बन्दरके बाह्य-वैराग्यके प्रदर्शनकी रीतिका अनुकरण सम्पूर्ण रूपसे त्याग दिया॥13-14॥ भितरे वैराग्य, बाहिरे करे सर्व कर्म। देखिया त' माता-पितार आनन्दित मन॥15॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास भीतरसे विरक्त थे, परन्तु बाहरसे विषयी व्यक्तियोंकी भाँति सब कार्य करने लगे। उनके ऐसे व्यवहारको देखकर उनके माता-पिताको बहुत आनन्द हुआ॥15॥ अनुभाष्य—हृदयमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंको एकबार भी आवाहन नहीं करनेपर लोकदृष्टिमें सब प्रकारके विषय-कार्य करने लगे॥15॥
168 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/16-22 ] मथुरासे आये महाप्रभुका सङ्ग पानेके लिये प्रयास :- 'मथुरा हैते प्रभु आइला',—वार्त्ता यबे पाइला। प्रभु-पाश चलिबारे उद्योग करिला ॥ 16 ॥ अनुवाद—'महाप्रभु मथुरासे लौट आये हैं',— श्रीरघुनाथदासको जब यह समाचार मिला, तब वे महाप्रभुके पास जानेका प्रयास करने लगे ॥ 16 ॥ सप्तग्रामके मुस्लिम चौधरी नवाबका वजीरकी सहायतासे सप्तग्रामपर अधिकार :- हेनकाले मुलुकेर एक म्लेच्छ अधिकारी। सप्तग्राम-मुलुकेर से हय 'चौधुरी' ॥ 17 ॥ अनुवाद—उस समय उस प्रदेशमें एक मुसलमान अधिकारी था। सप्तग्राम-प्रदेशका वह 'चौधुरी' था ॥ 17 ॥ अनुभाष्य—'चौधुरी',—जो प्रजासे उनके द्वारा देय करमें-से एक चौथाई अपने भागको अपने पास रखकर शेष धन भूमि-अधिकारीके पास खजानेमें जमा करते हैं॥ 17 ॥ हिरण्यदास मुलुक निल 'मक्ररि' करिया। तार अधिकार गेल, मरे से देखिया ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदासके ताऊ श्रीहिरण्यदासने राजासे ताल-मेल करके सप्तग्राम-प्रदेशसे कर-संग्रहका अधिकार स्थायीरूपसे अपने नामपर लिखवा लिया। मुसलमान चौधुरीका अधिकार चले जानेपर वह श्रीहिरण्यदाससे ईर्ष्या करने लगा ॥ 18 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मक्ररि',—इजारा (पट्टा देना), (स्थायीरूपसे) व्यवस्था ॥ 18 ॥ अनुभाष्य—श्रीहिरण्यदासने सप्तग्राम-प्रदेशके कर-संग्रह और भुगतानके कार्यकी स्थायीरूपसे व्यवस्था कर ली; उससे मुसलमान चौधुरीको प्राप्त होनेवाला अंश सम्पूर्ण रूपसे समाप्त हो गया, ऐसा देखकर उसके हृदयमें बहुत क्रोध हुआ ॥ 18 ॥ बार लक्ष देय राजाय, साधे बिश लक्ष। से 'तुरुक्' किछु ना पाञा हैल प्रतिपक्ष ॥ 19 ॥ अनुवाद—श्रीहिरण्यदास बीस लाख मुद्राएँ एकत्रित करके कर-रूपमें राजाको बारह लाख मुद्राएँ देते थे। वह 'तुर्क' (मुस्लिम चौधुरी) कुछ भी नहीं प्राप्त करनेके कारण श्रीहिरण्यदासका प्रतिद्वन्द्वी बन गया ॥ 19 ॥ अनुभाष्य—बीस लाख करमें-से राजाको एक चौथाई भाग (पाँच लाख) छोड़कर पन्द्रह लाख जमा करनेके बदले बारह लाख जमा करनेपर वह तुर्क अर्थात् मुसलमान स्वयंको प्राप्त होने वाले लाभसे वञ्चित होकर उनका विरोधी बन गया ॥ 19 ॥ हिरण्य-गोवर्धनका भाग जाना और श्रीरघुनाथका बन्धन :- राज-घरे कैफियत् दिया उजीरे आनिल। हिरण्यदास पलाइल, रघुनाथे बान्धिल ॥ 20 ॥ अनुवाद—उस मुस्लिम चौधुरीने राज-खजानेमें यह समस्त जानकारी दी और श्रीहिरण्यदासको पकड़नेके लिये वह राजाके मन्त्रीको अपने साथ लेकर सप्तग्राममें आया। श्रीहिरण्यदास तो घरसे भाग गये, इसलिये उन्होंने श्रीरघुनाथदासको पकड़ लिया ॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कैफियत्',—विवरण-पत्र ॥ 20 ॥ श्रीरघुनाथको मुस्लिम-चौधुरीके द्वारा डराना :- प्रतिदिन रघुनाथे करये भर्त्सना। “बाप-ज्येठारे आन', नहे पाइबा यातना ॥ ”21 ॥ अनुवाद—मुस्लिम चौधुरी प्रतिदिन आकर श्रीरघुनाथदासको डराता-धमकाता और उनसे कहता,—“अपने पिता और ताऊको लेकर आओ अन्यथा तुम्हें यातनाएँ भोगनी पड़ेंगी ॥ ”21 ॥ श्रीरघुनाथके मुखके दर्शनसे स्नेहसे आर्द्रीचित्त होकर लौटना :- मारिते आसिया यदि देखे रघुनाथे। मन फिरि' याय, तबे ना पारे मारिते ॥ 22 ॥