श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2180, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/155-164 पाँचवाँ अध्याय 163 कृष्णनिन्दामें 'स्तोभ'रूपी नामाभासके उच्चारणसे ही मुक्ति :- कृष्णे गालि दिते करे नाम उच्चारण। सेइ नाम हय तार 'मुक्तिर' कारण ॥"155 ॥ अनुवाद—कोई यदि श्रीकृष्णको गाली देनेके लिये भी उनके नामका उच्चारण करता है, तो वही नाम ही उसकी मुक्तिका कारण बन जाता है ॥"155 ॥ कविका वैष्णवोंके चरणोंमें आत्मसमर्पण :- तबे सेइ कवि सबार चरणे पड़िया। सबार शरण लैल दन्ते तृण लञा ॥ 156 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे सिद्धान्त सम्मत व्याख्या सुनकर उस कविने सभी भक्तोंके चरणोंमें गिरकर प्रणाम किया। तब उसने अपने दाँतोंमें तिनका दबाकर दैन्यभावसे उनकी शरण ग्रहण की ॥ 156 ॥ पहले भक्तोंकी कृपासे महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- तबे सब भक्त तारे अङ्गीकार कैला। तार गुण कहिं महाप्रभुरे मिलाइला ॥ 157 ॥ अनुवाद—उसकी दीनता और शरणागत भावको देखकर सभी भक्तोंने उसे अङ्गीकार किया। तब उन्होंने महाप्रभुसे उसके दीनतादि गुणोंका वर्णन करके उनसे मिलवाया ॥ 157 ॥ कविके द्वारा संन्यास-धर्म ग्रहण और पुरीमें वास :- सेइ कवि सर्व त्यजि' रहिला नीलाचले। गौरभक्तगणेर कृपा के कहिते पारे? ? 158 ॥ अनुवाद—उस कविने अपना सबकुछ त्याग कर दिया और नीलाचलमें ही रहने लगा। श्रीगौरभक्तोंकी कृपाका कौन वर्णन कर सकता है ? 158 ॥ श्रीमिश्रकी कृष्णकथा-श्रवण-लीला और श्रीरामानन्दके माहात्म्यका वर्णन :- एइ त' कहिलुँ प्रद्युम्नमिश्र-विवरण। प्रभुर आज्ञाय कैल कृष्णकथार श्रवण ॥ 159 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने श्रीप्रद्युम्न मिश्रका विवरण प्रस्तुत किया, महाप्रभुके उपदेशानुसार उन्होंने श्रीकृष्णकथाका श्रवण किया ॥ 159 ॥ तार मध्ये कहिलुँ रामानन्देर महिमा। आपने श्रीमुखे प्रभु वर्णे याँर सीमा ॥ 160 ॥ अनुवाद—उसी विवरणके मध्य मैंने श्रीरामानन्द रायकी महिमाका वर्णन किया जिसकी सीमाका वर्णन स्वयं महाप्रभु अपने मुखसे करते हैं ॥ 160 ॥ वैष्णवोंमें श्रद्धाके कारण अनभिज्ञ कविको भी महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- प्रस्तावे कहिलुँ कविर नाटक-विवरण। अज्ञ हञा श्रद्धाय पाइल प्रभुर चरण ॥ 161 ॥ अनुवाद—प्रसङ्गवशतः मैंने कविके द्वारा रचित नाटकका भी वर्णन किया, अज्ञ होनेपर भी श्रद्धा होनेके कारण उसने महाप्रभुके चरणोंका आश्रय प्राप्त किया ॥ 161 ॥ श्रद्धापूर्वक चैतन्यलीलाके श्रवण और कीर्तनसे सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजनकी प्राप्ति :- श्रीकृष्णचैतन्य-लीला—अमृतेर सार। एकलीला-प्रवाहे बहे शत-शत धार ॥ 162 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अमृतका सार हैं। उनकी एक लीलाके प्रवाहमें ही सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ प्रवाहित होती हैं ॥ 162 ॥ श्रद्धा करि' एइ लीला येइ पड़े, सुने। गौरलीला, भक्ति-भक्त-रस-तत्त्व जाने ॥ 163 ॥ अनुवाद—जो कोई भी महाप्रभुकी लीलाओंको श्रद्धापूर्वक पढ़ता, सुनता है, वह भक्तितत्त्व, भक्ततत्त्व और गौर-लीलाके रसतत्त्वको समझ जाता है ॥ 163 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 164 ॥