भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2179

162 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/146-154 ] विद्वेषी शिशुपालकी निन्दारूपी उक्तिका दृष्टान्त :- एइमत शिशुपाल करिल निन्दन। सेइवाक्ये सरस्वती करेन स्तवन॥146॥ अनुवाद—इसी प्रकार शिशुपालने भी श्रीकृष्णकी निन्दा की थी, सरस्वती देवीने शिशुपालके उन्हीं वाक्योंके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति कर दी॥146॥ अनुभाष्य—शिशुपालने जिन वाक्योंसे श्रीकृष्णकी निन्दा की थी, उनसे भी इसी प्रकारसे शुद्धा सरस्वतीने श्रीकृष्णकी स्तुति की थी॥146॥ पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीस्वरूपके द्वारा प्राकृत कविके व्यवहृत शब्दसमूहके द्वारा कृष्णस्तुतिकी व्याख्या, श्रीजगन्नाथरूपी दारु-ब्रह्म और श्रीगौरहरिरूप जङ्गम-ब्रह्ममें अभेद-संस्थापन :- तैछे एइ श्लोके तोमार अर्थ 'निन्दा' आइसे। सरस्वतीर अर्थ शुन, याते 'स्तुति' भासे॥147॥ अनुवाद—[श्रीस्वरूप दामोदरने उस ब्राह्मण कविसे कहा—] उसी प्रकार तुम्हारे इस श्लोककी तुम्हारे द्वारा की गयी व्याख्यासे भगवान्‌की 'निन्दा' होती है, किन्तु अब तुम सरस्वती देवीके द्वारा किये गये अर्थको श्रवण करो, जिसमें स्तुति प्रकाशित होती है॥147॥ जगन्नाथ हन कृष्णेर 'आत्मस्वरूप'। किन्तु इँहा दारुब्रह्म—स्थावर-स्वरूप॥148॥ एक ही विग्रह जगत्‌के उद्धारके लिये इच्छाशक्तिके प्रभावसे दो रूपोंमें प्रकटित :- ताँहा-सह आत्मता एकरूप हञा। कृष्ण एकतत्त्वरूप—दुइरूप हञा॥149॥ संसारतारण-हेतु येइ इच्छा शक्ति। ताहार मिलन करि एकेते ऐछे प्राप्ति॥150॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीजगन्नाथदेव श्रीकृष्णके 'आत्म-स्वरूप' हैं, तथापि यहाँ श्रीजगन्नाथ पुरीमें उन्होंने दारु-ब्रह्म स्थावर-स्वरूप धारण किया है। वह दारुब्रह्म स्थावर-स्वरूप आत्म-स्वरूपके साथ एक रूप है। श्रीकृष्ण एक ही तत्त्व होनेपर भी दो रूप (स्थावर-स्वरूप और आत्म-स्वरूप) हुए हैं। संसारका उद्धार करनेके लिये श्रीकृष्णकी जो इच्छा-शक्ति है, वह दोनों रूपोंमें विराजमान है, इसलिये श्रीजगन्नाथदेव और श्रीकृष्ण (श्रीगौरसुन्दर)में एकताकी प्राप्ति होती है॥148-150॥ सकल संसारी-लोकेर करिते उद्धार। गौर-जङ्गम-रूपे कैला अवतार॥151॥ अनुवाद—समस्त जगत्-वासियोंका उद्धार करनेके लिये श्रीकृष्ण जङ्गम श्रीगौरचन्द्रके रूपमें अवतरित हुए हैं॥151॥ श्रीजगन्नाथके दर्शनसे और श्रीगौरके प्रचारसे जीवोंका उद्धार :- जगन्नाथेर दर्शने खण्डाय संसार। सब देशेर सब-लोक नारे आसिबार॥152॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनसे जीवका संसार-बन्धन कट जाता है, किन्तु समस्त देशोंके सभी लोग उनके दर्शनके लिये नहीं आ पाते॥152॥ श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु देशे देशे याञा। सब-लोके निस्तारिला जङ्गम-ब्रह्म हञा॥153॥ अनुवाद—इसलिये जङ्गम ब्रह्मके रूपमें अवतरित श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने देश-देशमें जाकर समस्त जगत्-वासियोंका उद्धार किया॥153॥ सरस्वतीर अर्थ एइ कहिलुँ विवरण। एहो भाग्य तोमार, यैछे करिला वर्णन॥154॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने सरस्वतीदेवी जो तुम्हारे श्लोकका स्तुतिपरक अर्थ करेंगी, उसका वर्णन किया है। यह तुम्हारा सौभाग्य ही है कि तुमने श्रीजगन्नाथदेव और श्रीचैतन्य महाप्रभुका अपने श्लोकमें ऐसा वर्णन किया है॥154॥