श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें166 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/1-8 ] श्रीरघुनाथदास गोस्वामी रचित विलापकुसुमाञ्जलि स्तवमें— “यो मां दुस्तरनिर्जलमहाकूपादपारक्लमात् सद्यः सान्द्रदयाम्बुधिः प्रकृतितः स्वैरीकृपारज्जुभिः। उद्धृत्यात्मसरोजनिन्दिचरणप्रान्तं प्रपाद्य स्वयं श्रीदामोदरसाच्चकार तमहं चैतन्यचन्द्रं भजे॥” [अर्थात् “स्वभावतः घनीभूत दयाके सागर जिन्होंने मुझे अत्यन्त क्लेशपूर्ण, बड़ी कठिनाईसे पार होनेवाले गृहरूपी जलशून्य महाकूपसे स्वतन्त्र कृपारूपी रस्सीके द्वारा उद्धार करके कमलकी शोभाको भी धिक्कार देनेवाले अपने चरणोंमें आश्रय प्रदान करके बादमें श्रीस्वरूप-दामोदर प्रभुके हाथोंमें समर्पित किया था, मैं उन्हीं श्रीचैतन्यचन्द्रका भजन करता हूँ।"]॥1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥ नीलाचलमें गौरलीला :- एइमत गौरचन्द्र भक्तगण-सङ्गे। नीलाचले नाना लीला करे नाना रङ्गे ॥3॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र भक्तोंके साथ नीलाचलमें अनेक प्रकारकी आनन्द प्रदान करनेवाली लीलाएँ कर रहे थे॥3॥ अपने भक्तोंके कष्टकी आशङ्कासे अपने कृष्ण-विरहरूपी दुःखका सङ्गोपन करना :- यद्यपि अन्तरे कृष्णवियोग बाधये। बाहिरे ना प्रकाशय भक्त-दुःख-भये ॥4॥ अनुवाद-यद्यपि कृष्ण-वियोग भीतरसे महाप्रभुके हृदयको पीड़ित करता था, तथापि भक्तोंके दुःखके भयसे उसे बाहरमें प्रकाशित नहीं करते थे॥4॥ सुतीव्र कृष्ण-विच्छेद-दुःखमें महाप्रभुकी अवर्णनीय व्याकुलता :- उत्कट विरह-दुःख यबे बाहिराय। तबे ये वैकल्य प्रभुर वर्णन ना याय॥5॥ अनुवाद-जब महाप्रभुके हृदयका तीव्र विरह-दुःख बाहर निकलता, उस समय उनमें कैसी व्याकुलता होती, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥5॥ विप्रलम्भ दशामें श्रीरायका कृष्णकथाका संलाप और श्रीस्वरूपका गान ही महाप्रभुके लिये जीवन-स्वरूप :- रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर गान। विरह-वेदनाव् प्रभुर राखये पराण ॥6॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-वेदनामें श्रीराम force-वेदनामें श्रीराम forceानन्द रायकी श्रीकृष्णकथा तथा श्रीस्वरूप दामोदरका गान ही उनके प्राणोंकी रक्षा करते थे॥6॥ अनेक लोगोंके साथ नाना प्रकारके कृष्ण-प्रसङ्गोंमें विरहके गुरुत्वका कम होना, रात्रिमें निर्जनमें कृष्णविरह-दुःखकी वृद्धि :- दिने प्रभु नाना-सङ्गे हय अन्य मन। रात्रिकाले बाड़े प्रभुर विरह-वेदन ॥7॥ अनुवाद-दिनके समय तो अनेक भक्तोंके साथ मिलनेके कारण महाप्रभुका मन विरहसे कुछ हट जाता था, किन्तु रात्रिके समय महाप्रभुकी विरह-वेदना बहुत बढ़ जाती॥7॥ श्रीस्वरूप और श्रीरामरायके द्वारा उनके भावोंके उपयोगी वचन और गानके द्वारा महाप्रभुको आश्वासन :- ताँर सुखहेतु सङ्गे रहे दुइजना। कृष्णरस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥8॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-वेदनाको शान्त करनेके लिये श्रीस्वरूप दामोदर तथा श्रीराम forceानन्द राय-दोनों उनके साथ रहते और श्रीकृष्णरससे परिपूर्ण श्लोक एवं गीत सुनाकर महाप्रभुको सान्त्वना प्रदान करते ॥8॥