भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2182, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2182

छठा अध्याय कथासार—महाप्रभुमें कृष्णप्रेमके तीव्र भावोंके उदय होनेके समय श्रीस्वरूप और श्रीरामानन्द उन्हें अनेक प्रकारसे सान्त्वना प्रदान करते थे। उसी समय श्रीरघुनाथदास भी पुरीमें आ गये। श्रीरघुनाथदास बहुत दिनोंसे महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय करनेका प्रयत्न कर रहे थे। महाप्रभु वृन्दावन जानेके छलसे जिस समय शान्तिपुर गये, तब उनके चरणोंका आश्रय करनेकी प्रार्थना करनेपर महाप्रभुने उन्हें [श्रीरघुनाथदासको] युक्त-वैराग्यका आश्रय करनेका उपदेश दिया। उन्हीं दिनों किसी म्लेच्छ-चौधरीने श्रीहिरण्यदासके प्रति ईर्ष्या करके गौड़से वजीरको बुलवाया, श्रीहिरण्यदास वहाँसे भाग गये। श्रीरघुनाथदासकी बुद्धिके बलसे श्रीहिरण्यदासका वह सङ्कट दूर हो गया। श्रीरघुनाथदासने पाणिहाटी जाकर श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे चिड़वा-दहीका महोत्सव किया। उस महोत्सवके अगले दिन श्रीनित्यानन्द प्रभुने कृपा करके श्रीरघुनाथको श्रीचैतन्यचरण प्राप्त करनेका आशीर्वाद दिया। उसके बाद रात्रिमें श्रीवासुदेव-दत्तके अनुगृहीत और अपने गुरु एवं पुरोहित श्रीयदुनन्दन आचार्यके श्रीरघुनाथके घरपर आनेसे श्रीरघुनाथ उनके साथ कुछ दूरी तक जाकर वहाँसे अकेले भाग गये। गुप्त मार्गसे जाकर बारह दिनोंमें पुरुषोत्तम क्षेत्रमें पहुँचकर महाप्रभुके चरणकमलोंमें जाकर पड़े। महाप्रभुने उन्हें 'स्वरूपके रघु' यह नाम देकर श्रीस्वरूप गोस्वामीके हाथोंमें समर्पित किया। श्रीरघुनाथने वहाँ पाँच दिन तक प्रसाद पाया और उसके बाद बहुत दिनों तक सिंहद्वारपर अयाचक-वृत्तिका पालन किया। बादमें छत्रमें महाप्रसाद माँगकर खाने लगे। श्रीरघुनाथके पिताने [उनके पुरीमें होनेका] संवाद पाकर कुछ सेवक और धन भेजा, किन्तु श्रीरघुनाथने उनसे कोई स्थूल धन-जनादि ग्रहण नहीं किया। महाप्रभुने श्रीरघुनाथके छत्रमें भिक्षा करनेकी बातको सुनकर उन्हें अपनी गुञ्जामाला और गोवर्धन शिला प्रदान की। बादमें श्रीदास गोस्वामीने मार्गमें फेंके गये बासी-सड़े हुए प्रसादको धोकर खाना आरम्भ किया, उससे श्रीस्वरूप और महाप्रभुने सन्तुष्ट होकर एकदिन उस प्रसादको बलपूर्वक आस्वादन करके श्रीरघुनाथपर कृपा की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीरघुनाथको श्रीस्वरूपके हाथोंमें अर्पण करनेके बाद आत्मसात् करनेवाले श्रीगौरको प्रणाम :- कृपागुणैर्यः कुगृहान्धकूपादुद्धृत्य भंग्या रघुनाथदासम्। न्यस्य स्वरूपे विदधेऽन्तरङ्गं श्रीकृष्णचैतन्यममुं प्रपद्ये॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने अपनी कृपारूपी रस्सीके द्वारा श्रीरघुनाथदासका गृहरूपी अन्धकूपसे कुशलतासे उद्धार करके उन्हें श्रीस्वरूपके निकट अर्पण करके अपना अन्तरङ्ग भक्त बनाया था, मैं उन्हीं श्रीकृष्णचैतन्यके चरणकमलोंमें शरणागत होता हूँ॥१॥ अनुभाष्य— यः (चैतन्यदेवः) कृपागुणैः (अनुकम्पा-वितरणैः) कुगृहान्धकूपात् (कु कुत्सितं पुंस्त्रीपुत्रादिकथाबहुलं गृहमेव अन्धकूपः निर्गमनपथरहितः, तस्मात्) रघुनाथदासं (दासगोस्वामिनं) भंग्या (कौशलेन) उद्धृत्य (उत्थाप्य) स्वरूपे (दामोदर-स्वरूप-गोस्वामिनि) न्यस्य (समर्प्य) अन्तरङ्गं (निजजनं) विदधे (चकार), अमुं तं श्रीकृष्णचैतन्यम् अहं प्रपद्ये (शरणं व्रजामि)। श्लोक-भावानुवाद—जिन्होंने अनुकम्पा करके श्रीदासगोस्वामीका गृहान्धकूपसे (निन्दित पुरुष-स्त्री-पुत्रादिकी बातोंके आधिक्यवाले गृहरूपी अन्धकूप जिससे बाहर निकलनेका मार्ग नहीं है, उससे) कुशलतापूर्वक उद्धार करके श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीको समर्पित करके अन्तरङ्ग-भक्त बनाया, उन श्रीकृष्णचैतन्यके मैं शरणागत होता हूँ।