भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2184

[ 6/9-15 छठा अध्याय 167 श्रीकृष्णके जैसे सुबल सखा हैं, महाप्रभुके भी वैसे श्रीराम-राय :- सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय। गौरसुखदान-हेतु तैछे राम-राय॥9॥ अनुवाद—श्रीकृष्णलीलाके समय जैसे सुबल सखा उनकी श्रीराधासे विरहके समय उन्हें सुखी करनेके लिये सहायता प्रदान करते थे, उसी प्रकार श्रीरामानन्द राय श्रीगौरसुन्दरको सुखी करनेके लिये सहायता करते॥9॥ श्रीराधाकी जैसे ललिता सखी, महाप्रभुके लिये भी वैसे श्रीस्वरूप-दामोदर :- पूर्वे यैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान। तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे प्रभुर प्राण॥10॥ अनुवाद—पहले जैसे श्रीराधाकी विरह दशामें उनके प्राणोंकी रक्षाके लिये श्रीललिता प्रधान सहायिका थीं, उसी प्रकार श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा करते थे॥10॥ दोनों ही महाप्रभुके परमप्रेष्ठ अन्तरङ्ग :- दुइ जनार सौभाग्य कहन ना याय। प्रभुर 'अन्तरङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय॥11॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय तथा श्रीस्वरूप दामोदरके सौभाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे महाप्रभुके अन्तरङ्गके रूपमें जगत्में प्रसिद्ध थे॥11॥ महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथके मिलनके वृत्तान्तका वर्णन :- एइमत विहरे गौर लञा भक्तगण। रघुनाथ-मिलन एबे सुन, भक्तगण॥12॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर अपने भक्तोंके साथ विहार करते थे। हे भक्तों! अब महाप्रभुके साथ श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके मिलनेका प्रसङ्ग सुनो॥12॥ पूर्वकालमें कानाइ-नाटशालासे पुरी लौटते समय मार्गमें शान्तिपुरमें महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको शिक्षा :- पूर्वे शान्तिपुरे रघुनाथ यबे आइला। महाप्रभु कृपा करि' ताँरे शिखाइला॥13॥ अनुवाद—पहले जब श्रीरघुनाथदास शान्तिपुरमें महाप्रभुके दर्शनके लिये आये थे, तब महाप्रभुने उन्हें कृपा करके शिक्षा प्रदान की थी॥13॥ महाप्रभुकी शिक्षाके अनुसार श्रीरघुनाथके द्वारा घरमें युक्त- वैराग्यका आचरण, बाहरी रूपमें विषयीकी भाँति और भीतरमें निर्विषय निष्किञ्चन और श्रीकृष्णके लिये अखिल चेष्टासे युक्त :- प्रभुर शिक्षाते तैं हो निज-घरे याय। मर्कट-वैराग्य छाड़ि' हइला 'विषयी-प्राय'॥14॥ अनुवाद—महाप्रभुकी शिक्षानुसार श्रीरघुनाथदास अपने घर लौट गये और वे मर्कट-वैराग्यको छोड़कर बाहरी रूपसे विषयीकी भाँति व्यवहार करने लगे॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मर्कट-वैराग्य',—गृहस्थ व्यक्तिके द्वारा वैरागीके वेषादिको धारण करके रहनेपर भी उसे 'मर्कट-वैरागी' कहते हैं॥14॥ अनुभाष्य—श्रीरघुनाथको शिक्षा,—मध्यलीला 16/238-243 संख्या देखें। लोगोंकी दृष्टिमें 'विषयी'के जैसे श्रीरघुनाथने भोगोंमें आसक्त बन्दरके बाह्य-वैराग्यके प्रदर्शनकी रीतिका अनुकरण सम्पूर्ण रूपसे त्याग दिया॥13-14॥ भितरे वैराग्य, बाहिरे करे सर्व कर्म। देखिया त' माता-पितार आनन्दित मन॥15॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास भीतरसे विरक्त थे, परन्तु बाहरसे विषयी व्यक्तियोंकी भाँति सब कार्य करने लगे। उनके ऐसे व्यवहारको देखकर उनके माता-पिताको बहुत आनन्द हुआ॥15॥ अनुभाष्य—हृदयमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंको एकबार भी आवाहन नहीं करनेपर लोकदृष्टिमें सब प्रकारके विषय-कार्य करने लगे॥15॥