श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2165, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें148 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/61-70 ] श्रीमिश्रकी दैन्योक्ति :- आनेर कि कथा, तुमि-प्रभुर उपदेष्टा ! आमि त' भिक्षुक विप्र, तुमि-मोर पोष्टा ॥ 61 ॥ अनुवाद-औरोंकी तो बात ही क्या, आप तो महाप्रभुको भी उपदेश देनेवाले हैं! मैं तो एक भिक्षुक ब्राह्मण हूँ और आप मेरे पालनकर्त्ता हैं ॥ 61 ॥ भाल-मन्द-किछु आमि पुछिते ना जानि। 'दीन' देखि' कृपा करि' कहिबा आपनि ॥” 62 ॥ अनुवाद-मुझे पूछना नहीं आता, क्योंकि मैं अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं जानता हूँ। आप मुझे दीन जानकर कृपा करके मेरे लिये जो श्रेयस्कर हो वह कहिये ॥” 62 ॥ श्रीरामानन्दके द्वारा कृष्णकथाका कीर्तन :- तबे रामानन्द क्रमे कहिते लागिला। कृष्णकथा-रसामृत-सिन्धु उथलिला ॥ 63 ॥ अनुवाद-तब श्रीरामानन्द राय क्रमसे श्रीकृष्णकथा कहने लगे, जिससे श्रीकृष्णकथारूपी रसामृत-सिन्धुमें उत्ताल तरङ्गों उठने लगीं ॥ 63 ॥ शिष्यका अधिकार समझकर स्वयं ही प्रश्न करने और उत्तर देनेवाले :- आपने प्रश्न करि' पाछे करेन सिद्धान्त। तृतीय प्रहर हैल, नहे कथा-अन्त ॥ 64 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द राय स्वयं ही प्रश्न करते और फिर सिद्धान्तके अनुसार उसका उत्तर देते। इस प्रकार तीसरा प्रहर हो गया, किन्तु तब भी कथा समाप्त नहीं हुई ॥ 64 ॥ दोनोंको ही श्रीकृष्णकथामें आत्म-विस्मृति :- वक्ता श्रोता कहे शुने दुँहे प्रेमावेशे। आत्मस्मृति नाहि, काहाँ जाने दिन-शेषे ॥ 65 ॥ अनुवाद-वक्ता और श्रोता, दोनों श्रीकृष्णकथाके कीर्तन-श्रवणसे प्रेममें आविष्ट हो गये तथा जब उन्हें आत्मस्मृति ही नहीं रहीं, तब वे कैसे जानते कि दिन समाप्त हो गया है ॥ 65 ॥ श्रीकृष्णकी कथामें दिनका ढलना :- सेवक कहिल, - “दिन हैल अवसान।” तबे राय कृष्णकथार करिला विश्राम ॥ 66 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायके सेवकने आकर कहा, - “दिन समाप्त हो गया है।” तब श्रीरामानन्द रायने श्रीकृष्णकथाको विश्राम दिया ॥ 66 ॥ श्रीमिश्रको विदायी देना और श्रीमिश्रका हर्ष :- बहुसम्मान करि' मिश्रे विदाय दिला। 'कृतार्थ हइलाङ' बलि' नाचिते लागिला ॥ 67 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने बहुत सम्मानके साथ श्रीप्रद्युम्न मिश्रको विदायी दी। 'मैं कृतार्थ हुआ'- ऐसा कहकर श्रीप्रद्युम्न मिश्र नृत्य करने लगे ॥ 67 ॥ सन्ध्याके समय महाप्रभुके निकट श्रीमिश्रका आगमन :- घरे गिया मिश्र कैल स्नान, भोजन। सन्ध्याकाले देखिते आइल प्रभुर चरण ॥ 68 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्रने घर जाकर स्नान और भोजन किया। वे सन्ध्याके समय महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शन करनेके लिये आये ॥ 68 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमिश्रसे कृष्णकथाके श्रवणके विषयमें जिज्ञासा :- प्रभुर चरण वन्दे उल्लसित-मने। प्रभु कहे,-“कृष्णकथा हइल श्रवणे??” 69 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्रने उल्लसित मनसे महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की। महाप्रभुने उनसे पूछा,-“क्या कृष्णकथाका श्रवण किया?” 69 ॥ श्रीमिश्रके द्वारा अपनी कृतार्थता जतलाना :- मिश्र कहे,-“प्रभु, मोरे कृतार्थ करिला। कृष्णकथामृतार्णवे मोरे डुबाइला ॥ 70 ॥