श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2164, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/51-60 पाँचवाँ अध्याय 147 अनुवाद-रामानन्द रायका भजन रागानुग-मार्गीय है। वे सिद्धदेहमें हैं, इसलिये उनका मन प्राकृत विषयोंसे क्षुब्ध नहीं होता ॥ ५१ ॥ श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीति-चेष्टामयी श्रीकृष्णतत्त्व-विद्या ही गुरुत्वका प्रमाण है, उच्चकुलमें जन्म नहीं :- आमिह रायेर स्थाने शुनि कृष्णकथा। शुनिते इच्छा हय यदि, पुनः याह तथा ॥ ५२ ॥ अनुवाद-मैं स्वयं भी रामानन्द रायसे कृष्णकथा श्रवण करता हूँ। यदि तुम्हारी कृष्णकथा सुननेकी इच्छा हो, तो पुनः उन्हींके पास जाओ॥ ५२ ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमिश्रको श्रीरायके समीप शिष्यत्व प्राप्त करनेके लिये पुनः भेजना :- मोर नाम कहिह, - 'तेँहो पाठाइला मोरे। तोमार स्थाने कृष्णकथा शुनिवार तरे ॥ '५३ ॥ अनुवाद-तुम रामानन्द रायके पास जाकर मेरा नाम लेकर कहना, - 'उन्होंने मुझे आपके पास कृष्णकथा सुननेके लिये भेजा है॥'५३ ॥ शीघ्र याह, यावत् तेँहो आछेन सभाते।" एत शुनि' प्रद्युम्न-मिश्र चलिला त्वरिते ॥ ५४ ॥ अनुवाद-तुम शीघ्र जाओ जब तक रामानन्द राय सभामें है।" यह सुनकर श्रीप्रद्युम्न मिश्र तुरन्त चल पड़े॥ ५४॥ श्रीमिश्रका श्रीरायके घरमें जाना, अमानी और मानद श्रीरायके द्वारा श्रीमिश्रका अभिनन्दन :- राय-पाशे गेल, राय प्रणति करिल। “आज्ञा कर, ये लागि' आगमन हैल ॥ ”५५ ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीरामानन्द रायके पास पहुँचे। श्रीरामानन्द रायने उन्हें प्रणाम किया और पूछा, - “कृपया आज्ञा कीजिये। आपका किस उद्देश्यसे यहाँ आगमन हुआ है॥” ५५ ॥ श्रीमिश्रके द्वारा महाप्रभुका परिचय प्रदान :- मिश्र कहे, - “महाप्रभु पाठाइला मोरे। तोमार स्थाने कृष्णकथा शुनिवार तरे ॥ ”५६ ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न मिश्रने कहा, - “महाप्रभुने मुझे आपसे श्रीकृष्णकथा सुननेके लिये भेजा है॥” ५६ ॥ श्रीरायका आनन्द :- शुनि' रामानन्द राय हइला सन्तोषे। कहिते लागिला किछु मनेर हरिषे ॥ ५७ ॥ महाप्रभुकी आदेश-वाणीके श्रवणसे श्रीरायके द्वारा अपने सौभाग्यका वर्णन :- “प्रभुर आज्ञाय कृष्णकथा शुनिते आइला एथा। इहा वइ महाभाग्य आमि पाब कोथा ? ?' ५८ ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीरामानन्द राय बहुत प्रसन्न हुए। वे हर्षित होकर कहने लगे, - “आप महाप्रभुकी आज्ञासे कृष्णकथा सुननेके लिये यहाँपर आये हैं। इससे बढ़कर परम सौभाग्य मुझे और कहाँपर मिलेगा ?” ५७-58 ॥ एकान्तमें श्रीमिश्रसे जिज्ञासा :- एत कहि' तारे लञा निभृते बसिला। “कि कथा शुनिते चाह?” मिश्रे पुछिला ॥ ५९ ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीरामानन्द राय श्रीप्रद्युम्न मिश्रको एकान्त स्थानपर ले जाकर बैठ गये और उनसे पूछा, - “आप किस विषयको सुनना चाहते हैं?” ५९ ॥ पहले श्रीराय-महाप्रभु-संवादमें वर्णित सम्बन्ध-अभिधेय- प्रयोजनात्मक श्रीकृष्णकथाको पुनः सुनानेकी प्रार्थना :- तेँहो कहे, - “ये कहिला विद्यानगरे। सेइ कथा क्रमे तुमि कहिबा आमारे ॥ ६० ॥ अनुवाद-श्रीमिश्रने कहा, - “आपने जिस विषयको विद्यानगरमें सुनाया था, वही कथा आप क्रमसे मुझे सुनाइये ॥ ६० ॥