भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2163

146 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/48-51 ] भागवत-शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (10/33/39) में— विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ 48 ॥ अनुवाद—जो धीरपुरुष व्रजदेवियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रासविलासका श्रद्धाके साथ बारम्बार श्रवण या वर्णन करता है, उसे प्रथमतः भगवान्‌के चरणोंमें पराभक्तिकी प्राप्ति होती है और फिर वह बहुत शीघ्र ही जितेन्द्रिय होकर अपने हृदयके रोग अर्थात् लौकिक कामभावसे सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो अप्राकृत-श्रद्धासे युक्त होकर इस रासपञ्चाध्यायमें व्रजवधुओंके साथ श्रीकृष्णकी अप्राकृत क्रीड़ाके वर्णनको सुनता अथवा वर्णन करता है, वह धीर पुरुष भगवान्‌में यथेष्ट परा-भक्ति प्राप्त करके हृदयरोगरूपी जड़्रीय कामको शीघ्र ही दूर करता है। तात्पर्य यह है कि, श्रीकृष्णलीला—सम्पूर्णतः 'चिन्मय' है। चिन्मयी गोपियोंके साथ पूर्ण चिन्मय (अधोक्षज) श्रीकृष्णकी लीला श्रद्धापूर्वक अर्थात् चिन्मय-तत्त्वकी उपलब्धि करनेके यत्नसहित विवेचन करते-करते चिद्-प्रेमके उदित होनेके परिमाणानुसार जड़्रीय आसक्ति एवं जड़्रीय काम आदि दूर होते रहते हैं; सम्पूर्ण चिन्मय-लीलाके उदित होनेपर फिर किञ्चित् भी जड़्रीय कामकी गन्ध नहीं रहती॥ 48 ॥ अनुभाष्य— यः पुमान् श्रद्धान्वितः (श्रद्धया अप्राकृतसुदृढ़विश्वासेन युक्तः सेवोन्मुखः सन्) व्रजवधूभिः (गोपीभिः सह) विष्णोः (नन्दनन्दनस्य परमस्य विभोः) इदं (पूर्वोक्त-रासपञ्चाध्यायोक्तं) च विक्रीड़ितं (रासाख्यां विशिष्टां क्रीड़ां) अनुशृणुयात् (अनु निरन्तरं गुरुमुखात् प्राकृतव्यवधानराहित्येन शृणुयात्) अथ (अनन्तरं) वर्णयेत् (रूपानुक्रमपथा कृष्णनामरूपगुणलीलादिकं सङ्कीर्त्तनं कुर्यात् सः) धीरः (षड्वेगजयी अचञ्चल रागानुगः गोस्वामी) अचिरेण भगवति (कृष्णे) परां भक्तिम् (उत्कृष्टां प्रेमभक्तिं) प्रतिलभ्य (प्राप्य) हृद्रोगं (मनोभवकामरूपाधिम्) आशु (शीघ्रम्) अपहिनोति (दूरीकरोति)। श्लोक-भावानुवाद—जो पुरुष अप्राकृत सुदृढ़विश्वासयुक्त अर्थात् सेवोन्मुख होकर गोपियोंके साथ स्वयं भगवान् नन्दनन्दनकी रासपञ्चाध्यायमें उक्त रास-नामक विशेष क्रीड़ाको गुरुमुखसे सांसारिक बाधासे रहित श्रवण करके बादमें रूपानुक्रम पथसे श्रीकृष्णनामरूपगुणलीलादिका कीर्तन करता है, वह षड्वेगजयी रागानुग गोस्वामी होकर शीघ्र ही श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट प्रेमभक्ति प्राप्त करके मनोभवकामरूप व्याधिको शीघ्र ही दूर करता है॥ 48 ॥ रागानुगजनोंकी निरन्तर श्रीकृष्णलीलाके अनुशीलनसे स्वरूपसिद्धि और चिदानन्द देहकी प्राप्ति :— ये शुने, ये पड़े, ताँर फल एतादृशी। सेइ भावाविष्ट, येइ सेवे अहर्निशि॥ 49 ॥ ताँर फल कि कहिमु, कहने ना याय। नित्यसिद्ध सेइ, प्राय-सिद्ध ताँर काय॥ 50 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 49-50 ॥ अनुभाष्य—जो श्रीकृष्णके अप्राकृत रासादि विलासका श्रवण और कीर्तन करता है एवं श्रीरूपके अप्राकृत भावानुसार सदा ही शुद्ध अकृत्रिम-रागमें आविष्ट होकर मनसे श्रीकृष्णसेवा करता है, उसके अपूर्व फलकी प्राप्ति प्राकृत-भाषाके द्वारा वर्णनीय नहीं है। वह नित्यसिद्ध पार्षद है, अथवा उसका सिद्धप्राय शरीर लोगोंके नेत्रोंसे दिखलायी देनेपर भी स्वरूपसिद्धि-प्राप्त श्रीकृष्णसेवापरायण भावोंका आश्रय होनेके कारण अप्राकृत क्रियामें लगा होता है। श्रीकृष्णकी इच्छासे वस्तुसिद्धिकी अपेक्षा करनेवाला उसका शरीर सिद्धप्राय और अप्राकृत होता है॥ 49-50 ॥ रागात्मिका-भक्तिका पालन करनेवाले नित्यसिद्ध श्रीराय :— रागानुग-मार्गे जानि रायेर भजन। सिद्धदेह-तुल्य, ताते 'प्राकृत' नहे मन॥ 51 ॥