श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 5/44-47 पाँचवाँ अध्याय 145 अमल शब्द-प्रमाण श्रीभागवतके आनुगत्यमें ही अनुमानकी सार्थकता; श्रीरायकी अप्राकृत चित्तवृत्तिके हेतु निर्देशरूपी सिद्धान्त :- किन्तु शास्त्रदृष्ट्ये करि एक अनुमान। श्रीभागवत-शास्त्र-ताहाते प्रमाण ॥ 44 ॥ अनुवाद-किन्तु शास्त्रोंके निर्देशानुसार मैं एक अनुमान कर रहा हूँ। श्रीभागवत शास्त्र उस विषयमें प्रमाण प्रदान करता है ॥ 44 ॥ अप्राकृत श्रद्धा अथवा रागानुगा भक्तिका पालन करनेवालेको श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनके फलसे सिद्धि अथवा गोस्वामित्वकी प्राप्ति :- व्रजवधु-सङ्गे कृष्णेर रासादि-विलास। येइ जन कहे, सुने करिया विश्वास ॥ 45 ॥ हृद्रोग-काम ताँर तत्काले हय क्षय। तिनगुण-क्षोभ नहे, 'महाधीर' हय ॥ 46 ॥ अनुवाद-जो भी व्यक्ति व्रजगोपियोंके साथ श्रीकृष्णके रासादि विलासका विश्वासपूर्वक श्रवण अथवा कीर्तन करता है, उसके हृदयका रोग अर्थात् काम तत्काल क्षय हो जाता है। उसमें मायाके तीन गुणोंसे उत्पन्न होनेवाले क्षोभ (विकार) नहीं रहते और वह व्यक्ति महाधीर बन जाता है ॥ 45-46 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'तिनगुण',-सत्त्व, रजः और तमः,-इन तीन गुणोंके क्षोभसे जो स्त्री-पुरुषके व्यवहारकी इच्छा होती है, ऐसी इच्छा उसमें नहीं रहती ॥ 46 ॥ अनुभाष्य-जो व्यक्ति श्रीमद्भागवतमें वर्णित श्रीकृष्णकी अप्राकृत-रासादि मधुर लीलाका अपने अप्राकृत-हृदयके द्वारा विश्वास करके वर्णन करते हैं अथवा श्रवण करते हैं, उनका प्राकृत मनके द्वारा सृजित काम सम्पूर्णरूपसे क्षीण हो जाता है। अप्राकृत श्रीकृष्णलीलाके वक्ता अथवा श्रोता अप्राकृत-राज्यमें अपने अस्तित्वका अनुभव करते हैं, जिसके फलस्वरूप प्रकृतिके तीन गुण उन्हें पराजित करनेमें समर्थ नहीं होते। वे जड़ वस्तुओंमें परम निर्गुण-भावसे युक्त होकर स्थिरमति एवं श्रीकृष्णकी सेवामें अपना अधिकार समझनेमें समर्थ होते हैं। प्राकृत सहजिया लोगोंकी भाँति इस प्रसङ्गमें कोई इस प्रकार नहीं समझे कि, 'प्राकृत कामसे लुब्ध जीव यदि सम्बन्ध-ज्ञान प्राप्त करनेके स्थानपर प्राकृत-बुद्धिसे युक्त होकर अपने भोगमय राज्यमें वास करते हुए साधनभक्तिका परित्याग करके श्रीकृष्णके रासादि अप्राकृत विहार अथवा लीलाको अपने जैसे प्राकृत-भोगका आदर्श जानकर, उसका श्रवण और कीर्तनादि करे तो उसका जड़़ीय काम विनष्ट हो जायेगा।' इसका निषेध करनेके लिये ही महाप्रभुने 'विश्वास'-शब्दके द्वारा प्राकृत सहजिया लोगोंकी प्राकृत बुद्धिका खण्डन किया है। श्रीशुकने भी (भाः 10/33/30 श्लोकमें) कहा है,- “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन् मौढ्याद्यथा-रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥" [अर्थात् “परन्तु जो अनीश्वर-असमर्थ हैं, उन्हें मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये, शरीरसे करना तो दूर रहा। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वरकी इस लीलाका अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट-पतित हो जायेगा। भगवान् शिवने समुद्रसे उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।"] ॥ 45-46 ॥ श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनसे कृष्णप्रेमानन्दके सिन्धुकी वृद्धि :- उज्ज्वल मधुर-रस प्रेमभक्ति पाय। आनन्दे कृष्णमाधुर्य विहरे सदाय ॥ 47 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णलीलाके श्रवण-कीर्तनसे भक्तको उज्ज्वल मधुर-रसरूपी प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है और वह सदैव आनन्दपूर्वक कृष्णके माधुर्यमें ही विहार करता है ॥ 47 ॥