श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें144 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 5/34-43 ] तबहिँ विकार पाय मोर तनु-मन। प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन?? 36॥ अनुवाद-तब श्रीप्रद्युम्न मिश्रने श्रीरामानन्द रायके कार्यकलापको कह सुनाया। श्रीप्रद्युम्न मिश्रकी बात सुनकर महाप्रभु उनसे कहने लगे, - 'मैं तो संन्यासी हूँ और अपनेको विरक्त मानता हूँ। दर्शनकी बात तो दूर रहे, स्त्रीका नाम श्रवण करनेसे ही मेरे तन और मनमें विकार हो जाता है। स्त्रीके दर्शनसे कौन व्यक्ति स्थिर रह सकता है? 34-36 ॥ अनुभाष्य- 'प्रकृति', - पुरुषभोग-योग्य 'योषित्' अथवा स्त्री ॥ 35 ॥ इन्द्रियसुखकी लालसा और स्त्री-दर्शनकी प्रवृत्तिसे रहित विरक्त विद्वत्-संन्यासी शिरोमणि अधोक्षज-द्रष्टा महाभागवत आत्माराम श्रीरामानन्द-गोस्वामीके चरित्रका वर्णन :- रामानन्द रायेर कथा शुन, सर्वजन। कहिवार कथा नहे, याहा आश्चर्य-कथन ॥ 37 ॥ अनुवाद-सभी राय रामानन्दके विषयमें श्रवण कीजिये, यह बात ऐसी आश्चर्यजनक है कि वह कहने योग्य नहीं है ॥ 37 ॥ एके देवदासी, आर सुन्दरी तरुणी। ताहादेर सब सेवा करेन आपनि ॥ 38 ॥ अनुवाद-वे देवदासियाँ अति सुन्दरी और नवयुवती हैं, उसपर रामानन्द राय स्वयं उनकी सब प्रकारकी सेवाएँ करते हैं॥ 38॥ अनुभाष्य- 'सब सेवा', - सब प्रकारकी सेवा (39 संख्या देखें) ॥ 38॥ स्नानादि कराय, पराय वास-विभूषण। गुह्य अङ्ग यत, तार दर्शन-स्पर्शन ॥ 39 ॥ तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन। नानाभावोद्गम तारे कराय शिक्षण ॥ 40 ॥ निर्विकार देह-मन-काष्ठ-पाषाण सम! आश्चर्य, - तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥ 41 ॥ अनुवाद-वे स्वयं उन देवदासियोंको स्नानादि कराते हैं, उन्हें वस्त्र-आभूषणादिसे विभूषित करते हैं। यद्यपि ऐसा करते समय उनका देवदासियोंके गुप्त अङ्गोंका दर्शन तथा स्पर्श करना भी होता है, तथापि रामानन्द रायका मन निर्विकार रहता है। रामानन्द राय उन देवदासियोंको अनेक प्रकारके भावोंको प्रकाशित करनेकी शिक्षा प्रदान करते हैं। परन्तु लकड़ी अथवा पत्थरके समान रामानन्द रायका शरीर तथा मन विकाररहित होता है। अति आश्चर्यकी बात है कि नवयुवती कन्याओंका स्पर्श करनेपर भी उनका मन निर्विकार रहता है॥ 39-41 ॥ अनुभाष्य- 'नानाभावोद्गम', - कृष्णलीलाके अभिनयके उपयोगी तैंतीस प्रकारके भावोंका प्रकाश। वर्धित होनेके धर्मसे रहित अचेतन लकड़ी और द्रवीभूत होनेके धर्मसे रहित कठोर पत्थरकी भाँति रामानन्दके शरीर एवं मनमें विकार उत्पन्न नहीं होता ॥ 40-41 ॥ फलके द्वारा कारणका अनुमान; गुणातीत शुद्धसत्त्व चिद्वस्तुका प्राकृत गुणके स्पर्श-रहित होनेके कारण श्रीरामानन्दकी देह-अप्राकृत चिदानन्द :- एक रामानन्देर हय एइ अधिकार। ताते जानि अप्राकृत-देह ताँहार ॥ 42 ॥ अनुवाद-एकमात्र रामानन्द रायका ऐसा अधिकार है। इसके द्वारा मैं समझता हूँ कि रामानन्द रायका शरीर अप्राकृत है॥ 42 ॥ अधोक्षज भक्तकी चित्तवृत्ति-जड़ीय-ज्ञानसे अतीत :- ताँहार मनेर भाव तँह जाने मात्र। ताहा जानिवारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥ 43 ॥ अनुवाद-एकमात्र रामानन्द राय ही अपने मनके भावोंको जानते हैं, उनके मनके भावोंको जाननेवाला दूसरा कोई योग्य व्यक्ति नहीं है॥ 43 ॥