भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2156

पाँचवाँ अध्याय कथासार—श्रीहट्ट-निवासी श्रीप्रद्युम्न मिश्रके द्वारा महाप्रभुसे श्रीकृष्णकथाको श्रवण करनेकी इच्छा करनेपर, महाप्रभुने उन्हें श्रीराय रामानन्दके पास भेजा। देवदासियोंके साथ श्रीरामानन्दके व्यवहारको सुनकर श्रीप्रद्युम्न मिश्र वहाँसे लौट आये। बादमें महाप्रभुने श्रीप्रद्युम्न मिश्रको श्रीरामानन्दके तत्त्वके विषयमें भली-भाँति समझा दिया। श्रीमिश्रने पुनः जाकर श्रीरामानन्दसे तत्त्व-उपदेश ग्रहण किये। बङ्गाल-देशके एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुकी लीलाके सम्बन्धमें एक नाटककी रचना करके लानेपर श्रीस्वरूप-गोस्वामीने उसे श्रवण करके उसमें मायावाद-दोष दिखला दिये, तथापि उन ब्राह्मणके द्वारा रचित कविताका दूसरा अर्थ करके उन्हें सन्तुष्ट किया; तब वे कवि चरितार्थ होकर सर्वस्व त्याग करके नीलाचलमें वैष्णवोंके आश्रयमें ही रहे। —(अमृतप्रवाह भाष्य) भवरोगग्रस्त संसार-समुद्रमें पतित अचैतन्य जीवोंका श्रीचैतन्यके चरणाश्रयसे ही मङ्गल :- वैगुण्यकीटकलिनः पैशुन्य-व्रणपीड़ितः। दैन्यार्णवे निमग्नोऽहं चैतन्य-वैद्यमाश्रये॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बुरे कर्मफलरूपी कीटसे दंशित, ईर्ष्यारूपी फोड़ेसे पीड़ित और दैन्य समुद्रमें निमग्न होकर मैंने चैतन्यरूपी वैद्यका आश्रय किया है॥ 1 ॥ अनुभाष्य— वैगुण्यकीटकलिनः (वैगुण्यं कर्म-विपाकः तद्रूपेण कीटेन कलिनः दष्टः) पैशुन्यव्रणपीड़ितः (पैशुन्यं खलत्वं तद्रूपेण व्रणेन क्षतेन पीड़ितः) दैन्यार्णवे (दैन्यसमुद्रे) निमग्नः अहं चैतन्यवैद्यं (महाप्रभुरूपं चिकित्सकम्) आश्रये (आश्रितोऽस्मि)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ जय जय शचीसुत श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय कृपामय नित्यानन्द धन्य॥ 2 ॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। कृपामय श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जयाद्वैत कृपासिन्धु जय भक्तगण। जय स्वरूप, गदाधर, रूप, सनातन॥ 3 ॥ अनुवाद—कृपासिन्धु श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो, समस्त भक्तोंकी जय हो। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुकी जय हो॥ 3 ॥ महाप्रभु और श्रीप्रद्युम्नमिश्रका संवाद; श्रीमिश्रके द्वारा महाप्रभुसे कृष्णकथा श्रवण करनेके लिये दीनतापूर्वक प्रार्थना :- एकदिन प्रद्युम्न-मिश्र प्रभुर चरणे। दण्डवत् करि' किछु करे निवेदने॥ 4 ॥ "शुन, प्रभु, मुञि दीन गृहस्थ अधम ! कोन भाग्ये पाञाछौँ तोमार दुर्लभ चरण॥ 5 ॥ कृष्णकथा शुनिवारे मोर इच्छा हय। कृष्णकथा कह मोरे हञा सदय॥" 6 ॥ अनुवाद—एक दिन श्रीप्रद्युम्न-मिश्रने महाप्रभुके चरणोंमें दण्डवत् करके उनसे निवेदन किया,—"हे महाप्रभो ! मेरा निवेदन सुनिये। मैं एक दीन-हीन अधम गृहस्थ हूँ! मुझे किसी सौभाग्यसे आपके दुर्लभ चरणकमलोंके आश्रयकी प्राप्ति हुई है। मेरी श्रीकृष्णकथाको सुननेकी अभिलाषा है, आप मुझे श्रीकृष्णकथा सुनाकर मुझपर दया करें॥" 4-6 ॥