श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें138 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/237-239 ] कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुसे श्रीसनातन गोस्वामीके पुनः मिलनेके विषयमें बतलाया है जिसके श्रवणसे मैंने महाप्रभुके हृदयके अभिप्रायको जाना है॥237॥ निरन्तर अनुशीलनरूप मन्थनके फलसे चैतन्यचरितसिन्धुसे कृष्ण-प्रीति रूपी अमृतकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र एइ-इक्षुदण्ड-सम। चर्वण करिते हय रस-आस्वादन॥238॥ अनुवाद-यह श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र गन्नेके समान है, इसका चर्वण करनेसे रसका आस्वादन होता है॥238॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥239॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे पुनः सनातनसङ्गोत्सवो नाम चतुर्थः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥239॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें पुनः सनातनसङ्ग-उत्सव नामक चौथे अध्यायका अनुवाद समाप्त।