भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2155, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2155

138 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/237-239 ] कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुसे श्रीसनातन गोस्वामीके पुनः मिलनेके विषयमें बतलाया है जिसके श्रवणसे मैंने महाप्रभुके हृदयके अभिप्रायको जाना है॥237॥ निरन्तर अनुशीलनरूप मन्थनके फलसे चैतन्यचरितसिन्धुसे कृष्ण-प्रीति रूपी अमृतकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र एइ-इक्षुदण्ड-सम। चर्वण करिते हय रस-आस्वादन॥238॥ अनुवाद-यह श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र गन्नेके समान है, इसका चर्वण करनेसे रसका आस्वादन होता है॥238॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥239॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे पुनः सनातनसङ्गोत्सवो नाम चतुर्थः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥239॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें पुनः सनातनसङ्ग-उत्सव नामक चौथे अध्यायका अनुवाद समाप्त।