श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें118 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/103-112 ] हैं, क्योंकि वे एक ही साथ स्वयं दीक्षित ब्राह्मणके रूपमें शुद्धनाम ग्रहण करके 'आचार्य' और उच्चकीर्तन करके समस्त जगतवासियोंको नाम-यज्ञमें दीक्षित करवाकर 'प्रचारक' हैं—यही उनका 'आचार और प्रचार' है॥ 103 ॥ श्रीहरिदास और श्रीसनातनका परस्पर कृष्णकथाकी चर्चामें समय व्यतीत करना :- एइमत दुइजन नाना-कथा-रङ्गे। कृष्णकथा आस्वाद्य रहिं एकसङ्गे ॥ 104 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामी एकसाथ रहकर अनेक प्रकारकी कृष्णकथाके आनन्दका आस्वादन करते ॥ 104 ॥ रथयात्राके समय गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन और दर्शन :- यात्राकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण। पूर्ववत् कैला सबे रथयात्रा दरशन ॥ 105 ॥ अनुवाद—रथयात्राके समय गौड़देशके समस्त भक्त आये तथा पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभीने रथयात्राके दर्शन किये ॥ 105 ॥ रथके आगे महाप्रभुके नृत्यको देखकर श्रीसनातनका विस्मय :- रथ-अग्रे प्रभु तैछे करिला नर्त्तन। देखिं चमत्कार हैल सनातनेर मन ॥ 106 ॥ अनुवाद—रथके सामने महाप्रभुने पहलेकी भाँति नृत्य किया। उसे देखकर श्रीसनातन गोस्वामीके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 106 ॥ चातुर्मास्यके समय गौड़ीय और उड़िया भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :- वर्षार चारिमास रहिला सब निज-भक्तगणे। सबा-सङ्गे प्रभु मिलाइला सनातने ॥ 107 ॥ अनुवाद—वर्षा ऋतुके चार मास तक गौड़देशसे आये सभी भक्त श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीको उन सब भक्तोंसे मिलवाया ॥ 107 ॥ अद्वैत, नित्यानन्द, श्रीवास, वक्रेश्वर। वासुदेव, मुरारि, राघव, दामोदर ॥ 108 ॥ पुरी, भारती, स्वरूप, पण्डित-गदाधर । सार्वभौम, रामानन्द, जगदानन्द, शङ्कर ॥ 109 ॥ काशीश्वर, गोविन्दादि यत भक्तगण। सबा-सने सनातनेर कराइला मिलन ॥ 110 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवास पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीराघव पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीगोविन्द आदि जितने भक्त थे, महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीकी उन सबसे भेंट करवायी ॥ 108-110 ॥ श्रीसनातन सभीकी ही प्रीतिके पात्र :- यथायोग्य सबार कैला चरण वन्दन। ताँरे कराइला सबार कृपार भाजन ॥ 111 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने यथायोग्य सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुकी कृपाके कारण श्रीसनातन उन सभीकी कृपाके पात्र बन गये ॥ 111 ॥ अपने गुणोंके द्वारा विष्णु-वैष्णवके स्नेह-प्रीतिके पात्र :- सद्गुणे, पाण्डित्ये, सबार प्रिय-सनातन। यथायोग्य कृपा-मैत्री-गौरव-भाजन ॥ 112 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी अपने सद्गुणों तथा पाण्डित्यके कारण सबके प्रिय थे। वे महाप्रभुके भक्तोंमें-से यथायोग्य किसीकी कृपा, किसीकी मित्रता और अन्य किसीके गौरवके पात्र थे ॥ 112 ॥