भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2134

[ 4/95-103 चौथा अध्याय 117 अनुभाष्य-पूर्वोक्त (इसी अध्यायकी) 82-83 संख्याकी उक्तिके तात्पर्यके लिये 79-81 संख्या देखें ॥95॥ सफलता अथवा सिद्धि-श्रीकृष्णकी इच्छाकी अनुगामी दासी :- ये कराइते चाहे ईश्वर, सेइ सिद्ध हय। तोमार सौभाग्य एइ कहिलुँ निश्चय ॥96॥ श्रीसनातनके माध्यमसे महाप्रभुके द्वारा मुख्यतः शुद्धभक्ति और वैष्णव स्मृतिके सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-आचारका संस्थापन :- भक्तिसिद्धान्त, शास्त्र-आचार-निर्णय। तोमाद्वारे कराइबेन, बुझिलुँ आशय ॥97॥ श्रीहरिदासका स्वाभाविक वैष्णवोचित दैन्य और हृदयकी व्यथाको बतलाना :- आमार एइ देह प्रभुर कार्ये ना लागिल। भारत-भूमिते जन्मि' एइ देह व्यर्थ हैल॥"98॥ अनुवाद-भगवान् जो भी कार्य करवाना चाहते हैं, वह कार्य अवश्य ही सिद्ध होता है। यह तुम्हारा सौभाग्य ही है, मैं इस बातको निश्चित रूपसे कह रहा हूँ। मुझे महाप्रभुके कहनेका यही आशय समझ आता है कि वे भक्ति-सिद्धान्त और शास्त्रीय-आचरणके निर्णयको तुम्हारे द्वारा प्रकाशित करवाना चाहते हैं। मेरा यह शरीर महाप्रभुके किसी भी कार्यमें नहीं लग सका, इसलिये भारत-भूमिमें जन्म ग्रहण करनेपर भी मेरा यह शरीर धारण करना व्यर्थ हो गया है॥"96-98॥ अनुभाष्य-'भारत-भूमिते,'-आदिलीला 9/41 संख्या और भाः 5/19/19-27 श्लोक देखें ॥98॥ श्रीसनातनके द्वारा श्रीहरिदासकी स्तुति :- सनातन कहे,-"तोमा-सम केबा आछे आन? महाप्रभुर गणे तुमि-महाभाग्यवान् ! ॥99॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,-"हे श्रीहरिदास ठाकुर ! आपके समान अन्य कौन है? आप महाप्रभुके गणोंमें-से एक हैं, इसलिये आप महाभाग्यवान् हैं !99॥ शुद्धकृष्णनाम कीर्तन अथवा प्रचार ही आचार्यरूपी भगवदवतारका अपना कार्य, कीर्तन-आचार्य श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुका नामका प्रचार :- अवतार-कार्य प्रभुर-नाम-प्रचारे। सेइ निज-कार्य प्रभु करेन तोमार द्वारे ॥100॥ अनुवाद-महाप्रभुके अवतरित होनेका मुख्य कार्य नामका प्रचार ही है, अपना वही कार्य महाप्रभु आपके द्वारा ही करवा रहे हैं॥100॥ अनुभाष्य-निजकार्य जो शुद्धकृष्णनामका प्रचार है, उसे महाप्रभुने श्रीहरिदासके द्वारा सम्पादित किया ॥100॥ ठाकुर श्रीहरिदासका आचार और प्रचार :- प्रत्यह कर तिन लक्ष नाम-सङ्कीर्त्तन। सबार आगे कर नामेर महिमा कथन ॥101॥ अनुवाद-आप प्रतिदिन तीन लाख नाम-सङ्कीर्तन करते हैं और सभीको नामकी महिमा बतलाते हैं॥101॥ असुष्ठु अथवा असम्पूर्ण आचार-प्रचार :- आपने आचरे केह, ना करे प्रचार। प्रचार करेन केह, ना करेन आचार ॥102॥ अनुवाद-कई व्यक्ति स्वयं तो आचरण करते हैं, किन्तु प्रचार नहीं करते। अन्य कई व्यक्ति प्रचार तो करते हैं, किन्तु आचरण नहीं करते॥102॥ कृष्णेन्द्रिय प्रीतियुक्त चेष्टामय यथार्थ आचार्यका ही शुद्धनाम-भक्ति प्रचारमें अधिकार; चारों प्रकारके वर्णाश्रमके व्यक्ति तथा जगत्के गुरु वैष्णवाचार्य परमहंस श्रीहरिदास ठाकुरका आदर्श जीवन :- 'आचार', 'प्रचार'-नामेर करह 'दुइ' कार्य। तुमि-सर्वगुरु, तुमि-जगतेर आर्य ॥"103॥ अनुवाद-आप नामका 'आचार' और 'प्रचार'-इन दोनों कार्योंको करते हैं। आप सभीके गुरु तथा जगत्के आर्य अर्थात् श्रेष्ठ भक्त हैं॥"103॥ अनुभाष्य-श्रीहरिदास ठाकुर-सर्वमान्य जगद्गुरु

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