श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें116 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/84-95 ] कि वह कैसे नाचती-गाती है! उसी प्रकार आप जिसे जैसे नचाते हैं, वह वैसे ही नृत्य करता है। किन्तु वह कैसे नाचता है, उसे कौन नचाता है, वह इस बातको नहीं जानता॥"84-86॥ श्रीहरिदासको साक्षी मानकर महाप्रभुके द्वारा उनपर अपने निजी कहकर स्वीकार किये गये श्रीसनातनकी देहके रक्षणका भार-अर्पण :- हरिदासे कहे प्रभु,—"शुन, हरिदास। परेरे द्रव्य इँहो चाहेन करिते विनाश॥ 87 ॥ परेरे स्थाप्य द्रव्य केह ना खाय, बिलाय। निषेधिह इँहारे,—येन ना करे अन्याय॥"88॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरसे कहा,—"हे हरिदास, सुनो! यह सनातन दूसरेकी वस्तुको विनष्ट करना चाहता है। किसी दूसरेकी धरोहरको न तो स्वयं ही भोग करना चाहिये और न ही बाँटना चाहिये। इसलिये इसे ऐसे अन्यायपूर्ण कार्य करनेसे आप निषेध करना॥"87-88॥ अनुभाष्य—'स्थाप्य',—रक्षणीय; 'खाय',—स्वयं ही भोग करे; 'बिलाय',—वितरण करे, 'अन्याय'—मुझमें अर्थात् कृष्णमें समर्पित इसकी देहका विनाश॥ 88॥ श्रीहरिदासके द्वारा जीवोंको शिक्षा,—अधोक्षज महाप्रभुकी अप्राकृत हृदयगत कृष्णेन्द्रिय-तर्पण-इच्छाके आनुगत्यमें ही बद्धजीवके द्वारा फल्गु-अहङ्कारत्यागकी कर्त्तव्यता :- हरिदास कहे,—"मिथ्या अभिमान करि। तोमार गम्भीर हृदय बुझिते ना पारि॥ 89 ॥ कोन् कोन् कार्य तुमि कर कोन् द्वारे। तुमि ना जानाइले केह जानिते ना पारे॥ 90 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीसनातनके महाप्रभु-कृपा-प्राप्ति रूपी सौभाग्यका वर्णन करके महाप्रभुकी स्तुति :- एतादृश तुमि इँहारे करियाछ अङ्गीकार। एत सौभाग्य इँहा ना हय काहार॥"91॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"हम तो मिथ्या अभिमान करते हैं। वास्तवमें हम आपके हृदयके गम्भीर भावोंको नहीं समझ सकते। कौन-कौनसे कार्य आप किसके द्वारा करते हैं, उसे आपके द्वारा जनाये बिना कोई नहीं जान सकता। ऐसे गम्भीर हृदयवाले आपने इनको (श्रीसनातनको) अङ्गीकार किया है, इसलिये इनका जितना सौभाग्य है, उतना सौभाग्य अन्य किसीका भी नहीं है॥"89-91॥ दोनोंको आलिङ्गन करनेके बाद महाप्रभुका प्रस्थान :- तबे महाप्रभु करि' दुँहारे आलिङ्गन। 'मध्याह्न' करिते उठि' करिला गमन॥ 92 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातनको आलिङ्गन किया और अपने मध्याह्न-कृत्य करनेके लिये उठकर चल दिये॥ 92 ॥ श्रीहरिदासके द्वारा श्रीसनातनके सौभाग्यका वर्णन :- सनातने कहे हरिदास करि' आलिङ्गन। "तोमार भागयेर सीमा ना याय कथन॥ 93 ॥ श्रीसनातनकी देह महाप्रभुका ही अपना कहकर स्वीकार किया गया धन :- तोमार देह कहेन प्रभु 'मोर निज-धन'। तोमा-सम भाग्यवान् नाहि कोन जन॥ 94 ॥ मथुरामण्डलमें श्रीसनातनकी देहके द्वारा महाप्रभुके चार प्रकारके मनोऽभीष्ट-सम्पादन :- निज-देहे ये कार्य ना पारेन करिते। से कार्य कराइबे तोमा, सेह मथुराते॥ 95 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने श्रीसनातन गोस्वामीको आलिङ्गन करते हुए कहा,—"तुम्हारे भाग्यकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा सकता। तुम्हारे शरीरको महाप्रभु 'मेरी निजी-सम्पत्ति' कहते हैं। तुम्हारे समान भाग्यवान् अन्य कोई व्यक्ति नहीं है। महाप्रभु अपनी देहके द्वारा जिन कार्योंको नहीं कर पा रहे, वे कार्य तुम्हारे द्वारा करवायेंगे और इन कार्योंको वे मथुरामें करवायेंगे॥ 93-95॥