भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2132

[ 4/78-86 चौथा अध्याय 115 अपने बहुतसे प्रयोजन सिद्ध करूँगा ॥ 78 ॥ मथुरामण्डलमें श्रीसनातनके माध्यमसे महाप्रभुके द्वारा (1) भक्त और भगवद्-तत्त्व अथवा अभिधेय, सम्बन्ध और प्रयोजन-तत्त्वका प्रकाश, (2) वैष्णव-स्मृति- सङ्कलनके द्वारा वैष्णव-सदाचार-प्रवर्त्तन, (3) मठ- मन्दिरादिमें श्रीकृष्णविग्रह अर्चनरूपी वैधीभक्ति, मनमें राग अथवा प्रेमसेवाके आदर्शका प्रदर्शन और (4) लुप्त-तीर्थोंका उद्धार और युक्तवैराग्यके साथ शुद्धभक्तिमय जीवन दिखलाकर शिक्षा :- भक्त-भक्ति-कृष्णप्रेम-तत्त्वेर निर्धार। वैष्णवेर कृत्य आर वैष्णव-आचार ॥ 79 ॥ कृष्णभक्ति, कृष्णप्रेमसेवा-प्रवर्त्तन। लुप्ततीर्थ-उद्धार आर वैराग्य-शिक्षण ॥ 80 ॥ निज-प्रियस्थान मोर-मथुरा-वृन्दावन। ताँहा एत धर्म चाहि करिते प्रचारण ॥ 81 ॥ अनुवाद—"मैं भक्त, भक्ति और कृष्णप्रेम-तत्त्वका निर्धारण, वैष्णवोंके कृत्य तथा वैष्णव-आचार, कृष्णभक्ति, कृष्णकी प्रेमपूर्वककी जानेवाली सेवाका प्रवर्त्तन, लुप्त तीर्थोंका उद्धार एवं वैराग्यकी शिक्षा—इन सभी तत्त्वोंका अपने प्रिय स्थान मथुरा-वृन्दावनमें प्रचार करना चाहता हूँ॥ 79-81 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा सर्वप्रथम श्रीबृहद्भागवतामृतकी रचना करवाकर भक्त-भक्ति- कृष्णप्रेमतत्त्वको निर्धारित किया है; दूसरा, श्रीहरिभक्तिविलास संग्रह करवाकर वैष्णवोंके कृत्य और वैष्णवोंके आचारको निर्धारित किया है; तीसरा, श्रीसनातन गोस्वामीके अद्भुत अनुष्ठानके द्वारा श्रीवृन्दावनमें श्रीविग्रहोंकी सेवा एवं आदर्श भजनानन्दमय चरित्रके द्वारा मानसमें व्रज-भजनका प्रवर्त्तन करवाया है; चौथा, कुण्डादि लुप्त तीर्थसमूहका उद्धार एवं उनके वैराग्ययुक्त भक्तिरसमय आदर्श भक्तजीवनके द्वारा शुद्धभक्तोंके अनुकरणीय विषयोंसे सुदूर अवस्थित विरक्त जीवन-यापनकी शिक्षा दी है। श्रीमथुरा और वृन्दावन श्रीगौरसुन्दरकी अत्यन्त प्रियभूमि है, श्रीसनातनको उस भूमिमें अवस्थान कराकर महाप्रभुने उनके द्वारा पूर्वोक्त धर्मसमूहका प्रचार करनेकी अभिलाषा की॥ 79-81 ॥ माताकी आज्ञासे स्वयं क्षेत्रमण्डलमें रहकर अपने अभिन्न प्रकाश-विग्रह चिद्विलास श्रीसनातनके रूपमें मथुरामण्डलमें पूर्वोक्त चार प्रकारकी मनोऽभीष्ट कृष्णसेवाका सम्पादन :- मातार आज्ञाय आमि बसि नीलाचले। ताँहा 'धर्म' शिखाइते नाहि निज-बले ॥ 82 ॥ अनुवाद—मैं माताकी आज्ञासे इस जगन्नाथपुरीमें रह रहा हूँ। इसलिये मैं मथुरा-वृन्दावनमें जाकर वहाँके लोगोंको धाममें रहकर प्रेमधर्मका पालन कैसे किया जाय, यह नहीं सिखा सकता ॥ 82 ॥ अनुभाष्य— 'ताँहा',—मथुरामण्डलमें ॥ 82 ॥ एत सब कर्म आमि ये-देहे करिमु। ताहा छाड़िते चाह तुमि, केमने सहिमु ? ?”83 ॥ अनुवाद—इन सब कार्योंको मैं जिस देहके द्वारा करना चाहता हूँ, तुम मेरी उसी देहको त्यागना चाहते हो। मैं इसे कैसे सहन कर सकता हूँ?”83 ॥ श्रीसनातनके द्वारा स्वयंको यन्त्रके रूपमें और महाप्रभुको यन्त्री जानकर महाप्रभुकी स्तुति :- तबे सनातन कहे,–“तोमाके नमस्कारे। तोमार गम्भीर हृदय के बुझिते पारे ? ?84 ॥ काष्ठेर पुतली येन कुहके नाचाय। आपने ना जाने, पुतली किबा नाचे गाय ! !85 ॥ यारे यैछे नाचाओ, से तैछे करे नर्त्तने। कैछे नाचे, केबा नाचाय, सेह नाहि जाने ॥”86 ॥ अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपके हृदयके गम्भीर भावोंको कौन समझ सकता है? मदारी जैसे काठकी पुतलीको नचाता है, तो पुतली स्वयं यह नहीं जानती